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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

सत्यमुकृत आदि अदली अजर अचिन्त पुण्य
मुनीन्द्र कल्याणमय कबीर सुरति योग
सन्तायन धनी धर्मदासकी दया
सर्व सन्त महन्तांकी दया ।

अथ कबीरपंथी-शब्दावली

प्रथम खण्ड-प्रथम विभाग :

संज्ञा सुभिरन-प्रारम्भः

साखी

गुरुको कीजे दण्डवत, कोटि कोटि परनाम ।
कीट न जाने भुंगको, वह करले आप समान॥

संज्ञा गौरी ( समय सुर्यास्त )

गुरुसों लगन कठिन है भाई ॥
लगत लगे बिनु काज न सरिहै, जिय परलेतर जाई ॥
मृगा नाद शब्दका भेदी, शब्द सुनन को जाई ॥
सो शब्द सुनि प्राण दान दे, नेक न तन को डराई ॥
तजि गृहबार सती एक निकसी, सत् करन को जाई ॥
पावक देख डरे नहिं मनमों, कूदपरे सर माई ॥
पपिहा स्वाति-बुन्द के कारण, पिया पिया रट लाई ॥
च्यासे प्राण जाय क्यों न अबहीं, और नीर नहिं भाई ॥

शब्दावली

(४१)

दोय दल आनि जुरे जब सनमुख, सूरा लेत लड़ाई ॥
टूक टूक है गिरे धरणि में, खेत छाड़ि नहीं जाई ॥
छाडे अपने तन की आशा, निरभय है गुण गाई ॥
कहें कबीर ऐसी लव लावे, सहज मिले गुरु आई ॥ १ ॥

साखी

काल खडा शिर ऊपरे, जागु विराने गीत ।
जाका घर है गैलमें, सोव कस सोव निचित ॥

॥ गौरी ॥ २ ॥

॥ सकल तजि नाम सुमिर रे भाई ॥
माटी के सँग माटी मिलिहै, पवन में पवन समाई ॥
जतन जतन कर सुत को पाले, काचा दूध पिलाई ॥
सो बेटा रे काल है बैठे, बाबा कहत लजाई ॥
जो तिरिया मुख बिरिया खवाती, सोवत अंग लगाई ॥
सो तिरिया मुख मोरके बैठी, टूटिगयी सगम सगाई ॥
जो देहिया पर नीर पखारे, चोवा चँदन लगाई ॥
सो देहिया पर काग उड़त हैं, देखत लोग घिनाई ॥
झूठी काया झूठी माया, झूठी लोग लुगाई ॥
कहें कबीर सुनो भाइ साधू, झूठ जगत पतियाई ॥ २ ॥

साखी

साधु हमारे आतमा, हम साधुनके जीव ।
साधुन मध्ये यों रमूँ, ज्यों पय मध्ये घीव ॥

गौरी ॥ ३ ॥

॥ दासपर नाम ध्वजा फहराई ॥
काल जंजाल निकट नहीं आवै, माया देखि डराई ॥
जो कोई दाससे द्रोह विचारे, प्रभु को नाहि सोहाई ॥
हिरण्यकुश की वा गति हो गई, रावण धूर उड़ाई ॥

(४२)

कबीरपंथी—

दुरयोधन परिच्छित राजा, फिर पाछे पछताई॥
सुर पण्डित औ नृपति बादशाह, ऊंची पदवी पाई ॥
भक्ति बिना सब तुच्छ बराबर, बांधे यमपुर जाई ॥
का भये वेद पुराण गुन गाये, सत्य दया नहिं आई ॥
अहंकारमें सबहिं भुलाने, अजगर जनम सो पाई ॥
हम तो कान राखी नहिं भाई, ज्यों का त्यों ठहराई ॥
भावे कोई दुख सुख करि माने, भक्ति के पंथ चलाई ॥
योग, यज्ञ, तीरथ, व्रत, संयम, करनी कोटि कराई ॥
नाम बिना सबही है खाली, कहैं कबीर समुझाई ॥ ३ ॥

संगीतरत्नमालामें यही पद इस प्रकार हैं—
ध्वनी गौरी वृन्दावनी (समय सूर्यास्त)

॥ दास पर नाम ध्वजा फहराई ॥ काल जाल निकट नहिं
आवे, माया देखि डराई ॥ जो कोई दाससो द्रोह विचारे,
प्रभुको नाहिं सुहाई ॥ हरनाकुशकी वह गति हो गई, रावण धूर
उड़ाई ॥ सुर ब्रह्मा नृप अरु इन्द्रकी, ऊंची पदवी पाई । भक्ति
बिना सब तुच्छ बराबर, बांधे यमपुर जाई ॥ कहैं भयो वेद
पुरान पढ़े से, घट महे दया न आई । अहंकारसे भवमें डूबे,
अजगर तन धरि भाई ॥ हमनहिं कान करी काहू की, ज्यों को
त्यों दर्शाई । चाहे कोई सुख कोई दुःख मानो, सत्य कहौं
गोहराई ॥ योग यज्ञ तीरथ व्रत संयम, साधन कोटि कराई ।
विनु गुरु सफल होत नहिं कबहुँ, कहे कबीर समुझाई ॥

साखी ।

नाम लिया तिन सब लिया, सकल वेदका भेद ।
बिना नाम नरके गये, पढ़ि पढ़ि चारों वेद ॥

गौरी ४ ।

॥ बंदे नाम साहेब का ले रे ॥ एक लख पूत सवा लख
नाती, संपति थिर ना रहे रे ॥ लंका ऐसे कोट विनशि गये, छिन

शब्दावली

(४३)

