केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
यद्विदितं तदल्पं मर्त्यं दुःखा- | जो वस्तु विदित होती है वह
[ब्रह्मण] त्मकं चेति हेयम् । | अल्प, मरणशील एवं दुःखमयी होती
[आत्मभिन्नत्व-] तस्माद्विदितादन्यद्ब्रह्म | है, इसलिये वह हेय (त्याज्य) है ।
[प्रतिपादनम्] इत्युक्ते त्वहेयत्वमुक्तं | ब्रह्म उस विदित वस्तुसे भिन्न है—
स्यात् । तथा अविदितादधि | ऐसा कहनेसे उसका अहेयत्व
इत्युक्तेऽनुपादेयत्वमुक्तं स्यात् । | बतलाया गया । तथा ‘वह अविदित-
| से भी ऊपर है' ऐसा कहनेपर उसका
| अनुपादेयत्व प्रतिपादन किया गया ।
वाक्य-भाष्य
“एतं वै तमात्मानं विदित्वा” | “उस इस आत्माको निश्चयपूर्वक जान-
(बृ० उ० ३ । ५ । १) इति च । | कर” आदि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ।
सर्वत्र श्रुतिष्वात्मविज्ञाने विज्ञा- | श्रुतियोंमें आत्माके ज्ञानके लिये सर्वत्र
नान्तरापेक्षत्वं दृश्यते । तस्मात् | ही विज्ञानान्तरकी अपेक्षा देखी जाती
प्रत्यक्षश्रुतिविरोध इति चेत् । | है । इसलिये [ उपर्युक्त कथनका ]
न; कस्मात् ? अन्यो हि स | प्रत्यक्ष ही श्रुतिसे विरोध है ।
आत्मा बुद्ध्यादिकार्यकरणसङ्घा- | सिद्धान्ती-ऐसा कहना ठीक नहीं ।
ताभिमानसन्तानाविच्छेद लक्षणो- | क्यों ? क्योंकि बुद्धि आदि कार्य और
ऽविवेकात्मको बुद्धयवभासप्रधानः | करणके संघातमें जो अभिमान है उसकी
चक्षुरादिकरणो नित्यचित्स्वरू- | परम्पराका विच्छेद न होना ही जिसका
पात्मान्तःसारो यत्रानित्यं विज्ञानम् | लक्षण है, नित्य चित्स्वरूप आत्मा ही
अवभासते । बौद्धप्रत्ययानाम् आ- | जिसका आन्तरिक सार है और जिसमें
विर्भावतिरोभावधर्मकत्वात्तद्धर्म- | अनित्य विज्ञानका अवभास हुआ
तयैव विलक्षणमपि चावभासते । | करता है यह अविवेकात्मक, चिदाभास-
| प्रधान तथा चक्षु आदि करणोंवाला
| आत्मा ( जीवात्मा ) [ शुद्ध चेतनसे ]
| भिन्न ही है । बौद्ध प्रतीतियोंका
| आविर्भाव-तिरोभाव उसका धर्म है;
| अतः अपने उस धर्मके कारण वह उस-
| से पृथक् दिखलायी भी देता है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
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पद-भाष्य
कार्यार्थं हि कारणमन्यदन्येन | किसी कार्यके लिये ही किसी अन्य
उपादीयते । अतश्च न वेदितुः | पुरुषद्वारा एक अन्य कारण यानी साधनको ग्रहण किया जाता है; अतः
अन्यस्मै प्रयोजनायान्यदुपादेयं | वेत्ता (आत्मा) को किसी अन्य प्रयोजनके लिये कोई अन्य साधन
भवतीति । एवं विदिताविदिता- | उपादेय नहीं है । इस प्रकार वह विदित और अविदित दोनोंसे भिन्न
भ्यामन्यदिति हेयोपादेय- | है—इस कथनद्वारा हेय और उपादेयका प्रतिषेध कर दिया जाने-
प्रतिषेधेन स्वात्मनोऽनन्यत्वाद् | से [ ज्ञेय वस्तु ] अपने आत्मासे अभिन्न सिद्ध होनेके कारण शिष्यकी
ब्रह्मविषया जिज्ञासा शिष्यस्य | ब्रह्मविषयक जिज्ञासा पूर्ण हो जाती
वाक्य-भाष्य
अन्तःकरणस्य मनसोऽपि | [ किन्तु वह शुद्ध चेतन तो ]
मनोऽन्तर्गतत्वात्सर्वान्तरश्रुतेः । | 'आत्मा सर्वान्तर है' ऐसा बतलाने-वाली श्रुतिके अनुसार अन्तःकरण
अन्तर्गतेन नित्यविज्ञानस्वरूपेण | यानी मनका भी मन है। उस अन्तर्गत,
आकाशवदप्रचलितात्मनान्तर्गर्भ- | नित्यविज्ञानस्वरूप, आकाशके समान
भूतेन बाह्यो बुद्ध्यात्मा तद्विलक्षणः | अविचल और अन्तर्गर्भभूत चिदात्मासे बाह्य और विलक्षण अनित्य विज्ञानवान्
अर्चिर्भिरिवाग्निः प्रत्ययैरावि- | विज्ञानात्मा ही, आविर्भाव-तिरोभाव
र्भावतिरोभावधर्मकैर्विज्ञानाभास- | धर्मवाले विज्ञानाभासरूप अनित्य
रूपैरनित्यविज्ञान आत्मा सुखी | प्रत्ययोंके कारण लौकिक पुरुषोंद्वारा आत्मा सुखी-दुःखी है—ऐसा माना
दुःखीत्यभ्युपगतो लौकिकैः । | जाता है, जैसे ज्वालाओंके कारण अग्नि ।
अतोऽन्यो नित्यविज्ञानस्वरूपादा- | अतः यह नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मा-
त्मनः। तत्र हि विज्ञानापेक्षा विप- | से भिन्न है । उसीमें विज्ञानकी अपेक्षा
रीतज्ञानत्वं चोपपद्यते न पुन- | तथा विपरीत ज्ञानत्वकी सम्भावना है—
र्नित्यविज्ञाने । | नित्यविज्ञानस्वरूप चिदात्मामें नहीं ।
४० केनोपनिषद् [ खण्ड १
४० केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
निर्वर्तिता स्यात् । न ह्यन्यस्य | है, क्योंकि अपने आत्मासे भिन्न
स्वात्मनो विदिताविदिताभ्याम् | किसी और वस्तुका विदित और
अन्यत्वं वस्तुनः सम्भवतीत्यात्मा | अविदित दोनोंसे भिन्न होना सम्भव
ब्रह्मेत्येष वाक्यार्थः; “अयमात्मा | नहीं है । अतः आत्मा ही ब्रह्म
ब्रह्म” (माण्डू० २) “य आत्मा- | है—यह इस वाक्यका अर्थ है ।
पहतपाप्मा,” (छा० उ० ८।७।१) | यही बात “यह आत्मा ब्रह्म है”
| “जो आत्मा पापसे रहित है”
वाक्य-भाष्य
तत्त्वमसीति बोधोपदेशो न | पूर्व०—[ ऐसा माननेसे तो ]
