सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

८ ] गणितसारसंग्रहः [ १. ६१-

नव नन्दं च रन्ध्रं च पदार्थं लब्धकेशवौ । निधिंरत्नं ग्रहाणं च दुर्गानाम च संख्यया ॥६१॥
आकाशं गगनं शून्यमम्बरं खं नभो वियत् । अनन्तमन्तरिक्षं च विष्णुपदं दिवि स्मरेत् ॥६२॥
अथ स्थाननामानि
एकं तु प्रथमस्थानं द्वितीयं दशसंज्ञिकम् । तृतीयं शतमित्याहुः चतुर्थं तु सहस्रकम् ॥६३॥
पञ्चमं दशसाहस्रं षष्ठं स्याल्लक्षमेव च । सप्तमं दशलक्षं तु अष्टमं कोटिरुच्यते ॥६४॥
नवमं दशकोट्यस्तु दशमं शतकोटयः । अर्बुदं रुद्रसंयुक्तं न्यर्बुदं द्वादशं भवेत् ॥६५॥
खर्वं त्रयोदशस्थानं महाखर्वं चतुर्दशम् । पद्मं पञ्चदशं चैव महापद्मं तु षोडशम् ॥६६॥
क्षोणी सप्तदशं चैव महाक्षोणी दशाष्टकम् । शङ्खं नवदशं स्थानं महाशङ्खं तु विंशकम् ॥६७॥
क्षित्यैकविंशतिस्थानं महाक्षित्या द्विविंशकम् । त्रिविंशकमथ क्षोभं महाक्षोभं चतुर्नयम् ॥६८॥
अथ गणकगुणनिरूपणम्
लघुकरणोहापोहानालस्यग्रहणधारणोपायैः । व्यक्तिकराङ्कविशिष्टैर्गणकोऽष्टाभिर्गुणैर्ज्ञेयः ॥६९॥
इति संज्ञा समासेन भाषिता मुनिपुङ्गवैः । विस्तरेणागमाद्ध्येयं वक्तव्यं यदितः परम् ॥७०॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ संज्ञाधिकार समाप्तः ॥
गये हैं । वे यहाँ अनुवादित नहीं किये गये हैं ॥५३-६२॥
स्थान-नामावलि [ संकेतनात्मक स्थानों के नाम ]
प्रथम स्थान वह है जो एक ( इकाई ) कहलाता है, दूसरा स्थान दश ( दहाई ), तीसरा स्थान
शत ( सैकडा ) और चौथा सहस्र ( हजार ) कहलाता है ॥६३॥ पाँचवा दस सहस्र ( दस हजार ),
छठवाँ लक्ष ( लाख ), सातवाँ दशलक्ष ( दस लाख ) और आठवाँ कोटि ( करोड़ ) कहलाता है ॥६४॥
नौवाँ दशकोटि ( दस करोड़ ) और दसवाँ शतकोटि ( सौ करोड़ ) कहलाता है। ग्यारहवाँ स्थान अर्बुद
( अरब ) और बारहवाँ न्यर्बुद ( दस अरब ) कहलाता है ॥६५॥ तेरहवाँ स्थान खर्व ( खरब ) और
चौदहवाँ महाखर्व ( दस खरब ) कहलाता है । इसी तरह, पंद्रहवाँ पद्म और सोलहवाँ महापद्म
कहलाता है ॥६६॥ पुनः सत्रहवाँ क्षोणी, अठारहवाँ महाक्षोणी कहलाता है । उन्नीसवाँ स्थान शङ्ख और
बीसवाँ महाशङ्ख कहलाता है ॥६७॥ इक्कीसवाँ स्थान क्षित्या, बाईसवाँ महाक्षित्या कहलाता है।
तेईसवाँ क्षोभ और चौबीसवाँ महाक्षोभ कहलाता है ॥६८॥
गणकगुणनिरूपण
निम्नलिखित आठ गुणों से गणितज्ञ की पहिचान होती है—
(१) लघुकरण—हल करने में शीघ्र गति, (२) ऊह—अग्रविकल्प, कि इच्छित फल प्राप्त हो सकेगा,
(३) अपोह—अग्रविकल्प, कि इच्छित फल प्राप्त नहीं होगा, (४) अनालस्य—प्रमाद न होना, (५) ग्रहण—
समझने की शक्ति, (६) धारण—स्मरण रखने की शक्ति, (७) उपाय—साधन करने की नई रीतियाँ
खोजना, एवं (८) व्यक्तिकराङ्क—उन संख्याओं तक पहुँचने का सामर्थ्य रखना जो अज्ञात राशियों को
ज्ञात बना सकें ॥६९॥ इस प्रकार, मुनि पुङ्गवों ने संक्षेप में परिभाषाओं का कथन किया है । जो कुछ
इसके विषय में आगे विस्तार रूप से कहा जाना चाहिए उसे आगम¹ के अध्ययन से ज्ञात करना चाहिये ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणित-शास्त्र में, संज्ञा अधिकार समाप्त हुआ ॥७०॥
१ यहाँ आगम का आशय, सम्भवतः जिनागम प्रणीत अलौकिक गणित से हो जिसके विषय में
ग्रंथकार द्वारा मात्र यहीं संकेत किया गया प्रतीत होता है ।

-२. १ ] परिकर्मव्यवहारः [ ९

२. परिकर्मव्यवहारः

इतः परं परिकर्माभिधानं प्रथमव्यवहारमुदाहरिष्यामः ।

प्रत्युत्पन्नः

तत्रे प्रथमे प्रत्युत्पन्नपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
गुणयेद्गुणेन गुण्यं कवाटसंधिक्रमेणै संस्थाप्य । राश्यर्धखण्डतस्तथैरनुलोमविलोममार्गाभ्याम् ॥१॥
१ K तत्र च । २ K और B विन्यस्योभौ राशी । ३ K और B सङ्गुणयेत् ।

२. परिकर्म व्यवहार [ अङ्कगणित सम्बन्धी क्रियाएँ ]

इसके पश्चात्, हम परिकर्म नामक प्रथम व्यवहार प्रकट करते हैं ।

प्रत्युत्पन्न ( गुणन )

परिकर्म क्रियाओं में प्रथम गुणन के क्रिया-सम्बन्धी नियम निम्नलिखित हैं—
जिस तरह दरवाजे की कोरें रहती हैं, उसी प्रकार गुण्य और गुणक को एक-दूसरे के नीचे
रखकर, गुण्य को गुणक से दो रीतियों ( अनुलोम अथवा विलोम क्रम से हल करने की विधियों )
में से किसी एक द्वारा गुणित करना चाहिये । प्रथम विधि में गुण्य के खंड द्वारा गुण्य को विभा-
जित और गुणक को गुणित करते हैं । द्वितीय विधि में, गुणक के खंड द्वारा गुणक को विभाजित तथा
गुण्य को गुणित करते हैं । तृतीय विधि में उन्हें उसी रूप में लेकर गुणन करते हैं ॥ १ ॥
( १ ) प्रतीक रूप से यह नियम इस प्रकार है—
'अब' को 'सद' से गुणा करने पर गुणनफल ( i ) अब/अ × (अ × सद); या (ii) (अब × स) ×
सद/स या (iii) अब × सद होता है । यह स्पष्ट है कि प्रथम दो विधियों को उपर्युक्त गुणनखण्डों के
चुनाव द्वारा क्रिया को सरल करने के उपयोग में लाते हैं ।
अनुलोम, अथवा हल करने की सामान्य विधि वह है जो व्यापक रूपसे उपयोग में लाई जाती
है । विलोम विधि निम्नलिखित है— १९९८
१९९८ में २७ का गुणा करने के लिये— २७
प्रत्येक स्तंभ का योग करने पर २ × १ | २ | | | | |
२ × ९ | १ | ८ | | | |
उत्तर ५३९४६ प्राप्त होता है २ × ९ | | १ | ८ | | |
२ × ८ | | | १ | ६ | |
७ × १ | | ७ | | | |
७ × ९ | | ६ | ३ | | |
७ × ९ | | | ६ | ३ | |
७ × ८ | | | | ५ | ६ |

| ५ | ३ | ९ | ४ | ६ |
ग० सा० सं०-२

१० ] गणितसारसंग्रहः [ २. २-
अत्रोद्देशकः
दत्तान्येकैकस्मै¹ जिनभवनेऽम्बुजानि तान्यष्टौ । वसतीनां चतुरुत्तरचत्वारिंशच्छतायै कति ॥२॥
नव पद्मरागमणयः समर्चिता एकजिनगृहे दृष्टाः । साष्टाशीतिद्विशतीमितवसतिषु ते कियन्तः स्युः ॥३॥
चत्वारिंशच्चैकोनशताधिकपुष्यरागमणयोऽर्च्याः⁵ ।
एकस्मिन् जिनभवने सनवशते ब्रूहि क॑ति मणयः ॥ ४ ॥
पद्मानि सप्तविंशतिरेकस्मिन् जिनगृहे प्रदत्तानि ।
साष्टानवतिसहस्रे सनवशते तानि कति कथय ॥ ५ ॥
⁷एकैकस्यां वसातावष्टोत्तरशतसुवर्णपद्मानि । एकाष्टचतुः सप्तकनवषट्पञ्चाष्टकानां किम् ॥ ६ ॥
शशिवसुखरजलनिधिनवपदार्थभयनयसमूहमास्थाप्य ।
हिमकरविषनिधिगतिभिर्गुणिते किं ¹⁰राशिपरिमाणम् ॥ ७ ॥
हिमगुपयोनिधिगतिशशिवह्नित्रतनिचयमत्र संस्थाप्य¹⁴ ।
सैकाशीत्या त्वं¹² मे गुणयित्वाचक्ष्व¹³ तत्संख्याम् ॥ ८ ॥
अग्निवसुखरभयेन्द्रियशशलाञ्छनराशिमत्र संस्थाप्यै¹¹ ।
रन्ध्रैर्गुणंयित्वा मे कथय सखे राशिपरिमाणम् ॥ ९ ॥