में ऐसो बाव बहे रे ॥ न कोई तेरा तू ना किसी का, पैडोई खलक बहे रे ॥ नदी नाव संयोग जुरो है, ऐसो मिलना हैरे ॥ मातु पिता सुत बंधू तिरिया, कोई न संग चले रे ॥ ये सब हैं स्वारथ के संगी, गुरु विन सुख न लहे रे ॥ छिनकमाहिं तन विनशि जायगा, फिर कछु करिना सके रे ॥ ताते वेग सम्हार अपनपौ, साहेब कबीर कहे रे ॥ ४ ॥

साखी ।

साहब से सब होता है, बन्दे से कछु नाहिं ॥
राई सो परवत करे, परवत राई माहिं ॥

  • गौरी ५ ।

॥ अवधू कुदरत की गति न्यारी ॥ रंक निवाज करै वह राजा, भूपति करै भिखारी ॥ एते लौंग फल नहिं लागे, चंदन फूल न फूला ॥ मच्छ शिकारी रमे जँगल में, सिंह समुद्रहिं झूला ॥ रेंड-हख भयो मलयागिर, चहुँदिशि फूटी बासा ॥ तीन लोक ब्रह्मण्ड खण्डमें, अंधा देख तमासा ॥ पंगुल मेरु सुमेर उलंघे, त्रिभुवन मुक्ता डोले ॥ गुंगा ज्ञान विज्ञान प्रकासे, अन-हद बानी बोले ॥ अकाशहिं बांधि पताल पठावै, शेष र्वर्ग पर राजे ॥ कहैं कबीर राम हैं राजा, जो कछु करे सो छाजे ॥ ५ ॥

आरती प्रारम्भ ।

आरती ॥ १ ॥

जय जय सत्य कबीर । सत्यनाम सत मुक्त; सत रत सत कामी । विगत क्लेश सत धामी, त्रिभुवनपति स्वामी ॥ टेक ॥ जयति जय कबीरम्, नाशक भव भीरम् । धरचो मनुज शरीरम्, शिशु वर सरतीरम् ॥ जय २ ॥ कमल पत्र पर शोभित, शोभाजित कैसे । नीलाचल पर राजित, मुक्तामनि जैसे

  • नोट -और बहुतसी गौरी आगे दिया है सो देखना चाहिये सूचीमें देखनेसे पता मिलेगा ।

(४४)

कबीरपंथी—

॥ जय २ ॥ परम मनोहर रूपम्, प्रमुदित सुखरासी । अति
अभिनव अविनाशी, काशी पुर वासी ॥ जय २ ॥ हंस उबारन
कारन, प्रगटे तन धारी । पारखरूपविहारी, अविचल अधिकारी
॥ जय २ ॥ साहब कबीर की आरति, अगनित अघहारी ।
धर्मदास बलिहारी, सुद मंगल कारी ॥ जय २ ॥

आरति ॥ २ ॥

जय जय श्रीगुरुदेव ।

पारख रूप कृपालम्, सुदमय त्रैकालम् । मानस साधु मरा-
लम्, नाशक भव जालम् ॥ जय २ ॥ कुन्द इन्दु वर सुन्दर,
सन्तन हितकारी । शान्ताकार शरीरम्, श्वेताम्बर धारी
॥ जय २ ॥ शुभ्र सुकुट चर्कांकित, मस्तक पर सोहै । विमल
तिलक युत भृकुटी, लखि सुनिमन मोहै ॥ जय २ ॥ हीरा
मणि सुक्तादिक, भूषित उर देशम् । पद्मासन सिंहासन, स्थित
मंगल वेषम् ॥ जय २ ॥ तरुण अरुण कञ्जांघ्रि, त्रिभुवन वश
कारी । तम अज्ञान प्रहारी, नख छुति अति भारी ॥ जय २ ॥
सत्य कबीर की आरति, जो कोइ गावै । सुक्ति पदारथ पावै,
भवमै नहिं आवै ॥ जय २ ॥

आरती ॥ ३ ॥

संज्ञा आरतीनाम तुम्हारे । अनहद ध्वनि गुरुज्ञान विचारे ॥
ततकर तेल दयाकर दीपा । ब्रह्मअग्नि मन पवन समीपा ॥
पांचो बाती निरमल बारो । सुरति चैँवर ले सनमुख ठारो ॥
प्रेमकर पुहुप धूप धर ध्याना । चित चंदन घसि आगे आना ॥
अविगतरूप अघर परकासा । आरति गावे कविर धर्मदासा ॥

आरती ॥ ४ ॥

संज्ञा आरति करे गुरुसेवा । संपुट खोल मिले गुरुदेवा ॥
तेजपुंजकी ज्योति उजियारा । घंटा झाँझ बजे अधिकारा ॥

शब्दावली

(४५)

अनहद शब्द अखंडित होई । अगवासमें रहे समोई ॥
सुकृत अंश पुरुष को ध्यावे । सतगुरुचीन्ह चरण चितलावे ॥
मनबच कर्म जो आरतिगावे । कहे कबीर सतलोक सिधावे ॥

आरती ॥ ५ ॥

संज्ञाआरति सुकृत कीन्हा । हंस उबरि अपन करलीन्हा ॥
गगनमंडलबिच फुल्य कफुला । तर भी डार उपर भी मूला ॥
गगनमंडलबिच आरति साजे । सोहैं हंसा आन विराजे ॥
तत निहतत मैं जाय समाना । देखहु दीप अघर अस्थाना ॥
कहैं कबीर सुनु साधो भाई । अजर अमर घर रहो समाई ॥

