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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(४२)

कबीरपंथी—

दुरयोधन परिच्छित राजा, फिर पाछे पछताई॥
सुर पण्डित औ नृपति बादशाह, ऊंची पदवी पाई ॥
भक्ति बिना सब तुच्छ बराबर, बांधे यमपुर जाई ॥
का भये वेद पुराण गुन गाये, सत्य दया नहिं आई ॥
अहंकारमें सबहिं भुलाने, अजगर जनम सो पाई ॥
हम तो कान राखी नहिं भाई, ज्यों का त्यों ठहराई ॥
भावे कोई दुख सुख करि माने, भक्ति के पंथ चलाई ॥
योग, यज्ञ, तीरथ, व्रत, संयम, करनी कोटि कराई ॥
नाम बिना सबही है खाली, कहैं कबीर समुझाई ॥ ३ ॥

संगीतरत्नमालामें यही पद इस प्रकार हैं—
ध्वनी गौरी वृन्दावनी (समय सूर्यास्त)

॥ दास पर नाम ध्वजा फहराई ॥ काल जाल निकट नहिं
आवे, माया देखि डराई ॥ जो कोई दाससो द्रोह विचारे,
प्रभुको नाहिं सुहाई ॥ हरनाकुशकी वह गति हो गई, रावण धूर
उड़ाई ॥ सुर ब्रह्मा नृप अरु इन्द्रकी, ऊंची पदवी पाई । भक्ति
बिना सब तुच्छ बराबर, बांधे यमपुर जाई ॥ कहैं भयो वेद
पुरान पढ़े से, घट महे दया न आई । अहंकारसे भवमें डूबे,
अजगर तन धरि भाई ॥ हमनहिं कान करी काहू की, ज्यों को
त्यों दर्शाई । चाहे कोई सुख कोई दुःख मानो, सत्य कहौं
गोहराई ॥ योग यज्ञ तीरथ व्रत संयम, साधन कोटि कराई ।
विनु गुरु सफल होत नहिं कबहुँ, कहे कबीर समुझाई ॥

साखी ।

नाम लिया तिन सब लिया, सकल वेदका भेद ।
बिना नाम नरके गये, पढ़ि पढ़ि चारों वेद ॥

गौरी ४ ।

॥ बंदे नाम साहेब का ले रे ॥ एक लख पूत सवा लख
नाती, संपति थिर ना रहे रे ॥ लंका ऐसे कोट विनशि गये, छिन