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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 152 में से

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पृष्ठ 54

. ४६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
भिद्यङ्गचः शब्दः पदं वागिति | नियमवाले वर्ण 'वाक्' कहे जाते
उच्यते; "अकारो वै सर्वा वाक्सैषा | हैं। तथा उनसे अभिव्यक्त होनेवाला
स्पर्शान्तस्थोष्मभिर्व्यज्यमाना | शब्द भी 'पद' या 'वाक्' कहा
जाता है । श्रुति कहती है—
बह्वी नानारूपा भवति" | "अकार* ही सम्पूर्ण वाक् है, और
(ऐ० आ० २।३।७।१३) इति | यह वाक् ही अपने स्पर्श¹ अन्तस्थ² और
उष्म³ आदि भेदोंसे अभिव्यक्त होकर
श्रुतेः । मितममितं स्वरः | अनेक रूपवाली हो जाती है।"
इस प्रकार मितं⁴ अमितं⁵ स्वरं⁶ एवं
सत्यानृते एष विकारो यस्यास्तया | सत्य और मिथ्या—ये जिसके विकार
वाक्य-भाष्य
यद्ब्रह्म वाचा शब्देनानभ्युदितम् | जो ब्रह्म वाणीसे अर्थात् शब्दसे
अनभ्युदित—अनुक्त अर्थात् अप्रकाशित
अनभ्युक्तमप्रकाशितमित्येतत्, | है। और जिससे वाणी अभ्युदित होती
है—ऐसा कहकर उसे वाणीके प्रकाश-
येन वागभ्युद्यत इति वाक्प्रकाश- | का हेतु बतलाया है। 'जिससे वाणी
प्रकाशित होती है' ऐसा कहकर
हेतुत्वोक्तिः। येन प्रकाश्यत इति | वाणीके अभिधान (उच्चारण) के
अभिधेय (वाच्य) को प्रकाशित
वाचोऽभिधानस्याभिधेयप्रकाश- | करनेमें ब्रह्मको हेतु बतलाया है [अर्थात्
यह दिखलाया है कि वाणीमें जो
कत्वस्य हेतुत्वमुच्यते ब्रह्मणः । | अर्थको अभिव्यञ्जित करनेका सामर्थ्य
है वह ब्रह्मका ही है ] ।

  • अकार प्रधान ॐकारसे उपलक्षित स्फोट नामक चिच्छक्ति।
    १. क से म तक सभी वर्ग। २. य र ल व । ३. श ष स ह । ४. जिनके पादका
    अन्त नियत अक्षरोंवाला है उन वाक्योंको मित (ऋग्वेद) कहते हैं। ५. जिनके पादका
    अन्त नियत अक्षरोंवाला नहीं है उन वाक्योंको अमित (यजुर्वेद) कहते हैं। ६. गायन-
    प्रधान सामवेद 'स्वर' कहलाता है।