आरती ॥ ६ ॥

संज्ञा आरति करो विचारी । कालहृत जम रहे झखमारी ॥
खुलगइ सुषमन कूंचीतारा । अनहदशब्द उठे झनकारा ॥
सुरत निरत दोय उलटिसमावै । मकरतार जिहिं डोर लगावै ॥
उनसुन शब्द अगम घर होई । अचाह कँवलमें रहे समोई ॥
विगसित कमल होय परगासा । आरतिगावै कविर धर्मदासा ॥

आरती ॥ ७ ॥

संज्ञाआरति सुकृति सँजोई । चरणकमल चित राखु समोई ॥
तिरगुन तेल तत्वकी बाती । ज्योति प्रकाश भरे दिनराती ॥
शून्य शिखर पर झाझर बाजे । महापुरुष घर राज विराजे ॥
शब्दसरूपी आप विराजे । दर्शन होत सकल भ्रम भाजे ॥
प्रेमप्रीति कै सेवा लावै । गुरुगम हो परम पद पावै ॥
सुख अनंद है आरति गावै । कहैं कबीर सतलोक सिधावै ॥

संज्ञासाखी

‘कबीर’ संज्ञासुभिरन आरती, भजन भरोसे दास ।
मनसा बाचा कर्मना, जबलग घटमें श्वास ॥ १ ॥
श्वास श्वास में नाम ले, बूथा श्वास जनि खोय ।
ना जानो यहि श्वास को, आवन होय न होय ॥ २ ॥

(४६)

कबीरपंथी—

श्वासा की कर सुमिरनी, कर अजपा को जाप ।
परम तत्त्व को ध्यान धर, सोऽहं आपै आप ॥ ३ ॥
सोऽहं पोषा पवन में, बांधा मेरु सुमेर ।
ब्रह्मगांठ हिरदय धरो, यहि विधि माला फेर ॥ ४ ॥
माला है निज श्वास का, फेरेंगे कोइ दास ।
चौरासी भरमें नहीं, कटे करमकी फांस ॥ ५ ॥
सदगुरु मोहिं निवाजिये, दीजे अम्मर बोल ।
शीतल शब्द कबीर का, हंसा करें कलोल ॥ ६ ॥
'हंसा' मत डरपो काल से कर मेरी परतीत ।
अमरलोक पहुँचाइहौं, चलो सो भौजल जीत ॥ ७ ॥
भौजल में बहु काग हैं, कोइ कोइ हंस हमार ।
कहे कबीर धर्मदास सो, खेड़ उतारो पार ॥ ८ ॥
अविनासी की आरती, गावैं सत्य कबीर ।
कहैं कबीर सुर नर सुनी, कोइ न लागे तीर ॥ ९ ॥
सांझ भये दिन आथवे, चकई दीन्हौं रोय ।
चल चकवा तहैं जाइये, रैन दिवस ना होय ॥ १० ॥
रैन की बिछुरी चाकई, आन मिली परभात ।
जो जन बिछुरे नाम से, दिवस मिले नहिं रात ॥ ११ ॥
हौं कबीर विचलों नहीं, शब्द मोर समरत्थ ।
ताहि लोक पहुँचाइहौं, चढ़ै शब्द के रत्थ ॥ १२ ॥
तर ऊपर धर्मदास है, जती सती को रेख ।
रहता पुरुष कबीर है, चलता है सब भेष ॥ १३ ॥
भेष बरोबर भेष है, भेद बरोबर नाहिं ।
तौल बरोबर घूँघची, मोल बरोबर नाहिं ॥ १४ ॥

शब्दावली

(४७)

निर्विकार निर्भय तुही, और सकल भय माहिं ।
सबपर तेरी साहिबी, तुझ पर साहेब नाहिं ॥ १५ ॥
भय भञ्जन दुख परिहरन, अम्बर करन शरीर ।
आदि युगादि आप हौ, अदली अदल कबीर ॥ १६ ॥
विनवतहों कर जोरि के सुनु गुरु कृपानिधान ।
संतन का सुख दीजिये, दया गरीबी जान ॥ १७ ॥
दया गरीबी वन्दगी, समिता शील सुभाव ।
इतने लक्षण साधुके, कहैं कबीर विभाव ॥ १८ ॥
बहुत दिननसे जोहता, बाट तुम्हारी राम ।
जिव तरसे तुव मिलनको, मन नाहीं विश्राम ॥ १९ ॥
सो दिन कैसा होगा, गुरु गद्दोगे बांह ।
अपना कर बैठावगे, चरण कमल की छांह ॥ २० ॥
क्या मुखले विन्ती कहुँ, लाज आवत है मोहि ।
हमतो औगुन बहु किये, कैसे भावो तोहि ॥ २१ ॥
सुरति करु मोरि साइयाँ, हम हैं भव जल माहिं ।
आपेही बहिजायँगे जो नहिं पकडो बांहि ॥ २२ ॥
मैं अपराधी जनम का, नख सिख भरा विकार ।
तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो उबार ॥ २३ ॥
औगुन मेरे बापजी, बखशो गरीब निवाज ।
जो हौं पूत कपूत हौं, तोहु पिताको लाज ॥ २४ ॥
साहब तुम जनि वीसरो, लाख लोग लगि जाहिं ।
हम सन तुम्हरे बहुत हैं, तुम सन हमरे नाहिं ॥ २५ ॥
कर जोरे विन्ती कहुँ, भवसागर आपार ।
बन्दा ऊपर मिहर करी, आवागमन निवार ॥ २६ ॥

(४८)