१ B स्य हिं । २ B नस्या । ३ B शतस्य कति भवनानाम् । ४ M B चत्वारिंशद्वयका
शताधिका । ५ M ऽच्छाः । ६ M ते कियन्तस्स्युः । ७ M एकैकजिनालयाय दत्तानि । ८ M प्रयुक्त-
नवशतगृहाणां किम् । ९ ( यह श्लोक केवल M और B में प्राप्य है) । १० M और B किन्तस्य ।
११ M प्यम् । १२ M अहो । १३ M मे शीघ्रम् । १४ B विन्यस्य ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रत्येक जिनमन्दिर में आठ-आठ कमल पुष्प चढ़ाये गये । बतलाओ कि १४४ मंदिरों को कितने
दिये गये ? ॥ २ ॥ नौ पद्मराग मणि केवल एक जिनमन्दिर में पूजन में अर्पित किये हुए देखे जाते हैं ।
२८८ मंदिरों में (उसी दर से) कितने अर्पित किये गये ? ॥ ३ ॥ एक जिनमंदिर में १३९ पुष्यरागमणि
पूजन में भेंट किये जाते हैं । बतलाओ, १०९ मंदिरों में कितने मणि भेंट किये गये ? [ मूल गाथा
में १३९ को १०० + ४० - १ रूप में लिखा हुआ है ] ॥ ४ ॥ २७ कमल के फूल एक जिनमंदिर में
भेंट किये गये । बतलाओ कि इस दर से १९९८ मंदिरों में कितने कमल भेंट किये गये ? [ मूल गाथा
में १९९८ को १०९८ + ९०० लिखा है ] ॥ ५ ॥ प्रत्येक मंदिर को १०८ स्वर्ण कमल भेंट की दर
से, ८५६९७४८१ मंदिरों में कितने दिये जायेंगे ? ॥ ६ ॥ १, ८, ६, ४, ९, ९, ७ और २ अंकों को
इकाई के स्थान से लेकर ऊपर के स्थानों तक रखने से बनाई गई संख्या को ४४१ से गुणित करने पर
क्या फल प्राप्त होगा ? ॥ ७ ॥ इस प्रश्न में, १, ४, ४, १, ३ और ५ अंकों को इकाई के स्थान से
लेकर ऊपर के स्थानों तक रखकर, प्राप्त की हुई संख्या को ८१ से गुणित करो और बतलाओ कि कौन
सी संख्या प्राप्त होगी ? ॥ ८ ॥ इस प्रश्न में १५७६८३ संख्या लिखकर उसे ९ से गुणित करो और तब,
हे मित्र ! मुझे बतलाओ कि गुणनफल राशि क्या होगी ? ॥ ९ ॥ इस प्रश्न में १२३४५६७९ संख्या को
९ से गुणित करते हैं । यह गुणनफल राशि आचार्य महावीर के कथनानुसार, नरपाल के कण्ठ आभरण

-२. १७ ] परिकर्मव्यवहारः [ ११
नेन्दाद्र्यृतुशरचतुस्त्रिद्वन्द्वैकं स्थाप्य²मत्र नवगुणितम् ।
आचार्यमहावीरैः कथितं नरपालकण्ठिकाभरणम् ॥१०॥
षट्त्रिकं पञ्चषट्कं च सप्त चादौ प्रतिष्ठितम् । त्रयस्त्रिंशत्संगुणितं कण्ठाभरणमादिशेत्³ ॥११॥
हुतवहगतिशशिमुनिभिर्वसुनयगतिचन्द्रमत्र संस्थाप्य ।
शैलेन तु गुणयित्वा कथयेदं रत्नकण्ठिकाभरणम् ॥१२॥
अनलाब्धिहिमगुमुनिशरदुरिताक्षिपयोधिसोममास्थाप्य ।
शैलेन तु गुणयित्वा कथय त्वं राजकण्ठिकाभरणम् ॥१३॥
गिरिगुणदिविगिरिगुणदिविगिरिगुणनिकरं तथैव गुणगुणितम् ।
पुनरेवं गुणगुणितम् एकादिनवोत्तरं विद्धि ॥१४॥
सप्त शून्यं द्वयं द्वन्द्वं पञ्चैकं च प्रतिष्ठितम् । त्रयःसप्ततिसंगुण्यं⁴ कण्ठाभरणमादिशेत् ॥१५॥
जलनिधिपयोधिशशधरनयनद्रव्याक्षिनिकरमास्थाप्य ।
गुणिते तु चतुःषष्ट्या का संख्या गणितविद्ब्रूहि ॥१६॥
शशाङ्केन्दुखैकेन्दुशून्यैकरूपं निधाय क्रमेणात्र राशिप्रमाणम् ।
हिमांश्रवग्नरन्ध्रैः प्रसंतोदितेऽस्मिन् भवेत्कण्ठिका राजपुत्रस्य योग्या ॥१७॥
इति परिकर्मविधौ प्रथमः प्रत्युत्पन्नः समाप्तः ।

१ श्लोक १० से १५ तक केवल M और B में प्राप्य हैं । २ सभी हस्तलिपियों में 'स्थाप्य तत्र' पाठ
है । ३ B शे । ४ B नयं १० सभी हस्तलिपियों में छंद रूपेण अशुद्ध पाठ “कण्ठाभरणं विनिर्दिशेत्” है ।

की रचना करती है ॥१०॥ ३ को छः बार, ६ को पाँच बार, और ७ को एक बार अवरोही क्रम से
(इकाई के स्थान की ओर) लिखकर, इस संख्या का ३३ से गुणन करने पर एक प्रकार के हार की संख्या
प्राप्त होती है ॥११॥ इस प्रश्न में, ३, ४, १, ७, ८, २, ४ और १ अंकों को इकाई के स्थान से ऊपर
की ओर के क्रम में लिखने पर संख्या का ७ से गुणन करो; और तब कहो कि वह रत्न कंठिका नामक
आभरण है ॥ १२ ॥ १४२८५७१४३ संख्या को लिखकर उसे ७ से गुणित करो; और तब कहो कि वह
राजकण्ठिका आभरण है ॥१३॥ इसी तरह, ३७०३७०३७ को ३ से गुणित करो । इस गुणनफल को फिर
गुणित करो ताकि गुणक क्रमशः एक से लेकर ९ तक हों ॥१४॥ ७, ०, २, २, ५ और १ अंकों को
( इकाई के स्थान से ऊपर की ओर के क्रम में ) रखते हैं । और इस संख्या को ७३ से गुणित करते हैं ।
प्राप्त संख्या को कण्ठ आभरण कहते हैं ॥१५॥ इकाई के स्थान से ऊपर की ओर अंक ४, ४, १, २, ६
और २ क्रमानुसार लिखकर, प्ररूपित संख्या को ६४ से गुणित करने पर हे गणित विद्ब्रूहि, बतलाओ कि
कौन सी संख्या प्राप्त होगी ? ॥१६॥ इस प्रश्न में, इकाई के स्थान से ऊपर की ओर १, १, ०, १, १, ०, १
और १ अंकों को क्रमानुसार रखने से एक विशेष संख्या का मान होता है; और तब इस संख्या में
९१ का गुणा करने पर राजपुत्र के योग्य कण्ठहार प्राप्त होता है ॥१७॥
इस प्रकार, परिकर्म व्यवहार में, प्रत्युत्पन्न नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।

(१०) इसमें तथा अन्य गाथाओं में कुछ संख्याएँ विभिन्न प्रकार के हारों की रचना करती हुईं
मानी गई हैं; क्योंकि उनमें एक से अंकों का शीघ्र ही दृष्टिगोचर होनेवाला सम्मितीय विन्यास रहता है ।
(११) यहाँ गुण्य ३३३३३३६६६६६७ है ।
(१४) यह प्रश्न, स्वतः, इस रूपमें अवतरित हो जाता है : ३७०३७०३७ x ३ को १, २, ३, ४,
५, ६, ७, ८ और ९ द्वारा क्रमानुसार गुणित करो ।

१२ ] गणितसारसंग्रहः [ २. १८-
भागहारः
द्वितीये भागहारकर्मणि करणसूत्रं यथा-
¹विन्यस्य भाज्यमानं तस्याधःस्थेन भागहारेण । सदृशापवर्तनविधिना भागं कृत्वा फलं प्रवदेत् ॥१८॥
अथवा-
प्रतिलोमपथेन भजेद्भाज्यमधःस्थेन भागहारेण । सदृशापवर्तनविधिर्यद्यस्ति विधाय तमपि तयोः।१९॥
अत्रोद्देशकः
दीनाराष्टसहस्रं द्वानवतियुतं शतेन संयुक्तम् । चतुरुत्तरषष्टिनरैर्भक्तं कोंऽशो नुरेकस्य ॥२०॥
रूपाग्रसप्तविंशतिशतानि कनकानि यत्र भाज्यन्ते । सप्तत्रिंशत्पुरुषैरेकस्यांशं² समाचक्ष्व ॥२१॥
दीनारदशसहस्रं त्रिंशतयुतं सप्तवर्गसंमिश्रम् । नवसप्तत्या पुरुषैर्भक्तं³ किं लब्धमेकस्य ॥२२॥
अयुतं चत्वारिंशच्चतुस्सहस्रैकशतयुतं हेम्नाम्⁴। नवसप्ततिवसतीनां दत्तं वित्तं किमेकस्याः ॥२३॥
सप्तदशत्रिंशतयुतान्येकत्रिंशत्सहस्रजम्बूनि । भक्तानि नवत्रिंशन्नरैर्वदैकस्य भागं त्वम् ॥२४॥
१ यह श्लोक P में प्राप्य नहीं है । २ K स । ३ M कोंऽशो नुरेकस्य । ४ यह श्लोक P में प्राप्य
नहीं है । ५ B और K हेमम् । ६ इस श्लोक में दिये गये प्रश्न का पाठ M में निम्न प्रकार है-
त्रिंशतयुतैकत्रिंशत्सहस्रयुक्ता दशाधिकाः सप्त ।
भक्ताश्चत्वारिंशत्पुरुषैरेकोनैस्तत्र दीनारम् ॥
भागहार [ भाग ]
परिकर्म क्रियाओं में द्वितीय, भागहार क्रिया का नियम निम्नलिखित है-
भाज्य को लिखकर उसे उभयनिष्ठ ( साधारण ) गुणनखंडों को अलग करने के रीति के अनुसार
भाजक द्वारा भाजित करो । भाजक को भाज्य के नीचे रखो और तब, परिणामी भजनफल को प्राप्त
करो ॥१८॥ अथवा-यदि सम्भव हो, तो उभयनिष्ठ गुणनखंड को निरसित करने की विधि से, भाज्य के
नीचे भाजक को रखकर, भाज्य को प्रतिलोम विधि से अर्थात् बायें से दायें भाजित करना चाहिये ॥१९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
६४ व्यक्तियों में ८१९२ दीनार बाँटे गये हैं । प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में कितने आये हैं? ॥२०॥
मुझे एक व्यक्ति का हिस्सा बतलाओ जब कि २७०१ स्वर्ण के टुकड़े ३७ व्यक्तियों में बाँटे जाते हैं । ॥२१॥
१०३४९ दीनार ७९ व्यक्तियों में बाँटे जाते हैं । बतलाओ एक व्यक्ति को क्या प्राप्त होगा ? ॥२२॥
१४१४१ स्वर्ण के टुकड़े ७९ मंदिरों में दिये जाते हैं । बतलाओ प्रत्येक मंदिर में कितना धन दिया
जाता है ? ॥२३॥ ३१३१७ जम्बू फल ( गुलाबी सेव ) ३९ व्यक्तियों में बाँटे गये हैं । प्रत्येक का अंश
( हिस्सा ) बतलाओ ? ॥२४॥ ३१३१३ जम्बू फल १८१ व्यक्तियों में बाँटे गये हैं । प्रत्येक का अंश
(२०) मूल गाथा में ८१९२ को ८००० + ९२ + १०० द्वारा लिखित किया गया है ।
(२२) मूल गाथा में १०३४९ को १०००० + ३०० + (७)² द्वारा निदर्शित किया गया है ।
(२३) यहाँ १४१४१ को १०००० + (४० + ४००० + १ + १००) द्वारा कथित किया गया है ।
(२४) यहाँ ३१३१७ को १७ + ३०० + ३१००० द्वारा दर्शाया गया है ।

