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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 150

१४७ उत्तरकाण्ड
मानस-वचन-कायँ किए पाप सतिभायँ,
रामको कहाइ दासु दगाबाज पुनी सो ॥
रामनामको प्रभाउ, पाउ, महिमा, प्रतापु,
तुलसी-सो जग मनिअत महामुनी-सो ।
अतिहीं अभागो, अनुरागत न रामपद,
मूढ़ ! एतो बड़ो अचिरिजु देखि-सुनी सो ॥७२॥
मैंने पेटकी आगके कारण ( अपनी ) जाति, सुजाति, कुजाति,
सभीके टुकड़े ( माँग-माँगकर ) खाये हैं—यह बात संसारमें
( सबको ) विदित है; मन, वचन और कर्मसे सच्चे भावसे अर्थात्
स्वाभाविक ही ( बहुत-से ) पाप किये और रामजीका दास कहलाकर
भी दगाबाज ही बना रहा । अब रामनामका प्रभाव, पैठ, महिमा
और प्रताप देखिये, जिसके कारण तुलसी-जैसे ( दुष्ट ) को भी
लोग महामुनि ( वाल्मीकि ) के समान मानते हैं। रे मूढ़ ! तू
बड़ा ही अभागा है; इतना बड़ा अचरज देख-सुनकर भी श्रीरामके
चरणोंमें प्रीति नहीं करता ।
जायो कुल मंगन, बधावनो बजायो, सुनि
भयो परितापु पापु जननी-जनकको ।
बारेतें ललात-बिललात द्वार-द्वार दीन,
जानत हो चारि फल चारि ही चनकको ॥
तुलसी सो साहेब समर्थको सुसेवकु है,
सुनत सिहात सोचु बिधिहू गनकको ।
नामु राम ! रावरो सयानो किधौं बावरो,
जो करत गिरोतें गरु तृनतें तनकको ॥७३॥