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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 421 में से

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पृष्ठ 73

-२. ५६ ] परिकर्मव्यवहारः [ १९
घनेमेकं द्वे अघने घनपदकृत्या भजेत्त्रिगुणयाघनतः ।
पूर्वत्रिगुणाप्रकृतिस्त्याज्याप्रघनश्च पूर्ववल्लब्धपदैः ॥५४॥
अत्रोद्देशकः
एकादिनवान्तानां घनात्मनां रत्नशशिनवाब्धीनाम् । नँगरसवसुखर्तुगजक्षपाकियाणां च मूलं किम् ॥५५॥
गतिनयमदशिखिशशिनां मुनिगुणखर्त्वक्षिनखैखरात्रीणाम् ।
वँसुखयुगखाद्रिगतिकरिचन्द्रर्तूनां गृहाण पदम् ॥५६॥
१ यह श्लोक M में प्राप्य नहीं है । २ M गिरि । ३ M रसा । ४ M विधुपुरखरस्वरर्तुज्वलनधराणां ।
तीन अंकों के विभिन्न समूह में से एक अंक घन (cubic) और दो अघन (non-cubic)
होते हैं । अघन अंक में घनमूल के वर्ग की तिगुनी राशि का भाग दो । अग्रिम अघन अंक में से,
ऊपर प्राप्त हुए भजनफल को वर्गित करने से प्राप्त हुई राशि तथा पिछले घन अंक में से (घटाई
गई अधिक से अधिक घनसंख्या के) घनमूल की तिगुनी राशि का गुणनफल घटाओ । और तब अग्रिम
घन अंक को स्थिति में लाकर, उसमें से ऊपर प्राप्त हुए भजनफल का घन घटाओ । इस तरह स्थिति में
लाकर प्राप्त हुए घनमूल अंकों की सहायता से पूर्व विधि उपयोग में लाओ ॥५४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
१ से लेकर ९ तक की घन संख्याओं के घनमूल क्या होंगे ? ४९१३ और १८४०८६७ के घनमूल
बतलाओ ? ॥५५॥ १३८२४, ३६९२६०३७ और ६१८४७०२०८ के घनमूल निकालो ॥५६॥
(५३-५४) जिसका घनमूल निकालना होता है ऐसी दी गई संख्या में अंक नियमानुसार समूहों
में विभक्त कर दिये जाते हैं । प्रत्येक समूह में अधिक से अधिक ३ अंक होते हैं; उनके नाम क्रमशः
दाहिनी ओर से बाँई ओर : घन (अथवा वह जो घनात्त्मक होता है अर्थात् जिसमें से घन राशि
घटाना होती है ), शोध्य ( अथवा वह जो घटाया जाता है ) और भाज्य हैं । बाँई ओर का अंतिम
समूह हमेशा तीन अंकमय नहीं होता । उसमें एक, दो, या तीन अंक तक रहते हैं । निम्नलिखित
साधित उदाहरण से नियम स्पष्ट हो जावेगा ।
७७३०८७७६ का घनमूल निकालना—
शो. घ.  भा. शो. घ.  भा. शो. घ.
७ ७   ३ ० ८   ७ ७ ६
घ.........४³ =        ६ ४       यह नियम उल्लेख नहीं करता कि कौन
भा......४² × ३    = ४८) १३३ (२      से अंक घनमूल की संरचना करते हैं । पर
९६       यह अर्थ किया जाता है कि क्रिया में घन
―――       किये गये अंकों को क्रम से बाँई ओर से
शो...२² × ३ × ४...   =  ३७०       दाहिनी ओर रखने संख्या (घनमूल) प्राप्त
=  ४८       होती है ।
―――
३२२८
घ......२³..........   =   ८
―――
भा......४२² × ३... = ५२९२) ३२२०७ (६
३१७५२
―――
४५५७
शो...६² × ३ × ४२............ = ४५३६
―――
२१६
घ....६³....................... =  २१६
―――
×
∴ घनमूल = ४२६ ।