गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 74, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें२० ] गणितसारसंग्रहः [ २. ५७-
चतुःपयोध्यभ्रिशराश्विदृष्टिहयेभखव्योमभयेक्षणस्य ।
वदाष्टकर्माब्धिखघातिभावद्विवह्निरत्नर्तुनगस्य मूलम् ॥५७॥
द्रव्याश्वशैलदुरितखवह्वयद्रिभयस्य वदत घनमूलम् ।
नवचन्द्रहिमगुमुनिशशिलब्ध्यम्बरखरयुगस्यापि ॥५८॥
गोतिगजविषयेषुविधुस्वर।द्रिकरगतियुगस्य भण मूलम् ।
लेख्याश्वनगनवाचलपुरखरनयजीवचन्द्रमसाम् ॥५९॥
गतिकरदुरितेभाभ्भोधिताक्ष्य्र्ध्वजाक्षद्विकृतिनवपदार्थद्रव्यवह्वीन्दुचन्द्र-
जलधरपथरुन्ध्रेष्वष्टकानां घनानां गणक गणितदक्षाचक्ष्व मूलं परीक्ष्य ॥६०॥
इति परिकर्मविधौ षष्ठं घनमूलं समाप्तम् ।
संकलितम्
सप्तमे संकलितपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
रूपेणोनो गच्छो दलीकृतः प्रचयताडितो मिश्रः । प्रभवेण पदाभ्यस्तः संकलितं भवति सर्वेषाम् ॥६१॥
प्रकारान्तरेण धनानयनसूत्रम्—
एकविहीनो गच्छः प्रचयगुणो द्विगुणितादिसंयुक्तः । गच्छाभ्यस्तो द्विहृतः प्रभवेत्सर्वत्र संकलितम् ॥६२।
१ यह श्लोक M में अप्राप्य है ।
२७००८७२२५३४४ और ७६३२९४०४८८ के घनमूल प्राप्त करो ॥५७॥ ७७३०८७७६ और २६०९१७११९
के भी घनमूल निकालो ॥५८॥ २४२७७१५५८४ और १६२६३७९७७६ के घनमूल निकालो ॥५९॥
हे गणक ! यदि तुम गणित में कुशल हो तो ८५९०११३६९९४५९४८८६४ घनराशि का घनमूल परीक्षा
से निकालकर बतलाओ ॥६०॥
इस प्रकार, परिकर्म व्यवहार में घनमूल नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
संकलित [ श्रेणियों का संकलन ]
परिकर्म क्रियाओं में सप्तम संकलित क्रिया सम्बन्धी नियम निम्नलिखित है—
पहिले श्रेढि के पदों की संख्या को एक द्वारा घटाया जाता है और तब प्राप्त फल को आधा कर
प्रचय द्वारा गुणित किया जाता है । इसे, जब श्रेढि के प्रथम पद के साथ मिलाकर पदों की संख्या से
गुणित करते हैं तो समान्तर श्रेढि के समस्त पदों का योग प्राप्त होता है ॥६१॥
दूसरी तरह से श्रेढि का योग प्राप्त करने का नियम—
श्रेढि के पदों की संख्या को एक द्वारा ह्रासित कर प्रचय द्वारा गुणित करते हैं । प्राप्त फल में
श्रेढि के प्रथम पद की दुगुनी राशि मिलाते हैं; और जब इस योग को श्रेढि के पदों की संख्या से
गुणित कर दो से भाजित करते हैं, तो सर्वत्र श्रेढि का योग उत्पन्न होता है ॥६२॥
( ६१ ) यह नियम बीजीयरूप से निम्नलिखित रूप में प्रदर्शित किया जा सकता है—
⎛ (न - १)/२ ब + अ ⎞ न = य, जहाँ अ प्रथम पद है; ब प्रचय है, न पदों की संख्या है और य
समस्त श्रेढि का योग है ।
( ६२ ) इसी तरह, { [(न - १) ब + २ अ] / २ } न = य होता है ।