कबीरपंथी-

अन्तरजामी एक तू, आतम के आधार ।
जो तू छाडे साथको, कौन उतारे पार ॥ २७ ॥
अबकी जो साई मिले, सब दुख आँखों रोय ।
चरणों ऊपर शिर धरूँ, कहूँ जो कहना होय ॥ २८ ॥
साहब तुमहिं दयाल हो, तुम लग मेरी दौर ।
जैसे काग जहाज को, सुझे और न ठौर ॥ २९ ॥
मुझमें अवगुन तुझहि गुन, तुझगुन अवगुन मुझ ।
जो मैं विसरूँ तुझको, तू नहिं विसरे मुझ ॥ ३० ॥
तेरे विसरे क्यों बने, मैं किस शरने जाँव ।
शिवविरंचि मुनि नारदा, तिन हृदय नसमाव ॥ ३१ ॥
मैं तो भूल बिगारिया, जनिकर मैला चित्त ।
साहब गुरुवा चाहिये, नफर विगारे नित्त ॥ ३२ ॥
औगुन किया तो बहु किया, करत न मानी हार ।
भावे बन्दा बखशिये, भावे गर्दन मार ॥ ३३ ॥
साई केरा बहुत गुन, औगुन एको नाहिं ।
जो दिल खोजा आपना, सब अवगुनमुझ माहिं ॥ ३४ ॥
मुझमें गुन एको नहीं, जान राय शिर मौर ।
तेरे नाम प्रतापसे, पाऊँ आदर ठौर ॥ ३५ ॥
मैं खोटा साई खरा, मैं गादा मैं गारि ॥
मैं अपराधी आत्मा, साई सरन उबारि ॥ ३६ ॥
और पतित तो कूप हैं मैं हूँ समुद्र समान ।
मोहि टेक तोहि नामकी, सुनियो कृपानिधान ॥ ३७ ॥
अवसर बीता अलप तन, पीव रहा परदेश ।
कलंक उतारो रामजी, भानो भरम संदेश ॥ ३८ ॥

शब्दावली

(४९)

साई मोर सावध अहै, मैही भया अचेत ।
मन बच कर्म न हरि भजा, ताते निरफल खेत ॥ ३९ ॥
मन परतीत न प्रेमरस, ना कोइ तनमें ढंग ।
ना जानो वा पीवसो, कयोंकर रहसी रंग ॥ ४० ॥
साई तो जब मिलेंगे, पूछेंगे कुशलात ।
आदि अन्तकी सब कहूँ, उरअन्तरकी बात ॥ ४१ ॥
अब सागर तो भारी भया, गहरा अगम अथाह ।
तुम दयाल दयाकरो, तब पाऊँ कछुथाह ॥ ४२ ॥
सतगुरु बडे दयाल हैं, संतनके आधार ।
भव सागर अथाहसो, खेइ उतारें पार ॥ ४३ ॥

विज्ञानतोत्र

सत्य सत्यके नामसों सत्य सागर भरा, सत्यके नाम तिहुँ
लोक छाजा ॥ सन्तजन आरति करें प्रेमतारी भरेँ, ढोलनिश्शान
मिरदंग बाजा ॥ भक्ति सांची किया नाम निश्चैलिया, शून्यकी
शिखर ब्रह्माण्ड गाजा ॥ सत्य कवीर सर्वज्ञ साहब मिले; भजो
सत्यनामका रंक राजा ॥ कबीर, हम दीन दुनी दरवेशा । हम
किया सकल परवेशा ॥ हम दुवा सलामत लेखा । हम शब्द
सरूपी पेखा ॥ हम रुंध मुंड में फीरा । हम फाका फकर
फकीरा ॥ हम रमे कौन की नाल । हम चलैं कौन की चाल ॥
हम सरबझी सहजे रमे, हमरी वार न पार ॥ वार भी हमही पार
भी हमही, नाना दरिया तीर ॥ सकल निरंतर हम रमे, हम
गहिरे गहर गंभीर ॥ खाली खलक खलक के माँही, यों गुरु
कहैं कबीर ॥ सत्यनाम की आरती, निरमल भया शरीर ॥ सत
सुकृत लौलीन है, ज्ञान ध्यान लो थीर । “धर्मदास लोके गये
गुरु बहिंयां मिले कबीर” धर्मदास लोके गये, छाड़ि सकल

(५०)

कबीरपंथी—

संसार ॥ हंसन पार उतारहीं, गुरु धर्मदास परिवार ॥ अजावन से जावन भया, जावन से भयै मूल ॥ चहुँ दिशि फूटी बासना रही कली में फूल ॥ जब फूले तब गिरि पडे, चरन कमल की धूर ॥ कली फावरी हो रही साहब हाल हजूर ॥ कबीर मिले धर्मदासको, लिख परवाना दीन्ह ॥ आदि अन्त की बीनती, यही लोक को चीन्ह ॥

“ बिना देह साहब निरालम्ब जानी ”

अति लौलीन चीन्हन्त ज्ञानी । शब्देसरूपी सुनाकाशवानी ॥ जानेजनावैकहावैन देवा । ऐसातत्वपुजेपुजावैलगावै न सेवा ॥ सदाध्यानधारी अखंडेनिगसा । सदासिंधुपीवै न जावेपियासा ॥ प्रेमधामधीरा उदासी अकेला । लौलीन योगी गुरु ज्ञान मेला ॥ मिलन्ताचलन्तारहन्ता अपारी । ऐसीदृष्टिदेखोअनंतोविचारी ॥ सदा चेत चेतंत चितवंत सूर। ऐसा रूयाल खेलंत बूझंत पूरा न ज्ञानो न ध्यानो न मान मानों । नहीं चंद्र तारा ऊगे न भानो ॥ आगे न पीछे न मध्ये न कोई । ज्यों काजला ब्रह्म त्यों तत सोई ॥ डारो न मूलो न वृक्षो न छाया । जीवो न शीवो न कालो न काया ॥ दृष्टी न मुष्टी न देवी न देवा । जापो न थापो न पूजा न सेवा ॥ नहीं पौन पानी न चंदे न सूर। अखंडित ब्रह्म सोई सिद्धपूरा । हमनाहीं तुमनाहीं बंधू न भाई । निराधार आधार रंको न राई ॥ गावै न ध्यावै न हेली न हेला । नारी न पुरुषो न खेली न खेला ॥ नहीं पेट पुष्टि न पावों न माथा । न जीवो न शीवो न नाथो अनाथा ॥ शेषो महेशो गनेशो न ग्वालं । गोपी न ग्वाले न कंसे न कालं ॥ आसे न पासे न दासे न देवा । आवै न जावे लगावै न सेवा ॥ नहीं वार पारे न नियरे हजुर। ज्योंका त्यों तत्त गहिरे गंभीरा ॥ यंत्रे न मंत्रे न दरदे

