कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 54, कुल 968 में से
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कबीरपंथी-
अन्तरजामी एक तू, आतम के आधार ।
जो तू छाडे साथको, कौन उतारे पार ॥ २७ ॥
अबकी जो साई मिले, सब दुख आँखों रोय ।
चरणों ऊपर शिर धरूँ, कहूँ जो कहना होय ॥ २८ ॥
साहब तुमहिं दयाल हो, तुम लग मेरी दौर ।
जैसे काग जहाज को, सुझे और न ठौर ॥ २९ ॥
मुझमें अवगुन तुझहि गुन, तुझगुन अवगुन मुझ ।
जो मैं विसरूँ तुझको, तू नहिं विसरे मुझ ॥ ३० ॥
तेरे विसरे क्यों बने, मैं किस शरने जाँव ।
शिवविरंचि मुनि नारदा, तिन हृदय नसमाव ॥ ३१ ॥
मैं तो भूल बिगारिया, जनिकर मैला चित्त ।
साहब गुरुवा चाहिये, नफर विगारे नित्त ॥ ३२ ॥
औगुन किया तो बहु किया, करत न मानी हार ।
भावे बन्दा बखशिये, भावे गर्दन मार ॥ ३३ ॥
साई केरा बहुत गुन, औगुन एको नाहिं ।
जो दिल खोजा आपना, सब अवगुनमुझ माहिं ॥ ३४ ॥
मुझमें गुन एको नहीं, जान राय शिर मौर ।
तेरे नाम प्रतापसे, पाऊँ आदर ठौर ॥ ३५ ॥
मैं खोटा साई खरा, मैं गादा मैं गारि ॥
मैं अपराधी आत्मा, साई सरन उबारि ॥ ३६ ॥
और पतित तो कूप हैं मैं हूँ समुद्र समान ।
मोहि टेक तोहि नामकी, सुनियो कृपानिधान ॥ ३७ ॥
अवसर बीता अलप तन, पीव रहा परदेश ।
कलंक उतारो रामजी, भानो भरम संदेश ॥ ३८ ॥