केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
पद-भाष्य
विशेषः। यदा बोधो नश्यति, तदा | वह बोधक्रियारूप विशेषणसे युक्त
| होता है और जब उसका नाश हो
नष्टबोधो द्रव्यमात्रं निर्विशेषः। | जाता है तो वह निर्विशेष द्रव्यमात्र
तत्रैवं सति विक्रियात्मकः साव- | रह जाता है। ऐसा माननेसे तो
| वह विकारी, सावयव, अनित्य और
यवोजनित्योऽशुद्ध इत्यादयो दोषा | अशुद्ध निश्चित होता है, और उसके
न परिहर्तुं शक्यन्ते । | इन दोषोंका किसी प्रकार परिहार
| नहीं किया जा सकता ।
यदपि काणादानाम् आत्म- | तथा वैशेषिक मतावलम्बियोंका
कणादमत- मनः संयोगजो बोध | जो मत है कि 'आत्मा और मनके
समीक्षा | संयोगसे उत्पन्न होनेवाला बोध
आत्मनि समवैति; अतः | आत्मामें समवाय-सम्बन्धसे रहता
आत्मनि बोद्धृत्वम्, न तु | है, इसीसे आत्मामें बोद्धृत्व है,
विक्रियात्मक आत्मा; द्रव्य- | वस्तुतः आत्मा विकारी नहीं है,
मात्रस्तु भवति घट इव रागसम- | वह तो नीलपीतादि वर्णोंके समवायी
| घटके समान केवल द्रव्यमात्र है'
वायी; अस्मिन् पक्षेऽप्यचेतनं | —सो इस पक्षमें भी ब्रह्म अचेतन
द्रव्यमात्रं ब्रह्मेति "विज्ञान- | द्रव्यमात्र सिद्ध होता है और "ब्रह्म
मानन्दं ब्रह्म" (बृ०उ० ३।९।२८) | विज्ञान एवं आनन्दस्वरूप है"
वाक्य-भाष्य
आत्मविज्ञानापेक्षम् । यदि हि | प्राप्ति आत्मविज्ञानकी अपेक्षा रखने-
विद्योत्पाद्यममृतत्वं स्यादनित्यं | वाली है। यदि अमृतत्व विद्यासे उत्पन्न
भवेत्कर्मकार्यवत् । अतो न | किया जाने योग्य होता तो कर्मफलके
| समान अनित्य हो जाता। इसलिये वह
विद्योत्पाद्यम् । | विद्यासे उत्पाद्य नहीं है।
यदि चात्मनैवामृतत्वं विन्दते | यदि कहो कि जब अमृतत्व स्वतः
| ही मिल जाता है तो विद्या उसमें क्या
किं पुन्र्विद्यया क्रियत इत्युच्यते । | करती है, तो इसमें हमें यह कहना है