शब्दावली

(५१)

न थोका । नरके न सरगे न संसे शोका ॥ सेते न पीते न सञ्जे
न लालं । गोरै न सँवरे न बृद्धे न बालं ॥ भेदा अभेदा न खेदा
न कोई । सदा सुरति सोहँग एकै न दोई ॥ जाने जनावे जनावे
न झूरा । वारे न पारे न नियरे हजूर ॥ नादे न विंदे न जिदे न
जीवा । निरंतर ब्रह्म एकै शक्ती न शीवा ॥ नहींयोगयोगी न भोगी
न भुक्ता । सच्चिदानंदसाहब बंधो न मुक्ता ॥ खेले खेलावै खेलावे
औ खेले । चेत चेतावे चेतावे औ चेत ॥

“एके अनेके अनेके सो एकै”

चितगुण चित विलास दास सो अंतर नाही । आदि अंत
में मध्य गोसाई अगह गहन में नाही ॥ गहनीगहिए सो कैसा,
सोहं शब्दसमानआदिब्रह्मजैसेका तैसा ॥ “कहैं कबीर हम खेलैं
सहज सुभावा” अकह अडोल अबोल सोहं समिता । तामो आन
बसा एकरमिता ॥ वा रमता को लखे जो कोई । ता को आवा-
गमन न होई ॥ “ओऽहं सोऽहं सोहं सोई ।”

ओहम्म कीलक सोहम्मवाला । ओऽहं सोऽहम्म बोले रिसाला ॥
किलक कमत कंमोद कंकवत, ये चारों गुरु पीर ॥ धर्मदास
को शब्द सुनायो, सतगुरु सत्य कबीर ॥ बाजा नाद भया पर
तीत । सतगुरु आये भौजल जीत ॥ बाजबाज साहब का राज
मारा कूटा दगाबाज ॥ हाजिरको हजूर गाफिलको दूर हिंदूका
गुरुमुसलमानका पीर “सात द्वीत नौखंड में, सोहं सत्यकबीर”

इति श्रीविज्ञानस्तोत्र समाप्तः ।

दयासागरस्तुति ।

गुरु दयासागर ज्ञान आगर, शब्दरूपी सतगुर । तामु चरण
मरोज बंदों, सुखदायक सुखसागर ॥ योगजीत अजीत अम्मर,

(५२)

कबीरपंथी—

भाषते सत सुकृतं । दयापाल दयाल स्वामी, ज्ञानदाता इस्थितं ।
क्षमाशील संतोष समिता, आनंदरूपी हिरदयं । सहजभाव विवेक
इस्थिर, निरमाया निहसंशयं ॥ निरमोही निरवैर निरभै, अकथ
कथिता अविगतं ॥ उपकार औ उपदेशदाता, मुक्तिमार्ग सत-
गुरं ॥ दास भाव की प्रीति बिनती, भक्ति करन करावनं ।
चौरासी बन्धन कर्म खण्डन, बन्दीछोर कहावनं ॥ त्रिगुणरहिता
सत्य बकता, सत्लोक निवासितं । सतपुरुष जहाँ सत्साहब,
तहाँ आप विराजितं ॥ युगन युगन सतपुरुष आज्ञा, जीवन
कारण पगुधरं । दीन लीन अचान ह्वैके, जगतमें डोलत फिरं ॥
करुणामय कवीर केवल, सुखदायक सर्व लायकं । जम भयंकर
मान मरदन, दुखित जीव सहायकं ॥

जीवके उद्धारका मार्ग

धर्मदास करजोर बिनवे, दया करो मन बसकरं । कहूँसेवा
गुरुभक्ति अविचल, निसदिनअराधोसुमिरणं ॥ सदगुरु की अधिक
महिमा, ज्ञान कुण्ड नहाइये । भ्रमति मन तब होय स्थिर, बहुरि
न भौजल आइये ॥ साधुसन्त की अधिक महिमा, रहनि कुण्ड
नहाइये ॥ काम कोष विकार परिहरि बहुरि न भौजल आइये ।
दासतनकी अधिक महिमा, सेवाकुण्ड नहाइये ॥ प्रेमभक्ति पति
व्रत हटकरि, बहुरि न भौजल आइये । योगीजन की अधिक
महिमा, मुक्तिकुण्ड नहाइये । चन्दसूर मन गगन थिरकरि,
बहुरि न भौजल आइये ॥ श्रोता बक्ता की अधिक महिमा,
विचारकुण्ड नहाइये । सारशब्दनिवेरि लीजे, बहुरि न भौजल
आइये । गुरु साधुसन्त समाज मध्ये, भक्ति मुक्ति हटाइये ।
सुरतिकर सत्लोक पहुँचे, बहुरि न भौजल आइये ॥ धर्मदास
प्रकाश कीन्हो, अकह कुण्ड नहाइये । सकल कलविष धोय

