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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

कहलाता हूँ। आप दीनोंके बन्धु और दयालु हैं मेरी यह
दीनता है।
रावरो कहावौं, गुनु गावौं राम ! रावरोई,
रोटी द्वै हौं पावौं राम ! रावरी हीं कानि हौं।
जानत जहानु, मन मेरेहूँ गुमानु बड़ो,
मान्यो मैं न दूसरो, न मानत, न मानिहौं ॥
पाँचकी प्रतीति न भरोसो मोहि आपनोई,
तुम्ह अपनायो हौं तबै हीं परि जानिहौं।
गढ़ि-गुढ़ि, छोलि-छालि कुंदकी-सी भाईं वातैं
जैसी मुख कहौं, तैसी जीयँ जब आनिहौं ॥६३॥
हे राम ! मैं आपका कहलाता हूँ और आपहींका गुण गाता
हूँ और हे रघुनाथजी ! आपहीके लिहाजसे मुझे दो रोटियाँ भी मिल
जाती हैं। संसार जानता है और मेरे मनमें भी बड़ा अभिमान है
कि मैंने दूसरेको न माना, न मानता हूँ और न मानूँगा। मुझे न
पंचोंका ही विश्वास है और न अपना ही भरोसा है, मैं गढ़-गुढ़
और छील-छालकर खरादपर चढ़ाई हुई-सी चिकनी-चुपड़ी बातें
बनाता हूँ। वैसी ही जब हृदयमें भी ले आऊँगा तब समझूँगा कि
आपने मुझे अपनाया है।
बचन बिकारु, करतबउ खुआर, मनु
बिगत-बिचार, कलिमलको निधानु है।
रामको कहाइ, नामु बेचि-बेचि खाइ, सेवा-
संगति न जाइ, पाछिलेको उपखानु है॥
तेहू तुलसीको लोगु भलो-भलो कहै, ताको

१४१ उत्तरकाण्ड
दूसरो न हेतु, एकु नीकें कै निदानु है।
लोकरीति विदित बिलोकिअत जहाँ-तहाँ,
स्वामीकें सनेहँ स्वानहू को सनमानु है ॥६४॥
(जिसकी) बोलीमें विकार है, करनी भी बहुत बुरी है तथा
मन भी विवेकशून्य और कलिमलका भण्डार है। जो श्रीरामचंद्र-
जीका कहलाकर नामको बेंच-बेंचकर खाता है और जैसी कि पुरानी
कहावत है, सेवा और सत्संगमें प्रवृत्त नहीं होता। उस तुलसीको
भी लोग भला कहते हैं। इसका कोई दूसरा कारण नहीं है, केवल
एक निश्चित हेतु है यह प्रसिद्ध लोकरीति और जहाँ-तहाँ देखनेमें
भी आता है कि स्वामीका जहाँ-तहाँ स्नेह होनेपर उसके कुत्तेका
भी सम्मान होता है।
नाम-विश्वास
स्वारथको साजु न समाजु परमारथको,
मोसो दगाबाज दूसरो न जगजाल है।
कै न आयौं, करौं न करौंगो करतूति भली,
लिखी न बिरंचिहूँ भलाई भूलि भाल है ॥
रावरी सपथ, रामनामही की गति मेरें,
इहाँ झूठो, झूठो सो तिलोक तिहूँ काल है।
तुलसी को भलो पै तुम्हारें ही किएँ कृपाल,
कीजै न बिलंबु, बलि, पानीभरी खाल है ॥६५॥
मेरे पास न तो कोई स्वार्थसाधनका ही सामान है और न
परमार्थकी ही सामग्री है। विश्व ब्रह्माण्डमें मेरे समान कोई दूसरा
दगाबाज भी नहीं है। सुकर्म तो न मैं करके आया हूँ, न करता

कवितावली १४२
हूँ और न करूँगा ही ! ब्रह्माने भूलकर भी मेरे भाग्यमें भलाई नहीं
लिखी। आपकी शपथ है, हे रामजी ! मुझको केवल आपके नाम-
हीकी गति है। जो यहाँ (आपके सामने) झूठा है वह तो तीनों लोक
और तीनों कालमें झूठा ही है। हे कृपालो ! तुलसीकी भलाई तो
तुम्हारे ही किये होगी; बलिहारी जाऊँ, अब विलम्ब न कीजिये,
क्योंकि मेरी दशा ठीक पानीसे भरी हुई खालके समान है। अर्थात्
जैसे पानीभरी खाल बहुत जल्दी सड़ जाती है वैसे ही मेरे भी नष्ट
होनेमें देरी नहीं है।
रागको न साजु, न बिरागु, जोग, जाग जियँ,
काया नहि छाड़ि देत ठाटिबो कुठाटको।
मनोराजु करत अकाजु भयो आजु लगि,
चाहै चारु चीर, पै लहै न टूकु टाटको ॥
भयो करतारु बड़े कूरको कृपालु, पायो
नामप्रेमु-पारसु, हौं लालची बराटको ।
‘तुलसी’ बनी है राम ! रावरें बनाएँ, ना तो
धोबी-कौसो कूकरु, न घरको, न घाटको ॥६६॥
मेरे पास न तो राग अर्थात् सांसारिक सुख-भोगकी सामग्री
है और न मेरे जीमें वैराग्य, योग या यज्ञ ही है; और यह शरीर
कुचाल चलना नहीं छोड़ता । मनोराज्य (वासनाएँ) करते-करते
आजतक हानि ही होती रही। यह चाहता तो अच्छे-अच्छे वस्त्र
है, परन्तु इसे मिलता टाटका टुकड़ा भी नहीं । हे जगत्कर्ता प्रभो !
आप इस अत्यन्त कुटिलपर भी कृपालु हुए, मुझ कौड़ी (तुच्छ
भोगों) के लालचीने भगवन्नामका प्रेमरूप पारस पाया। हे श्रीरामजी !
यह सब आपके बनाये बनी है, नहीं तो धोबीके कुत्तेके समान

