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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

४२ गणितसारसंग्रह
शब्द सूत्र अध्याय पृष्ठ स्पष्टीकरण अभ्युक्ति
कोटि करोड़, संकेतना का आठवाँ स्थान ।
कोटिका ... ... ... वस्त्र, आभूषण तथा बेत का संख्यात्मक परिशिष्ट ४ की
माप । सूची ७ देखिये ।
क्रोश ... ... ... लम्बाई (दूरी) का माप । परिशिष्ट ३ की
सूची १ देखिये ।
कृति ... ... ... वर्ग करण क्रिया ।
कृष्णागरु ... ... ... सुगन्धित काष्ठ की काली विभिन्नता ।
खर्व संकेतना का तेरहवाँ स्थान ।
खारी धान्य का आयतन सम्बन्धी माप ।
गच्छ श्रेढि के पदों की संख्या ।
गण्डक स्वर्ण का भार माप । परिशिष्ट ४ की
सूची ४ देखिये ।
गतनाऽद्य १०½ ९ पूर्वाह्न में बीता हुआ दिनांश ।
गुञ्जा ... स्वर्ण या रजत का भार माप । परिशिष्ट ४ की
सूचियाँ ४ एवं
५ देखिये ।
गुण ५ ७ ... जीवा ।
गुणकार ... ... ... गुणा ।
गुणधन ९३ २ ... गुणोत्तर श्रेढि के पदों की संख्या के
तुल्य साधारण निष्पत्तियों को लेकर,
उनके परस्पर गुणनफल में प्रथम पद
का गुणा करने से गुणधन प्राप्त होता है ।
गुण सङ्कलित ... गुणोत्तर श्रेढि (Geometrical
progression).
घटी काल माप परिशिष्ट ४ की
सूची २ देखिये ।
घन ५३-५४ २ ... किसी राशि का घन करना; जिस राशि
का घनमूल निकालना इष्ट होता है,
उसे इकाई के स्थान से प्रारम्भ कर
तीन-तीन के समूह में विभाजित कर
लेते हैं । इन समूहों में से प्रत्येक का
दाहिनी ओर का अंतिम अंक घन
कहलाता है ।
घन मूल घनमूल निकालने की क्रिया।

गणितसारसंग्रह ४३

शब्द | सूत्र | अध्याय | पृष्ठ | स्पष्टीकरण | अभ्युक्ति

चक्रिकाभञ्जन | ६ | १ | १ | जन्ममरण के चक्र का संहार करनेवाले; |
| | | | राष्ट्रकूट राजवंश के राजा का नाम । |
चतुर्मण्डल क्षेत्र | ८२ ½ | ७ | २०१ | मध्य स्थिति |
चम्पक | ६ | ४ | ६९ | पीले सुगन्धित पुष्प वाला वृक्ष | Michelia
| | | | | Champaka
चय | ६८ | २ | २२ | प्रचय । वह राशि जो समान्तर श्रेढि |
| | | | के उत्तरोत्तर पदों में समान अन्तर |
| | | | स्थापित करती है । |
चरमार्ध | १०३ ½ | ६ | ११२ | शेष मूल्य |
चिति | ३०३ | ६ | १६९ | श्रेढि संकलन । ढेर । |
| | | २६२ | |
चित्र कुट्टीकार | २१६ | ६ | १४५ | अनुपाती विभाजन समन्वित विचित्र |
| | | | एवं मनोरञ्जक प्रश्न । |
चित्र कुट्टीकार मिश्र | २७३ ½ | ६ | १६० | अनुपाती विभाजन क्रिया के प्रयोग |
| | | | गर्भित विचित्र एवं मनोरञ्जक मिश्रित |
| | | | प्रश्न । |
छन्द | ३३३ ½ | ६ | १७७ | ... ... | A syllabic
| | | | | metre
जन्य | ९० ½ | ७ | २०४ | 'बीज' नामक दत्त न्यास से व्युत्पादित |
| | | | त्रिभुज और चतुर्भुज आकृतियाँ । |
जम्बू | ६४ | ४ | ८० | वृक्ष का नाम । | Eujenia
| | | | | Jambalona,
जिन | १ | ६ | ९१ | जिन्होंने घातिया कर्मों का नाश किया | जिन्होंने अनेक
| | | | है वे सकल जिन हैं इनमें अरहंत और | विषम भवों के
| | | | सिद्धगर्भित हैं । आचार्य, उपाध्याय | गहन दुःख प्रदान
| | | | तथा साधु एक देश जिन कहे जाते हैं | करनेवाले कर्म
| | | | क्योंकि वे रत्नत्रय सहित होते हैं । | शत्रुओं को जीता
| | | | असंयत सम्यक् दृष्टि से लेकर अयोगी | है-निर्जरा की है,
| | | | पर्यन्त सभी जिन होते हैं । | वे जिन कहलाते
| | | | | हैं ।
जिनपति | ८३ ½ | ६ | १०८ | तीर्थंकर । |
ज्येष्ठ धन | १०२ ½ | ६ | ११२ | सबसे बड़ा धन । |
डुण्डुक | ६७ | ८ | २६८ | वृक्ष का नाम । |

