कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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निर्विकार निर्भय तुही, और सकल भय माहिं ।
सबपर तेरी साहिबी, तुझ पर साहेब नाहिं ॥ १५ ॥
भय भञ्जन दुख परिहरन, अम्बर करन शरीर ।
आदि युगादि आप हौ, अदली अदल कबीर ॥ १६ ॥
विनवतहों कर जोरि के सुनु गुरु कृपानिधान ।
संतन का सुख दीजिये, दया गरीबी जान ॥ १७ ॥
दया गरीबी वन्दगी, समिता शील सुभाव ।
इतने लक्षण साधुके, कहैं कबीर विभाव ॥ १८ ॥
बहुत दिननसे जोहता, बाट तुम्हारी राम ।
जिव तरसे तुव मिलनको, मन नाहीं विश्राम ॥ १९ ॥
सो दिन कैसा होगा, गुरु गद्दोगे बांह ।
अपना कर बैठावगे, चरण कमल की छांह ॥ २० ॥
क्या मुखले विन्ती कहुँ, लाज आवत है मोहि ।
हमतो औगुन बहु किये, कैसे भावो तोहि ॥ २१ ॥
सुरति करु मोरि साइयाँ, हम हैं भव जल माहिं ।
आपेही बहिजायँगे जो नहिं पकडो बांहि ॥ २२ ॥
मैं अपराधी जनम का, नख सिख भरा विकार ।
तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो उबार ॥ २३ ॥
औगुन मेरे बापजी, बखशो गरीब निवाज ।
जो हौं पूत कपूत हौं, तोहु पिताको लाज ॥ २४ ॥
साहब तुम जनि वीसरो, लाख लोग लगि जाहिं ।
हम सन तुम्हरे बहुत हैं, तुम सन हमरे नाहिं ॥ २५ ॥
कर जोरे विन्ती कहुँ, भवसागर आपार ।
बन्दा ऊपर मिहर करी, आवागमन निवार ॥ २६ ॥