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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 156

१५३ उत्तरकाण्ड
तुलसीकी, बलि, बार-बारहीं सँभार कीबी,
जद्यपि कृपानिधानु सदा सावधान है ॥८०॥
मेरे स्वार्थके कामोंमें चतुराई और परमार्थके कामोंमें पाखण्ड
भरा हुआ है । हे रामजी ! तो भी मैं आपका कहलाता हूँ और
सारा संसार भी यही जानता है । हे पिता ! आपने नामके प्रतापसे
आजतक अच्छी निभा दी और हे स्वामिन् ! आगेके लिये भी
प्रभु समर्थ और सर्वज्ञ हैं । हे देव ! कलियुगकी कुचालको दिन-
दिन दूनी बढ़ती देखकर और पहरेदारको भी चोर देखकर मेरा
हृदय दहल गया है । हे कृपानिधान ! यद्यपि आप सदा ही
सावधान हैं तथापि तुलसी बलिहारी जाता है, आप इसकी बार-
बार सँभाल करते रहियेगा ( ताकि इसके मनमें विकार न
आने पावे ) ।
दिन-दिन दूनो देखि दारिदु, दुकालु, दुख,
दुरितु, दुराजु सुख-सुकृत सकोच है ।
मागें पैंत पावत पचारि पातकी प्रचंड,
कालकी करालता, भलेको होत पोच है ॥
आपनें तौ एकु अवलंबु अंब डिंभ ज्यों,
समर्थ सीतानाथ सब संकट त्रिमोच है ।
तुलसीकी साहसी सराहिए कृपाल राम !
नामकें भरोसें परिनामको निसोच है ॥८१॥
दिनोंदिन दरिद्रता, दुष्काल ( दुर्भिक्ष ), दुःख, पाप और
कुराज्यको दूना होता देखकर सुख और सुकृत संकुचित हो रहे
हैं । समय ऐसा भयंकर आ गया है कि बड़े-बड़े पापी तो डाँट-