उपपद्यत इति चेत् । “आत्मानमे- | “तत्त्वमसि” ( यह ब्रह्म तू है) यह
वावेत्” (बृ० उ० १।४।१०) | उपदेश भी नहीं बन सकता और न
इत्येवमादीनि च नित्यबोधात्म- | “अपने आत्माको ही जाना [ कि मैं
कत्वात् । न ह्यादित्योऽन्येन | ब्रह्म हूँ ]” इत्यादि वाक्य ही सार्थक
प्रकाश्यतेऽतस्तदर्थबोधोपदेशः | हो सकते हैं—क्योंकि ब्रह्म तो नित्य-
अनर्थक इति चेत् । | बोधस्वरूप है । सूर्य दूसरेसे प्रकाशित
| कभी नहीं हो सकता । इसलिये
| आत्माके विषयमें ज्ञानका उपदेश
| करना व्यर्थ ही होगा ।
न; लोकाध्यारोपापोहार्थत्वात् । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि
बोधोपदेशस्य सर्वात्मनि हि नित्य- | वह उपदेश लोगोंद्वारा किये हुए
अध्यास- विज्ञाने बुद्ध्याद्यनित्य- | अध्यारोपकी निवृत्तिके लिये है ।
निरासार्थत्वम् धर्मा लोकैरध्या- | लोगोंने आत्मतत्त्वके अज्ञानवश उस
रोपिता आत्माविवेकतस्तदपो- | नित्यविज्ञानस्वरूप सर्वात्मापर बुद्धि
हार्था बोधोपदेशो बोधात्मनः । | आदि अनित्य धर्मोंका आरोप किया
तत्र च बोधाबोधौ समञ्जसौ, | हुआ है । उसकी निवृत्तिके लिये ही
| उस ज्ञानस्वरूपके ज्ञानका उपदेश
| किया जाता है ।
| तथा उस बोधस्वरूपमें बोध और
| अबोध समीचीन भी हैं, क्योंकि जैसे
अन्यनिमित्तत्वादुदक इवौष्ण्यम् | अग्निके कारण जलमें उष्णता रहती है
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
पद-भाष्य
“यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (बृ० | “जो साक्षात् अपरोक्षरूपसे ब्रह्म ही
उ० ३।४।१) “य आत्मा | है” “जो आत्मा सर्वान्तर है” इत्यादि
सर्वान्तरः” (बृ० उ० ३।४।१) | अन्य श्रुतियोंसे भी प्रमाणित
इत्यादिश्रुत्यन्तरेभ्यश्चेति । | होती है ।
वाक्य-भाष्य
अह्निमित्तम्, रात्रयहनी इवादित्य- | तथा सूर्यके कारण दिन और रात
निमित्ते। लोके नित्याचौष्ण्य- | हुआ करते हैं, वैसे ही उनका कारण
| भी अन्य (आरोपित धर्म) ही
प्रकाशावग्न्यादित्ययोरन्यत्रभावा- | है। उष्णता और प्रकाश-ये अग्नि
| और सूर्यके तो नित्य-धर्म हैं, किन्तु
भावयोर्निमित्तत्वाद नित्याविव | लोकमें अन्यत्र अपने भाव और
| अभावके कारण वे अनित्यवत् उपचरित
उपचर्येते । धक्ष्यत्यग्निः प्रकाश- | होते हैं; जैसे- 'अग्नि जला देगा',
यिष्यति सवितेति तद्वत् । एवं | 'सूर्य प्रकाशित करेगा' इत्यादि
| वाक्योंमें; वैसे ही [आत्माके विषयमें
च सुखदुःखबन्धमोक्षाद्यध्यारोपो | समझना चाहिये]। इस प्रकार लोकका
| जो सुख-दुःख एवं बन्ध-मोक्षरूप
लोकस्य तदपेक्ष्य तत्त्वमस्यात्मा- | अध्यारोप है उसकी अपेक्षासे ही
| 'तत्त्वमसि' 'आत्मानमेवावेत्' इत्यादि
नमेवावेदित्यात्मावबोधोपदेशेन | श्रुतियाँ आत्मज्ञानके उपदेशसे केवल
श्रुतयः केवलमध्यारोपापोहार्थाः। | अध्यारोपकी निवृत्तिके लिये ही हैं।
यथा सवितासौ प्रकाशयति | जिस प्रकार 'यह सूर्य अपने-आपको
| प्रकाशित करता है' [ इस वाक्यसे
आत्मानम् इति | प्रकाशस्वरूप सूर्यमें प्रकाशकर्तृत्वका
ब्रह्मणो विदिता- | तद्वत्, बोधाबोध- | उल्लेख किया जाता है] उसी प्रकार
विदिताभ्या- | कर्तृत्वं च नित्य- | नित्यबोधस्वरूप आत्मामें भी ज्ञान
मन्यत्वम् | बोधात्मनि।तस्मात्- | और अज्ञानका कर्तृत्व माना गया है।
| इसलिये वह अविदित (अज्ञात) से
अन्यदविदितात् । अधिशब्दश्च | भी अन्य है। यहाँ 'अधि' शब्द 'अन्य'
अन्यार्थे । यद्वा यदि यस्याधि | अर्थमें है। अथवा जो जिससे अधि
४२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
४२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
एवं सर्वात्मनः सर्वविशेष- | इस प्रकार सर्वात्मा सर्वविशेष-
रहितस्य चिन्मात्रज्योतिषो | रहित चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप वस्तुका
ब्रह्मत्वप्रतिपादकस्य वाक्यार्थस्य | ब्रह्मत्व प्रतिपादन करनेवाले वाक्यार्थ--
वाक्य-भाष्य
तत्ततोऽन्यत्सामर्थ्यात् । यथाधि | (ऊपर) होता है वह उससे अन्य ही
हुआ करता है, क्योंकि उस शब्दकी
भृत्यादीनां राजा । अव्यक्तमेव | शक्तिसे यही बोध होता है; जिस प्रकार
सेवक आदिसे ऊपर राजा । १ अव्यक्त
अविदितं ततोऽन्यदित्यर्थः । | ही अविदित है, उससे यह आत्मा
पृथक् है—यही इसका तात्पर्य है ।
विदितमविदितं च व्यक्ताव्यक्ते | विदित और अविदित यानी
व्यक्त और अव्यक्त ही क्रमशः कार्य
कार्यकारणत्वेन विकल्पिते | तथा कारणभावसे माने गये हैं उनसे
भिन्न वह ब्रह्म है जो सम्पूर्ण विशेषणोंसे
ताभ्यामन्यद्ब्रह्म विज्ञानस्वरूपं | रहित विज्ञानस्वरूप है—यह इस समस्त
सर्वविशेषप्रत्यस्तमितम् इत्ययं | वाक्यसमुदायका तात्पर्य है । अतः
आत्मस्वरूप होनेके कारण यह त्याज्य
समुदायार्थः । अत एवात्मत्वान्न | या ग्राह्य भी नहीं है । अन्य वस्तु ही
किसी अन्यकी त्याज्य या ग्राह्य हुआ