४४ गणितसारसंग्रह
शब्द सूत्र अध्याय पृष्ठ स्पष्टीकरण अभ्युक्ति
तमाल ३९ ४ ७४ वृक्ष का नाम । Xantho-
chymus
ताली ११६ १/२ ६ ११९ वृक्ष का नाम Pictorius
तिलक २६ ४ ७२ सुन्दर पुष्पों वाला वृक्ष ।
तीर्थ १ ६ ९१ उथला स्थान जहाँ से नदी आदि को
पार कर सकते हैं ।
तीर्थंकर १ ६ ९१ तीर्थों को उत्पन्न करनेवाली, चार-
घातिया कर्मों का नाशकर अर्हंत पद
से विभूषित आत्मा ।
तुला ४४ १ ६ कुप्य ( Baser ) धातुओं का भार
माप ।
त्रसरेणु २६ १ ४ कण । क्षेत्रमाप ।
त्रिप्रश्न १२ १ २ संस्कृत ज्योतिष ग्रंथों के किसी अध्याय
का नाम ।
त्रिसमचतुरश्र ५ ७ १८१ तीन समान भुजाओं वाला चतुर्भुज
क्षेत्र ।
दण्ड ३० १ ४ दूरी की माप । परिशिष्ट ४ की
सूची १ देखिये ।
दश ६३ १ ८ संकेतना का दसवाँ स्थान ।
दश कोटि ६५ १ ८ दस करोड़ ।
दश लक्ष ६४ १ ८ दस लाख ( One million ) ।
दश सहस्र ६४ १ ८ दस हजार ।
द्विरग्र शेषमूल ३ ४ ६८ भिन्नो के विविध प्रश्नों की एक जाति ।
द्विसम त्रिभुज ५ ७ १८० दो समान भुजाओं वाला (समद्विबाहु)
त्रिभुज क्षेत्र ।
द्विसम चतुरश्र ,, ,, १८० दो समान भुजाओं वाला चतुर्भुज क्षेत्र ।
द्वि द्विसम चतुरश्र ,, ,, १८० आयत क्षेत्र ।
दीनार ४३ १ ६ कुप्य धातुओं का भार माप । टंक- परिशिष्ट ४ की
( सिक्के ) का नाम भी दीनार है । सूची ६ देखिये ।
दृष्ट धन ८४ २ २६ ज्ञात धन
द्रक्षूण ४३ १ ६ कुप्य धातुओं ( Baser metals ) ,, ,,
का भार माप ।
द्रोण ३७ १ ५ धान्य सम्बन्धी आयतन माप परिशिष्ट ४ की
सूची ३ देखिये ।
धनुषाकार क्षेत्र ४३ ७ १९० वृत्त के चाप एवं चापकर्ण से सीमित क्षेत्र ॥

गणितसारसंग्रह ४५
शब्द | सूत्र | अध्याय | पृष्ठ | स्पष्टीकरण | अभ्युक्ति
धरण | ३९ | १ | ५ | स्वर्ण या रजत का भार माप । | परिशिष्ट ४ की
| | | | | सूचियाँ ४ और
| | | | | ५ देखिये ।
नन्द्यावर्त | ३३२ १/२ | ६ | १७७ | विशेष प्रकार के बने हुए राजमहल
| | | | का नाम । |
नरपाल | १० | २ | ११ | राजा; सम्भवतः किसी राजा का नाम । |
निरुद्ध | ५६ | ३ | ४९ | लघुत्तम समापवर्त्य । |
निष्क | ११४ | ३ | ६१ | स्वर्ण टंक (सिक्का) । |
नीलोत्पल | २२१ | ६ | १४७ | नील कमल (जल में उगने वाली
| | | | नीली नलिनी) । |
नेभिक्षेत्र | १७ | ७ | १८४ | दो संकेन्द्र परिधियों का मध्यवर्ती
| ८० १/२ | " | २०० | क्षेत्र (Annulus) । |
न्यर्बुद | ६५ | १ | ८ | संकेतना का बारहवाँ स्थान । |
पट्टिका | ६३- | ८ | २६७ | क्रकच कर्म (Saw-work) का | परिशिष्ट ४ की
| ६७ १/२ | | | माप । | सूची १० देखिये ।
पण | ३९ | १ | ५ | स्वर्ण का भार माप; स्वर्ण टंक | परिशिष्ट ४ की
| | | | (सिक्का) । | सूची ४ देखिये ।
पणव | ३२ | ७ | १८८ | डिंडम या भेरी;
(अन्वायाम छेद) | | | | ... ... ... |
पद्म | ६६ | १ | ८ | संकेतना का पंद्रहवाँ स्थान । |
पद्मराग | ३ | २ | १० | एक प्रकार का रत्न । |
परमाणु | २५ | १ | ४ | पुद्गल का अविभागी कण । | परिशिष्ट ४ की
| | | | | सूची १ देखिये ।