-२. २९ ] परिकर्मव्यवहारः [ १३
त्र्योधिकदशत्रिशतयुतान्येकत्रिंशत्सहस्रजम्बू॑नि । सैकाशीतिशतेन प्रहृतानि नरैर्वदैकांशम् ॥२५॥
त्रिदशसहस्री सैकाषष्टिद्विशतीसहस्रषट्कयुता । रत्नानां नवपुंसां दत्तैकनरोऽत्र किं लभते ॥२६॥
ऐकादिषडन्तानि क्रमेण हीनानि हाटकानि सखे । विद्युज्जलधिबन्धुसंख्यैर्नरैर्हृतान्येकभागः कः॥२७॥
त्र्यशीतिमिश्राणि चतुःशतानि चतुस्सहस्रघ्ननगान्वितानि ।
रत्नानि दत्तानि जिनालयानां त्रयोदशानां कथयैकभागम् ॥२८॥
इति परिकर्मविधौ द्वितीयो भागहारः समाप्तः ॥
वर्गः
तृतीये वर्गपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
द्विसमवधो घातो वा स्वेष्टोनयुतद्वयस्य सेष्टकृतिः । एकाद्विचयेच्छागच्छद्युतिर्वा भवेद्वर्गः ॥२९॥
१ यह श्लोक केवल M में प्राप्य है ।
२ M एकद्वित्रिचतुःपञ्चषट्कैर्हीनाः क्रमेण संभक्ताः ।
सैकचतुःशतसंयुतचत्वारिंशज्जिनालयानां किम् ॥
बतलाओ ? ॥२५॥ ३६२६१ मणि ९ व्यक्तियों को बराबर-बराबर दिये जाते हैं । एक व्यक्ति कितने मणि
प्राप्त करता है ? ॥२६॥ हे मित्र, एक से आरम्भ कर ६ तक के अंकों को इकाई के स्थान से ऊपर की
ओर के क्रम में रखकर और फिर क्रमानुसार हासित अंकों द्वारा संरचित संख्या की सुवर्ण-मुद्राएँ ४४१
व्यक्तियों में वितरित की जाती हैं । प्रत्येक को कितनी मिलती हैं ? ॥२७॥ २८४८३ मणि १३ जिन
मंदिरों में भेंट स्वरूप दिये जाते हैं । प्रत्येक मंदिर को कितना अंश प्राप्त होता है ? ॥२८॥
इस प्रकार, परिकर्म व्यवहार में, भागहार [ भाग ] नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
वर्ग
परिकर्म क्रियाओं में तृतीय [ वर्ग करने की क्रिया ] के नियम निम्नलिखित हैं—
दो सम राशियों का गुणनफल; अथवा दो सम राशियों में से किसी एक चुनी संख्या को प्रथम
राशि में से घटाकर प्राप्त फल तथा दूसरी राशि में उस चुनी हुई संख्या को जोड़ने से प्राप्त फल, इन
दोनों फलों के गुणनफल में उस चुनी हुई संख्या का वर्गफल जोड़ने पर प्राप्तफल, अथवा, गुणोत्तर
श्रेढि ( जिसमें प्रथमपद १ है और प्रचय २ है ) का अ पदों तक का योगफल, उस इच्छित राशि का
वर्ग होता है ॥२९॥ दो या तीन या इससे अधिक संख्याओं का वर्ग, उन सब संख्याओं के वर्ग के योग
(२५) यहाँ ३१३१३ को १३ + ३०० + ३१००० द्वारा दर्शाया गया है ।
(२६) यहाँ ३६२६१ को ३०००० + १ + (६० + २०० + ६०००) द्वारा दर्शाया गया है ।
(२७) यहाँ दिया गया भाज्य, स्पष्ट रूप से, १२३४५६५४३२१ है ।
(२८) यहाँ २८४८३ को ८३ + ४०० + (४००० x ७) द्वारा निरूपित किया गया है ।
(२९) बीजगणित द्वारा बतलाये जाने पर यह नियम इस तरह का रूप लेता है—
(i) अ x अ = अ² (iii) (अ + क) (अ - क) + क² = अ² (iii) १ + ३ + ५ + ७ + ...
अ पदों तक = अ²

१४ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ३०-
द्विस्थानप्रभृतीनां राशीनां सर्ववर्गसंयोगः । तेषां क्रमघातेन द्विगुणेन विमिश्रितो वर्गः ॥३०॥
कृत्वान्त्यकृतिं हन्याच्छेषपदैर्द्विगुणमन्त्यमुत्सार्य । शेषानुत्सार्यैवं करणीयो विधिरयं वर्गे ॥३१॥
अत्रोद्देशकः
एकादिनवान्तानां पञ्चदशानां द्विसंगुणाष्टानाम् । व्रतयुगयोश्च रसाग्न्योः शरनगयोर्वर्गमाचक्ष्व ॥३२॥
साष्टात्रिंशत्त्रिशती चतुःसहस्त्रैकषष्टिषट्छतिका । द्विशती षट्पञ्चाशन्मिश्रा वर्गीकृता किं स्यात् ॥३३॥
लेख्यागुणेपुबाणद्रव्याणां शरगतिन्त्रिसूर्याणाम् । गुणरत्नाग्निपुराणां वर्गं भण गणक यदि वेत्सि ॥३४॥
तथा उन संख्याओं को एक बार में दो लेकर उनके दुगुने गुणनफल के योग को मिलाने के बराबर होता
है ॥३०॥ दाहिनी ओर से बाईं ओर को अङ्क गिनने के क्रम में संख्या के अन्तिम अङ्क का वर्ग प्राप्त
करो, और तब इस अङ्क को द्विगुणित कर तथा एक संकेतना के स्थान तक दाहिनी ओर हटा देने के
पश्चात्, इस अन्तिम अङ्क को शेष स्थानों के अङ्कों द्वारा गुणित करो । इस तरह संख्या के शेष अङ्कों में
प्रत्येक को एक-एक स्थान तक इसी विधि से हटाते जाओ । यह वर्ग करने की विधि है ॥३१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
१ से लेकर ९ तक तथा १५, १६, २५, ३६ और ७५— इन संख्याओं के वर्ग का मान
निकालो ॥३२॥ ३३८, ४६६१ और २५६ का वर्ग करने पर क्या-क्या प्राप्त होगा ? ॥३३॥ हे गणितज्ञ !
यदि तुम जानते हो तो बतलाओ कि ६५५३६, १२३४५ और ३३३३ के वर्ग क्या होंगे ? ॥३४॥
(३०) यहाँ स्थान शब्द का स्पष्ट अर्थ संकेतना स्थान होता है । यहाँ एक टीका के निर्वचन
के अनुसार वह योग के विघटकों का भी द्योतक है, क्योंकि योग में प्रत्येक ऐसे भाग का स्थान होता
है । इन दोनों निर्वचनों के अनुसार नियम ठीक उतरता है ।
जैसे : (१२३४)² = (१०००² + २००² + ३०² + ४²) + २ × १००० × २०० + २ × १००० × ३०

  • २ × १००० × ४ + २ × २०० × ३० + २ × २०० × ४ + २ × ३० × ४
    इसी तरह, (१ + २ + ३ + ४)² = (१² + २² + ३² + ४²) + २ (१ × २ + १ × ३ + १ × ४
  • २ × ३ + २ × ४ + ३ × ४)
    (३१) निम्नलिखित साधित उदाहरणों द्वारा दाहिने ओर हटाने का उल्लिखित नियम स्पष्ट हो
    जावेगा । यह महावीर की मौलिक विधि है । इन गणनाओं में स्तम्भों का योग इस प्रकार किया जावे
    कि किसी भी स्तम्भ के दहाई के अंक बांई ओर के स्तम्भ में जोड़े जावें ।
१३१ का वर्ग निकालना१३२ का वर्ग करना५५५ का वर्ग करना ।
१² = १ <br> २ × १ × ३ =      ६ <br> २ × १ × १ =          २ <br> ३² =          ९ <br> २ × ३ × १ =              ६ <br> १² =                  १ <br> ----------------------- <br>                १ ७ १ ६ ११² = १ <br> २ × १ × ३ =      ६ <br> २ × १ × २ =          ४ <br> ३² =          ९ <br> २ × ३ × २ =              १२ <br> २² =                  ४ <br> ----------------------- <br>                १ ७ ४ २ ४५² = २५ <br> २ × ५ × ५ =      ५० <br> २ × ५ × ५ =          ५० <br> ५² =          २५ <br> २ × ५ × ५ =              ५० <br> ५² =                  २५ <br> ----------------------- <br>                ३० ८ ० २ ५

