गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
DevanagariHindipublished421 पृष्ठ
पृष्ठ 65, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 65-२. १७ ] परिकर्मव्यवहारः [ ११
१ श्लोक १० से १५ तक केवल M और B में प्राप्य हैं । २ सभी हस्तलिपियों में 'स्थाप्य तत्र' पाठ
की रचना करती है ॥१०॥ ३ को छः बार, ६ को पाँच बार, और ७ को एक बार अवरोही क्रम से
-२. १७ ] परिकर्मव्यवहारः [ ११
नेन्दाद्र्यृतुशरचतुस्त्रिद्वन्द्वैकं स्थाप्य²मत्र नवगुणितम् ।
आचार्यमहावीरैः कथितं नरपालकण्ठिकाभरणम् ॥१०॥
षट्त्रिकं पञ्चषट्कं च सप्त चादौ प्रतिष्ठितम् । त्रयस्त्रिंशत्संगुणितं कण्ठाभरणमादिशेत्³ ॥११॥
हुतवहगतिशशिमुनिभिर्वसुनयगतिचन्द्रमत्र संस्थाप्य ।
शैलेन तु गुणयित्वा कथयेदं रत्नकण्ठिकाभरणम् ॥१२॥
अनलाब्धिहिमगुमुनिशरदुरिताक्षिपयोधिसोममास्थाप्य ।
शैलेन तु गुणयित्वा कथय त्वं राजकण्ठिकाभरणम् ॥१३॥
गिरिगुणदिविगिरिगुणदिविगिरिगुणनिकरं तथैव गुणगुणितम् ।
पुनरेवं गुणगुणितम् एकादिनवोत्तरं विद्धि ॥१४॥
सप्त शून्यं द्वयं द्वन्द्वं पञ्चैकं च प्रतिष्ठितम् । त्रयःसप्ततिसंगुण्यं⁴ कण्ठाभरणमादिशेत् ॥१५॥
जलनिधिपयोधिशशधरनयनद्रव्याक्षिनिकरमास्थाप्य ।
गुणिते तु चतुःषष्ट्या का संख्या गणितविद्ब्रूहि ॥१६॥
शशाङ्केन्दुखैकेन्दुशून्यैकरूपं निधाय क्रमेणात्र राशिप्रमाणम् ।
हिमांश्रवग्नरन्ध्रैः प्रसंतोदितेऽस्मिन् भवेत्कण्ठिका राजपुत्रस्य योग्या ॥१७॥
इति परिकर्मविधौ प्रथमः प्रत्युत्पन्नः समाप्तः ।
१ श्लोक १० से १५ तक केवल M और B में प्राप्य हैं । २ सभी हस्तलिपियों में 'स्थाप्य तत्र' पाठ
है । ३ B शे । ४ B नयं १० सभी हस्तलिपियों में छंद रूपेण अशुद्ध पाठ “कण्ठाभरणं विनिर्दिशेत्” है ।
की रचना करती है ॥१०॥ ३ को छः बार, ६ को पाँच बार, और ७ को एक बार अवरोही क्रम से
(इकाई के स्थान की ओर) लिखकर, इस संख्या का ३३ से गुणन करने पर एक प्रकार के हार की संख्या
प्राप्त होती है ॥११॥ इस प्रश्न में, ३, ४, १, ७, ८, २, ४ और १ अंकों को इकाई के स्थान से ऊपर
की ओर के क्रम में लिखने पर संख्या का ७ से गुणन करो; और तब कहो कि वह रत्न कंठिका नामक
आभरण है ॥ १२ ॥ १४२८५७१४३ संख्या को लिखकर उसे ७ से गुणित करो; और तब कहो कि वह
राजकण्ठिका आभरण है ॥१३॥ इसी तरह, ३७०३७०३७ को ३ से गुणित करो । इस गुणनफल को फिर
गुणित करो ताकि गुणक क्रमशः एक से लेकर ९ तक हों ॥१४॥ ७, ०, २, २, ५ और १ अंकों को
( इकाई के स्थान से ऊपर की ओर के क्रम में ) रखते हैं । और इस संख्या को ७३ से गुणित करते हैं ।
प्राप्त संख्या को कण्ठ आभरण कहते हैं ॥१५॥ इकाई के स्थान से ऊपर की ओर अंक ४, ४, १, २, ६
और २ क्रमानुसार लिखकर, प्ररूपित संख्या को ६४ से गुणित करने पर हे गणित विद्ब्रूहि, बतलाओ कि
कौन सी संख्या प्राप्त होगी ? ॥१६॥ इस प्रश्न में, इकाई के स्थान से ऊपर की ओर १, १, ०, १, १, ०, १
और १ अंकों को क्रमानुसार रखने से एक विशेष संख्या का मान होता है; और तब इस संख्या में
९१ का गुणा करने पर राजपुत्र के योग्य कण्ठहार प्राप्त होता है ॥१७॥
इस प्रकार, परिकर्म व्यवहार में, प्रत्युत्पन्न नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
(१०) इसमें तथा अन्य गाथाओं में कुछ संख्याएँ विभिन्न प्रकार के हारों की रचना करती हुईं
मानी गई हैं; क्योंकि उनमें एक से अंकों का शीघ्र ही दृष्टिगोचर होनेवाला सम्मितीय विन्यास रहता है ।
(११) यहाँ गुण्य ३३३३३३६६६६६७ है ।
(१४) यह प्रश्न, स्वतः, इस रूपमें अवतरित हो जाता है : ३७०३७०३७ x ३ को १, २, ३, ४,
५, ६, ७, ८ और ९ द्वारा क्रमानुसार गुणित करो ।