४६ गणितसारसंग्रह

शब्द | सूत्र | अध्याय | पृष्ठ | स्पष्टीकरण | अभ्युक्ति

परिकर्म | ४७ | १ | ६ | गणितीय क्रियाएँ। इन्द्रनन्दि कृत |
| ४८ | | | श्रुतावतार (श्लोक १६०-१६१) के |
| | | | अनुसार कुन्दकुन्दपुर के पद्मनन्दि |
| | | | (अर्थात् कुन्दकुन्द) ने अपने गुरुओं |
| | | | से सिद्धान्त का अध्ययन किया और |
| | | | षट्खण्डागम के तीन खंडों पर परि- |
| | | | कर्म नाम की टीका लिखी। यह |
| | | | अनुपलब्ध है। (त्रिलोक प्रज्ञप्ति, |
| | | | भाग २, १९५१ की प्रस्तावना से |
| | | | उद्धृत)। |
पल | ३९ | | ५ | स्वर्ण, रजत एवं अन्य धातुओं का | परिशिष्ट ४ की
| ४१ | १ | ५ | भार माप। | सूचियाँ ४, ५, ६
| ४४ | | ६ | | देखिये।
पक्ष | ३४ | १ | ५ | काल माप। | परिशिष्ट ४ की
| | | | | सूची २ देखिये।
पाटली | ६ | ४ | ६९ | मधुर गंध वाले पुष्पों | Bignonia
| २४ | ४ | ७२ | वाला वृक्ष। | Suaveolens.
पाद | २९ | १ | ४ | लम्बाई का माप। | परिशिष्ट ४ की
| | | | | सूची १ देखिये।
पार्श्व | ८३½ | ६ | १०८ | पार्श्वनाथ, २३वें तीर्थंकर। बाजू में। |
पुन्नाग | ३५ | ४ | ७३ | वृक्ष का नाम। | Rottleria
| | | | | Tinctoria
पुराण | ४१ | १ | ६ | रजत का भार माप, सम्भवतः | परिशिष्ट ४ की
| | | | टंक भी। | सूची ५ देखिये।
पुष्यराग | ४ | २ | १० | एक प्रकार का रत्न। |
पैशाचिक | ११२½ | ७ | २१३ | पिशाच सम्बन्धी; इसलिये अत्यन्त |
| | | | कठिन अथवा जटिल। |
प्रकीर्णक | ३ | ४ | ६८ | विविध प्रश्नावली। |
प्रतिबाहु | ७ | ७ | १८२ | पार्श्व या बाजू की भुजा। |
प्रत्युत्पन्न | १ | २ | ९ | गुणन। |
प्रपूरणिका | १९२ | ६ | १४० | (साहित्यिक) वह जो पूर्ण रूप से |
| | | | भर अथवा तुष्ट कर देती है; यहाँ |
| | | | स्वर्ण मिश्रित कुप्य धातुएँ; तलछट |
| | | | (dross)। |

गणितसारसंग्रह ४७
शब्द | सूत्र | अध्याय | पृष्ठ | स्पष्टीकरण | अभ्युक्ति
प्रभाग | ९९ | ३ | ५९ | भिन्न का भिन्न (भाग का भाग)।
प्रमाण | २८ | १ | ४ | लम्बाई का माप। | परिशिष्ट ४ की
| | | | | सूची १ देखिए !
| २ | ५ | ८३ | इच्छा की संवादी दत्त राशि जो |
| | | | त्रैराशिक प्रश्नों से सम्बन्धित है। |
प्रवर्तिका | ३७ | १ | ५ | धान्य सम्बन्धी आयतन माप। |
प्रस्थ | ३६ | १ | ५ | ,, ,, | परिशिष्ट ४ की
| | | | | सूचियाँ ३ और ६
| | | | | देखिये।
प्रक्षेपक | ७९ ½ | ६ | १०८ | अनुपाती वितरण। |
प्रक्षेपक करण | ७९ ½ | ६ | १०८ | अनुपाती वितरण सम्बन्धी क्रिया। |
प्लक्ष | ६७ | ८ | २६८ | वृक्ष का नाम; प्रोदुम्बर। | Ficus Infec-
| | | | | toria, or
| | | | | Religiosa.
फल | २ | ५ | ८३ | त्रैराशिक प्रश्न में निकाली जाने वाली |
| | | | राशि की संवादी दत्त राशि। |
बहिश्चक्रवाल वृत्त | २८ | ७ | १८७ | कङ्कण की बाहिरी परिधि। |
| ६७ ½ | ७ | १९७ | |
बाण | ४३ | ७ | १९० | धनुषाकार क्षेत्र में चाप और चापकर्ण |
| | | | की महत्तम उदग्र दूरी। (height |
| | | | of a segment) |
बालेन्दु क्षेत्र | ७९ ½ | ७ | २०० | चंद्रमा की कला सदृश क्षेत्र। |
बीज | | | | (साहित्यिक), बोया जाने वाला |
| | | | धान्य आदि। |
| ९० ½ | ७ | २०४ | (यहाँ) इसका उपयोग धनात्मक |
| | | | दो पूर्णांकों के अभिधान हेतु होता है |
| | | | जिनके गुणनफल एवं वर्गों की सहायता |
| | | | से भुजाओं के माप को निकालने |
| | | | पर समकोण त्रिभुज संरचित होता है। |
भाग | ४२ | १ | ६ | कुप्य (baser) धातुओं का माप | परिशिष्ट ४ की
| | | | | सूची ६ देखिये।
भागानुबंध | ११३ | ३ | ६१ | संयव भिन्न (Fractions in |
| | | | association) |
भागापवाह | १२६ | ३ | ६३ | वियुत भिन्न (Dissociated |
| | | | fractions) |