शब्दावली

(५३)

निर्मल, बहुरि न भोजल आइये ॥ साहब कबीर प्रकाश सदगुरु, भली सुमति दिठाइये । सार में ततसार दरसे, सोई अकल कहाइये । धर्मदास पट खोलि देखो, तत्त्व में निहतत्त्व है । कहैं कबीर निहतत्त्व दरसे, आवागमन निवारिये ॥

इति श्रीव्यासागरस्तुति समाप्तः

चेतावनी

नमो ! नमो धर्मनि पातक, पूर रहो मद काम । जिनको लोक बासा दिया, अधम उधारण नाम ॥ अनेक बन्धनते बाँधिया; एक विचारा जीव । अपने बल छूटे नहीं, तुमहिं छुडावहु पीव ॥ मैं अपराधी जनमका, नख शिख भरा विकार । तुम दाता दुख भजना, मेरी करो उबार ॥ अवगुण मेरे बापजी बकसो गरीब निवाज । मैं तो पूत कुपूतहों, तुम्ही पिता कोलाज ॥ विनती है निज दास की, सुनिये दीनदयाल । दास आपनो जानिके, सतगुरु होहु कृपाल ॥ 'कबीर' जम्मन जाय पुकारिया, धर्मराय दरबार । हंस मवासी है रहा, लगे न फाँस हमार ॥ हमरी शंका ना करे, तुम्हरी धरै न धीर । सतगुरु के बल गाजहीं, कहैं कबीर कबीर ॥ कबीर कहंता जानदे, मेरी दसी न जाय । खेवटिया के नाव पर, चढ़े चनोरे आय ॥ बाजा बाजा रहित का, परानगरमें शोर ॥ सदगुरु खसम कबीर है नजरन आवे और ॥

सत्यका शब्द

सत्का शब्द सुन भाई फकीरी अदल बादशाही ॥ साधो बन्दगी दीदार । सहज उतर सायर पार ॥ सोहं शब्दसे कर प्रीति । अनभय अखण्ड घरको जीत ॥ तन में खबर कर भाई जा में नाम रुशनाई ॥ सुरतिनगरमें वस्ती खूब । बेहद उलट चढ महबूब ॥ मूरति नगरामें कर सैल । जामें आतमा को महेल ॥

(५४)

कबीरपंथी—

अमरी मूलसन्धि मिलाव । जापर रखो बाँयाँ पांव ॥ दहिना मध्यमें धरना । आसन अमर यों करना ॥ द्वादश पवन भर पीजे । शशिघर उलट चढ़लीजे ॥ तन मन वारना कीजे । उलट निज नामरस पीजे ॥ तन मन सहित राखो श्वास ॥ इस बिध करो बेहद बास ॥ दोनों नैन के कँर बान । भौरा उलटि कस कमान ॥ परबत छके दरिया जान । करले तिरकुटी अस्नान ॥ सहज परस पद निर्बान । तेरा मिटे आवाजान ॥ जा में गैव का बाजार । सरबर दोह दीसे पार ॥ जा बिच खड़ीकुदरत झार । शोभा कोटि अगम अपार ॥ लागे नौलख तारा फूल । करनी कोटि जरिया मूल ॥ ताको देखना मत भूल । रमता राम आप रमूल ॥ माया भरम की कांची । देखु दिल अन्दरकी सांची ॥ वरषे तूर बिन मोती । चन्दा सूर की जोती ॥ झलके झिलमिला नारी । ताबिच अरूप है कयारी मानो प्रेम की झारी । खुलगई अगम किंवारी ॥ बेडा भरम का खोया । दीपक नामका जोया ॥ जोगी जुगतसे जीवे । प्याला प्रेम का पीवे ॥ मौला पीव को दीजे । तनमनकुरखान करलीजे ॥ परी है प्रेम की फांसी । मनुवां गगनका बासी ॥ बाजे बिना तन्ती तूर । सहजे ऊगे पछिम सूर ॥ भौरा सुगंध का प्यासा । किया है कमलमें बासा ॥ रमता हंस है राजा । सहजे पलक आवाजा ॥ सुन्दर श्याम घन लाया । बादल गगनमें छाया ॥ अमृत बूंद झर लाया । देखि दोह नैन ललचाया ॥ अजब दीदार को पाया । दरिया सहजमें नहाया । दरिया उलट उमगे नीर । ता बिच चले चौसठ छोर ॥ हंसा आन बैठे तीर । सहज जुगे मुक्ता हीर ॥ मिला है प्रेम का प्यारा ॥ नहीं है नैन सों न्यारा ॥ जीवनमृत न व्यापेकाला । जो त्रिकुटीसे पलक न

शब्दावली

(५५)

टाला ॥ पल जब पीव से लाग। धोखा तब दिलों का भागा ॥
चेतावनी चित विलास । जबलग रहे पिंजर श्वास ॥ सोहंशब्द
अजपाजाप । साहब कवीरसो आपहिंआप ॥

साखी ।

चेतावनि चितलागि रहे, यह गति लखै न कोय । अगम
पन्थ के महल में, अनहद बानी होय ॥ नाम नैन में रमि रहा,
जाने बिरला कोय । जाको सतगुरु मीलिया, ताको मालुम
होय ॥ झण्डा रोपा गैब का, दोय परवत के सन्ध । साधु पहि-
चाने शब्द को, दृष्टि कमल कर बन्ध ॥ झलके जोती झिल-
मिला, बिन बाती विन तेल ॥ चहुँदिशि सूरज ऊगिया, ऐसा
अदभुत खेल ॥ जागृत रूपी रहत है, सतमत गहिर गंभीर ।
अजरनाम बिनसे नहीं, सोऽहं सत्य कवीर ॥

