कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहलाता हूँ। आप दीनोंके बन्धु और दयालु हैं मेरी यह
दीनता है।
रावरो कहावौं, गुनु गावौं राम ! रावरोई,
रोटी द्वै हौं पावौं राम ! रावरी हीं कानि हौं।
जानत जहानु, मन मेरेहूँ गुमानु बड़ो,
मान्यो मैं न दूसरो, न मानत, न मानिहौं ॥
पाँचकी प्रतीति न भरोसो मोहि आपनोई,
तुम्ह अपनायो हौं तबै हीं परि जानिहौं।
गढ़ि-गुढ़ि, छोलि-छालि कुंदकी-सी भाईं वातैं
जैसी मुख कहौं, तैसी जीयँ जब आनिहौं ॥६३॥
हे राम ! मैं आपका कहलाता हूँ और आपहींका गुण गाता
हूँ और हे रघुनाथजी ! आपहीके लिहाजसे मुझे दो रोटियाँ भी मिल
जाती हैं। संसार जानता है और मेरे मनमें भी बड़ा अभिमान है
कि मैंने दूसरेको न माना, न मानता हूँ और न मानूँगा। मुझे न
पंचोंका ही विश्वास है और न अपना ही भरोसा है, मैं गढ़-गुढ़
और छील-छालकर खरादपर चढ़ाई हुई-सी चिकनी-चुपड़ी बातें
बनाता हूँ। वैसी ही जब हृदयमें भी ले आऊँगा तब समझूँगा कि
आपने मुझे अपनाया है।
बचन बिकारु, करतबउ खुआर, मनु
बिगत-बिचार, कलिमलको निधानु है।
रामको कहाइ, नामु बेचि-बेचि खाइ, सेवा-
संगति न जाइ, पाछिलेको उपखानु है॥
तेहू तुलसीको लोगु भलो-भलो कहै, ताको