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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(५१)

न थोका । नरके न सरगे न संसे शोका ॥ सेते न पीते न सञ्जे
न लालं । गोरै न सँवरे न बृद्धे न बालं ॥ भेदा अभेदा न खेदा
न कोई । सदा सुरति सोहँग एकै न दोई ॥ जाने जनावे जनावे
न झूरा । वारे न पारे न नियरे हजूर ॥ नादे न विंदे न जिदे न
जीवा । निरंतर ब्रह्म एकै शक्ती न शीवा ॥ नहींयोगयोगी न भोगी
न भुक्ता । सच्चिदानंदसाहब बंधो न मुक्ता ॥ खेले खेलावै खेलावे
औ खेले । चेत चेतावे चेतावे औ चेत ॥

“एके अनेके अनेके सो एकै”

चितगुण चित विलास दास सो अंतर नाही । आदि अंत
में मध्य गोसाई अगह गहन में नाही ॥ गहनीगहिए सो कैसा,
सोहं शब्दसमानआदिब्रह्मजैसेका तैसा ॥ “कहैं कबीर हम खेलैं
सहज सुभावा” अकह अडोल अबोल सोहं समिता । तामो आन
बसा एकरमिता ॥ वा रमता को लखे जो कोई । ता को आवा-
गमन न होई ॥ “ओऽहं सोऽहं सोहं सोई ।”

ओहम्म कीलक सोहम्मवाला । ओऽहं सोऽहम्म बोले रिसाला ॥
किलक कमत कंमोद कंकवत, ये चारों गुरु पीर ॥ धर्मदास
को शब्द सुनायो, सतगुरु सत्य कबीर ॥ बाजा नाद भया पर
तीत । सतगुरु आये भौजल जीत ॥ बाजबाज साहब का राज
मारा कूटा दगाबाज ॥ हाजिरको हजूर गाफिलको दूर हिंदूका
गुरुमुसलमानका पीर “सात द्वीत नौखंड में, सोहं सत्यकबीर”

इति श्रीविज्ञानस्तोत्र समाप्तः ।

दयासागरस्तुति ।

गुरु दयासागर ज्ञान आगर, शब्दरूपी सतगुर । तामु चरण
मरोज बंदों, सुखदायक सुखसागर ॥ योगजीत अजीत अम्मर,