॥ इति चेतावनी ॥

ज्ञानगुदरी ।

अलखपुरुष जब किया बिचारा । लख चौरासीधागा डारा ॥
पांच पत्तव की गुदरी बीनी । तीन गुणनसे ठाढी कीनी ॥ ता में
जीव ब्रह्म औ माया । समरथ ऐसा खेल बनाया ॥ सीवन पांच
पचीसो लागे । काम क्रोध मोह मद पागे ॥ काया गुदरी का
बिस्तारा । देखो सन्तो अमर सिंगरा ॥ चांद सूर दोह पैवैंद
लागे । गुरु प्रताप से सोवत जागे ॥ शब्दकी सुई सुरतिकाडोरा ।
ज्ञानके टोभन सिरजनडोरा ॥ अबगुदरीकी करु हुशियारी । दाग
न लागे देखुबिचारी ॥ सुमतकी साबुन सिरजनधोई । कुमत
मैलको डारो खोई ॥ जिनगुदरीका कियाविचारा ॥ सोजन भेटे
सिरजन हारा ॥ धीरजधुनीध्यान धर आसन । सतकी कोपीनसहज
सिंगासन ॥ जुगतकमंडल कर गहि लीन्हा । प्रेम पावडी मुरशद

(५६)

कवीरपंथो-

चीन्हा ॥ सेलीशील बिबेककी माला । दयाकी टोपी तनधर्म-
शाला ॥ मिहर मंतंगा मन वैशाखी । मृगछाला मनहीको राखी॥
निहचे धोती पवन जनेउ । अजपा जपे सो जाने भेऊ ॥ रहे
निग्नतर सतगुरु दाया । साधु सँगतकर सबकछु पाया ॥ लौकी
लकुटी हिरदया झोरी । क्षमा खड़ाऊँ पहिर बहोरी ॥ मुक्ति
मेखला सुकृत सुमिरनी । प्रेम पियाला पीवे मौनी ॥ उदास
कूबरी कलह निवारी । ममता कुत्तीको ललकारी ॥ जुगतजंजी-
रवांथजब लीन्हा । अगम अगोचरखिरकी चीन्हा ॥ विराग-
त्याग बिज्ञान निधाना । तत्ततिलकदीन्होनिरबाना ॥ गुरुगम
चकमकमनसमतूला । ब्रह्म अगिनपरगटकरमूला ॥ संशय शोक
सकल भ्रम जारा । पांच पचीसो परगटमारा ॥ दिलका दरपन
दुबिधा खोई । सो बैरागी पक्का होई ॥ शून्य महल में फेरीदेई।
अमृतरसकी भिच्छा लेई ॥ दुखसुख मेला जगका भाऊ । तिर-
बेनीके घाट नहाऊँ ॥ तनमनशोधि भयाजेहि ज्ञाना । सोलखि
पावे पद निर्बाना ॥ अष्ट कमलदल चक्रर सोधे । जोगी आप
आपमें बोधे ॥ ईगला पिगलाके घर जाई । सुषमन नीर रहा
ठहराई ॥ वोह सोह तत्त्व बिचारा । बंकनालमें किया सँभारा ॥
मनको मार गगन चढिजाई । मानसरोवर पैठि नहाई ॥ अनह-
दनाद नामका पूजा । ब्रह्म बैराग देव नहि दूजा ॥ छुटगइ कश-
मल कर्मजलेखा । यहि नैनन साहबको देखा ॥ अहंकार
अभिमान बिडारा । घटका चौकाकर उजियारा ॥ चितकर
चंदन मनसा फूला । हितकर संपुट करले मूला ॥ शरधा चैवर
प्रीति कर धूपा । नौतम नाम साहबका रूपा ॥ गुदरी पहिरे
आप अलेखा । जिन यह प्रगट चलाई भेखा ॥ साहबकवीरब
स्निशजबदीन्हा । सुरनरमुनिसबगुदरी लीन्हा ॥ ज्ञानगूदरी पठे-

शब्दावली

(५७)

प्रभाता । जनम २ के पातक जाता ॥ ज्ञानगुदरी पढे मध्याना
सो लखि पावे पद निर्वाना ॥ संज्ञा सुमिरण जो नर करई । जरा
मरण भौसागर तरई ॥ कहैं कवीरा सुनो धर्मदासा । ज्ञानगुदरी
करचो प्रगासा ॥

साखी

माला टोपी सुमिरनी, सदगुरु दिया बखशीश । पल २ गुरु
को बंदगी, चरण नवाऊँ शीश ॥ भौ भंजन दुख परिहरन, अम्बर
करन शरीर । आदियुगादि आप हो, चारो युग कव्वीर ॥ बंदी-
छोर कहाइया, बलख शहर मंझार । छूटे बंद सब भेष के, धन
धन कहे संसार ॥

॥ इति श्रीज्ञानगुदरी सम्पूर्णम् ॥

रतनास्तुति

गुरुध्यानसार भजबारबार ।

सब तजबिकार सतनामसार सों कर यारी ॥ जय जय गुरु-
पीरं सत्यकबीरं, अमरशरीरं अधिकारी ॥ निर्गुण निज मूलं
धरि अस्थूलं, काटें शूलं भवभारी ॥ सूरति निज सोहं कलिमल-
खोहं, जन मनमोहं छबिभारी ॥ अम्बरपुरबासी सब सुखरासी,
सदा बिलासी बलिहारी ॥ पीरनके पीरा मतिके धीरा, अलख
फकीरा ब्रह्मचारी ॥ हंसन हितकारी जग पगुधारी, गरभप्रहारी
उपकारी ॥ काशी आये दास कहाये, हंस बचाये प्रणधारी ॥
रामानंदस्वामी अन्तर्यामी, हैं वड़नामी संसारी ॥ उनको गुरु-
कीन्हा मतबुधलीन्हा, उनहुन चीन्हा करतारी ॥ ब्राह्मणसन्यासी
कीन्हीहांसी, तब अविनाशी पगुधारी ॥ मगहर स्थाना किया
पयाना, दे परवाना जन तारी ॥ तहैं बलबीरा तजे शरीरा,