हेय उपादेयो वा । अन्यद्ध्यन्येन | करती है; स्वयं आप ही अपनी कोई
हेयमुपादेयं वा । न तेनैव | भी वस्तु हेय या उपादेय नहीं होती ।
आत्मा ही ब्रह्म है और सबका
तद्यस्य कस्यचिद्धेयमुपादेयं वा | अन्तर्यामी होनेसे वह किसी इन्द्रियका
विषय भी नहीं है । इसलिये यह किसी
भवति । आत्मा च ब्रह्म सर्वान्त- | अन्यका भी हेय या उपादेय नहीं है ।
रात्मत्वादविषयमतोऽन्यस्यापिन | इसके सिवा आत्मासे भिन्न कोई और
वस्तु न होनेके कारण भी [वह
हेयमुपादेयं वा । अन्याभावाच्च । | हेयोपादेयरहित है]।
१. जिस प्रकार सेवकोंके ऊपर होनेके कारण राजा उनसे भिन्न है उसी प्रकार
अविदितसे ऊपर होनेके कारण आत्मा उससे भिन्न है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
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पद-भाष्य
आचार्योपदेशपरम्परया प्राप्त- | का ‘इति शुश्रुम पूर्वेषाम्’ इत्यादि
त्वमाह—इति शुश्रुमेत्यादि । | वाक्यद्वारा आचार्योंके उपदेशकी
ब्रह्म च एवमाचार्योपदेशपरम्परया | परम्परासे प्राप्त होना दिखलाया गया
एवाधिगन्तव्यं न तर्कतः प्रवचन- | है। इस प्रकार वह ब्रह्म आचार्योंकी
मेधाबहुश्रुततपोयज्ञादिभ्यश्च, इति | उपदेश-परम्परासे ही ज्ञातव्य है,
एवं शुश्रुम श्रुतवन्तो वयं पूर्वे- | तर्कसे अथवा प्रवचन, मेधा, बहुश्रुत,
षाम् आचार्याणां वचनम्; ये | तप एवं यज्ञादिसे नहीं—ऐसा हमने
आचार्याः नः अस्मभ्यं तद् ब्रह्म | पूर्ववर्ती आचार्योंका वचन सुना है।
व्याचचक्षिरे व्याख्यातवन्तः | जिन आचार्योंने हमारे प्रति उस
| ब्रह्मका व्याख्यान—स्पष्ट कथन
वाक्य-भाष्य
इति शुश्रुम पूर्वेषामित्यागमो- | ‘इति शुश्रुम पूर्वेषाम्’ (यह हमने
[हाशिये में: यथोक्तस्य आत्म-] पदेशः । व्याचच- | पूर्व आचार्योंके मुँहसे सुना है) ऐसा
[हाशिये में: प्रामाणिकत्वम्] क्षिरे इत्यस्वातन्त्र्यं | कहकर यह दिखलाते हैं कि यह
तर्कप्रतिषेधार्थम् । ये | [परम्परागत] शास्त्रका उपदेश है।
| हमसे [शास्त्रीय मतका] व्याख्यान
नस्तद्ब्रह्मोक्तवन्तस्ते नित्यमेवागमं | किया था [यह उनकी स्वतन्त्र कल्पना
| नहीं है] ऐसा कहकर जो उन
ब्रह्मप्रतिपादकं व्याख्यातवन्तो | आचार्योंकी परतन्त्रता दिखलायी
| है यह तर्कका प्रतिषेध करनेके लिये है;
न पुनः स्वबुद्धिप्रभवेण तर्केण | जिन्होंने हमसे उस ब्रह्मका वर्णन किया
| था। अर्थात् उन्होंने ब्रह्म का प्रति-
उक्तवन्त इत्यागमपारम्पर्या- | पादन करनेवाले नित्य आगमका ही
| व्याख्यान करके बतलाया था अपनी
विच्छेदं दर्शयति विद्यास्तुतये । | बुद्धिसे ही प्रकट हुए तर्कद्वारा नहीं
| कहा। इस प्रकार ज्ञानकी स्तुतिके
तर्कस्त्वनवस्थितो भ्रान्तोऽपि | लिये शास्त्रपरम्पराका अविच्छेद
| दिखलाया है, क्योंकि तर्क तो
भवतीति ॥ ३ ॥ | अनवस्थित और भ्रमपूर्ण भी
| होता है ॥ ३ ॥
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४४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
४४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
विस्पष्टं कथितवन्तः, तेषाम् | किया था, उन्हींके [वचनसे हमें उसे जानना चाहिये] यह इसका तात्पर्य
इत्यर्थः ॥३॥ | है ॥ ३ ॥
'अन्यदेव तद्विदितादथो | 'वह विदितसे अन्य है और अविदितसे भी ऊपर है' इस वाक्य-
अविदितादधि' इत्यनेन वाक्येन | द्वारा आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसा
आत्मा ब्रह्मेति प्रतिपादिते | प्रतिपादन किये जानेपर श्रोताको
श्रोतुराशङ्का जाता-कथंन्वात्मा | यह शंका हुई—आत्मा किस
ब्रह्म । आत्मा हि नामाधिकृतः | प्रकार ब्रह्म है ? आत्मा तो कर्म
कर्मण्युपासने च संसारी कर्मो- | और उपासनामें अधिकृत संसारी
पासनं वा साधनमनुष्ठाय ब्रह्मादि- | जीवको कहते हैं, जो कर्म या
देवान्स्वर्गं वा प्राप्तुमिच्छति । | उपासनारूप साधनका अनुष्ठान कर
तत्तस्मादन्य उपास्यो विष्णु- | ब्रह्मा आदि देवताओं अथवा स्वर्गको
रीश्वर इन्द्रः प्राणो वा ब्रह्म | प्राप्त करना चाहता है । अतः
भवितुमर्हति, न त्वात्मा; लोक- | उससे भिन्न उसका उपास्य विष्णु,
प्रत्ययविरोधात् । यथान्ये | ईश्वर, इन्द्र अथवा प्राण ही ब्रह्म
तार्किका ईश्वरादन्य आत्मा | होना चाहिये—आत्मा नहीं,
इत्याचक्षते, तथा कर्मिणोऽमुं | क्योंकि यह बात लोक-विश्वासके
यजामुं यजेत्यन्या एव देवता | विरुद्ध है । जिस प्रकार अन्य
उपासते । तस्माद्युक्तं यद्विदित- | तार्किक लोग आत्माको ईश्वरसे
मुपास्यं तद्ब्रह्म भवेत्, ततोऽन्य | भिन्न बतलाते हैं उसी प्रकार कर्म-
उपासक इति । तामेतामाशङ्कां | काण्डी भी 'इसका यजन करो—
शिष्यलिङ्गेनोपलक्ष्य तद्वाक्याद्वा | इसका यजन करो' इस प्रकार अन्य
आह-मैवं शङ्किष्ठाः, | देवताकी ही उपासना करते हैं । अतः उचित यही है कि जो उपास्य विदित है वह ब्रह्म हो और उससे भिन्न उसका उपासक.हो । शिष्यके व्याज अथवा उसके वाक्यसे उसकी इस आशंकाको उपलक्षित कर कहते हैं—ऐसी शंका मत करो,
