कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५५ उत्तरकाण्ड
ने पुत्रके मिससे भगवान्का नाम लिया था। मैंने भी पेटरूपी
पुत्रके लिये उसीका आश्रय लिया है ]।
कलिवर्णन
जागिए न सोइए, बिगोइए जनमु जायँ,
दुख, रोग रोइए, कलेसु कोह-कामको।
राजा-रंक, रागी और विरागी, भूरिभागी,ये
अभागी जीव जरत, प्रभाउ कलि बामको ॥
तुलसी ! कबंध-कैसो धाइबो,विचारु, अंध !
धंध देखिअत जग, सोचु परिनामको ।
सोइबो जो रामके सनेहकी समाधि-सुखु,
जागिबो जो जीह जपै नीकें रामनामको ॥८३॥
(इस संसारमें) न तो हम जागते हैं, न सोते हैं; जीवनको
व्यर्थ खो रहे हैं। दुःख और रोगके कारण रोते हैं और काम-
क्रोधका क्लेश (मानसिक व्यथा) सहते हैं। राजा-रंक, रागी-
विरागी और महाभाग्यवान् तथा अभागी, सभी जीव जल रहे
हैं; कुटिल कलियुगका ऐसा ही प्रभाव है। गोसाईंजी अपने
लिये कहते हैं कि अरे अंधे ! विचार कर, इस जगत्में जितने
धंधे दिखायी देते हैं वे सब कबन्ध (बिना सिरवाले रुण्ड) की
दौड़के समान हैं, जिनका अन्त चिन्ता ही है। श्रीरामप्रेमकी
समाधिका जो सुख है वही सोना है और जिह्वा भलीभाँति
रामनाम जपे—यही जागना है।
बरन-धरमु गयो, आश्रम निवासु तज्यो,
त्रासन चकित सो परावनो परो-सो हैं ।