१४३ उत्तरकाण्ड
मैं न घरका था और न घाटका ही (अर्थात् न मैं इस लोकको
सुधार सकता था, न परलोकको)।
ऊँचो मनु, ऊँची रुचि, भागु नीचो निपट ही,
लोकरीति-लायक न, लंगर लवारु है।
स्वारथु अगमु, परमारथकी कहा चली,
पेटकीं कठिन जगु जीवको जवारु है॥
चाकरी न आकरी, न खेती, न बनिज-भीख,
जानत न कूर कछु किसब कबारु है।
तुलसीकी बाजी राखी रामहीकें नाम, नतु
भेंट पितरन को न मूड़हू में बारु है॥६७॥
इसका मन ऊँचा है तथा रुचि भी ऊँची है, परन्तु भाग्य
इसका अत्यन्त खोटा है। यह लोक-व्यवहारके लायक भी नहीं है
तथा बड़ा ही नटखट और गप्पी है। इसके लिये तो स्वार्थ भी अगम
है, परमार्थकी तो बात ही क्या है! पेटकी कठिनाईके कारण इसे
संसार जीका जंजाल हो रहा है। यह न तो कोई चाकरी ही
करता है और न खान खोदनेका काम करता है; इसके न खेती
है, न व्यापार है; न यह भीख माँगता है और न कोई अन्य प्रकार-
का धंधा या पेशा ही जानता है। तुलसीकी बाजी रामनामहीने
रक्खी है, अन्यथा इसके पास तो पितरोंको भेंट चढ़ानेके लिये
सिरपर बाल भी नहीं है।
अपत-उतार, अपकारको अगारु, जग
जाकी छाँह छुएँ सहमत ब्याध-बाधको।
पातक-पुहुमि पालिबेको सहसाननु सो,

कवितावली १४४
काननु कपटको, पयोधि अपराधको ॥
तुलसी-से वामको भो दाहिनो दयानिधानु,
सुनत सिहात सब सिद्ध, साधु, साधको ।
रामनाम ललित ललामु कियो लाखनि को,
बड़ो क्रूर कायर कपूत कौड़ी आधको ॥६८॥
यह नीच निर्लज्जोंकी न्यौछावर और अपकारोंका आगार है,
जिसकी छायाका स्पर्श होनेपर संसारमें व्याध और हिंसक जीव
भी सहम जाते हैं। पापरूप पृथ्वीकी रक्षा करनेके लिये यह
शेषजीके समान है तथा कपटका वन और अपराधोंका समुद्र है।
तुलसी-जैसे उलटी प्रकृतिके पुरुषके लिये दयानिधान (श्रीरामचन्द्र-
जी) दाहिने हो गये—यह सुनकर सब सिद्ध, साधु और साधक-
लोग सिहाते हैं। रामनामने बड़े कुटिल, कायर, कपूत और आधी
कौड़ीके मनुष्यको भी लाखोंका सुन्दर रत्न बना दिया।
सब अँग हीन, सब साधन विहीन, मन-
बचन मलीन, हीन कुल-करतूति हौं ।
बुधि-बल-हीन, भाव-भगति-विहीन, हीन
गुन, ग्यानहीन, हीन भाग हूँ, बिभूति हौं ॥
तुलसी गरीब की गई-बहोर रामनामु,
जाहि जपि जीहँ रामहू को बैठो धूति हौं ।
प्रीति रामनामसों, प्रतीति रामनामकी,
प्रसाद रामनामकें पसारि पाय सूतिहौं ॥६९॥

