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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 421 में से

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पृष्ठ 62

८ ] गणितसारसंग्रहः [ १. ६१-

नव नन्दं च रन्ध्रं च पदार्थं लब्धकेशवौ । निधिंरत्नं ग्रहाणं च दुर्गानाम च संख्यया ॥६१॥
आकाशं गगनं शून्यमम्बरं खं नभो वियत् । अनन्तमन्तरिक्षं च विष्णुपदं दिवि स्मरेत् ॥६२॥
अथ स्थाननामानि
एकं तु प्रथमस्थानं द्वितीयं दशसंज्ञिकम् । तृतीयं शतमित्याहुः चतुर्थं तु सहस्रकम् ॥६३॥
पञ्चमं दशसाहस्रं षष्ठं स्याल्लक्षमेव च । सप्तमं दशलक्षं तु अष्टमं कोटिरुच्यते ॥६४॥
नवमं दशकोट्यस्तु दशमं शतकोटयः । अर्बुदं रुद्रसंयुक्तं न्यर्बुदं द्वादशं भवेत् ॥६५॥
खर्वं त्रयोदशस्थानं महाखर्वं चतुर्दशम् । पद्मं पञ्चदशं चैव महापद्मं तु षोडशम् ॥६६॥
क्षोणी सप्तदशं चैव महाक्षोणी दशाष्टकम् । शङ्खं नवदशं स्थानं महाशङ्खं तु विंशकम् ॥६७॥
क्षित्यैकविंशतिस्थानं महाक्षित्या द्विविंशकम् । त्रिविंशकमथ क्षोभं महाक्षोभं चतुर्नयम् ॥६८॥
अथ गणकगुणनिरूपणम्
लघुकरणोहापोहानालस्यग्रहणधारणोपायैः । व्यक्तिकराङ्कविशिष्टैर्गणकोऽष्टाभिर्गुणैर्ज्ञेयः ॥६९॥
इति संज्ञा समासेन भाषिता मुनिपुङ्गवैः । विस्तरेणागमाद्ध्येयं वक्तव्यं यदितः परम् ॥७०॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ संज्ञाधिकार समाप्तः ॥
गये हैं । वे यहाँ अनुवादित नहीं किये गये हैं ॥५३-६२॥
स्थान-नामावलि [ संकेतनात्मक स्थानों के नाम ]
प्रथम स्थान वह है जो एक ( इकाई ) कहलाता है, दूसरा स्थान दश ( दहाई ), तीसरा स्थान
शत ( सैकडा ) और चौथा सहस्र ( हजार ) कहलाता है ॥६३॥ पाँचवा दस सहस्र ( दस हजार ),
छठवाँ लक्ष ( लाख ), सातवाँ दशलक्ष ( दस लाख ) और आठवाँ कोटि ( करोड़ ) कहलाता है ॥६४॥
नौवाँ दशकोटि ( दस करोड़ ) और दसवाँ शतकोटि ( सौ करोड़ ) कहलाता है। ग्यारहवाँ स्थान अर्बुद
( अरब ) और बारहवाँ न्यर्बुद ( दस अरब ) कहलाता है ॥६५॥ तेरहवाँ स्थान खर्व ( खरब ) और
चौदहवाँ महाखर्व ( दस खरब ) कहलाता है । इसी तरह, पंद्रहवाँ पद्म और सोलहवाँ महापद्म
कहलाता है ॥६६॥ पुनः सत्रहवाँ क्षोणी, अठारहवाँ महाक्षोणी कहलाता है । उन्नीसवाँ स्थान शङ्ख और
बीसवाँ महाशङ्ख कहलाता है ॥६७॥ इक्कीसवाँ स्थान क्षित्या, बाईसवाँ महाक्षित्या कहलाता है।
तेईसवाँ क्षोभ और चौबीसवाँ महाक्षोभ कहलाता है ॥६८॥
गणकगुणनिरूपण
निम्नलिखित आठ गुणों से गणितज्ञ की पहिचान होती है—
(१) लघुकरण—हल करने में शीघ्र गति, (२) ऊह—अग्रविकल्प, कि इच्छित फल प्राप्त हो सकेगा,
(३) अपोह—अग्रविकल्प, कि इच्छित फल प्राप्त नहीं होगा, (४) अनालस्य—प्रमाद न होना, (५) ग्रहण—
समझने की शक्ति, (६) धारण—स्मरण रखने की शक्ति, (७) उपाय—साधन करने की नई रीतियाँ
खोजना, एवं (८) व्यक्तिकराङ्क—उन संख्याओं तक पहुँचने का सामर्थ्य रखना जो अज्ञात राशियों को
ज्ञात बना सकें ॥६९॥ इस प्रकार, मुनि पुङ्गवों ने संक्षेप में परिभाषाओं का कथन किया है । जो कुछ
इसके विषय में आगे विस्तार रूप से कहा जाना चाहिए उसे आगम¹ के अध्ययन से ज्ञात करना चाहिये ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणित-शास्त्र में, संज्ञा अधिकार समाप्त हुआ ॥७०॥
१ यहाँ आगम का आशय, सम्भवतः जिनागम प्रणीत अलौकिक गणित से हो जिसके विषय में
ग्रंथकार द्वारा मात्र यहीं संकेत किया गया प्रतीत होता है ।