४८ गणितसारसंग्रह
शब्द सूत्र अध्याय पृष्ठ स्पष्टीकरण अभ्युक्ति
भागाभ्यास ३ ४ ६८ प्रकीर्णक भिन्नों का एक प्रकार ।
भागभाग १११ ३ ६० जटिल भिन्न ( Complex frac-
tion ) ।
भागमातृ १३८ ३ ६६ भाग, प्रभाग, भागभाग, भागानुबन्ध,
और भागापवाह भिन्न जातियों के
दो या दो से अधिक प्रकारों के संयोग
से संरचित ।
भाग सम्वर्ग ३ ४ ६८ प्रकीर्णक भिन्नों की एक जाति ।
भागहार १८ २ १२ विभाजन क्रिया ।
भाज्य ५३-५४ २ १८ घनमूल समूह की रचना करने वाले
तीन स्थानों में से बीच का स्थान ।
जिसमें भाग देते हैं ।
भार ४४ १ ६ कुप्य ( baser ) धातुओं का माप । परिशिष्ट ४ की
सूची ६ देखिये ।
भिन्न कुट्टीकार १३४ ६ १२३ भिन्नीय राशियों का अन्तर्धारक
अनुपाती वितरण ।
भिन्न दृश्य ३ ४ ६८ प्रकीर्णक भिन्नों की एक जाति ।
मधुक २५ ४ ७२ वृक्ष का नाम । Bassia
Latifolia
मध्यधन ६३ २ २१ समानान्तर श्रेढि का मध्य पद ।
मर्दल ३२ ७ १८८ डिंडिम या भेरी ।
( अन्वायाम छेद)
महाखर्व ६६ १ ८ संकेतना का चौदहवाँ स्थान ।
महापद्म ६६ १ ८ संकेतना का सोलहवाँ स्थान ।
महावीर १ १ १ २४वें तीर्थंकर वर्द्धमान स्वामी ।
महाशंख ६७ १ ८ संकेतना का बीसवाँ स्थान ।
महाक्षित्या ६८ १ ८ संकेतना का बाईसवाँ स्थान ।
महाक्षोभ ६८ १ ८ संकेतना का चौबीसवाँ स्थान ।
महाक्षोणी ६७ १ ८ संकेतना का अठारहवाँ स्थान ।
मार्ग ६३ ८ १६७ छेद ( section ); वह अनुरेखा
जिस पर से काष्ठ का टुकड़ा आरे से
चीरा जाता है ।

गणितसारसंग्रह ४९

शब्दसूत्रअध्यायपृष्ठस्पष्टीकरणअभ्युक्ति
मानी३७१५धान्य सम्बन्धी आयतन माप ।परिशिष्ट ४ की
सूची ३ देखिये ।
माष४०१५रजत का भार माप टंक (सिक्का) ।परिशिष्ट ४ की
सूची ५ देखिये ।
मिश्रधन८०-८२२२४संयुक्त या मिला हुआ योग ।
मुख५०७१९३चतुर्भुज की ऊपरी भुजा (top-side)शङ्खाकार और
मृदङ्ग आकार वाले
क्षेत्रों में भी मुख का
उपयोग हुआ है ।
मुरज३२७१८८मृदंग के समान डिंडिम या भेरी ।
मुहूर्त३४१५काल मापपरिशिष्ट ४ की
सूची २ देखिये ।
मूल३६२१५वर्गमूल; प्रकीर्णक भिन्नों को एक जाति
३४६८
मूलमिश्र३४६८जिसमें वर्गमूल अंतर्भूत हों; प्रकीर्णक
भिन्नों की एक जाति ।
मेरु५५८३जम्बूद्वीप के मध्यभाग में स्थित सुमेरु
पर्वत । विशेष विवरण के लिये त्रिलोक
प्रज्ञप्ति भाग २ में (४/१८०२-१८११;
४/२८१३, २८२३) देखिये ।
मृदंग३२७१८८एक प्रकार की डिंडिम या भेरी ।
(अन्वायाम छेद)
यव२७१४एक प्रकार का धान्य; लम्बाई का माप ।परिशिष्ट ४ की
४२१६एक प्रकार का धातु माप ।सूची १ देखिये ।
यव कोटि५ १/२९२७०लंका के पूर्व से ९०° की ओर एक स्थान ।
योग४२४७५मन वचन काय के निमित्त से आत्मा के(जैन परिभाषा)
प्रदेशों के चंचल होने की क्रिया ।
तपस्या; ध्यान का अभ्यास(अन्य मत से)
योजन३११४लम्बाई का मापपरिशिष्ट ४ की
सूची १ देखिये ।
रथरेणु२६१४पुद्गल कण" "
रूप९७ १/२६१११पूर्णांक ।
रोमकापुरी५ १/२९२७०लंका के पश्चिम से ९०° की ओर एक स्थान ।

