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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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१४१ उत्तरकाण्ड
दूसरो न हेतु, एकु नीकें कै निदानु है।
लोकरीति विदित बिलोकिअत जहाँ-तहाँ,
स्वामीकें सनेहँ स्वानहू को सनमानु है ॥६४॥
(जिसकी) बोलीमें विकार है, करनी भी बहुत बुरी है तथा
मन भी विवेकशून्य और कलिमलका भण्डार है। जो श्रीरामचंद्र-
जीका कहलाकर नामको बेंच-बेंचकर खाता है और जैसी कि पुरानी
कहावत है, सेवा और सत्संगमें प्रवृत्त नहीं होता। उस तुलसीको
भी लोग भला कहते हैं। इसका कोई दूसरा कारण नहीं है, केवल
एक निश्चित हेतु है यह प्रसिद्ध लोकरीति और जहाँ-तहाँ देखनेमें
भी आता है कि स्वामीका जहाँ-तहाँ स्नेह होनेपर उसके कुत्तेका
भी सम्मान होता है।
नाम-विश्वास
स्वारथको साजु न समाजु परमारथको,
मोसो दगाबाज दूसरो न जगजाल है।
कै न आयौं, करौं न करौंगो करतूति भली,
लिखी न बिरंचिहूँ भलाई भूलि भाल है ॥
रावरी सपथ, रामनामही की गति मेरें,
इहाँ झूठो, झूठो सो तिलोक तिहूँ काल है।
तुलसी को भलो पै तुम्हारें ही किएँ कृपाल,
कीजै न बिलंबु, बलि, पानीभरी खाल है ॥६५॥
मेरे पास न तो कोई स्वार्थसाधनका ही सामान है और न
परमार्थकी ही सामग्री है। विश्व ब्रह्माण्डमें मेरे समान कोई दूसरा
दगाबाज भी नहीं है। सुकर्म तो न मैं करके आया हूँ, न करता