१४५ उत्तरकाण्ड
मैं (योगके आठों) अङ्गोंसे हीन हूँ, सब साधनोंसे रहित
हूँ, मन-वचनसे मलिन हूँ तथा कुल और कर्मोंमें भी बड़ा पतित
हूँ। मैं बुद्धि-बलहीन, भाव और भक्तिमे रहित, गुणहीन, ज्ञानहीन
तथा भाग्य और ऐश्वर्यसे भी रहित हूँ। इस दीन तुलसीदासकी
हीन अवस्थाका उद्धार करनेवाला तो रामका नाम ही है जिसे
जिह्वासे जपकर मैं रामजीको भी छल चुका हूँ। मुझे रामनामसे
ही प्रीति है, रामनाममें ही विश्वास है और मैं रामनामके ही
कृपासे पैर पसारकर (निश्चिन्त होकर) सोता हूँ।
मेरें जान जबतें हौं जीव है जनम्यो जग,
तबतें बेसाह्यो दाम लोभ, कोह कामको।
मन तिन्हीकी सेवा, तिन्ही सों भाउ नीको,
बचन बनाइ कहौं 'हौं गुलामु रामको'॥
नाथहूँ न अपनायो, लोक झूठी है परी, पै
प्रभुहू तें प्रबल प्रतापु प्रभुनामको।
आपनीं भलाई भलो कीजै तौ भलाई, न तौ
तुलसीको खुलैगो खजानो खोटे दामको ॥७०॥
मेरी समझसे जबसे मैं जगत्में जीव होकर जन्मा हूँ तबसे
मुझे लोभ, क्रोध और कामने दाम देकर मोल ले लिया है।
(अतएव) मनसे उन्हींकी सेवा होती है और उन्हींसे गहरा प्रेम
है; परन्तु बात बनाकर कहता हूँ कि मैं तो श्रीरामका गुलाम हूँ।
हे नाथ! आपने भी (अयोग्य समझकर) नहीं अपनाया; किन्तु
लोकमें झूठी प्रसिद्धि हो गयी (कि मैं रामका गुलाम हूँ)।
परन्तु प्रभुसे भी प्रभुके नामका प्रताप अधिक प्रचण्ड है। (अतः)
क० १०-

कवितावली १४६
अपनी भलाईसे यदि आप मेरा भला कर दें तो अच्छा ही है,
नहीं तो तुलसीके कपटका खजाना खुलेगा ही ।
जोग न बिरागु,जप, जाग, तप, त्यागु,ब्रत,
तीरथ न धर्म जानौं, वेदविधि किमि है ।
तुलसी-सो पोच न भयो है, नहिं हैहै कहूँ,
सोचैं सब, याके अघ कैसे प्रभु छमिहैं ॥
मेरें तौ न डरु, रघुवीर ! सुनौ, साँची कहौं,
खल अनखैहैं तुम्हें, सज्जन न गंमिहैं ।
भले सुकृतीके संग मोहि तुलाँ तौलिए तौ,
नामकें प्रसाद भारु मेरी ओर नमिहै ॥७१॥
मैं न तो अष्टाङ्गयोग जानता हूँ और न वैराग्य, जप, यज्ञ,
तप, त्याग, व्रत, तीर्थ अथवा धर्म ही जानता हूँ । मैं यह भी नहीं
जानता कि वेदका विधान कैसा है । तुलसीके समान पामर न
तो कोई हुआ है और न कहीं होगा । ( इसीलिये ) सभी सोचते
हैं, न जाने, प्रभु इसके पापोंको कैसे क्षमा करेंगे । किन्तु हे
रघुनाथजी ! सुनिये, मैं ( आपसे ) सच कहता हूँ, मुझे कुछ भी
डर नहीं है । ( यदि आप मुझे क्षमा कर देंगे तो ) दुष्ट लोग तो
अवश्य आपसे अप्रसन्न होंगे, किन्तु सज्जनोंको इससे कुछ भी दुःख
नहीं होगा । यदि आप मुझे किसी बड़े पुण्यवान्के साथ तराजू-
पर तोलेंगे तो आपके नामकी कृपासे मेरी ओरका पलड़ा ही
झुकता हुआ रहेगा ।
जातिके, सुजातिके, कुजातिके पेटागि बस
खाए टूक सबके, बिदित बात दुनीं सो ।

१४७ उत्तरकाण्ड
मानस-वचन-कायँ किए पाप सतिभायँ,
रामको कहाइ दासु दगाबाज पुनी सो ॥
रामनामको प्रभाउ, पाउ, महिमा, प्रतापु,
तुलसी-सो जग मनिअत महामुनी-सो ।
अतिहीं अभागो, अनुरागत न रामपद,
मूढ़ ! एतो बड़ो अचिरिजु देखि-सुनी सो ॥७२॥
मैंने पेटकी आगके कारण ( अपनी ) जाति, सुजाति, कुजाति,
सभीके टुकड़े ( माँग-माँगकर ) खाये हैं—यह बात संसारमें
( सबको ) विदित है; मन, वचन और कर्मसे सच्चे भावसे अर्थात्
स्वाभाविक ही ( बहुत-से ) पाप किये और रामजीका दास कहलाकर
भी दगाबाज ही बना रहा । अब रामनामका प्रभाव, पैठ, महिमा
और प्रताप देखिये, जिसके कारण तुलसी-जैसे ( दुष्ट ) को भी
लोग महामुनि ( वाल्मीकि ) के समान मानते हैं। रे मूढ़ ! तू
बड़ा ही अभागा है; इतना बड़ा अचरज देख-सुनकर भी श्रीरामके
चरणोंमें प्रीति नहीं करता ।
जायो कुल मंगन, बधावनो बजायो, सुनि
भयो परितापु पापु जननी-जनकको ।
बारेतें ललात-बिललात द्वार-द्वार दीन,
जानत हो चारि फल चारि ही चनकको ॥
तुलसी सो साहेब समर्थको सुसेवकु है,
सुनत सिहात सोचु बिधिहू गनकको ।
नामु राम ! रावरो सयानो किधौं बावरो,
जो करत गिरोतें गरु तृनतें तनकको ॥७३॥