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
ब्रह्म वागादिसे अतीत और अनुपास्य है
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥
जो वाणीसे प्रकाशित नहीं है, किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती
है उसीको तू ब्रह्म जान, जिस इस [ देशकालावनिच्छन्न वस्तु ] की लोक
उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
यत् चैतन्यमात्रसत्ताकम्, | जो चैतन्यसत्तास्वरूप ब्रह्म वाणी-
वाचा वागिति जिह्वामूलादिष्वष्टसु | से [अप्रकाशित है]—जिह्वामूल आदि
स्थानेषु विवक्तमाग्रेयं वर्णानाम् | आठ स्थानोंमें* आश्रित तथा अग्नि-
अभिव्यञ्जकं करणम्, वर्णाश्चार्थ- | देवतासे अधिष्ठित वर्णोंको अभिव्यक्त
सङ्केतपरिच्छिन्ना एतावन्त एवं | करनेवाली इन्द्रिय एवं अर्थ-संकेतसे
क्रमप्रयुक्ता इति; एवं तद्- | परिच्छिन्न और इतने तथा इस
| क्रमसे† प्रयुक्त होनेवाले हैं, ऐसे
वाक्य-भाष्य
यद्वाचा इति मन्त्रानुवादो | 'यद्वाचा' इत्यादि मन्त्रोंका उल्लेख
दृढप्रतीतेः । अन्यदेव तद्वि- | आत्मतत्त्वकी दृढप्रतीतिका लिये किया
दितादिति योऽयमागमार्थो | गया है । 'यह विदितसे भिन्न है' ऐसा
ब्राह्मणोक्तोऽस्यैव द्रढिम्ने मन्त्रा | जो शास्त्रका तात्पर्य इस ब्राह्मण-ग्रन्थने
यद्वाचेत्यादयः पठ्यन्ते । | ऊपर कहा है उसकी पुष्टिके लिये ही
| ये 'यद्वाचा' इत्यादि मन्त्र पढ़े जाते हैं।
- जिह्वामूल, हृदय, कण्ठ, मूर्धा, दन्त, नासिका, ओष्ठ और तालु ।
† यह मीमांसकोंका मत है, जैसे 'गौः' यह पद गकार, औकार तथा विसर्ग—
इस क्रमविशेषसे अवच्छिन्न वर्णरूप ही है ।
. ४६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
. ४६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
भिद्यङ्गचः शब्दः पदं वागिति | नियमवाले वर्ण 'वाक्' कहे जाते
उच्यते; "अकारो वै सर्वा वाक्सैषा | हैं। तथा उनसे अभिव्यक्त होनेवाला
स्पर्शान्तस्थोष्मभिर्व्यज्यमाना | शब्द भी 'पद' या 'वाक्' कहा
जाता है । श्रुति कहती है—
बह्वी नानारूपा भवति" | "अकार* ही सम्पूर्ण वाक् है, और
(ऐ० आ० २।३।७।१३) इति | यह वाक् ही अपने स्पर्श¹ अन्तस्थ² और
उष्म³ आदि भेदोंसे अभिव्यक्त होकर
श्रुतेः । मितममितं स्वरः | अनेक रूपवाली हो जाती है।"
इस प्रकार मितं⁴ अमितं⁵ स्वरं⁶ एवं
सत्यानृते एष विकारो यस्यास्तया | सत्य और मिथ्या—ये जिसके विकार
वाक्य-भाष्य
यद्ब्रह्म वाचा शब्देनानभ्युदितम् | जो ब्रह्म वाणीसे अर्थात् शब्दसे
अनभ्युदित—अनुक्त अर्थात् अप्रकाशित
अनभ्युक्तमप्रकाशितमित्येतत्, | है। और जिससे वाणी अभ्युदित होती
है—ऐसा कहकर उसे वाणीके प्रकाश-
येन वागभ्युद्यत इति वाक्प्रकाश- | का हेतु बतलाया है। 'जिससे वाणी
प्रकाशित होती है' ऐसा कहकर
हेतुत्वोक्तिः। येन प्रकाश्यत इति | वाणीके अभिधान (उच्चारण) के
अभिधेय (वाच्य) को प्रकाशित
वाचोऽभिधानस्याभिधेयप्रकाश- | करनेमें ब्रह्मको हेतु बतलाया है [अर्थात्
यह दिखलाया है कि वाणीमें जो
कत्वस्य हेतुत्वमुच्यते ब्रह्मणः । | अर्थको अभिव्यञ्जित करनेका सामर्थ्य
है वह ब्रह्मका ही है ] ।
- अकार प्रधान ॐकारसे उपलक्षित स्फोट नामक चिच्छक्ति।
१. क से म तक सभी वर्ग। २. य र ल व । ३. श ष स ह । ४. जिनके पादका
अन्त नियत अक्षरोंवाला है उन वाक्योंको मित (ऋग्वेद) कहते हैं। ५. जिनके पादका
अन्त नियत अक्षरोंवाला नहीं है उन वाक्योंको अमित (यजुर्वेद) कहते हैं। ६. गायन-
प्रधान सामवेद 'स्वर' कहलाता है।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
पद-भाष्य
वाचा पदत्वेन परिच्छिन्नया | हैं उस पदरूपसे परिच्छिन्न एवं
करणगुणवत्या—अनभ्युदितम् | वागिन्द्रियरूप गुणवाली वाणीसे
अप्रकाशितमनभ्युक्तम् । | जो अनभ्युदित—अप्रकाशित
| अर्थात् नहीं कहा गया है—
येन ब्रह्मणा विवक्षितेऽर्थे | बल्कि जिस ब्रह्मके द्वारा
सकरणा वाक् अभ्युद्यते चैतन्य- | वागिन्द्रियसहित वाणी विवक्षित
ज्योतिषा प्रकाश्यते प्रयुज्यत | अर्थमें बोली जाती अर्थात् अपने
इत्येतद्यद्वाचो ह वागित्युक्तम्, | चैतन्य-ज्योतिःस्वरूपसे प्रकाशित
“वदन्वाक्” (बृ० उ० १ । | यानी प्रयुक्त की जाती है, जो
४।७) “यो वाचमन्तरो यम- | 'वाणीकी वाणी है' इस प्रकार
यति” (बृ० उ० ३ । ७ । १७) | बतलाया गया है [जिसके विषयमें]
इत्यादि च वाजसनेयके । “या | बृहदारण्यकोपनिषद्में “बोलनेके
वाक् पुरुषेषु सा घोषेषु प्रतिष्ठिता | कारण वाणी है” “जो भीतरसे वाणी-
| का नियमन करताहै” इत्यादि कहा
| है, तथा “चेतन प्राणियोंमें जो वाणी
| (वाक्शक्ति) है वह घोषों (वर्णों) में
वाक्य-भाष्य
उक्तं च केनेषितां वाचमिमां | ऊपर 'लोग किसकी प्रेरणासे इस
