कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
भाषते सत सुकृतं । दयापाल दयाल स्वामी, ज्ञानदाता इस्थितं ।
क्षमाशील संतोष समिता, आनंदरूपी हिरदयं । सहजभाव विवेक
इस्थिर, निरमाया निहसंशयं ॥ निरमोही निरवैर निरभै, अकथ
कथिता अविगतं ॥ उपकार औ उपदेशदाता, मुक्तिमार्ग सत-
गुरं ॥ दास भाव की प्रीति बिनती, भक्ति करन करावनं ।
चौरासी बन्धन कर्म खण्डन, बन्दीछोर कहावनं ॥ त्रिगुणरहिता
सत्य बकता, सत्लोक निवासितं । सतपुरुष जहाँ सत्साहब,
तहाँ आप विराजितं ॥ युगन युगन सतपुरुष आज्ञा, जीवन
कारण पगुधरं । दीन लीन अचान ह्वैके, जगतमें डोलत फिरं ॥
करुणामय कवीर केवल, सुखदायक सर्व लायकं । जम भयंकर
मान मरदन, दुखित जीव सहायकं ॥
जीवके उद्धारका मार्ग
धर्मदास करजोर बिनवे, दया करो मन बसकरं । कहूँसेवा
गुरुभक्ति अविचल, निसदिनअराधोसुमिरणं ॥ सदगुरु की अधिक
महिमा, ज्ञान कुण्ड नहाइये । भ्रमति मन तब होय स्थिर, बहुरि
न भौजल आइये ॥ साधुसन्त की अधिक महिमा, रहनि कुण्ड
नहाइये ॥ काम कोष विकार परिहरि बहुरि न भौजल आइये ।
दासतनकी अधिक महिमा, सेवाकुण्ड नहाइये ॥ प्रेमभक्ति पति
व्रत हटकरि, बहुरि न भौजल आइये । योगीजन की अधिक
महिमा, मुक्तिकुण्ड नहाइये । चन्दसूर मन गगन थिरकरि,
बहुरि न भौजल आइये ॥ श्रोता बक्ता की अधिक महिमा,
विचारकुण्ड नहाइये । सारशब्दनिवेरि लीजे, बहुरि न भौजल
आइये । गुरु साधुसन्त समाज मध्ये, भक्ति मुक्ति हटाइये ।
सुरतिकर सत्लोक पहुँचे, बहुरि न भौजल आइये ॥ धर्मदास
प्रकाश कीन्हो, अकह कुण्ड नहाइये । सकल कलविष धोय