५० गणितसारसंग्रह
शब्द | सूत्र | अध्याय | पृष्ठ | स्पष्टीकरण | अभ्युक्ति
लङ्का | ५ १/२ | ९ | २७० | वह स्थान जहाँ उज्जैन से निकलने वाला ध्रुववृत्त ( meridian ) विषुवत् रेखा से मिलता है । |
लव | ३३ | १ | ५ | काल माप । | परिशिष्ट ४ की सूची २ देखिये ।
लक्ष | ६४ | १ | ८ | लाख, संकेतना का छठवाँ स्थान । |
लाभ | ५ | ६ | ९२ | भजनफल या हिस्सा ( अंश ) । |
वकुल | २५ | ४ | ७२ | वृक्ष का नाम । | Mimusops Elengi.
वज्र (अन्वायाम छेद) | ३२ | ७ | १८८ | इंद्र का आयुध । ... ... |
वज्रापवर्तन | २ | ३ | ३६ | भिन्नों के गुणन में तिर्यक् प्रहासन । |
वर्गमूल | ३६ | २ | १५ | वह इष्ट राशि जिसका वर्ग करने से वह दत्त राशि उत्पन्न होती है जिसका वर्गमूल निकालना इष्ट होता है । |
वर्ण | १६९ | ६ | १३५ | ( साहित्यिक ) रंग; शुद्ध स्वर्ण १६ वर्ण का मानकर दत्त स्वर्ण की शुद्धता के अंश का अभिधान वर्ण द्वारा होता है । |
वर्धमान | १ | ५ | ८३ | चौबीसवें तीर्थंकर । |
वल्लिका / वल्लिका कुट्टीकार | १९५ १/२ | ६ | ११५ | लता सदृश अंकश्रृंखला पर आधारित अनुपाती वितरण । |
वाह | ३८ | १ | ५ | धान्य सम्बन्धी आयतन माप । |
विचित्र कुट्टीकार | २१६ | ६ | १४५ | अनुपाती विभाजन समन्वित विचित्र एवं मनोरञ्जक प्रश्नावली । |
वितस्ति | ३० | १ | ४ | लम्बाई का माप । | परिशिष्ट ४ की सूची १ देखिये ।
विद्याधर नगर | ६२ | ८ | २६७ | यहाँ आयताकार नगर का प्रयोजन मालूम पड़ता है । |
विषम कुट्टीकार | १३४ | ६ | १२३ | भिन्नीय राशियों का अंतर्धारक अनुपाती ( भिन्न कुट्टीकार ) । |
विषम चतुरश्र | ५ | ७ | १८१ | सामान्य चतुर्भुज । |

गणितसारसंग्रह ५१
शब्द | सूत्र | अध्याय | पृष्ठ | स्पष्टीकरण | अभ्युक्ति
विषम संक्रमण | २ | ६ | ९१ | कोई भी दत्त दो राशियों के भाजक और भजनफल द्वारा प्ररूपित दो राशियों के योग एवं अंतर की अर्द्ध राशियों सम्बन्धी क्रिया । |
वृषभ | ८३ ½ | ६ | १०८ | प्रथम तीर्थंकर का नाम । |
व्यवहारांगुल | २७ | १ | ४ | लम्बाई का माप । | परिशिष्ट ४ की सूची १ देखिये ।
व्युत्कलित | १०६ | २ | ३२ | समानान्तर श्रेढि की समस्त श्रेढि में से श्रेढि का अंश घटाने की क्रिया । |
शङ्ख | ६७ | १ | ८ | संकेतना का उन्नीसवां स्थान । |
शत | ६३ | १ | ८ | सौ; सैकड़ा । |
शत कोटि | ६५ | १ | ८ | सौ करोड़ । |
शाक | ६४ | ८ | २६७ | वृक्ष का नाम ( Teak tree ) । |
शान्ति | ८४ ½ | ६ | १०८ | शान्तिनाथ तीर्थङ्कर । |
शेष | ३ | ४ | ६८ | आरम्भ से श्रेढि के अंश को निकाल देने पर शेष बचनेवाले पद । |
शेषनाड्य | १० ½ | ९ | २७१ | अपराह्न में बीतनेवाला दिनांश । |
शेषमूल | ३ | ४ | ६८ | प्रकीर्णक भिन्नों की एक जाति । |
शोध्य | ५३-५४ | २ | १८-१९ | घनमूल समूह के तीन अंकों में से एक । |
श्रावक | ६६ | २ | २२ | जैनधर्म का पालन करने वाला गृहस्थ । |
श्रीपर्णी | ६७ | ८ | २६८ | वृक्ष का नाम । | Premna Spinosa.
शृङ्गाटक | ३० ½ | ८ | ७५ | त्रिभुजाकार स्तूप । |
षोडशिका | ३६ | १ | ५ | धान्य सम्बन्धी आयतन माप । | परिशिष्ट ४ की सूची ३ देखिये ।
सकल कुट्टीकार | १३६ ½ | ६ | १२४ | अनुपाती वितरण जिसमें भिन्न अंतर्भूत नहीं होते । |
सङ्क्रमण | २ | ६ | ९१ | दो राशियों के योग एवं अन्तर की अर्द्ध राशियों सम्बन्धी क्रिया । |
सङ्कलित | ६१ | २ | २० | श्रेढि का योग निकालने की क्रिया । |
सङ्क्रान्ति | १७ | ५ | ८५ | सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करने का मार्ग । |