(३३) मूल गाथा में ४६६१ को ४००० + ६१ + ६०० द्वारा निरूपित किया गया है ।

-२. ३६ ] परिकर्मव्यवहारः [ १५
सप्ताशीतित्रिशतसहितं षट्सहस्रं पुनश्च पञ्चत्रिंशच्छतसमधिकं सप्तनिघ्नं सहस्रम् ।
द्वाविंशत्या युतदशशतं^१ वर्गितं तन्नयाणां ब्रूहि त्वं मे गणकगुणवन्संगुणय्य प्रमाणम् ॥३५॥
इति परिकर्मविधौ तृतीयो वर्गः समाप्तः ।
वर्गमूलम्
चतुर्थे वर्गमूलपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
अन्त्यौजादपहृतकृतिमूलेन द्विगुणितेन युग्महृतौ। लब्धकृतिस्त्याज्यौजॆ द्विगुणदलं वर्गमूलफलम् ॥३६॥
१ P, K और B राशिरेतत्कृतीनाम् ।
६३८७ और तब ७१३५ और तब १०२२, इनमें से प्रत्येक संख्या का वर्ग किया जाता है । हे कुशल
गणितज्ञ ! अच्छी तरह गणना करने के पश्चात् मुझे बतलाओ कि इन तीनों के वर्ग क्या होंगे ? ॥३५॥
इस तरह, परिकर्म व्यवहार में, वर्ग नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
वर्गमूल
परिकर्म

१६ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ३७-
अत्रोद्देशकः
एकादिनवान्तानां वर्गगतानां वदाशु मे मूलम् । ऋतुविषयलोचनानां द्रव्यमहीध्रेन्द्रियाणां च ॥३७॥
एकाग्रषष्टिसमधिकपञ्चशतोपेतषट्सहस्राणाम् । षड्वर्गपञ्चपञ्चकषण्णामपि मूलमाकलय ॥३८॥
द्र्व्यपदार्थनयाचललेख्यालब्ध्यब्धिनिधिनयाब्धीनाम् ।
शशिनेत्रेन्द्रिययुगनयजीवानां चापि किं मूलम् ॥३९॥
चन्द्राब्धिगतिकषायद्र्व्यर्तुहुताशनतुरंगशीनाम् ।
विधुलेख्येन्द्रियहिमकरमुनिगिरिशशिनां च मूलं किम् ॥४०॥
द्वादशशतस्य मूलं षण्णवतियुतस्य कथय संचिन्त्य । शतषट्कस्यापि सखे पञ्चकवर्गेण युक्तस्य ॥४१॥
अङ्केभकर्माम्बरशंकराणां सोमाक्षिवैश्वानरभास्कराणाम् ।
चन्द्रर्तुबाणाब्धिगतिद्विपानामाचक्ष्व मूलं गणकाग्रणीस्त्वम् ॥४२॥
इति परिकर्मविधौ चतुर्थं वर्गमूलं समाप्तम् ॥
घनः
पञ्चमे घनपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा-
त्रिसमाहतिर्घनः स्याद्विष्टोनयुतान्यराशिघातो वा । अल्पगुणितेष्टकृत्या कलितो वृन्देन चेष्टस्य ॥४३॥
इष्टादिद्विगुणेष्टप्रचयैष्टपदान्वयोऽथ वेष्टकृतिः । व्येकेष्टहृतैकादिद्विचयेष्टपदैक्ययुक्ता वा ॥४४॥
१ P और M वर्गगतानां शीघ्रं रूपादिनवावसानराशीनाम् । मूलं कथय सखे त्वं० । २ M नव ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे मित्र ! मुझे शीघ्र बतलाओ कि १ से लेकर ९ तक की वर्गसंख्याओं, तथा २५६ और ५७६
के वर्गमूल क्या हैं ? ॥३७॥ ६५६१ और ६५५३६ के वर्गमूल निकालो ॥३८॥ ४२९४९६७२९६ और
६२२५२१ के वर्गमूल क्या हैं ? ॥३९॥ ६३६६४४४४१ और १७७१५६१ के वर्गमूल क्या हैं ? ॥४०॥
हे मित्र ! भलीभाँति सोचकर मुझे बतलाओ कि १२९६ और ६२५ के वर्गमूल क्या हैं ? ॥४१॥ हे
गणितज्ञों में अग्रणी ! ११०८८९, १२३२१ और ८४४५६१ के वर्गमूल बताओ ? ॥४२॥
इस प्रकार, परिकर्म व्यवहार में, वर्गमूल नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
घन
परिकर्म क्रियाओं में, पञ्चम घन नामक क्रिया का नियम निम्नलिखित है—
कोई तीन बराबर राशियों का गुणनफल उस दत्त राशि का घन होता है । अथवा, कोई दी हुई
राशि का, किसी चुनी हुई राशि को दत्त राशि में जोड़ने से प्राप्त फल का तथा चुनी हुई राशि को दत्त
राशि में से घटाने से प्राप्त फल का गुणनफल प्राप्त करते हैं । इसमें, चुनी हुई राशि के वर्ग को दत्त
राशि में से चुनी हुई राशि को घटाने से प्राप्त फल से गुणित करने पर प्राप्त गुणनफल और चुनी हुई
राशि का घन जोड़ने पर भी दत्त राशि का घन प्राप्त होता है ॥४३॥
अथवा, जिसका प्रथम पद दी गई राशि है तथा प्रचय दी गई राशिका दुगुना है और जिसके
पदों की संख्या दी हुई राशि के बराबर है, ऐसी समान्तर श्रेढि का योग दी हुई राशि के घन को उत्पन्न
करता है । अथवा, जिस राशि का घन प्राप्त करना है उसके वर्ग में, दी गई राशि में से एक घटाकर प्राप्त
राशि तथा दी गई राशि के बराबर जिसके पदों की संख्या है (और जिसका प्रथम पद एक है और प्रचय
दो है) ऐसी समान्तर श्रेढि के योग का गुणनफल मिलाकर उस दी हुई राशि का घन प्राप्त करते हैं ॥४४॥
(४३) प्रतीक रूप से यह नियम (निरूपित करने पर) इस तरह साधित होता हैः-
(i) अ × अ × अ = अ³ (ii) अ (अ + ब) (अ - ब) + ब² (अ - ब) + ब³ = अ³
(४४) बीजगणित से नियम का अर्थ : (i) अ³ = अ + ३अ + ५अ + ७अ + ∙∙∙ अ पदों तक ।
(ii) अ³ = अ² + (अ - १) (१ + ३ + ५ + ७ + ∙∙∙ अ पदों तक)

-२. ४७] परिकर्मव्यवहारः [ १७
ऐकादिचयेष्टपदे पूर्वं राशिं परेण संगुणयेत् । गुणितसमासस्त्रिगुणश्चरमेण युतो घनो भवति ॥४५॥
अन्त्यान्यस्थानकृतिः परस्परस्थानसंगुणा त्रिहता । पुनरेवं² तद्योगः³ सर्वपदघनान्वितो वृन्दम् ॥४६॥
ॲन्त्यस्य घनः कृति॒रपि सा त्रिहतोत्सार्य शेषगुणिता वा ।
शेषकृतिस्त्र्यन्त्यहता स्थाप्योत्सार्यैवमत्र विधिः ॥४७॥
१ P में यह श्लोक प्राप्य नहीं है । २ M°रपि । ३ M°गो वा । ४ यह श्लोक M में छूट
गया है । P K B में निम्नलिखित श्लोक पाठान्तर रूप में प्राप्य है । उपर्युक्त दो विधियों का उल्लेख
इसमें भी है ।
त्रिसमगुणोऽन्त्यस्य घनस्तद्वर्गस्त्रिगुणितो हतः शेषैः ।
उत्सार्य शेषकृतिरथ निष्ठा त्रिगुणा घनस्तथाग्रे वा ॥
समान्तर रूप से बढ़ती हुई श्रेढि में ( जिसका प्रथम पद एक है तथा प्रचय भी एक है और पदों की संख्या
कोई दी गई राशि के बराबर है ), प्रत्येक पिछले पद को अगले पद से गुणा कर प्राप्त गुणनफलों का योग
प्राप्त कर प्राप्त योगफल को तीन से गुणित करते हैं । इस प्रकार प्राप्त गुणनफल में श्रेढि का अंतिम पद
जोड़ने पर, दी हुई राशि का घन प्राप्त होता है ॥४५॥ ( जिन दो अथवा अधिक राशियों के योग का
घन निकालना है, उन्हें अलग-अलग स्थानों में स्थापित करते हैं । ) प्रथम तथा अन्य स्थानों के वर्ग
निकालकर उनमें प्रत्येक को अन्य स्थानों की राशियों से गुणित कर तिगुणा करते हैं और जोड़ देते हैं ।
इस प्रकार प्राप्त योगफल में सब स्थानों की राशियों में से प्रत्येक के घन को मिलाते हैं तो दत्त राशियों
के योग का घनफल प्राप्त होता है । ( इस सूत्र द्वारा ग्रंथकार का अभिप्राय २३६ जैसी संख्या का
घनफल, उसे ( २०० + ३० + ६ ) रूप में परिवर्तित कर इन तीन राशियों के योग का घनफल निकाल-
कर प्राप्त करना है । ) ॥४६॥ अथवा; दी गई संख्या में दाहिनी ओर से बाईं ओर की गिनती में
अन्तिम अंक का घन; और अन्तिम अंक के वर्ग की तिगुनी राशि को केवल एक संकेतना स्थान
द्वारा दाहिनी ओर हटाया जाता है और शेष स्थानों में पाये जाने वाले अंकों द्वारा गुणित किया जाता
है ; तब ऊपर की भाँति शेष स्थानों में पाये जाने वाले अंकों का वर्ग केवल एक संकेतना दाहिनी ओर
हटाया जाता है और ऊपर कथित अन्तिम अंक की तिगुनी राशि द्वारा उसे गुणित कर एक स्थान हटा कर
रखा जाता है । ये राशियाँ इसी स्थिति में जोड़ दी जाती हैं । यह नियम यहाँ प्रयोज्य होता है ॥४७॥