(५८)

कवीरपंथी-

काटन पीरा भव भारी ॥ बिरसिघदेवराजा, सुनबलगाजा सबदल
साजा संभारी ॥ उत्त पीर पठाना है बलवाना, लाय कमाना कर
डारी ॥ सनमुख नियराना छूटे बाना, भै घमसाना रण भारी ॥ तब
गुरुज्ञानी मनकी जानी, अधरहिं बानी उच्चारी ॥ खोलोपरदा है
नहिं सुरदा, जूझ अवस्था करडारी ॥ सुनिके यह बानी अचर
जमानी, देख निशानी सिरमारी ॥ रोये परवीना हम मतिहीना,
तुमहिं न चीन्हा करतारी ॥ मगहर तजि बासा किया प्रकाशा,
जहँ धर्मदासा ब्रतधारी ॥ तिनको शिष कीन्हा सर्वस दोन्हा,
दुख हरलीन्हा यमभारी ॥ सतपन्थ चलाये भ्रम मिटाये, शब्द
दिढाये संसारी ॥ रतनाजन तेरो करत निहेरो, हमतन हेरो
बलिहारी ॥

अष्टक ।

साहब गुरुज्ञानी समरथध्यानी, अचल स्थानीस्थीरं ॥ अवि-
गतवानी मुक्तिनिशानी, जगमें आनी कब्बीरं ॥ शीशबिराजे
तिलक अखण्डित, मुख सतसुकृत गम्भीरं ॥ ज्ञान प्रचण्डित
पाखंड खण्डित, समता मंडित कब्बीरं ॥ भेष रिसाला श्रवनी
माला, प्रेम उजाला किर्पा गहिरं ॥ दीनदयालं जन प्रतिपालं,
सदा कृपालं कब्बीरं ॥ संकट टारन कष्ट निवारन, शीश विदा-
रन यम थीरं ॥ हंस उबारन जिव निस्तारन, भर्म विदारन
कब्बीरं ॥ सतयुग, त्रेता, द्वापर बीता, रमता तीता पर पीरं ॥
कलयुग कीता सबसों जीता, परम पुनीत कब्बीरं ॥ काशी छोड़
उडीसा आये, आसा गाडे सिन्ध तीरं ॥ ठाकुर पंडो गर्ब बिहंडो,
पाखंड खंडो कब्बीरं ॥ पुरुष विदेही अविचल देही, नाम सनेही
मन थीरं ॥ जो जन जाने भेटे तेही, दर्शन दे गुरु कब्बीरं ॥
कवीरं अष्टक टारन कष्टक, भौजल नष्टक कर थीरं ॥ धर्मनि-
दासं नित अभ्यासं, प्राप्त तासं कब्बीरं ॥

शब्दावली

(५९)

स्मृति ।

गुरु दुखित तुम विन रटत द्वारे, प्रगट दर्शन दीजिये ॥
गुरुसामियांसुनु विनतिमोरी, बलिजाउँ बिलंब न कीजिये ॥ गुरु
नैन भरभर रहत हेरो, निमिख नेह न छाडिये ॥ गुरु बाँह दीजे
बन्दछोर, सो अबकी बन्द छुड़ाइये ॥
विविध विधि तन भयेउ व्याकुल, विन देखे अब नारहों ॥ तपत
तनमन उठत ज्वाला, कठिन दुख कैसे सहों ॥ गुन औगुम अप-
राध छमाकरि, अब न पतित विसारिये ॥ यह विनती धर्मदास
जनकी, सतपुरुष अवमानिये ॥

विनय ।

दरस दीजै गुरु परम स्नेही । तुम विनु दुख पावे मोर देही ॥
अन्न न भावै नींद नहिं आवै । बारबार मोहि विरह सतावै ॥
घर आंगनमोहि कछु न सुहावै । वज्र भयो यहविरह नजावै ॥
नैनानीर बहे जलधारा । निसिदिन पंथ निहारुं तुम्हारा ॥ जैसे
निजधन जातहिराई । ऐसे तुम विनु कछु न सुहाई ॥ जैसे मनि
विनु फानि बेकरारा । ऐसे तुम विनु हाल हमारा ॥ हे कर्ता तुम
अपरम्पारा । केहि कारन गुरु मोहि विसारा ॥ जैसे मीन मरे
विनु नीरा । ऐसे तुम विनु दुखित शरीरा ॥ छन्द ॥ दुखित
तुम विनु रटत द्वार, प्रगट दर्शन दीजिये ॥ विनति सुनु स्वामिया
वलि जावैं विलंब न कीजिये ॥ विविध विधि हम भय हैं व्या-
कुल, विनदेखे जिव ना रहै ॥ तपत तन मन उठत ज्वाला, कठिन
दुख अब को सहे ॥ गुन औगुन अपराध छिमाकरि औगुन कछु
न विचारिये ॥ पतित पावन राखलाज, अब न पतित विसारिये ॥
वंदीछोर अब बाँह दीजे, अब की बन्द छुड़ाइये ॥ नैन भरि
भरि रहैं निरखत, निमिख नेह न तोरिये ॥ दासधर्मनि करत