५२ गणितसारसंग्रह
शब्द सूत्र अध्याय पृष्ठ स्पष्टीकरण अभ्युक्ति
सतेर ४३ १ ६ कुप्य (baser) धातुओं का भारमाप । परिशिष्ट ४ की
सूची ६ देखिये ।
समचतुरश्र ११२½ ७ २१३ वर्गाकार आकृति ।
सम त्रिभुज ५ ७ १८१ वह त्रिभुज जिसकी सब भुजाएँ
समान हों ।
समय ३२ १ ४ कालमाप । एक परमाणु का दूसरे परिशिष्ट ४ की
परमाणु के व्यतिक्रम करने में जितना सूची २ देखिये ।
काल लगता है, उसे समय कहते हैं ।
समवृत्त ६ ७ १८१ वृत्त ( Circle ) ।
सरल २६ ४ ७२ वृक्ष का नाम Pinus Longifolia
सर्ज ६७ ८ २६८ वृक्ष का नाम (साल वृक्ष के समान) ।
सर्वधन ६३–६४ २ २१ समान्तर श्रेढि का योग ।
सल्लकी ६३ ४ ८० वृक्ष का नाम । Boswellias Thurifera
सहस्र ६३ १ ८ हजार ।
सारस ३६ ४ ७४ एक प्रकार का पक्षी ।
सार संग्रह २३ १ ३ ( साहित्यिक ) किसी विषय के
सिद्धान्तों का संक्षिप्त प्रतिपादन ।
( यहाँ ) गणित ग्रंथ का नाम ।
साल २४ ४ ७२ वृक्ष का नाम । Shorea Ro-
busta, or
Valeria Ro-
busta.
सिद्ध १ ६ ९१ घातिया और अघातिया कर्मों का
नाश कर अष्टगुणों आदि को प्राप्त
मुक्त आत्मा ।
सिद्धपुरी ५½ ९ २७० लङ्का के प्रतिध्रुवस्थ ।
सुमति ७ ४ ७० पांचवें तीर्थङ्कर का नाम ।
सुवर्णकुट्टीकार १६९ ६ १३५ स्वर्ण सम्बन्धी प्रश्नों में प्रयुक्त अनु-
पाती वितरण ।
सुव्रत ८३½ ६ १०८ बीसवें तीर्थङ्कर का नाम ।
सूक्ष्मफल २ ७ १८१ क्षेत्रफल अथवा घनफल का शुद्ध माप । परिशिष्ट ४ की
स्तोक ३३ १ ५ कालमाप । सूची २ देखिये ।

गणितसारसंग्रह ५३

शब्दसूत्रअध्यायपृष्ठस्पष्टीकरणअभ्युक्ति
स्याद्वाद८१२“कथंचित्” का पर्यायवाची शब्द ।<br>(पाद टिप्पणी भी देखिये) ।
स्वर्ण९६२३०सोने का टंक (सिक्का) ।सुवर्ण भी ।
हस्त३०१४लम्बाई का माप ।परिशिष्ट ४ की सूची १ देखिये ।
हिन्ताल११६½६११९वृक्ष का नाम ।Phoenix or Elate Paludosa.
क्षित्या६८१८संकेतना का इक्कीसवां स्थान ।
क्षेपपद७०२२२समान्तर श्रेढि के दुगुने प्रथम पद एवं प्रचय के अंतर की अर्द्धराशि ।
क्षोणी६७१८संकेतना का सत्रहवां स्थान ।
क्षोभ६८१८संकेतना का तेईसवां स्थान ।
नोट—उपर्युक्त सारणी में सूत्र अध्याय एवं पृष्ठ के प्रारम्भ के कुछ स्तम्भ भूल से रिक्त रह गये हैं। उन्हें क्रमानुसार नीचे दिया जा रहा है—
अगरु—९।३।३७। अग्र—६२.।
अङ्ग—४५।४।७५। अङ्गुल—२७।१।४।
अणु—४। अध्वान—१७७। अन्त्यधन—६३।२।२१।
अन्तरावलम्बक—१८०½ ।७।२३६।
अन्तश्चक्रवाल वृत्त—६७½ ।७।१९७।
अपर—२७२। अमोघवर्ष—३।१।१।
अम्लवेतस—६७।८।२६८। अयन—३५।१।२।
अरिष्टनेमि—८४½।६।१०८। अर्जुन—६७।८।२६८।
अर्बुद—६५।१।८। अवनति—२७७।
अवलम्ब—१९२। अव्यक्त—१२२।३।६२।
अशोक—२४।४।७२। असित—६७।८, २६८।
आढक—३६।१।५ आदि—६४।२।२१।
आदिधन—२१। आदि मिश्रधन—२४।
आबाधा—४९।७।१९२। आयतवृत्त—१८१।
आयाम—९।७।१८४। आवलि—३२।१।४।
इच्छा—२।५।८३। इन्द्रनील—२२०।६।१४७।
इभदन्ताकार—८०½ ।७।२००। उच्छ्वास—३३।१।५।

—१९।
Look at the digits:
उन्नत वृत्त has १ ८ ।
उभय निषेध has १ ९ ।
Line 6:
कम्बुकावृत्त—१८।
कर्ण—१९।
Wait, both are circle/geometry terms in the same section! In chapter 7 (Kṣetragaṇita):
Verse 18 is about Kambuka-vṛtta / Unnata-vṛtta!
Verse 19 is about Karna / Ubhaya-niṣedha!
YES! Exactly verses 18 and 19!
That makes 100% sense!