कवितावली १४८
भिक्षा माँगनेवाले (ब्राह्मण) कुलमें तो उत्पन्न हुआ, जिसके
उपलक्षमें बधावा बजाया गया । यह सुनकर माता-पिताको परिताप
और कष्ट हुआ । फिर बालपनसे ही अत्यन्त दीन होनेके कारण
द्वार-द्वार ललचाता और बिलबिलाता फिरा, चनेके चार दानोंको
ही अर्थ, धर्म, काम और मोक्षरूप चार फल समझता था । वही
तुलसी अब समर्थ स्वामी श्रीरामचन्द्रजीका सुसेवक है—यह सुनकर
ब्रह्मा-जैसे गणक (ज्योतिषी) को भी चिन्ता और ईर्ष्या होती है ।
हे राम ! मालूम नहीं, आपका नाम चतुर है या पागल जो तृणसे
भी तुच्छ पुरुषको पर्वतसे भी भारी बना देता है।
वेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
रामनाम ही सों रीझें सकल भलाई है ।
कासीहूँ मरत उपदेसत महेसु सोई,
साधना अनेक चितई न चित लाई हैं ॥
छाछीको ललात जे, ते रामनामकें प्रसाद,
खात खुनसात सोंधे दूधकी मलाई है।
रामराज सुनिअत राजनीतिकी अवधि,
नामु राम ! रावरो तौ चामकी चलाई है ॥७४॥
वेद-पुराण भी कहते हैं और लोकमें भी देखा जाता है कि
रामनामहीसे प्रेम करनेमें सब तरहकी भलाई है । काशीमें मरनेपर
महादेवजी भी जीवोंको उसीका उपदेश करते हैं। उन्होंने अनेकों
साधनोंकी ओर न दृष्टि दी है और न उन्हें चित्तहीमें स्थान दिया
है । जो छाछको ललचाते थे वे रामनामके प्रसादसे सुगन्धित
दूधकी मलाई खानेमें भी नाक-भौ सिकोड़ते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके

१४९ उत्तरकाण्ड
राज्यमें राजनीतिकी पराकाष्ठा सुनी जाती है; किन्तु हे रामजी !
आपके नामने तो चमड़ेका सिक्का चला दिया ( अर्थात् अधमोंको
भी उत्तम बना दिया ) ।
सोच-संकटनि सोचु संकटु परत, जर
जरत, प्रभाउ नाम ललित ललामको।
बूड़िऔ तरति, बिगरीऔ सुधरति बात,
होत देखि दाहिनो सुभाउ बिधि बामको ॥
भागत अभागु, अनुरागत बिरागु, भागु,
जागत आलसि तुलसीहू-से निकामको।
भाई धारि फिरि कै गोहारि हितकारी होति,
आई मीचु मिटति जपत रामनामको ॥७५॥
अति सुन्दर और श्रेष्ठ रामनामका ऐसा प्रभाव है कि उससे
सोच और संकटोंको सोच और संकट पड़ जाता है, ज्वर भी
जलने लगते हैं, डूबी हुई ( नौका ) भी तर जाती है, बिगड़ी हुई
बात भी सुधर जाती है, ऐसे पुरुषको देखकर वाम विधाताका
स्वभाव भी अनुकूल हो जाता है, अभाग्य भाग जाता है, वैराग्य
प्रेम करने लगता है और तुलसी-से निकम्मे और आलसीका भी
भाग्य जाग जाता है । ( लूटनेको आयी हुई लुटेरोंकी ) सेना भी
उलटे रक्षक और हितकारी बन जाती है तथा राम-नामका जप
करनेसे आयी हुई मृत्यु भी टल जाती है।
आँधरो अधम जड़ जाजरो जराँ जवनु
सूकरकें सावक ढकाँ ढकेल्यो मगमं ।

