कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १४४
काननु कपटको, पयोधि अपराधको ॥
तुलसी-से वामको भो दाहिनो दयानिधानु,
सुनत सिहात सब सिद्ध, साधु, साधको ।
रामनाम ललित ललामु कियो लाखनि को,
बड़ो क्रूर कायर कपूत कौड़ी आधको ॥६८॥
यह नीच निर्लज्जोंकी न्यौछावर और अपकारोंका आगार है,
जिसकी छायाका स्पर्श होनेपर संसारमें व्याध और हिंसक जीव
भी सहम जाते हैं। पापरूप पृथ्वीकी रक्षा करनेके लिये यह
शेषजीके समान है तथा कपटका वन और अपराधोंका समुद्र है।
तुलसी-जैसे उलटी प्रकृतिके पुरुषके लिये दयानिधान (श्रीरामचन्द्र-
जी) दाहिने हो गये—यह सुनकर सब सिद्ध, साधु और साधक-
लोग सिहाते हैं। रामनामने बड़े कुटिल, कायर, कपूत और आधी
कौड़ीके मनुष्यको भी लाखोंका सुन्दर रत्न बना दिया।
सब अँग हीन, सब साधन विहीन, मन-
बचन मलीन, हीन कुल-करतूति हौं ।
बुधि-बल-हीन, भाव-भगति-विहीन, हीन
गुन, ग्यानहीन, हीन भाग हूँ, बिभूति हौं ॥
तुलसी गरीब की गई-बहोर रामनामु,
जाहि जपि जीहँ रामहू को बैठो धूति हौं ।
प्रीति रामनामसों, प्रतीति रामनामकी,
प्रसाद रामनामकें पसारि पाय सूतिहौं ॥६९॥