गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
DevanagariHindipublished421 पृष्ठ
पृष्ठ 63, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 63परिकर्म क्रियाओं में प्रथम गुणन के क्रिया-सम्बन्धी नियम निम्नलिखित हैं—
-२. १ ] परिकर्मव्यवहारः [ ९
२. परिकर्मव्यवहारः
इतः परं परिकर्माभिधानं प्रथमव्यवहारमुदाहरिष्यामः ।
प्रत्युत्पन्नः
तत्रे प्रथमे प्रत्युत्पन्नपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
गुणयेद्गुणेन गुण्यं कवाटसंधिक्रमेणै संस्थाप्य । राश्यर्धखण्डतस्तथैरनुलोमविलोममार्गाभ्याम् ॥१॥
१ K तत्र च । २ K और B विन्यस्योभौ राशी । ३ K और B सङ्गुणयेत् ।
२. परिकर्म व्यवहार [ अङ्कगणित सम्बन्धी क्रियाएँ ]
इसके पश्चात्, हम परिकर्म नामक प्रथम व्यवहार प्रकट करते हैं ।
प्रत्युत्पन्न ( गुणन )
परिकर्म क्रियाओं में प्रथम गुणन के क्रिया-सम्बन्धी नियम निम्नलिखित हैं—
जिस तरह दरवाजे की कोरें रहती हैं, उसी प्रकार गुण्य और गुणक को एक-दूसरे के नीचे
रखकर, गुण्य को गुणक से दो रीतियों ( अनुलोम अथवा विलोम क्रम से हल करने की विधियों )
में से किसी एक द्वारा गुणित करना चाहिये । प्रथम विधि में गुण्य के खंड द्वारा गुण्य को विभा-
जित और गुणक को गुणित करते हैं । द्वितीय विधि में, गुणक के खंड द्वारा गुणक को विभाजित तथा
गुण्य को गुणित करते हैं । तृतीय विधि में उन्हें उसी रूप में लेकर गुणन करते हैं ॥ १ ॥
( १ ) प्रतीक रूप से यह नियम इस प्रकार है—
'अब' को 'सद' से गुणा करने पर गुणनफल ( i ) अब/अ × (अ × सद); या (ii) (अब × स) ×
सद/स या (iii) अब × सद होता है । यह स्पष्ट है कि प्रथम दो विधियों को उपर्युक्त गुणनखण्डों के
चुनाव द्वारा क्रिया को सरल करने के उपयोग में लाते हैं ।
अनुलोम, अथवा हल करने की सामान्य विधि वह है जो व्यापक रूपसे उपयोग में लाई जाती
है । विलोम विधि निम्नलिखित है— १९९८
१९९८ में २७ का गुणा करने के लिये— २७
प्रत्येक स्तंभ का योग करने पर २ × १ | २ | | | | |
२ × ९ | १ | ८ | | | |
उत्तर ५३९४६ प्राप्त होता है २ × ९ | | १ | ८ | | |
२ × ८ | | | १ | ६ | |
७ × १ | | ७ | | | |
७ × ९ | | ६ | ३ | | |
७ × ९ | | | ६ | ३ | |
७ × ८ | | | | ५ | ६ |
| ५ | ३ | ९ | ४ | ६ |
ग० सा० सं०-२