वदन्ति यद्वाचो ह वाचमिति । | वाणीको बोलते हैं' इस प्रश्नके उत्तरमें
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीत्यविषयत्वेन | 'जो वाणीका वाणी है' इत्यादि कहा
ग्रहणं आत्मन्यवस्थापनार्थं | भी जा चुका है। 'तू उसीको ब्रह्म
आम्नायः । यद्वाचानभ्युदितं | जान' यह आगम ब्रह्मको अविषय-
वाक्प्रकाशनिमित्तं चेति ब्रह्म- | रूपसे बुद्धिमें बिठानेके लिये है ।
णोऽविषयत्वेन वस्त्वन्तरजिघृक्षां | 'जो वाणीसे प्रकट नहीं होता बल्कि
| वाणीके प्रकाशित होनेका हेतु है'
| इस कथनसे ब्रह्मका अविषयत्व
| सिद्ध करता हुआ शास्त्र पुरुषको
| अन्य वस्तुके ग्रहण करनेकी इच्छासे
कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः" इति | स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही
४८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः" इति | स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही
प्रश्नमुत्पाद्य प्रतिवचनमुक्तम् | जानता है" इस प्रकार प्रश्न उठा-
"सा वाग्यया स्वप्ने भाषते" इति। | कर यह उत्तर दिया है कि "जिसके
सा हि वक्तुर्वक्तिर्नित्या वाक् | द्वारा जीव स्वप्नमें बोलता है वह
चैतन्यज्योतिःस्वरूपा, "न हि | वाक् है" वक्ताकी वह नित्य वाचन-
वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते" | शक्तिही चैतन्य-ज्योतिःस्वरूप वाक्
(बृ० उ० ४ । ३ । २६) इति | है जैसा कि "वक्ताकी वाचन-
श्रुतेः। | शक्तिका लोप कभी नहीं होता"
| इस श्रुतिसे सिद्ध होता है।
तदेव आत्मस्वरूपं ब्रह्म | उस आत्मस्वरूपको ही तू बृहत्
निरतिशयं भूमाख्यं बृहत्त्वाद् | होनेके कारण 'ब्रह्म' यानी भूमा-
ब्रह्मेति विद्धि विजानीहि त्वम् । | संज्ञक सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म जान। जिन वाक्
यैर्वागाद्युपाधिभिर्वाचो ह वाक् | आदि उपाधियोंके कारण, वाणीका
चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो | वाणी, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र,
मनः कर्ता भोक्ता विज्ञाता | मनका मन, कर्ता, भोक्ता, विज्ञाता,
नियन्ता प्रशासिता विज्ञान- | नियन्ता, शासनकर्ता, तथा ब्रह्म
मानन्दं ब्रह्म इत्येवमादयः | विज्ञान और आनन्दस्वरूप है—
संव्यवहारा असंव्यवहारे नि- | इत्यादि प्रकारके व्यवहार उस
र्विशेषे परे साम्ये ब्रह्मणि प्रवर्तन्ते, | अव्यवहार्य निर्विशेष सर्वोत्कृष्ट
| समस्वरूप ब्रह्ममें प्रवृत्त होते हैं,
वाक्य-भाष्य
निवर्त्य स्वात्मन्येवावस्थापयति | निवृत्त करके अपने आत्मस्वरूपमें ही
| जोड़ता है और 'उसीको तू ब्रह्म जान'
आज्ञायस्तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीति | इस वाक्यद्वारा वह उसे अन्य प्रयत्नसे
| उपरत करता है तथा 'नेदं यदिद-
यत्नत उपरमयति । नेदमित्युपा- | मुपासते' इस कथनसे भी ब्रह्मका
| उपास्यत्व निषेध करनेके कारण
स्यप्रतिषेधाच्च ॥ ४॥ | [वह अन्य सब ओरसे उसे निवृत्त
| करता है] ॥ ४॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
पद-भाष्य
तान्युदस्य आत्मानमेव नि- | उन सब उपाधियोंका बाधकर अपने
र्विशेषं ब्रह्म विद्धीति एवशब्दार्थः। | निर्विशेष आत्माको ही ब्रह्म जान—
नेदं ब्रह्म यदिदम् इत्युपाधिभेद- | यही 'एव' शब्दका अर्थ है । जिस
विशिष्टमनात्मेश्वरादि उपासते | इस उपाधिविशिष्ट अनात्मा ईश्वरादि-
ध्यायन्ति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि | की उपासना—ध्यान करते हैं यह
इत्युक्तेऽपि नेदं ब्रह्म इत्यनात्म- | ब्रह्म नहीं है । 'उसीको तू ब्रह्म
| जान' इतना कह देनेपर भी
| [ अनात्मवस्तुमें ब्रह्मभावनाका
| निषेध हो ही जाता ] पुन: 'यह
नोऽब्रह्मत्वं पुनरुच्यते नियमार्थम् | ब्रह्म नहीं है' इस वाक्यके द्वारा
| जो अनात्माका अब्रह्मत्व प्रतिपादन
अन्यब्रह्मबुद्धिपरिसंख्यानार्थं | किया है वह आत्मामें ही ब्रह्म-
| बुद्धिका नियमन करनेके लिये अथवा
| अन्य उपास्य देवताओंमें ब्रह्म-बुद्धि-
वा ॥४॥ | की निवृत्ति करनेके लिये है ॥४॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥
जो मनसे मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया
हुआ कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान। जिस इस [देश-कालावच्छिन्न
वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ५ ॥
५० केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
यन्मनसा न मनुते; मन | जिसका मनके द्वारा मनन नहीं
इत्यन्तःकरणं बुद्धिमन्सोरेकत्वेन | किया जाता; मन और बुद्धिके
गृह्यते । मनुतेऽनेनेति मनः सर्व- | एकत्वरूपसे यहाँ मन शब्दसे अन्तः-
करणसाधारणम्, सर्वविषय- | करणका ग्रहण किया जाता है।
व्यापकत्वात् । “कामः सङ्कल्पो | जिसके द्वारा मनन करते हैं उसे
विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिर- | मन कहते हैं; वह समस्त इन्द्रियोंके
धृतिर्ह्रीर्धीरित्येतत्सर्वं मन एव” | विषयोंमें व्यापक होनेके कारण
(बृ० उ० १।५।३) इति | सम्पूर्ण इन्द्रियोंके लिये समान है।
श्रुतेः कामादिवृत्तिमन्मनः । तेन | “काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा,
मनसा यत् चैतन्यज्योतिर्मनसः | अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि
अवभासकं न मनुते न सङ्कल्प- | और भय—ये सब मन ही हैं” इस
यति नापि निश्चिनोति लोकः, | श्रुतिके अनुसार मन कामादि
मनसोऽवभासकत्वेन नियन्तृ- | वृत्तियोंवाला है । उस मनके द्वारा
त्वात् । सर्वविषयं प्रति प्रत्य- | यह लोक जिस मनके प्रकाशक
गेवेति स्वात्मनि न प्रवर्ततेऽन्तः- | चैतन्यज्योतिका मनन—संकल्प
करणम् । अन्तःस्थेन हि चैतन्य- | अथवा निश्चय नहीं कर सकता,
ज्योतिषावभासितस्य मनसो | क्योंकि मनका प्रकाशक होनेके
मननसामर्थ्यम्; तेन सवृत्तिकं | कारण वह तो उसका नियामक
| है । आत्मा सब विषयोंके प्रति
| प्रत्यक्रूप (आन्तरिक) ही है; अतः
| उसमें मन प्रवृत्त नहीं हो सकता ।
| अपने भीतर स्थित चैतन्यज्योतिसे
| प्रकाशित हुए मनमें ही मनन करनेका
| सामर्थ्य है। उसके द्वारा वृत्तियुक्त हुए
वाक्य-भाष्य
यन्मनसा इत्यादि समानम् । | ‘यन्मनसा’ इत्यादि श्रुतियोंका
मनो मतमितिःयेन ब्रह्मणा मनोऽपि | तात्पर्य समान ही है । ‘मन मनन
विषयीकृतं नित्यविज्ञानस्वरूपेण | किया जाता है’ अर्थात् जिस नित्य
| विज्ञानस्वरूप ब्रह्मद्वारा मन भी विषय
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
पद-भाष्य
मनो येन ब्रह्मणा मतं विषयीकृतं | मनको ब्रह्मवेत्तालोग जिस ब्रह्मके
व्याप्तम् आहुः कथयन्ति ब्रह्म- | द्वारा मत--विषयीकृत अर्थात् व्याप्त
विदः । तस्मात् तदेव मनस | बतलाते हैं; उस मनके प्रत्यक्चेतयिता
आत्मानं प्रत्यक्चेतयितारं ब्रह्म | आत्माको ही तू ब्रह्म जान । 'नेदं••••'
विद्धि। नेदमित्यादि पूर्ववत् ॥५॥ | इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पूर्ववत्
समझनी चाहिये ॥ ५ ॥
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ६ ॥
जिसे कोई नेत्रसे नहीं देखता बल्कि जिसकी सहायतासे नेत्र
[ अपने विषयोंको ] देखते हैं उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देश-
कालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥६॥
पद-भाष्य
यत् चक्षुषा न पश्यति न | लोक जिसे अन्तःकरणकी वृत्ति-
विषयीकरोति अन्तःकरणवृत्ति- | से युक्त नेत्रद्वारा नहीं देखता अर्थात्
संयुक्तेन लोकः, येन चक्षूंषि | विषय नहीं करता किन्तु जिस
चैतन्यआत्मज्योतिके द्वारा चक्षुओं
अन्तःकरणवृत्तिभेदभिन्नाश्चक्षु- | अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तियोंके
भेदसे विभिन्न हुई—नेत्रेन्द्रियकी
र्वृत्तीः पश्यति चैतन्यात्म- | वृत्तियोंको देखता—विषय करता
यानी व्याप्त करता है उसीको तू
ज्योतिषा विषयीकरोति व्या- | ब्रह्म जान इत्यादि पूर्ववत् समझना
प्नोति । तदेवेत्यादि पूर्ववत् ॥६॥ | चाहिये ॥६॥
वाक्य-भाष्य
इत्येतत् । सर्वकरणानामविषयम्, | किया जाता है। जो सब इन्द्रियोंका
तानि च सव्यापाराणि सविषयाणि | अविषय है और नित्य विज्ञानस्वरूपसे
नित्यविज्ञानस्वरूपावभासतया | अवभासित होनेके कारण जिससे वे
५२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
५२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदंऽ श्रुतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ७॥
जिसे कोई कानसे नहीं सुनता बल्कि जिससे यह श्रोत्रेन्द्रिय सुनी
जाती है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु ]
की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥
पद-भाष्य
यत् श्रोत्रेण न शृणोति | लोक जिसे मनोवृत्तिसे युक्त
दिग्देवताधिष्ठितेन आकाश- | आकाशके कार्यभूत तथा दिशा-
कार्येण मनोवृत्तिसंयुक्तेन न | रूप देवतासे अधिष्ठित श्रोत्रेन्द्रियद्वारा
विषयीकरोति लोकः, येन श्रोत्रम् | नहीं सुन सकता अर्थात् जिसे
इदं श्रुतं यत्प्रसिद्धं चैतन्यात्म- | श्रोत्रसे विषय नहीं कर सकता,
ज्योतिषा विषयीकृतं तदेव | बल्कि जिस चैतन्यआत्मज्योतिद्वारा
इत्यादि पूर्ववत् ॥७॥ | यह प्रसिद्ध श्रोत्र सुना यानी विषय
| किया जाता है वही [ब्रह्म है] इत्यादि
| पूर्ववत् समझना चाहिये ॥७॥
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ८ ॥
जो नासिकारन्ध्रस्थ प्राणके द्वारा विषय नहीं किया जाता बल्कि
जिससे प्राण अपने विषयोंकी ओर जाता है उसीको तू ब्रह्म जान ।
जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह
ब्रह्म नहीं है ॥ ८ ॥
वाक्य-भाष्य
येनावभास्यन्त इति श्लोकार्थः । | सभी इन्द्रियाँ अपने व्यापार और
