कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १५०
गिरो हियँ हहरि 'हराम हो, हराम हन्यो',
हाय ! हाय ! करत परीगो कालफगमें ॥
'तुलसी' बिसोक ह्वै त्रिलोकपतिलोक गयो
नामकें प्रताप, बात बिदित है जगमें ।
सोई रामनामु जो सनेहसों जपत जनु,
ताकी महिमा क्यों कही है जाति अगमैं ॥७६॥
एक सूअरके बच्चेने किसी अधम, अंधे, मूर्ख और बुढ़ापेसे
जर्जर यवनको राहमें धक्का देकर ढकेल दिया । इससे वह गिर
गया और हृदयमें भयभीत होकर 'अरे ! हरामने मार डाला,
हरामने मार डाला' इस प्रकार हाय-हाय करते-करते कालके फंदेमें
पड़ गया अर्थात् मर गया । गोसाईंजी कहते हैं कि वह यवन
नामके प्रतापसे सब प्रकारके शोकोंसे छूटकर त्रिलोकीनाथ भगवान्
रामके धामको चला गया, यह बात जगत्में प्रसिद्ध है । उसी
रामनामको जो मनुष्य प्रेमपूर्वक जपता है, उसकी अगाध महिमा
कैसे कही जा सकती है ।
जाप की न तप-खपु कियो, न तमाइ जोग,
जाग न विराग, त्याग, तीरथ न तनको ।
भाईको भरोसो न खरो-सो वैरु बैरीहू सों,
बलु अपनो न, हितू जननी न जनको ॥
लोकको न डरु, परलोकको न सोचु, देव-
सेवा न सहाय, गर्बु धामको न धनको ।
रामही के नामतें जो होइ सोइ नीको लागै,
ऐसोई सुभाउ कछु तुलसीके मनको ॥७७॥