( ४५ ) ३ [१ × २ + २ × ३ + ३ × ४ + ४ × ५ + ⋯ + अ – १ × अ} + अ = अ³]
( ४६ ) ३ अ²ब + ३ अब² + अ³ + ब³ = (अ + ब)³ । इस नियम को दो से अधिक स्थान
वाली संख्याओं के लिये प्रयोज्य बनाने के हेतु यहाँ स्पष्टतः अर्थ निकलता है कि ३ अ² (ब + स) +
३ अ (ब + स)² + अ³ + (ब + स)³ = (अ + ब + स)³; और यह स्पष्ट है कि कोई भी संख्या दो अन्य
उपयुक्त रूप से चुनी हुई संख्याओं के योग द्वारा प्ररूपित की जा सकती है ।
( ४७ ) ग्रन्थकारद्वारा दिये गये सूत्र का अभिप्राय प्रदर्शित विधि से स्पष्ट हो जावेगा—
मान लो १५ घन का प्राप्त करना है । इसे दो | | १ | ५ | | |
स्थानों से स्थापित करके, निरूपित रीति से घनफल १³ = | | १ | | | |
निकालते हैं । सूत्र में ग्रन्थकार ने अन्तिम अंक ५ के १² × ३ × ५ = | | १ | ५ | | |
घन के योग का कथन नहीं किया है । ५² × ३ × १ = | | | ७ | ५ | |
५³ = | | | १ | २ | ५ |

| ३ | ३ | ७ | ५ |
ग० सा० सं०-३

१८ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ४८-
अत्रोद्देशकः
ऐकादिनवान्तानां पञ्चदशानां शरैक्षणस्यापि । रसबह्नयोगिरिनगयोः कथय घनं द्रव्यलङ्घ्योश्च ॥४८॥
हिमकरगगनेन्दूनां नयगिरिशशिनां खरेन्दुबाणानाम् ।
वद मुनिचन्द्रयतीनां वृन्दं चतुरुदधिगुणशशिनाम् ॥४९॥
राशिर्घनीकृतोऽयं शतद्वयं मिश्रितं त्रयोदशभिः। तद्द्विगुणोऽस्मात्त्रिगुणश्चतुर्गुणः पञ्चगुणितश्च ॥५०॥
शतमष्टषष्टियुक्तं दृष्टमभीष्टे घने विशिष्टतमैः । एकादिभिरष्टान्तैर्यैर्गुणितं वद तद्धनं शीघ्रम् ॥५१॥
बन्धाम्बरर्तुगगनेन्द्रियकेशवानां संख्याः क्रमेण विनिधाय घनं गृहीत्वा ।
आचक्ष्व लब्धमधुना करणानुयोगगम्भीरसारतरसागरपारदृश्वन् ॥५२॥
इति परिकर्मविधौ पञ्चमो घनः समाप्तः ॥
घनमूलम्
षष्ठे घनमूलपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
अन्त्यघनादपहृतघनमूलकृतिस्त्रिहतिभाजिते भाज्ये ।
प्राक्त्रिहताप्तस्य कृतिः शोध्या शोध्ये घनेऽथ घनम् ॥५३॥
१. ४८ और ४९ वें श्लोकों के स्थान में, M में निम्न पाठ है—
एकादिनवान्तानां रुद्राणां हिमकरेन्दूनाम् ।
वद मुनिचन्द्रयतीनां वृन्दं चतुरुदधिगुणशशिनाम् ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक से लेकर ९ तक संख्याओं और १५, २५, ३६, ७७ और ९६ के घन क्या होंगे ? ॥४८॥
१०१, १७२, ५१६, ७१७ और १३४४ के घन क्या होंगे ? ॥४९॥ संख्या २१३ का घन किया जाता है ।
इस संख्या की दुगुनी, तिगुनी, चौगुनी और पांचगुनी राशियों के भी घन करने पर प्राप्त होने वाली
राशियाँ प्राप्त करो ॥५०॥ यह देखा जाता है कि १६८ में एक से लेकर आठ तक की समस्त संख्याओं का
गुणन करने पर प्राप्त राशियाँ घन राशियों से सम्बन्धित हैं । उन घन राशियों को शीघ्र बतलाओ ॥५१॥
हे करणानुयोग गणित की क्रियाओं के अभ्यासरूपी गहरे तथा उत्कृष्ट समुद्र के पारदृष्टा ! दाहिनी
ओर से बाईं ओर ४, ०, ६, ०, ५ और ९ क्रमानुसार लिख कर प्राप्त संख्या का घनफल शीघ्र
बतलाओ ॥५२॥ इस प्रकार, परिकर्म व्यवहार में, घन नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
घनमूल
परिकर्म-क्रियाओं में षष्ठम घनमूल क्रिया सम्बन्धी निम्नलिखित नियम है—
अन्तिम घन स्थान तक के अंकों द्वारा निरूपित संख्या में से सबसे अधिक सम्भव घन संख्या घटाओ ।
तब, (अग्रिम) भाज्य स्थान द्वारा निरूपित अंक को स्थिति में रखने के पश्चात् उसे उस घन के घनमूल
के वर्ग की तिगुनी राशि द्वारा भाजित करो । तब (अग्रिम) शोध्य स्थान द्वारा निरूपित अंक को स्थिति
में रखने के पश्चात् उसमें से उपर्युक्त भजनफल के वर्ग की त्रिगुणित राशि को उपर्युक्त ( सबसे अधिक
सम्भव घन के ) मूल द्वारा गुणित करने से प्राप्त राशि को घटाओ । और तब (अग्रिम) घन स्थान द्वारा
निरूपित अंक को स्थिति में रखने के पश्चात् उसमें से ऊपर प्राप्त हुए भजनफल के घन को घटाओ ॥५३॥

-२. ५६ ] परिकर्मव्यवहारः [ १९
घनेमेकं द्वे अघने घनपदकृत्या भजेत्त्रिगुणयाघनतः ।
पूर्वत्रिगुणाप्रकृतिस्त्याज्याप्रघनश्च पूर्ववल्लब्धपदैः ॥५४॥
अत्रोद्देशकः
एकादिनवान्तानां घनात्मनां रत्नशशिनवाब्धीनाम् । नँगरसवसुखर्तुगजक्षपाकियाणां च मूलं किम् ॥५५॥
गतिनयमदशिखिशशिनां मुनिगुणखर्त्वक्षिनखैखरात्रीणाम् ।
वँसुखयुगखाद्रिगतिकरिचन्द्रर्तूनां गृहाण पदम् ॥५६॥
१ यह श्लोक M में प्राप्य नहीं है । २ M गिरि । ३ M रसा । ४ M विधुपुरखरस्वरर्तुज्वलनधराणां ।
तीन अंकों के विभिन्न समूह में से एक अंक घन (cubic) और दो अघन (non-cubic)
होते हैं । अघन अंक में घनमूल के वर्ग की तिगुनी राशि का भाग दो । अग्रिम अघन अंक में से,
ऊपर प्राप्त हुए भजनफल को वर्गित करने से प्राप्त हुई राशि तथा पिछले घन अंक में से (घटाई
गई अधिक से अधिक घनसंख्या के) घनमूल की तिगुनी राशि का गुणनफल घटाओ । और तब अग्रिम
घन अंक को स्थिति में लाकर, उसमें से ऊपर प्राप्त हुए भजनफल का घन घटाओ । इस तरह स्थिति में
लाकर प्राप्त हुए घनमूल अंकों की सहायता से पूर्व विधि उपयोग में लाओ ॥५४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
१ से लेकर ९ तक की घन संख्याओं के घनमूल क्या होंगे ? ४९१३ और १८४०८६७ के घनमूल
बतलाओ ? ॥५५॥ १३८२४, ३६९२६०३७ और ६१८४७०२०८ के घनमूल निकालो ॥५६॥
(५३-५४) जिसका घनमूल निकालना होता है ऐसी दी गई संख्या में अंक नियमानुसार समूहों
में विभक्त कर दिये जाते हैं । प्रत्येक समूह में अधिक से अधिक ३ अंक होते हैं; उनके नाम क्रमशः
दाहिनी ओर से बाँई ओर : घन (अथवा वह जो घनात्त्मक होता है अर्थात् जिसमें से घन राशि
घटाना होती है ), शोध्य ( अथवा वह जो घटाया जाता है ) और भाज्य हैं । बाँई ओर का अंतिम
समूह हमेशा तीन अंकमय नहीं होता । उसमें एक, दो, या तीन अंक तक रहते हैं । निम्नलिखित
साधित उदाहरण से नियम स्पष्ट हो जावेगा ।
७७३०८७७६ का घनमूल निकालना—
शो. घ.  भा. शो. घ.  भा. शो. घ.
७ ७   ३ ० ८   ७ ७ ६
घ.........४³ =        ६ ४       यह नियम उल्लेख नहीं करता कि कौन
भा......४² × ३    = ४८) १३३ (२      से अंक घनमूल की संरचना करते हैं । पर
९६       यह अर्थ किया जाता है कि क्रिया में घन
―――       किये गये अंकों को क्रम से बाँई ओर से
शो...२² × ३ × ४...   =  ३७०       दाहिनी ओर रखने संख्या (घनमूल) प्राप्त
=  ४८       होती है ।
―――
३२२८
घ......२³..........   =   ८
―――
भा......४२² × ३... = ५२९२) ३२२०७ (६
३१७५२
―――
४५५७
शो...६² × ३ × ४२............ = ४५३६
―――
२१६
घ....६³....................... =  २१६
―――
×
∴ घनमूल = ४२६ ।

