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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 228 में से

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पृष्ठ 145

कवितावली १४२
हूँ और न करूँगा ही ! ब्रह्माने भूलकर भी मेरे भाग्यमें भलाई नहीं
लिखी। आपकी शपथ है, हे रामजी ! मुझको केवल आपके नाम-
हीकी गति है। जो यहाँ (आपके सामने) झूठा है वह तो तीनों लोक
और तीनों कालमें झूठा ही है। हे कृपालो ! तुलसीकी भलाई तो
तुम्हारे ही किये होगी; बलिहारी जाऊँ, अब विलम्ब न कीजिये,
क्योंकि मेरी दशा ठीक पानीसे भरी हुई खालके समान है। अर्थात्
जैसे पानीभरी खाल बहुत जल्दी सड़ जाती है वैसे ही मेरे भी नष्ट
होनेमें देरी नहीं है।
रागको न साजु, न बिरागु, जोग, जाग जियँ,
काया नहि छाड़ि देत ठाटिबो कुठाटको।
मनोराजु करत अकाजु भयो आजु लगि,
चाहै चारु चीर, पै लहै न टूकु टाटको ॥
भयो करतारु बड़े कूरको कृपालु, पायो
नामप्रेमु-पारसु, हौं लालची बराटको ।
‘तुलसी’ बनी है राम ! रावरें बनाएँ, ना तो
धोबी-कौसो कूकरु, न घरको, न घाटको ॥६६॥
मेरे पास न तो राग अर्थात् सांसारिक सुख-भोगकी सामग्री
है और न मेरे जीमें वैराग्य, योग या यज्ञ ही है; और यह शरीर
कुचाल चलना नहीं छोड़ता । मनोराज्य (वासनाएँ) करते-करते
आजतक हानि ही होती रही। यह चाहता तो अच्छे-अच्छे वस्त्र
है, परन्तु इसे मिलता टाटका टुकड़ा भी नहीं । हे जगत्कर्ता प्रभो !
आप इस अत्यन्त कुटिलपर भी कृपालु हुए, मुझ कौड़ी (तुच्छ
भोगों) के लालचीने भगवन्नामका प्रेमरूप पारस पाया। हे श्रीरामजी !
यह सब आपके बनाये बनी है, नहीं तो धोबीके कुत्तेके समान