कवितावली १५०
गिरो हियँ हहरि 'हराम हो, हराम हन्यो',
हाय ! हाय ! करत परीगो कालफगमें ॥
'तुलसी' बिसोक ह्वै त्रिलोकपतिलोक गयो
नामकें प्रताप, बात बिदित है जगमें ।
सोई रामनामु जो सनेहसों जपत जनु,
ताकी महिमा क्यों कही है जाति अगमैं ॥७६॥
एक सूअरके बच्चेने किसी अधम, अंधे, मूर्ख और बुढ़ापेसे
जर्जर यवनको राहमें धक्का देकर ढकेल दिया । इससे वह गिर
गया और हृदयमें भयभीत होकर 'अरे ! हरामने मार डाला,
हरामने मार डाला' इस प्रकार हाय-हाय करते-करते कालके फंदेमें
पड़ गया अर्थात् मर गया । गोसाईंजी कहते हैं कि वह यवन
नामके प्रतापसे सब प्रकारके शोकोंसे छूटकर त्रिलोकीनाथ भगवान्
रामके धामको चला गया, यह बात जगत्में प्रसिद्ध है । उसी
रामनामको जो मनुष्य प्रेमपूर्वक जपता है, उसकी अगाध महिमा
कैसे कही जा सकती है ।
जाप की न तप-खपु कियो, न तमाइ जोग,
जाग न विराग, त्याग, तीरथ न तनको ।
भाईको भरोसो न खरो-सो वैरु बैरीहू सों,
बलु अपनो न, हितू जननी न जनको ॥
लोकको न डरु, परलोकको न सोचु, देव-
सेवा न सहाय, गर्बु धामको न धनको ।
रामही के नामतें जो होइ सोइ नीको लागै,
ऐसोई सुभाउ कछु तुलसीके मनको ॥७७॥

१५१ उत्तरकाण्ड
मैंने न तो जप किया, न तपस्याका क्लेश सहा और न मुझे
योग, यज्ञ, वैराग्य, त्याग अथवा तीर्थकी ही इच्छा है। मुझे भाईका
भी भरोसा नहीं है, और न वैरीसे भी जरा-सी शत्रुता है। मुझे
अपना बल नहीं है और माता-पिता भी अपने हितैषी नहीं हैं,
परन्तु मुझे न तो इस लोकका डर है और न परलोकका ही सोच
है। देवसेवाका भी मुझे बल नहीं है और न मुझे धन-धामका ही
गर्व है। तुलसीके मनका कुछ इसी तरहका स्वभाव है कि भगवान्
रामके नामसे ही जो कुछ होगा वही उसे अच्छा लगता है।

ईसु न, गनेसु न, दिनेसु न, धनेसु न,
सुरेसु, सुर, गौरि, गिरापति नहि जपने।
तुम्हरेई नामको भरोसो भव तरिबेको,
बैठें-उठें 'जागत-बागत, सोएँ, सपनें॥
तुलसी है बावरो सो रावरोई, रावरी सौं,
रावरेऊ जानि जियँ कीजिए जु अपने।
जानकीरमन मेरे ! रावरें बदनु फेरें,
ठाउँ न समाउँ कहाँ, सकल निरपने ॥७८॥

मुझे शिव, गणेश, सूर्य, कुवेर, इन्द्रादि देवता, गौरी अथवा
ब्रह्माको नहीं जपना है। संसारसे तरनेके लिये उठते-बैठते, जागते-
घूमते, सोने एवं स्वप्न देखते—बस, आपके नामका ही भरोसा है।
तुलसी यद्यपि बावला है, परन्तु आपकी सौगंध, है आपका ही।
इस बातको अपने चित्तमें जानकर आप भी उसे अपना लीजिये।
हे मेरे जानकीनाथ ! आपके मुख फेर लेनेपर मेरे लिये कहीं ठौर-
ठिकाना नहीं रहेगा, मैं कहाँ रहूँगा? सभी बिराने हैं।

कवितावली १५२
जाहिर जहानमें जमानो एक भाँति भयो,
बेंचिए विबुधधेनु, गसभी बेसाहिए।
ऐसेऊ कराल कलिकालमें कृपाल! तेरे
नामकें प्रताप न त्रिताप तन दाहिए॥
तुलसी तिहारो मन-बचन-करम, तॉहि
नातें नेह-नेमु निज ओरतें निबाहिए।
रंकके नेवाज रघुराज! राजा राजनिके,
उमरि दराज महाराज तेरी चाहिए ॥७९॥
यह जमाना संसारमें इस बातके लिये प्रसिद्ध हो गया है
कि कामधेनुको बेंचकर गधी खरीदी जाने लगी। ऐसे भयंकर
कलिकालमें भी, हे कृपालो ! आपके नामके प्रतापसे त्रिताप
(दैहिक, दैविक, भौतिक) से शरीर दग्ध नहीं होता। गोसाईं-
जी कहते हैं, मन-वचन-कर्मसे मैं आपका (भक्त) हूँ। इसी नाते
आप अपनी ओरसे भी स्नेहके नियमको निभाइये। हे रंकोंपर
कृपा करनेवाले, राजाओंके राजा महाराज रघुनाथजी! हमें तो
आपकी उमर बड़ी चाहिये [फिर कोई खटका नहीं है]।
स्वारथ सयानप, प्रपंचु, परमारथ
कहायो राम! रावरो हौं, जानत जहान है।
नामकें प्रताप, बाप! आजु लौं निबाही नीकें,
आगेको गोसाईं! स्वामी सबल सुजान है॥
कलिकी कुचालि देखि दिन-दिन दूनी, देव!
पाहरूई चोर हेरि हिय हहरान है।