२० ] गणितसारसंग्रहः [ २. ५७-
चतुःपयोध्यभ्रिशराश्विदृष्टिहयेभखव्योमभयेक्षणस्य ।
वदाष्टकर्माब्धिखघातिभावद्विवह्निरत्नर्तुनगस्य मूलम् ॥५७॥
द्रव्याश्वशैलदुरितखवह्वयद्रिभयस्य वदत घनमूलम् ।
नवचन्द्रहिमगुमुनिशशिलब्ध्यम्बरखरयुगस्यापि ॥५८॥
गोतिगजविषयेषुविधुस्वर।द्रिकरगतियुगस्य भण मूलम् ।
लेख्याश्वनगनवाचलपुरखरनयजीवचन्द्रमसाम् ॥५९॥
गतिकरदुरितेभाभ्भोधिताक्ष्य्र्ध्वजाक्षद्विकृतिनवपदार्थद्रव्यवह्वीन्दुचन्द्र-
जलधरपथरुन्ध्रेष्वष्टकानां घनानां गणक गणितदक्षाचक्ष्व मूलं परीक्ष्य ॥६०॥
इति परिकर्मविधौ षष्ठं घनमूलं समाप्तम् ।
संकलितम्
सप्तमे संकलितपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
रूपेणोनो गच्छो दलीकृतः प्रचयताडितो मिश्रः । प्रभवेण पदाभ्यस्तः संकलितं भवति सर्वेषाम् ॥६१॥
प्रकारान्तरेण धनानयनसूत्रम्—
एकविहीनो गच्छः प्रचयगुणो द्विगुणितादिसंयुक्तः । गच्छाभ्यस्तो द्विहृतः प्रभवेत्सर्वत्र संकलितम् ॥६२।
१ यह श्लोक M में अप्राप्य है ।
२७००८७२२५३४४ और ७६३२९४०४८८ के घनमूल प्राप्त करो ॥५७॥ ७७३०८७७६ और २६०९१७११९
के भी घनमूल निकालो ॥५८॥ २४२७७१५५८४ और १६२६३७९७७६ के घनमूल निकालो ॥५९॥
हे गणक ! यदि तुम गणित में कुशल हो तो ८५९०११३६९९४५९४८८६४ घनराशि का घनमूल परीक्षा
से निकालकर बतलाओ ॥६०॥
इस प्रकार, परिकर्म व्यवहार में घनमूल नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
संकलित [ श्रेणियों का संकलन ]
परिकर्म क्रियाओं में सप्तम संकलित क्रिया सम्बन्धी नियम निम्नलिखित है—
पहिले श्रेढि के पदों की संख्या को एक द्वारा घटाया जाता है और तब प्राप्त फल को आधा कर
प्रचय द्वारा गुणित किया जाता है । इसे, जब श्रेढि के प्रथम पद के साथ मिलाकर पदों की संख्या से
गुणित करते हैं तो समान्तर श्रेढि के समस्त पदों का योग प्राप्त होता है ॥६१॥
दूसरी तरह से श्रेढि का योग प्राप्त करने का नियम—
श्रेढि के पदों की संख्या को एक द्वारा ह्रासित कर प्रचय द्वारा गुणित करते हैं । प्राप्त फल में
श्रेढि के प्रथम पद की दुगुनी राशि मिलाते हैं; और जब इस योग को श्रेढि के पदों की संख्या से
गुणित कर दो से भाजित करते हैं, तो सर्वत्र श्रेढि का योग उत्पन्न होता है ॥६२॥
( ६१ ) यह नियम बीजीयरूप से निम्नलिखित रूप में प्रदर्शित किया जा सकता है—
⎛ (न - १)/२ ब + अ ⎞ न = य, जहाँ अ प्रथम पद है; ब प्रचय है, न पदों की संख्या है और य
समस्त श्रेढि का योग है ।
( ६२ ) इसी तरह, { [(न - १) ब + २ अ] / २ } न = य होता है ।

-२. ६४ ] परिकर्मव्यवहारः [ २१
आद्युत्तरसर्वधनानयनसूत्रम्—
पदहतमुखमादिधनं व्येकपदार्धप्रचयगुणो गच्छः ।
उत्तरधनं¹ तयोर्योगो धनमूनोत्तरं मुखेऽन्त्यधने ॥६३॥
अन्त्यधनमध्यधनसर्वधनानयनसूत्रम्—
च॑यगुणितैकोनपदं साद्यन्त्यधनं तदादियोगाधंम् । मध्यधनं तत्पदवधमुद्दिष्टं सर्वसंकलितम् ॥६४॥
१ M तदूना सैक (व ?) पदाप्ता युतिः प्रभावः । २ यह श्लोक M में छूट गया है ।
आदिधन, उत्तरधन और सर्वधन निकालने का नियम—
प्रथम पद में श्रेढि के पदों की संख्या का गुणन करने से प्राप्त राशि आदिधन कहलाती है ।
प्रचय द्वारा गुणित श्रेढि के पदों की संख्या तथा एक कम पदों की संख्या की आधी राशि का गुणनफल
उत्तर धन कहलाता है । इन दोनों का योग सर्वधन अर्थात् समस्त श्रेढि के पदों का योग होता है ।
वही ऐसी श्रेढि के योग के तुल्य भी होता है जो श्रेढि के पदों का क्रम उलट दिया जाने से प्राप्त
होती है, जहां अंतिम पद प्रथम पद हो जाता है तथा प्रचय ऋणात्मक हो जाता है ॥६३॥
अन्त्यधन, मध्यधन तथा सर्वधन निकालने की विधि—
श्रेढि के पदों की संख्या एक द्वारा ह्रासित की जाती है और प्राप्त संख्या प्रचय द्वारा गुणित की
जाती है । तब इसे प्रथम पद में जोड़ने पर अन्त्यधन प्राप्त होता है । अन्त्यधन और प्रथम पद के योग
की आधी राशि मध्यधन कहलाती है । इस मध्यधन और श्रेढि के पदों की संख्या का गुणनफल, श्रेढि
के समस्त पदों का योग होता है ॥६४॥
(६३-६४) इन नियमों में समान्तर श्रेढि का प्रत्येक पद, प्रथम पद में प्रचय का गुणक जोड़ने
पर प्राप्त हुआ माना जाता है । इस गुणक का मान श्रेढि में पद विशेष की स्थिति पर निर्भर रहता है ।
इस अवधारणा के अनुसार हमें श्रेढि के प्रत्येक पद में प्रथम पद के साथ-साथ प्रचय का गुणक भी
निकालना पड़ता है । इस तरह प्राप्त प्रथम पदों के योग को आदिधन कहते हैं । प्रचय के ऐसे गुणकों
के योग को उत्तरधन कहते हैं । सर्वधन जो कि इन दोनों का योग होता है, श्रेढि का भी योग होता
है । अन्त्यधन, समान्तर श्रेढि का अंतिम पद होता है । मध्यधन का अर्थ मध्यपद होता है जो इस
श्रेढि के प्रथम पद और अंतिम पद का समान्तर-मध्यक ( arithmetical mean ) होता है । इस
तरह, जब श्रेढि में (२ न + १) पद होते हैं तब (न + १) वाँ पद मध्यधन कहलाता है । परंतु, जब
२न पद होते हैं, तो (न) वें और (न + १) वें पद के समान्तर-मध्यक के तुल्य मध्यधन होता है । इस
तरह, (१) आदिधन = न × अ; (२) उत्तरधन = (न - १) / २ × न × ब; (३) अन्त्यधन = (न - १) × ब + अ;
(४) मध्यधन = [{(न - १)ब + अ} + अ] / २ ; (५) सर्वधन = (१) + (२) = (न + अ) + ( (न - १) / २ × न × ब );
अथवा, सर्वधन = (४) × न = न × [{(न - १) ब + अ} + अ] / २ होता है ।
आगे यह बिलकुल स्पष्ट है कि ऋणात्मक प्रचय वाली समान्तर श्रेढि धनात्मक प्रचय वाली समान्तर
श्रेढि में बदल जाती है जब कि पदों का क्रम पूरी तरह उलटाया जाता है जिससे प्रथम पद अंतिम पद
हो जाता है ।

२२ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ६५-
अत्रोद्देशकः
एकादिदशान्ताद्यास्तावत्प्रचयास्समर्चयन्ति धनम् ।
वणिजो दश दश गच्छास्तेषां संकलितमाकलय ॥६५॥
द्विमुखत्रिचयैर्मणिभिः प्रानर्च श्रावकोत्तमः कश्चित् । पञ्चवसतीरमीषां का संख्या ब्रूहि गणितज्ञ ॥६६॥
आदिक्षयत्रयोऽष्टौ द्वादश गच्छस्त्रयोऽपि रूपेण । आ सप्तकात्प्रवृद्धाः सर्वेषां गणक भण गणितम् ॥६७॥
द्विकृतिमुखं चयोऽष्टौ नगरसहस्रे समर्चितं गणितम् ।
गणिताब्धिसमुत्तरणे बाहुबलिन्¹ त्वं समाचक्ष्व ॥६८॥
गच्छानयनसूत्रम्—
अष्टोत्तरगुणराशेर्द्विगुणाद्युत्तरविशेषकृतिसहितात् । मूलं चययुतमर्धितमाद्यूनं चयहृतं गच्छः ॥६९॥
प्रकारान्तरेण गच्छानयनसूत्रम्—
अष्टोत्तरगुणराशेर्द्विगुणाद्युत्तरविशेषकृतिसहितात् । मूलं क्षेपपदो नं दलितं चयभाजितं गच्छः ॥७०॥
१ M बली ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
दस व्यापारियों में से प्रत्येक समान्तर श्रेढि में संकलित धन दान करता है । दस श्रेढियों के प्रथम
पद एक से लेकर दस तक हैं, और प्रत्येक श्रेढि में प्रचय उतना ही है जितनी कि उनकी प्रथम पद राशि ।
प्रत्येक श्रेढि के पदों की संख्या दस है । उन श्रेढियों के योगों की गणना करो ॥६५॥ एक श्रेष्ठ श्रावक
एक-एक कर पाँच मन्दिरों में २ मणियों से आरम्भ कर उत्तरोत्तर ३ मणि बढ़ाता हुआ भेंट चढ़ाता है ।
हे गणितज्ञ ! कहो कि उनकी कुल संख्या क्या है ? ॥६६॥ प्रथम पद ३ है; प्रचय ८ है; और पदों की
संख्या १२ है । ये तीनों राशियाँ क्रम से एक द्वारा बढ़ाई जाती हैं जब तक कि ७ श्रेढियाँ प्राप्त नहीं
होतीं । हे गणितज्ञ ! इन सब श्रेढियों के योगों को प्राप्त करो ॥६७॥ हे गणितरूपी समुद्र को भुजाओं
द्वारा तरने में समर्थ ! बतलाओ कि १००० नगरों में की जाने वाली समस्त भेटों का मान क्या होगा,
जब कि भेंट ४ से आरम्भ की जाती है और उत्तरोत्तर ८ से वृद्धि को प्राप्त होती है ॥६८॥
समान्तर श्रेढि के पदों की संख्या ( गच्छ ) निकालने का नियम—
( प्रथम पद की दुगुनी ) राशि और प्रचय के अन्तर के वर्ग में श्रेढि के योग द्वारा गुणित प्रचय
की आठगुनी राशि जोड़ते हैं । प्राप्त योगफल के वर्गमूल में प्रचय जोड़ते हैं और परिणामी राशि आधी
करते हैं । इसे प्रथम पद द्वारा हासित कर प्रचय द्वारा विभाजित करते हैं तो श्रेढि के पदों की संख्या
प्राप्त होती है ॥६९॥
दूसरी रीति द्वारा पदों की संख्या निकालने का नियम—
( प्रथम पद की दुगुनी ) राशि और प्रचय के अन्तर के वर्ग में, श्रेढि के योग द्वारा गुणित प्रचय
की आठगुनी राशि जोड़कर प्राप्त योगफल के वर्गमूल में से क्षेपपद को घटाते हैं । परिणामी राशि को
आधा करते हैं । इसे प्रचय द्वारा विभाजित करने पर श्रेढि के पदों की संख्या प्राप्त होती है ॥७०॥