Let's re-examine line 4:
"ऋतु—३५।१।५। एक—६३।१।८। औण्ड्र-औण्ड्रफल—२५।"
Wait, why does औण्ड्र-औण्ड्रफल have only one number? Because it's verse 25!
Wait, is there a danda at the end? Yes, २५।

Now let's check line 2:
"उत्पन्न—१४०।३।६७। उत्सेध—१९८ २/७। २४१।"
Wait, let's look at "उत्सेध—":
Does it say:
उत्सेध—१९। ch 7? or १९८?
Wait! Look at the digits after उत्सेध—:
१, then maybe something else?
Wait, look at the stacked fraction:
Is that stacked

परिशिष्ट-५
डॉ० हीरालाल जैन ने जब सन् १९२३-२४ में कारंजा के जैन भण्डारों की ग्रन्थसूची तैयार की थी
तभी से उन्हें वहाँ की गणितसार संग्रह की प्राचीन प्रतियों की जानकारी थी । प्रस्तुत ग्रन्थ के पुनः
सम्पादन का विचार उत्पन्न होते ही उन्होंने उन प्रतियों को प्राप्त कर उनके पाठान्तर लेने का प्रयत्न
किया । इस कार्य में उन्हें उनके प्रिय शिष्य व वर्तमान में पाली प्राकृत के प्राध्यापक श्री जगदीश
किल्लेदार से बहुत सहायता मिली । उक्त प्रतियों का जो परिचय तथा उनमें से उपलब्ध टिप्पण
यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं वे उक्त प्रयास का ही फल है । अतः सम्पादक उक्त सज्जनों के बहुत
अनुगृहीत है ।
कारंजा जैन भण्डार की प्रतियों का परिचय
क्रमांक-अ० नं० ६३
( १ ) ( मुख पृष्ठ पर ) छत्तीसौ गणितग्रंथ ( ! )—( पुष्पिका में ) सारसंग्रह गणितशास्त्र ।
( २ ) पत्र ४९—प्रति पत्र ११ पंक्तियाँ—आकार ११.″७५ × ५″
( ३ ) प्रथम व्यवहार पत्र १५, द्वितीय २२ ( ! ), द्वितोय ३२, तृतीय ३७, चतुर्थ ४२
( ४ ) प्रारंभ—॥ ८० ॥ ॐ नमः सिद्धेभ्यः ॥ अलंघ्यं त्रिजगत्सारं ३०
( ५ ) अन्तिम—( पत्र ४२ ) इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ त्रिराशिको
नाम चतुर्थो व्यवहारः समाप्तः ॥
श्रीवीतरागाय नमः ॥ छ ॥ छत्तीसमेतेन सकल ८ भिन्न ८ भिन्नजाति ६
प्रकीर्णक १० त्रैराशिक ४ ईन्ता ३६ नू छत्तीसमे बुदु वीराचार्यरू पेल्हगणितवनु माधव-
चंद्रत्रैविद्याचार्यरू शोधिसिदरगि शोध्य सारसंग्रहमेनिसिकोंबुदु ॥ वर्गसंकलिता-
नयनसूत्रं ॥
( ६ ) अन्तिम—( पत्र ४९ ) घनं ३५ अंकसंहष्टिः छः ॥ इति छत्तीसीगणितग्रंथसमाप्तः ॥
छ ॥ छ ॥ श्रीः ॥ शुभं भूयात् सर्वेषां ॥ ॥ : संवत् १७०२ वर्षे मार्ग शिर वदी ४ बुधे
संवत् १७०२ वर्षे माह शुदि ३ शुक्ले श्रीमूसंघे सरस्वतीगछे बलात्कारगणे श्रीकुंदकुंदा-
चार्यान्वये भ० श्रीसकलकीर्तिदेवास्तदन्वये भ० श्रीवादिभूषण तत्पट्टे भ० श्रीरामकीर्ति-
स्तत्पट्टे भ० श्रीपद्मनंदीविराजमाने आचार्यश्रीनरेंद्रकीर्त्तिस्तच्छिष्य ब्र० श्रीलाड्यका तच्छिष्य
ब्र० कामराजस्तच्छिष्य ब्र० लालजि ताभ्यां श्रीरायदेशे श्रीभीलोडानगरे श्रीचंद्रप्रभचैत्यालये
दोसी कुंहा भार्या पदमा तयोः सुतौ दोसी केशर भार्या लाछा द्वितीय सुत दोसी वीरभाण
भार्या जितादे ताभ्यां स्वज्ञानावरणिकर्मक्षयार्थे निजद्रव्येण लिखाप्य छत्तीसीगणितशास्त्रं
दत्तं श्रीरस्तु ॥
( ७ ) प्राप्तिस्थान—बलात्कारगणमंदिर, कारंजा, अ० नं० ६३
( ८ ) स्थिति उत्कृष्ट, अक्षर स्पष्ट,
( ९ ) विशेषता—पृष्ठमात्रा, टिप्पण—( समास मे )