१५३ उत्तरकाण्ड
तुलसीकी, बलि, बार-बारहीं सँभार कीबी,
जद्यपि कृपानिधानु सदा सावधान है ॥८०॥
मेरे स्वार्थके कामोंमें चतुराई और परमार्थके कामोंमें पाखण्ड
भरा हुआ है । हे रामजी ! तो भी मैं आपका कहलाता हूँ और
सारा संसार भी यही जानता है । हे पिता ! आपने नामके प्रतापसे
आजतक अच्छी निभा दी और हे स्वामिन् ! आगेके लिये भी
प्रभु समर्थ और सर्वज्ञ हैं । हे देव ! कलियुगकी कुचालको दिन-
दिन दूनी बढ़ती देखकर और पहरेदारको भी चोर देखकर मेरा
हृदय दहल गया है । हे कृपानिधान ! यद्यपि आप सदा ही
सावधान हैं तथापि तुलसी बलिहारी जाता है, आप इसकी बार-
बार सँभाल करते रहियेगा ( ताकि इसके मनमें विकार न
आने पावे ) ।
दिन-दिन दूनो देखि दारिदु, दुकालु, दुख,
दुरितु, दुराजु सुख-सुकृत सकोच है ।
मागें पैंत पावत पचारि पातकी प्रचंड,
कालकी करालता, भलेको होत पोच है ॥
आपनें तौ एकु अवलंबु अंब डिंभ ज्यों,
समर्थ सीतानाथ सब संकट त्रिमोच है ।
तुलसीकी साहसी सराहिए कृपाल राम !
नामकें भरोसें परिनामको निसोच है ॥८१॥
दिनोंदिन दरिद्रता, दुष्काल ( दुर्भिक्ष ), दुःख, पाप और
कुराज्यको दूना होता देखकर सुख और सुकृत संकुचित हो रहे
हैं । समय ऐसा भयंकर आ गया है कि बड़े-बड़े पापी तो डाँट-

कवितावली १५४
डपटकर माँगनेसे अपना दाँव पा लेते हैं और भले आदमीका बुरा
हो जाता है । जैसे बालकको एकमात्र माँका ही सहारा होता है
वैसे ही अपने तो एकमात्र सहारा सर्वसंकटोंसे छुड़ानेवाले और
समर्थ श्रीसीतानाथका ही है । हे कृपालु रामजी ! तुलसीके
साहसकी सराहना कीजिये कि वह ( आपके ) नामके भरोसे
परिणामकी ओरसे निश्चिन्त हो गया है ।
मोह-मद मात्यो, रात्यो कुमति-कुनारिसों,
बिसारि वेद-लोक-लाज, आँकरो अचेतु है ।
भावै सो करत, मुहँ आवै सो कहत, कछु
काहूकी सहत नाहिं, सरकस हेतु है ॥
तुलसी अधिक अधमाई हू अजामिलतें,
ताहूमैं सहाय कलि कपटनिकेतु है ।
जैबेको अनेक टेक, एक टेक ह्वैवेकी, जो
पेट-प्रियपूत हित रामनामु लेतु है ॥८२॥
यह मोहरूपी मदसे उन्मत्त हो गया है, कुमतिरूपी कुलटा
स्त्रीमें रत है, लोक और वेदकी लज्जाको त्याग कर बड़ा अचेत
( बेपरवाह ) हो गया है । मनमानी करता है और मुँहमें जो आता
है वही [ बिना विचारे ] कह डालता है और उद्दण्डताके कारण
किसीकी कोई बात सहता नहीं। गोसाईंजी कहते हैं कि इस
प्रकार मुझमें अजामिलसे भी अधिक अधमता है; तिसपर भी
कपटनिधान कलि मेरा सहायक है । बिगड़नेके तो अनेक मार्ग हैं
परन्तु बननेका केवल एक रास्ता है; वह यह है कि यह पेटरूपी
पुत्रके लिये रामनाम लेता है [ भाव यह है कि अधम अजामिल-

