कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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डपटकर माँगनेसे अपना दाँव पा लेते हैं और भले आदमीका बुरा
हो जाता है । जैसे बालकको एकमात्र माँका ही सहारा होता है
वैसे ही अपने तो एकमात्र सहारा सर्वसंकटोंसे छुड़ानेवाले और
समर्थ श्रीसीतानाथका ही है । हे कृपालु रामजी ! तुलसीके
साहसकी सराहना कीजिये कि वह ( आपके ) नामके भरोसे
परिणामकी ओरसे निश्चिन्त हो गया है ।
मोह-मद मात्यो, रात्यो कुमति-कुनारिसों,
बिसारि वेद-लोक-लाज, आँकरो अचेतु है ।
भावै सो करत, मुहँ आवै सो कहत, कछु
काहूकी सहत नाहिं, सरकस हेतु है ॥
तुलसी अधिक अधमाई हू अजामिलतें,
ताहूमैं सहाय कलि कपटनिकेतु है ।
जैबेको अनेक टेक, एक टेक ह्वैवेकी, जो
पेट-प्रियपूत हित रामनामु लेतु है ॥८२॥
यह मोहरूपी मदसे उन्मत्त हो गया है, कुमतिरूपी कुलटा
स्त्रीमें रत है, लोक और वेदकी लज्जाको त्याग कर बड़ा अचेत
( बेपरवाह ) हो गया है । मनमानी करता है और मुँहमें जो आता
है वही [ बिना विचारे ] कह डालता है और उद्दण्डताके कारण
किसीकी कोई बात सहता नहीं। गोसाईंजी कहते हैं कि इस
प्रकार मुझमें अजामिलसे भी अधिक अधमता है; तिसपर भी
कपटनिधान कलि मेरा सहायक है । बिगड़नेके तो अनेक मार्ग हैं
परन्तु बननेका केवल एक रास्ता है; वह यह है कि यह पेटरूपी
पुत्रके लिये रामनाम लेता है [ भाव यह है कि अधम अजामिल-