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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 228 में से

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पृष्ठ 149

कवितावली १४६
अपनी भलाईसे यदि आप मेरा भला कर दें तो अच्छा ही है,
नहीं तो तुलसीके कपटका खजाना खुलेगा ही ।
जोग न बिरागु,जप, जाग, तप, त्यागु,ब्रत,
तीरथ न धर्म जानौं, वेदविधि किमि है ।
तुलसी-सो पोच न भयो है, नहिं हैहै कहूँ,
सोचैं सब, याके अघ कैसे प्रभु छमिहैं ॥
मेरें तौ न डरु, रघुवीर ! सुनौ, साँची कहौं,
खल अनखैहैं तुम्हें, सज्जन न गंमिहैं ।
भले सुकृतीके संग मोहि तुलाँ तौलिए तौ,
नामकें प्रसाद भारु मेरी ओर नमिहै ॥७१॥
मैं न तो अष्टाङ्गयोग जानता हूँ और न वैराग्य, जप, यज्ञ,
तप, त्याग, व्रत, तीर्थ अथवा धर्म ही जानता हूँ । मैं यह भी नहीं
जानता कि वेदका विधान कैसा है । तुलसीके समान पामर न
तो कोई हुआ है और न कहीं होगा । ( इसीलिये ) सभी सोचते
हैं, न जाने, प्रभु इसके पापोंको कैसे क्षमा करेंगे । किन्तु हे
रघुनाथजी ! सुनिये, मैं ( आपसे ) सच कहता हूँ, मुझे कुछ भी
डर नहीं है । ( यदि आप मुझे क्षमा कर देंगे तो ) दुष्ट लोग तो
अवश्य आपसे अप्रसन्न होंगे, किन्तु सज्जनोंको इससे कुछ भी दुःख
नहीं होगा । यदि आप मुझे किसी बड़े पुण्यवान्के साथ तराजू-
पर तोलेंगे तो आपके नामकी कृपासे मेरी ओरका पलड़ा ही
झुकता हुआ रहेगा ।
जातिके, सुजातिके, कुजातिके पेटागि बस
खाए टूक सबके, बिदित बात दुनीं सो ।