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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 152 में से

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पृष्ठ 84

७६ केनोपनिषद् [ खण्ड २

पद-भाष्य
यदा पुनर्बोधक्रियाकर्तेति बोध- | जिस प्रकार, जो वृक्षकी
क्रियालक्षणेन तत्कर्तारं विजाना- | शाखाओंको चलायमान करता है
| उसे वायु कहते हैं उसी प्रकार—
तीति बोधलक्षणेन विदितं प्रति- | जिस समय 'प्रतिबोधविदितम्'
| इसका ऐसा अर्थ किया जाता है
बोधविदितमिति व्याख्यायते, | कि आत्मा बोधक्रियाका कर्ता है;
| अतः बोधक्रियारूप लिङ्गसे उसके
यथा यो वृक्षशाखाश्चालयति स | कर्ताको जानता है, इसलिये बोधरूप-
| से विदित होनेके कारण वह
वायुरिति तद्वत्; तदा बोधक्रिया- | 'प्रतिबोधविदितम्' कहलाता है
| उस समय—आत्मा बोधक्रियारूप
शक्तिमानात्मा द्रव्यम्, न बोध- | शक्तिसे युक्त एक द्रव्य सिद्ध होता है,
| साक्षात् बोधस्वरूप ही सिद्ध नहीं
स्वरूप एव । बोधस्तु जायते | होता । बोध ( बुद्धिगत प्रतीति )
विनश्यति च । यदा बोधो | तो उत्पन्न होता है और नष्ट भी
| हो जाता है। अतः जिस समय
जायते, तदा बोधक्रियया स- | बोध उत्पन्न होता है उस समय तो
वाक्य-भाष्य
इत्यात्मविज्ञानममृतत्वनिमित्तम् | मृत्युका आरम्भ होता है, अतः
इति युक्तं हेतुवचनममृतत्वं हि | आत्मविज्ञान अमरत्वका हेतु है;
| इसलिये 'अमृतत्वं हि विन्दते' यह
विन्दत इति । | हेतुवचन ठीक ही है।
आत्मज्ञानेन किममृतत्वमु- | पूर्व०-क्या आत्मज्ञानसे अमरत्व
त्पाद्यते ? | उत्पन्न किया जाता है ?
न। | सिद्धान्ती-नहीं।
कथं तर्हि ? | पूर्व०-तब कैसे ?
आत्मना विन्दते स्वेनैव नि- | सिद्धान्ती-अमरत्व तो आत्मासे—
| अपने नित्यात्मस्वभावसे ही प्राप्त करते
त्यात्मस्वभावेनामृतत्वं विन्दते । | हैं, किसीके आश्रयसे नहीं। 'विन्दते'
नालम्बनपूर्वकम् । विन्दत इति | इससे यह समझना चाहिये कि उसकी