“क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं | विषयोंके सहित अवभासित होती हैं—
| यह इन मन्त्रोंका तात्पर्य है । “तथा
प्रकाशयति” ( गीता १३ । ३३ ) | क्षेत्रज्ञ सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
पद-भाष्य
यत् प्राणेन घ्राणेन पार्थिवेन अन्तःकरणकी और प्राणकी
नासिकापुटान्तरवस्थितेनान्तः- वृत्तियोंके सहित नासिकारन्ध्रमें स्थित
एवं पृथिवीके कार्यभूत प्राण यानी
करणप्राणवृत्तिभ्यां सहितेन यन्न घ्राणके द्वारा जो प्राणन अर्थात् गन्ध-
प्राणिति गन्धवन्न विषयीकरोति, युक्त वस्तुओंको विषय नहीं करता,
बल्कि जिस चैतन्यात्मज्योतिसे
येन चैतन्यात्मज्योतिषावभास्य- प्रकाश्यरूपसे प्राण अपने विषयकी
त्वेन स्वविषयं प्रति प्राणः प्रणी- ओर प्रवृत्त किया जाता है वही
ब्रह्म है इत्यादि शेष सब अर्थ पहले-
यते तदेवैत्यादि सर्वं समानम् ॥८॥ हीके समान है ॥ ८ ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥१॥
वाक्य-भाष्य
इति स्मृतेः । "तस्य भासा" है" इस स्मृतिसे और "उसीके तेजसे
(मुं० उ० २।२।१०) इति [ यह सब प्रकाशित है]" इस आथर्वणी
चाथर्वणे । येन प्राण इति क्रिया- श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है ।
'येन प्राणः' इस श्रुतिका यह तात्पर्य है
शक्तिरप्यात्मविज्ञाननिमित्तेत्ये- कि क्रियाशक्ति भी आत्मविज्ञानके
तत् ॥५॥६॥ ॥७॥ ॥८॥ कारण ही प्रवृत्त होती है ॥ ५-८ ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥
५४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
५४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
द्वितीय खण्ड
ब्रह्मज्ञानकी अनिर्वचनीयता
पद-भाष्य
एवं हेयोपादेयविपरीतस्त्व- | इस प्रकार हेयोपादेयसे विपरीत
मात्मा ब्रह्मेति प्रत्यायितः शिष्यः | तू आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसी प्रतीति
अहमेव ब्रह्मेति सुष्ठु वेदाहमिति | कराया हुआ शिष्य यह न समझ
मा गृह्णीयादित्याशयादाहाचार्यः | बैठे कि 'ब्रह्म मैं ही हूँ, ऐसा मैं उसे
शिष्यबुद्धिविचालनार्थम्—यदि- | अच्छी तरह जानता हूँ' इस
त्यादि । | अभिप्रायसे उसकी बुद्धिको [ इस
निश्चयसे ] विचलित करनेके लिये
आचार्यने 'यदि मन्यसे'इत्यादि कहा।
नन्विष्टैव सु वेदाहम् इति | पूर्व०—मैं उसे अच्छी तरह
निश्चिता प्रतिपत्तिः । | जानता हूँ—ऐसा निश्चित ज्ञान
तो इष्ट ही है ।
सत्यम्, इष्टा निश्चिता प्रति- | सिद्धान्ती—ठीक है, निश्चित
पत्तिः; न हि सु वेदा- | ज्ञान तो अवश्य इष्ट ही है, परन्तु
ब्रह्मणोऽवेद्यत्वे हेतुः | 'मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ'
हमिति । यद्धि वेद्यं | ऐसा कथन इष्ट नहीं है । जो वेद्य
वस्तु विषयीभवति, तत्सुष्ठु | वस्तु वेत्ताकी विषय होती है वही
वेदितुं शक्यम्, दाह्यमिव दग्धुम् | अच्छी तरह जानी जा सकती है;
अग्नेर्दग्धुः न त्वग्नेः स्वरूपमेव । | जिस प्रकार दहन करनेवाले अग्नि-
के दाहका विषय दाह्य पदार्थ ही
हो सकता है उसका स्वरूप नहीं
सर्वस्य हि वेदितुः स्वात्मा ब्रह्मेति | हो सकता । 'ब्रह्म सभी ज्ञाताओंका
सर्ववेदान्तानां सुनिश्चितोऽर्थः। | आत्मा (अपना-आप) ही है' यह
समस्त वेदान्तोंका भलीभाँति निश्चय
इह च तदेव प्रतिपादितं प्रश्न- | किया हुआ अर्थ है । यहाँ भी
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५
पद-भाष्य
प्रतिवचनोक्त्या ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ | ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि प्रश्नोत्तरों-
इत्यादि । ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ | द्वारा उसीका प्रतिपादन किया गया
इति च विशेषतोऽवधारितम् । | है । उसीको ‘यद्वाचानभ्युदितम्’
ब्रह्मवित्सम्प्रदायनिश्चयश्चोक्तः | इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निश्चय
‘अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | किया है । ‘वह विदितसे अन्य है
दितादधि’ इति । उपन्यस्तमुप- | और अविदितसे भी ऊपर है’ इस
संहरिष्यति च ‘अविज्ञातं वि- | वाक्यद्वारा ब्रह्मवेत्ताओंके सम्प्रदाय-
जानतां विज्ञातमविजानताम्’ | का निश्चय भी बतलाया गया है;
इति । तस्माद्युक्तमेव शिष्यस्य सु | तथा इस प्रकार उल्लेख किये हुए
वेदेति बुद्धिं निराकर्तुम् । | प्रकरणका ‘अविज्ञातं विजानतां
न हि वेदिता वेदितुर्वेदितुं | विज्ञातमविजानताम्’ इस वाक्यद्वारा
शक्यः अग्निर्द्धग्धुरिव दग्धुमग्नेः । | उपसंहार करेंगे । अतः ‘मैं अच्छी
| तरह जानता हूँ’ ऐसी शिष्यकी
| बुद्धिका निराकरण करना उचित
| ही है ।
| जिस प्रकार जलानेवाले अग्नि-
| द्वारा स्वयं अग्नि नहीं जलाया जा
| सकता उसी प्रकार जाननेवालेके
वाक्य-भाष्य
