सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 69

-२. ३६ ] परिकर्मव्यवहारः [ १५
सप्ताशीतित्रिशतसहितं षट्सहस्रं पुनश्च पञ्चत्रिंशच्छतसमधिकं सप्तनिघ्नं सहस्रम् ।
द्वाविंशत्या युतदशशतं^१ वर्गितं तन्नयाणां ब्रूहि त्वं मे गणकगुणवन्संगुणय्य प्रमाणम् ॥३५॥
इति परिकर्मविधौ तृतीयो वर्गः समाप्तः ।
वर्गमूलम्
चतुर्थे वर्गमूलपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
अन्त्यौजादपहृतकृतिमूलेन द्विगुणितेन युग्महृतौ। लब्धकृतिस्त्याज्यौजॆ द्विगुणदलं वर्गमूलफलम् ॥३६॥
१ P, K और B राशिरेतत्कृतीनाम् ।
६३८७ और तब ७१३५ और तब १०२२, इनमें से प्रत्येक संख्या का वर्ग किया जाता है । हे कुशल
गणितज्ञ ! अच्छी तरह गणना करने के पश्चात् मुझे बतलाओ कि इन तीनों के वर्ग क्या होंगे ? ॥३५॥
इस तरह, परिकर्म व्यवहार में, वर्ग नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
वर्गमूल
परिकर्म