१५५ उत्तरकाण्ड
ने पुत्रके मिससे भगवान्‌का नाम लिया था। मैंने भी पेटरूपी
पुत्रके लिये उसीका आश्रय लिया है ]।
कलिवर्णन
जागिए न सोइए, बिगोइए जनमु जायँ,
दुख, रोग रोइए, कलेसु कोह-कामको।
राजा-रंक, रागी और विरागी, भूरिभागी,ये
अभागी जीव जरत, प्रभाउ कलि बामको ॥
तुलसी ! कबंध-कैसो धाइबो,विचारु, अंध !
धंध देखिअत जग, सोचु परिनामको ।
सोइबो जो रामके सनेहकी समाधि-सुखु,
जागिबो जो जीह जपै नीकें रामनामको ॥८३॥
(इस संसारमें) न तो हम जागते हैं, न सोते हैं; जीवनको
व्यर्थ खो रहे हैं। दुःख और रोगके कारण रोते हैं और काम-
क्रोधका क्लेश (मानसिक व्यथा) सहते हैं। राजा-रंक, रागी-
विरागी और महाभाग्यवान् तथा अभागी, सभी जीव जल रहे
हैं; कुटिल कलियुगका ऐसा ही प्रभाव है। गोसाईंजी अपने
लिये कहते हैं कि अरे अंधे ! विचार कर, इस जगत्‌में जितने
धंधे दिखायी देते हैं वे सब कबन्ध (बिना सिरवाले रुण्ड) की
दौड़के समान हैं, जिनका अन्त चिन्ता ही है। श्रीरामप्रेमकी
समाधिका जो सुख है वही सोना है और जिह्वा भलीभाँति
रामनाम जपे—यही जागना है।
बरन-धरमु गयो, आश्रम निवासु तज्यो,
त्रासन चकित सो परावनो परो-सो हैं ।

करमु, उपासना कुबासनाँ बिनास्यो ग्यानु,
बचन-विराग, वेष जगतु हरो-सो है ॥
गोरख जगायो जोगु, भगति भगायो लोगु,
निगम-नियोगतें सो केलि ही छरो-सो है ।
कायँ-मन-बचन सुभायँ तुलसी ! है जाहि
रामनामको भरोसो, ताहिको भरोसो है ॥८४॥
इस कुसमयमें वर्णधर्म चला गया, ब्रह्मचर्यादि आश्रमोंने
अपना स्थान छोड़ दिया । (अधर्मके) त्राससे चकित होकर
भग्गी-सी पड़ी हुई है । कर्म, उपासना और ज्ञानको कुवासना
(विषयभोगकी प्रबल इच्छा) ने नष्ट कर दिया है । वचनमात्रके
वैराग्य और वेषने जगत्को ठग-सा लिया है । गोरखने योग क्या
जगाया, लोगोंको भक्तिसे विमुख कर दिया, और वेदकी आज्ञाने
खेलहीमें संसारको ठग-सा लिया है । गोसाईंजी कहते हैं कि
जिसे शरीर, मन और वचनसे स्वाभाविक ही रामनामका भरोसा
है उसीके सम्बन्धमें भरोसा होता है (कि वह संसारसे तर
जायगा) ।
बेद-पुरान बिहाइ सुपंथु, कुमारग, कोटि कुचालि चली है ।
कालु कराल, नृपाल कृपाल न, राजसमाजु बड़ोई छली है ॥
बर्न-बिभाग न आश्रमधर्म, दुनी दुख-दोष-दरिद्र दली है ।
स्वारथको परमारथको कलि रामको नामप्रतापु बली है ॥८५॥
वेद-पुराणरूप सुमार्गको त्यागकर तरह-तरहकी कुचालें
और करोड़ों कुमार्ग चल गये हैं । समय बड़ा कठिन है, राजा
दयारहित हैं, राजसमाज (मन्त्री, कर्मचारी) बड़ा ही छली है ।

१५७ उत्तरकाण्ड
वर्णविभाग नहीं रहा, न आश्रमधर्म ही रहा है और संसारको
दुःख, दोष और दरिद्रताने दलित कर दिया है। (ऐसे घोर)
कलिकालमें स्वार्थ और परमार्थके लिये रामनामका प्रताप ही
बलवान् है।
न मिटै भवसंकटु, दुर्घट है तप, तीरथ जन्म अनेक अटो।
कलिमें न विरागु, न ग्यानु कहूँ, सबु लागत फोकट झूठ-जटो ॥
नटु ज्यों जनि पेट-कुपेटक कोटिक चेटक-कौतुक-ठाट ठटो ।
तुलसी जो सदा सुखु चाहिअ तौ, रसनाँ निसिबासर रामु रटो८६
इस संसारका संकट मिट नहीं सकता; क्योंकि तप तो
कठिन है; और तीर्थोंमें अनेक जन्मोंतक विचरते रहो, किन्तु
कलियुगमें न कहीं वैराग्य है, न ज्ञान है; सब सारहीन और
असत्यपूरित प्रतीत होता है। नटकी भाँति अपने पेटरूपी कुत्सित
पेटारेसे करोड़ों इन्द्रजालके कौतुकका ठाट मत ठटो। गोसाईंजी
कहते हैं कि जो सदा सुख चाहते हो तो जिह्वासे रात-दिन राम-
नाम रटते रहो।
दमु दुर्गम,दान,दया,मख,कर्म,सुधर्म, अधीन सबै धनको।
तप,तीरथ,साधन,जोग,बिरागसों होइ,नहीं दृढ़ता तनको ॥
कलिकाल करालमें 'राम कृपालु'यहै अवलंबु बड़ो मनको।
'तुलसी'सब संजम हीन सबै, एक नाम-अधारु सदा जनको॥८७॥
दम अर्थात् इन्द्रियनिग्रह कठिन है। दान, दया, यज्ञ, कर्म
और उत्तम धर्म सब धनके अधीन हैं। तप, तीर्थ और योगसाधन
वैराग्यसे होते हैं, किन्तु (मनकी) दृढ़ता तनिक भी नहीं है। इस
कराल कलिकालमें 'राम कृपालु हैं'—यही मनके लिये बड़ा