यदि मन्यसे सुवेद इति | ‘यदि मन्यसे सुवेद’ इत्यादि वाक्यसे
शिष्यबुद्धिविचालना गृहीत- | जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करना
स्थिरतायै । विदिताविदि- | है वह उसके ग्रहण किये हुए अर्थको
ताभ्यां निवर्त्य बुद्धिं शिष्यस्य | स्थिर करनेके लिये ही है । शिष्यकी
स्वात्मन्यवस्थाप्य तदेव ब्रह्म त्वं | बुद्धिको ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंसे
विद्धीति स्वाराज्येऽभिषिच्य | हटाकर ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि’ (उसीको
उपास्यप्रतिषेधेनाथास्य बुद्धिं | तू ब्रह्म जान ) इस कथनसे अपने
विचालयति । | आत्मस्वरूपमें स्थिर कर तथा उपास्यके
| प्रतिषेधद्वारा उसे स्वाराज्यपर अभिषिक्त-
| कर अब उसकी बुद्धिको विचलित
| करते हैं ।
५६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
५६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
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पद-भाष्य
न चान्यो वेदिता ब्रह्मणोऽस्ति | द्वारा स्वयं जाननेवाला नहीं जाना
यस्य वेद्यमन्यत्स्याद्ब्रह्म । "नान्य- | जा सकता । ब्रह्मका जाननेवाला कोई और है भी नहीं जिसका वह
दतोऽस्ति विज्ञातृ" (बृ० उ० | उससे भिन्न ब्रह्म ज्ञेय हो सके ।
३।८।११) इत्यन्यो विज्ञाता | "इससे भिन्न और कोई ज्ञाता नहीं है" इस श्रुतिद्वारा भी ब्रह्मसे भिन्न
प्रतिषिध्यते । तस्मात् सुष्ठु वेदाहं | ज्ञाताका प्रतिषेध किया गया है । अतः 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता
ब्रह्मेति प्रतिपत्तिर्मिथ्यैव । तस्माद् | हूँ' यह समझना मिथ्या ही है । इसलिये गुरुने 'यदि मन्यसे'
युक्तमेवाहाचार्यो यदीत्यादि । | इत्यादि ठीक ही कहा है ।
यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनम् । त्वं वेत्थ
ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव
ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥
यदि तू ऐसा मानता है कि 'मैं अच्छी तरह जानता हूँ, तो
निश्चय ही तू ब्रह्मका थोड़ा-सा ही रूप जानता है । इसका जो रूप तू
जानता है और इसका जो रूप देवताओंमें विदित है [ वह भी अल्प
ही है ] अतः तेरे लिये ब्रह्म विचारणीय ही है । [ तब शिष्यने एकान्त
देशमें विचार करनेके अनन्तर कहा— ] 'मैं ब्रह्मको जान गया—ऐसा
समझता हूँ' ॥ १ ॥
पद-भाष्य
यदि कदाचित् मन्यसे सु | यदि कदाचित् तू ऐसा मानता
वेदेति सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति । | हो कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह
वाक्य-भाष्य
यदि मन्यसे सुवेद अहं | यदि तू यह मानता है कि मैं ब्रह्मको
ब्रह्मेति त्वं ततोऽल्पमेव ब्रह्मणो | अच्छी तरह जानता हूँ तो तू निश्चय
१ 'दभ्रमेव' ऐसा भी पाठ है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
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पद-भाष्य
कदाचिद्यथाश्रुतं दुर्विज्ञेयमपि | जानता हूँ । जिसके दोष क्षीण हो
क्षीणदोषः सुमेधाः कश्चित्प्रति- | गये हैं ऐसा कोई बुद्धिमान् पुरुष कभी सुने हुएके अनुसार दुर्विज्ञेय
पद्यते कश्चिन्नेति साशङ्कमाह | विषयको भी समझ लेता है और कोई नहीं भी समझता—इस
यदीत्यादि । दृष्टं च “य एषोऽ- | आशयसे ही [गुरुने] 'यदि मन्यसे' इत्यादि शंकायुक्त वाक्य कहा है ।
क्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति | ऐसा देखा भी गया है कि “यह जो नेत्रोंके भीतर पुरुष दिखायी
होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म” | देता है यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभयपद है और यही
(छा० उ० ८।७।४) इत्युक्ते | ब्रह्म है—ऐसा [ब्रह्माने] कहा” इस
प्राजापत्यः पण्डितोऽप्यसुरराड्- | प्रकार ब्रह्माजीके कहनेपर प्रजापति-की सन्तान और पण्डित होनेपर
विरोचनः स्वभावदोषवशादनुप- | भी असुरराज विरोचनने अपने स्वभावके दोषसे, किसी प्रकार सिद्ध
पद्यमानमपि विपरीतमर्थं शरीर- | न होनेपर भी शरीर ही आत्मा है,
मात्मेति प्रतिपन्नः । तथेन्द्रो | ऐसा विपरीत अर्थ समझ लिया । तथा देवराज इन्द्रने भी एक,
देवराट् सकृद्द्विस्त्रिरुक्तं चाप्रति- | दो तथा तीन बार कहनेपर भी इसका भाव न समझकर अपने
पद्यमानः स्वभावदोषक्षयमपेक्ष्य | स्वभावका दोष क्षीण हो जानेके
वाक्य-भाष्य
रूपं वेत्थ त्वमिति नूनं निश्चितं | ही ब्रह्मके रूपको बहुत कम जानता है—ऐसा आचार्य समझते हैं । परन्तु
मन्यत इत्याचार्यः। सा पुनर्वि- | आचार्य जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करते हैं वह किसलिये है—इसपर
चालना किमर्थेत्युच्यते-पूर्व- | कहते हैं कि [उनका यह कार्य] शिष्यद्वारा पहले ग्रहण किये हुए अर्थमें
गृहीतवस्तुनि बुद्धेः स्थिरतायै । | बुद्धिकी स्थिरताके लिये है ।