(६६) श्रावक जैनधर्म के गृहस्थ धर्म के गृहस्थ धर्म का पालन करने वाला होता है, जो केवल श्रवण
करता है अर्थात् धर्म या कर्तव्य के विषय में सुनता और सीखता है । सामान्यतः पाक्षिक श्रावक को
मिथ्यात्व, अन्याय एवं अभक्ष्य का त्याग होता है । √ (२अ - ब)² + ८ ब य + ब
(६९) बीजगणित से यह नियम इस भाँति प्ररूपित होगा— ------------------------- - अ
२
--------------------------------- = न
ब
(७०) (प्रथम पद की दुगुनी) राशि और प्रचय के अंतर की आधी राशि क्षेपपद कहलाती है । अर्थात्,
२अ - ब
------- . यह स्पष्ट है कि इस सूत्र में क्षेपपद का उल्लेख होने से पिछले सूत्र से मात्र उल्लेख में भिन्नता है ।
२

-२. ७५] परिकर्मव्यवहारः [ २३
अत्रोद्देशकः
आदिद्वौ प्रचयोऽष्टौ द्वोरूपेण त्रयाक्रमाद्वृद्धौ ।
खाङ्कौ रसाद्रिनेत्रं खेन्दुहरा वित्तमत्र को गच्छः ॥७१॥
आदिः पञ्च चयोऽष्टौ गुणरत्नाभिधनमत्र को गच्छः ।
षट् प्रभवश्च चयोऽष्टौ खद्विचतुः स्वं पदं किं स्यात् ॥७२॥
उत्तराद्यानयनसूत्रम्—
आदिधनोनं गणितं पदोनपदकृतिदलेन संभजितम् । प्रचयस्तद्धनहीनं गणितं पदभाजितं प्रभवः ॥७३॥
आद्युत्तरानयनसूत्रम्—
प्रभवो गच्छाप्तधनं विगतैकपदार्धगुणितचयहीनम् । पदहृतधनमाद्यूनं निरेकपददलहृतं प्रचयः ॥७४॥
प्रकारान्तरेणोत्तराद्यानयनसूत्रम्—
द्विहृतं संकलितधनं गच्छहृतं द्विगुणितादिना रहितम् ।
विगतैकपदविभक्तं प्रचयः स्यादिति विजानीहि ॥७५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रथम पद २ है, प्रचय ८ है; इन दोनों को उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ाते जाते हैं जिससे ३ श्रेढियाँ
बन जाती हैं । इन तीन श्रेढियों के योग क्रमशः ९०, २७६ और १११० हैं । प्रत्येक श्रेढि के पदों की
संख्या क्या है ? ॥७१॥ प्रथम पद ५ है; प्रचय ८ है; श्रेढि का योग ३३३ है । पदों की संख्या क्या है ?
अन्य श्रेढि का प्रथमपद ६ है, प्रचय ८ है और योग ४२० है । पदों की संख्या क्या है ? ॥७२॥
प्रचय और प्रथम पद को निकालने का नियम—
श्रेढि का योग आदिधन द्वारा हासित किया जाता है, और इसे, पदों की संख्या द्वारा हासित पदों
की संख्या के वर्ग द्वारा निरूपित राशि की आधी राशि द्वारा विभाजित करने पर प्रचय प्राप्त होता है ।
श्रेढि के योग को उत्तरधन द्वारा हासित करने पर प्राप्त फल को पदों की संख्या द्वारा विभाजित
करने पर श्रेढि का प्रथम पद प्राप्त होता है ॥७३॥
प्रथम पद और प्रचय प्राप्त करने का नियम—
श्रेढि में पदों की संख्या द्वारा भाजित श्रेढि का योग, जब प्रचय और एक कम पदों की संख्या
की आधी राशि के गुणन फल द्वारा हासित कर दिया जाता है तो श्रेढि का प्रथम पद प्राप्त होता है ।
योग को, पदों की संख्या से भाजित कर प्रथम पद द्वारा हासित करते हैं । प्राप्तफल को एक कम पदों
की संख्या की आधी राशि द्वारा विभाजित करने पर प्रचय प्राप्त होता है ॥७४॥
प्रचय और प्रथम राशि को अन्य विधि द्वारा निकालने के दो नियम:—
श्रेढि के योग को २ से गुणित कर और पदों की संख्या से विभाजित कर प्रथम पद की दुगुनी
राशि से हासित करते हैं । प्राप्तफल को एक कम पदों की संख्या की आधी राशि द्वारा विभाजित करने
पर प्रचय प्राप्त होता है ॥७५॥ श्रेढि के योग की दुगुनी राशि को पदों की संख्या से विभाजित कर
( ७३ ) आदि-धन और उत्तरधन के लिये इस अध्याय के ६३ और ६४ वें सूत्र की पाद टिप्पणी
देखिये । इस सूत्र को प्रतीक रूपसे प्रदर्शित करने पर वह निम्नरूप में साधित होता है—
न (न - १)
य - --------- ब
य - न अ     और         २
ब = -----------        अ = -----------------
(न² - न)/२               न
य  न - १     ( य/न ) - अ
( ७४ ) बीजीय रूप से : अ = --- - ------ ब; और ब = -------------
न   २      ( न - १ )/२
( २ य/न ) - २ अ
( ७५ ) प्रतीक रूप से : ब = -----------------
न - १

२४ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ७६-
द्विगुणितसंकलितधनं गच्छहृतं रूपरहितगच्छेन । ताडितचयेन रहितं द्वयेन संभाजितं प्रभवः ॥७६॥
अत्रोद्देशकः
नववदनं तत्त्वपदं भावाधिकशतधनं कियान्प्रचयः ।
पञ्च चयोऽष्ट पदं षट्पञ्चाशच्छतधनं मुखं कथय ॥७७॥
स्वेष्टाद्युत्तरगच्छानयनसूत्रम्—
संकलिते स्वेष्टहृते हारो गच्छोऽत्र लब्ध इष्टोने । ऊनितमादिः शेषे व्येकपदार्धोद्धृते प्रचयः ॥७८॥
अत्रोद्देशकः
चत्वारिंशत्सहिता पञ्चशती गणितमत्र संदृष्टम् । गच्छप्रचयप्रभवान्¹ गणितज्ञशिरोमणे कथय ॥७९॥
आद्युत्तरगच्छ सर्वमिश्रधनविश्लेषणे सूत्रत्रयम्—
उत्तरधनेन रहितं गच्छेनैकेन संयुतेन हृतम् । मिश्रधनं प्रभवः स्यादिति गणकशिरोमणे विद्धि ॥८०॥
१ M विगणय्य सखे ममाचक्ष्व ।
एक कम पदों की संख्या की आधी राशि द्वारा ह्रासित करते हैं । प्राप्तफल को प्रचय द्वारा गुणित कर,
जब दो के द्वारा विभाजित करते हैं तो श्रेढि का प्रथम पद प्राप्त होता है ॥७६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रथम पद ९ है; पदों की संख्या ७ है; और श्रेढि का योग १०५ है । प्रचय का मान क्या है ?
अन्य श्रेढि का प्रचय ५ है, पदों की संख्या ८ है और योग १५६ है । बतलाओ प्रथम पद क्या है ?॥७७॥
जब योग दिया गया हो तो इच्छानुसार प्रथम पद, प्रचय और पदों की संख्या निकालने
का नियम—
जब योग को किसी चुनी हुई संख्या द्वारा विभाजित करते हैं तो भाजक श्रेढि के पदों की संख्या
बन जाता है । जब इस भजनफल को किसी फिर से चुनी हुई संख्या द्वारा ह्रासित करते हैं तो यह
घटाई गई संख्या श्रेढि का प्रथम पद बन जाती है । घटाने के बाद प्राप्त शेष जब एक कम पदों की
संख्या की आधी राशि द्वारा विभाजित किया जाता है तो प्रचय उत्पन्न होता है ॥७८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में योग ५४० है । हे गणितज्ञों के शिरोमणि ! बतलाओ कि पदों की संख्या, प्रचय
और प्रथम पद क्या होंगे ? ॥७९॥
प्रथम पद से संयुक्त अथवा प्रचय अथवा पदों की संख्या से अथवा इन सभी से संयुक्त
समान्तर श्रेढि के योग को विश्लेषित करने के लिये तीन नियम—
हे गणक शिरोमणि ! मिश्रधन को उत्तर धन से ह्रासित कर, एक अधिक पदों की संख्या
द्वारा विभाजित किया जाता है तो प्रथम पद प्राप्त होता है—ऐसा समझो ॥८०॥ मिश्रधन को
( ७६ ) बीजीय रूप से : अ = [ ( २ य / न ) - ( न - १ ) ब ] / २
( ७८ ) प्रतीक रूप से, इस प्रश्न में, जब य दिया गया होता है और अ तथा न को किसी भी
तरह चुनना होता है, तब ब का मान निकालना पड़ता है । इसलिये, दिये गये य के लिये, ब के
कितने ही मान हो सकते हैं जो अ और न के चुने जाने पर निर्भर हों । जब अ और न चुन लिये
जाते हैं तो ब को निकालने के लिये यहाँ दिया गया नियम सूत्र ७४ से मिलता है ।