अवलम्बन है। गोसाईंजी कहते हैं कि सब लोग सब प्रकारके
संयमोंसे रहित हैं; भक्तोंको सदैव एक राम-नामका ही आधार है।
पाइ सुदेह त्रिमोह-नदी-तरनी न लही, करनी न कछू की।
रामकथा बरनी न बनाइ, सुनी न कथा प्रहलाद न ध्रूकी ॥
अब जोर जरा जरि गातु गयो, मन मानि गलानि कुबानि न मूकी।
नीकें कै ठीक दई तुलसी, अवलंब बड़ी उर आखर दूकी ॥८८॥
(मनुष्यकी) सुन्दर देह पाकर भी मोहरूपी नदीको पार
करनेके लिये (भक्तिरूपी) नौका प्राप्त नहीं की और न कोई
उत्तम करनी की। श्रीरामकथाको भलीभाँति नहीं गाया और न
प्रह्लाद और ध्रुव (-जैसे भक्तों) की कथा सुनी। अब भरपूर
वृद्धावस्थाके कारण शरीर जर्जर हो गया है, तथापि मनने ग्लानि
मानकर अपनी कुटेव नहीं छोड़ी। इससे तुलसीने अच्छी तरह
विचारकर यह निश्चय कर लिया है कि 'राम' इन दो अक्षरोंका
ही हृदयमें बड़ा अवलम्ब है।
राम-नाम-महिमा
रामु बिहाइ 'मरा' जपतें बिगरी सुधरी कबिकोकिलहू की।
नामहि तें गजकी, गनिकाकी, अजामिलकी चलि गै चलचूकी ॥
नामप्रताप बड़े कुसमाज बजाइ रही पति पांडुबधूकी ।
ताको भलो अजहूँ 'तुलसी' जेहि प्रीति-प्रतीति है आखर दूकी ॥
सीधा रामनाम त्याग कर उलटा 'मरा' 'मरा' जपनेसे
कविकोकिल (श्रीवाल्मीकिजी) की बिगड़ी सुधर गयी। राम-
नामसे ही गजकी और गणिकाकी बन गयी और अजामिलका
धोखा भी चल गया। रामनामहीके प्रतापसे बड़े कुसमाजमें

१५९ उत्तरकाण्ड
अर्थात् दुर्योधनकी सभामें द्रौपदीकी लाज डंकेकी चोट रह गयी ।
गोसाईंजी कहते हैं कि जिसको 'राम' इन दोनों अक्षरोंमें प्रीति
और प्रतीति है उसका अब भी भला ही है ।
नामु अजामिल-से खल तारन, तारन बारन-बारबधूको ।
नाम हरे प्रहलाद-विषाद, पिता-भय-साँसति-सागरु सूखो ॥
नामसों प्रीति-प्रतीति-विहीन गिल्यो कलिकाल कराल, न चूको ।
राखिहैं रामु सो जासु हिएँ तुलसी हुलसै बलु आखर दूको ॥
रामनाम अजामिल-जैसे खलोंको भी तारनेवाला है, गज और
वेश्याका भी निस्तार करनेवाला है । नामहीने प्रह्लादके विषादका
नाश किया और उनके पिता (हिरण्यकशिपु) से होनेवाले भय
और साँसतरूपी समुद्रको सुखा दिया । रामनाममें जिसकी प्रीति
और प्रतीति नहीं है, उसको कराल कलिकाल निगल जानेमें कभी
नहीं चूका अर्थात् निगल ही गया । गोस्वामीजी कहते हैं कि
जिसके हृदयमें 'रा' और 'म'—इन दो अक्षरोंका बल हुलसता
है, उसकी रक्षा श्रीरामजी करेंगे ।
जीव जहानमें जायो जहाँ, सो तहाँ 'तुलसी' तिहुँ दाह दहो है ।
दोसु न काहू, कियो अपनो, सपनेहूँ नहीं सुखलेसु लहो है ॥
रामके नामतें होउ सो होउ, न सोउ हिएँ, रसना हीं कहो है ।
कियो न कछू, करिबोन कछू, कहिबो न कछू, मरिबोइ रहो है ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—संसारमें जीव जहाँ भी उत्पन्न
होता है वहीं तीनों तापोंसे जलता रहता है । (इसमें) किसीका
दोष नहीं है, (सब) अपने ही कियेका फल है; इसीसे उसे
स्वप्नमें भी लेशमात्र सुख नहीं मिलता । रामनामके प्रभावसे जो