)->( भङ्ग )`

  • करते हैं, जब कि सब पदों को संवादरूप से ( correspondingly ) बढ़ाने के लिये प्रथम पद
  • को एक द्वारा बढ़ा हुआ मान लिया जाय ॥८१॥ मिश्रधन को विश्लेषित करने की विधि इस प्रकार है—
  • मिश्रधन को मन से चुने हुए प्रथम पद और पदों की संख्या द्वारा ह्रासित करते हैं और तब उत्तर-
  • मिश्रधन को भङ्ग करने वाले नियम को इस अंतर में प्रयुक्त करने पर प्रचय प्राप्त होता है ॥८२॥
  • उदाहरणार्थ प्रश्न
  • ४० में क्रमशः २, ३, ५ और १० जोड़कर आदि मिश्रधन और अन्य मिश्रधन बनाते हैं । मुझे
  • बतलाओ कि इन दशाओं में प्रथम पद, प्रचय, पदों की संख्या और कुल तीनों, क्रमशः क्या-क्या होंगे ? ॥८३॥
  • ( दृष्ट ) ज्ञात योग से दी हुई समान्तर श्रेढि का प्रथम पद और प्रचय, द्वितीय श्रेढि के प्रथम पद
  • और प्रचय; जहाँ मन से चुना हुआ योग दी हुई श्रेढि के ज्ञात योग का दुगुना, तिगुना, आधा, तिहाई
  • `अथवा इसी तरह का गुणक अथवा भिन्नीय रूप है, निम्नलिखित

२६ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ८४-
दृष्टधनाद्युत्तरतो द्विगुणत्रिगुणद्विभागत्रिभागादीष्टधनाद्युत्तरानयनसूत्रम्—
दृष्टविभक्तेष्टधनं द्विष्ठं तत्प्रचयताडितं प्रचयः । तत्प्रभवगुणं प्रभवो गुणभागस्येष्टवित्तस्य ॥८४॥
अत्रोद्देशकः
समगच्छश्चत्वारः षष्टिर्मुखमुत्तरं ततो द्विगुणम् । तद्द्व्यादि² हतविभक्तस्वेष्टस्याद्युत्तरे ब्रूहि ॥८५॥
इष्टगच्छयोर्व्यस्ताद्युत्तरसमधनद्विगुणत्रिगुणद्विभागत्रिभागादिधनानयनसूत्रम्—
व्येकात्महतो गच्छः स्वेष्टघ्नो द्विगुणितान्यपदहीनः ।
मुखमात्मोनान्यकृतिर्द्विकेष्टपदघातवर्जिता प्रचयः ॥८६॥
१ M गुणभागाद्युत्तरेच्छायाः । २ M गुण° ।

सरलता के लिये, चुने हुए योग को ज्ञात योग द्वारा विभाजित कर दो स्थानों में रखते हैं ।
इस भजनफल को जब ज्ञात प्रचय द्वारा गुणित करते हैं तो इष्ट प्रचय प्राप्त होता है । वही भजनफल जब
ज्ञात प्रथम पद से गुणित किया जाता है तो चाहा हुआ प्रथम पद उस श्रेढि का प्राप्त होता है जिसका
कि योग ज्ञात श्रेढि के योग का या तो अपवर्त्य अथवा भिन्नात्मक अंश ( भाग ) होता है ॥८४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
६०, ज्ञात प्रथम पद है, ज्ञात प्रचय उससे दुगुना है, और पदों की संख्या ( ज्ञात दी हुई श्रेढि
में तथा इष्ट समस्त श्रेणियों में ) ४ है । ज्ञात योग को २ से आरम्भ होने वाली संख्याओं द्वारा गुणित
अथवा भाजित करने पर प्राप्त हुए योगों वाली श्रेणियों के प्रथम पद और प्रचय निकालो ॥८५॥
जिनके पदों की संख्या मन से चुनी जाती है ऐसी दो श्रेणियों के पारस्परिक विनिमित प्रथम
पद और प्रचय तथा उन श्रेणियों के योगों ( जो बराबर हों, अथवा जिनमें से एक दूसरे का दुगुना,
तिगुना, आधा, तिहाई अथवा ऐसा ही कोई अपवर्त्य या भाग रूप हो, ) को निकालने का नियम—
किसी एक श्रेढि के पदों की संख्या स्वतः से गुणित होकर तथा एक द्वारा ह्रासित होकर और
फिर चुने हुए ( दो श्रेणियों के योग के ) अनुपात द्वारा गुणित होकर, और तब दूसरी श्रेढि के पदों की
संख्या की दुगुनी राशि द्वारा ह्रासित होकर कोई एक श्रेढि के ( परस्पर बदलने योग्य ) प्रथम पद को
प्राप्त होती है । दूसरी श्रेढि के पदों की संख्या की वर्गराशि पदों की संख्या द्वारा ही स्वतः ह्रासित
होकर और तब चुनी हुई निष्पत्ति द्वारा तथा प्रथम श्रेढि के पदों की संख्या के गुणनफल की दुगुनी राशि
द्वारा ह्रासित होकर, उस श्रेढि के परस्पर बदलने योग्य प्रचय को उत्पन्न करती है ॥८६॥

(८४) प्रतीक रूप से, अ₁ = (य₁ / य) अ; ब₁ = (य₁ / य) ब; जहाँ य₁, अ₁, ब₁ ऐसी श्रेढि के क्रमशः
योग,प्रथम पद और प्रचय हैं जिसका योग चुन लिया जाता है । यदि दो श्रेणियों का योग दिया गया
हो, तो दो प्रथम पदों की निष्पत्ति (ratio) और दो प्रचयों का अनुपात य₁ / य ही सर्वदा नहीं रहता ।
यहाँ जो हल दिये गये हैं वे कुछ विशिष्ट दशाओं में प्रयुक्त होते हैं ।
(८६) बीजीय रूप से, अ = न (न - १) × प - २ न₁ और ब = (न₁)² - न₁ - २ प न; जहाँ,
अ, ब और न क्रमशः प्रथमपद, प्रचय और श्रेढि के पदों की संख्या हैं; न₁ द्वितीय श्रेढि के पदों की
संख्या है, और प दो योगों की निष्पत्ति है। अ और ब इस तरह निकालने के बाद दूसरी श्रेढि के
प्रथमपद और प्रचय क्रमशः ब और अ होंगे ।

-२. ९०] परिकर्मव्यवहारः [ २७
अत्रोद्देशकः
पञ्चाष्टगच्छपुंसोर्व्यस्तप्रभवोत्तरे समानधनम् ।
द्वित्रिगुणादिधनं वा ब्रूहि त्वं गणक विगणय्य ॥८७॥
द्वादशषोडशपदयोर्व्यस्तप्रभवोत्तरे समानधनम् ।
व्यादिगुणभागधनमपि कथय त्वं गणितशास्त्रज्ञ ॥८८॥
असमानोत्तरसमगच्छसमधनस्याद्युत्तरानयनसूत्रम्—
अधिकचयस्यैकादिश्चाधिकचयशेषचयविशेषो गुणितः ।
विगतैकपदार्धेन सरूपश्च मुखानि मित्र शेषचयानाम् ॥८९॥
अत्रोद्देशकः
एकादिषडन्तचयानामेकत्रितयपञ्चसप्तचयानाम् ।
नवनवगच्छानां समवित्तानां चाशु वद मुखानि सखे ॥९०॥
१ M गणकमुखतिलक ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो मनुष्यों के धन क्रमशः दो समान्तर श्रेणियों के योग से ज्ञात होते हैं । श्रेणियों-सम्बन्धी
पदों की संख्या ५ और ८ है । दोनों श्रेणियों के प्रथम पद और प्रचय परस्पर बदलने योग्य हैं । श्रेणियों
के योग बराबर हैं अथवा उनमें से एक का योग दूसरे का दुगुना, तिगुना, आधा अथवा ऐसा ही कोई
अपवर्त्य है । हे गणितवेत्ता, शुद्ध गणना के पश्चात् बतलाओ कि इन योगों के तथा परस्पर बदलने योग्य
प्रथमपद और प्रचय के मान क्या हैं ? ॥८७॥ दो समान्तर श्रेणियों के सम्बन्ध में, जिनके पदों की
संख्या १२ और १६ है, प्रथमपद और प्रचय परस्पर बदलने योग्य हैं । श्रेणियों के योग बराबर हैं
अथवा उनमें से एक का योग दुगुना अथवा कोई ऐसा ही अपवर्त्य अथवा भाग है । हे गणितशास्त्रज्ञ
बतलाओ कि इन योगों के तथा परस्पर बदलने योग्य प्रथमपद और प्रचय के मान क्या होंगे ? ॥८८॥
असमान प्रचयौं, समगच्छ और समयोग धनवाली समान्तर श्रेणियों के प्रथम पद प्राप्त करने
का नियम—
जिसका प्रचय सबसे बड़ा है ऐसी श्रेढि का प्रथमपद एक ले लिया जाता है । इस सबसे बड़े प्रचय
और शेष प्रचय के अन्तर को एक से ह्रासित गच्छ की आधी राशि द्वारा गुणित करते हैं । जब इस गुणन-
फल में एक मिलाते हैं तो हे मित्र हमें शेष प्रचय वाली श्रेणियों के प्रथमपद प्राप्त होते हैं ॥८९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे सखे ! बराबर योग वाली दो श्रेणियों के प्रथमपदों को बतलाओ जब कि उनमें से प्रत्येक
में ९ गच्छ है तथा प्रचय क्रमशः १ से आरम्भ होकर ६ तक एक दशा में और १, ३, ५ और ७
दूसरी दशा में हो ॥९०॥
(८९) यहाँ दिया गया हल साधारण नियम की विशेष दशा है । अ₁ = (न - १)/२ ( ब₁ - ब) + अ,
जहाँ अ और अ₁ दो श्रेणियों प्रथमपद हैं; ब और ब₁ उनके संवादी प्रचय हैं । इस सूत्र ( formula )
में, जहाँ ब, ब₁ और न दिये गये हैं; अ₁ का मान अ के किसी मान को चुन लेने पर निकाला जा
सकता है । इस नियम में अ का मान १ लिया गया है ।