५६ गणितसारसंग्रह
प्रति क्रमांक—अ० नं० ६४
(१) सारसंग्रह गणितशास्त्र ।
(२) पत्रसंख्या १४२ प्रतिपत्र १० पंक्तियों—प्रतिपंक्ति २५ अक्षर आकार ५"४ x १६" ।
(३) प्रथमव्यवहार ३७ द्वितीय ७८ तृतीय ९५ चतुर्थ १०४ पञ्चम १११ षष्ठ १३१ सप्तम
१४० अंतिम १४२ ।
(४) प्रारंभ— ८० ॥ श्री जिनाय नमः ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ प्रणिपत्य वर्द्धमानं विद्यानंदं
विशुद्धगुणनिलयं । सूरिं च महावीरं कुर्वे तद्गणितशास्त्रसद्वृत्तिं ॥ १ ॥ अलंघ्यं इत्यादि ।
(५) अंतिम—छत्तीसी टीका ग्रंथसंख्या ३०००५ शुभं भवतु ॥ श्रीरस्तु ॥ शुभं ॥ स्वस्ति श्री
संवत् १६१६ वर्षे कार्तिक सुदि ३ गुरौ श्रीगंधारशुभस्थाने श्रीमदादिजिनचैत्यालये
श्रीमूहलसंघे श्रीसरस्वतीगच्छे श्रीबलात्कारगणे श्रीकुंदकुंदाचार्यान्वये भ० पद्मनंदिदेवास्तत्पट्टे
भ० श्रीदेवेंद्रकीर्तिदेवास्तत्पट्टे भ० श्रीविद्यानंदिदेवास्तत्पट्टे भ० श्री मल्लिभूषणदेवास्तत्पट्टे भ०
श्रीलक्ष्मीचंद्रदेवास्तत्पट्टे भ० श्रीवीरचंद्रदेवास्तत्पट्टे भ० श्रीज्ञानभूषणदेवास्तदन्वये आचार्य-
सुमतिकीर्तेरुपदेशात् श्रीहुंब जातीय सोनी सांतू भार्या बाई हरषाई तयोः पुत्र सोनी देधर
भार्या मरघाई तयोः सुतौ सोनी देवजी क्षीमजी एतेषां मध्ये सोनी देधरकेन इदं शास्त्रं
लिखाप्य दत्तं किंचत् श्रावकैः लिखापितं ॥ छ ॥
आ० वीरत्तभूषणानामिदं ।।
छत्तीसि गणितनि टिका
संवत् १८४२ मिति वैसाख सुदि ११ भट्टारक श्रीवीद्याभूषणइदं गणत छत्तिसी भट्टारक श्री देवेन्द्र-
कीर्तिजीज्यां प्रदत्तं सुभं भूयात् ।
(६) बलात्कार मंदिर कारंजा क्र० ६४ ।
प्रति क्रमांक—अ० नं० ६५
(१) सारसंग्रह गणितशास्त्र—प्रशस्ति मे—षट्त्रिंशतिकागणितशास्त्र ।
(२) पत्र ५३; प्रति पत्र १० पंक्तियाँ; आकार ११" x ४"७५ ।
(३) प्रथम व्यवहार १६; द्वितीय ३४; तृतीय ४०; चतुर्थ ४६; पंचम ५३ ।
(४) प्रारंभ—८०॥ श्रीवीतरागाय नमः ॥ अलंघ्यं त्रिजगत्सारं इत्यादि ।
(५) अन्तिम—(पत्र ५३) घनं ॥ इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ
वर्गसंकलितादिव्यवहारः पंचमः समाप्तः ॥
संवत् १७२५ वर्षे कार्तिक श्रुदि १० भौमे श्रीमूहलसंघे सरस्वतीगछे बलात्कारगणे
श्रीकुंदकुंदाचार्यान्वये भ० श्रीसकलकीर्त्यन्वये भ० श्रीवादिभूषणदेवास्तत्पट्टे भ० श्रीरामकीर्ति
देवास्तत्पट्टे भ० श्रीपद्मनंदिदेवास्तत्पट्टे भ० श्रीदेवेंद्रकीर्तिगुरूपदेशात् मुनि श्रीश्रुतकीर्ति-
स्तच्छिष्य मुनि श्रीदेवकीर्तिस्तच्छिष्य आचार्य श्रीकल्याणकीर्तिस्तच्छिष्य मुनि श्रीत्रिभुवन-
चंद्रेणेदं षट्त्रिंशतिका गणितशास्त्रं कर्मक्षयार्थे लिखितं ।
(७) प्राप्तिस्थान—बलात्कारगणमंदिर, कारंजा, अ० नं० ६५ ।
(८) स्थिति मध्यम, अक्षर स्पष्ट ।
(९) विशेषता—समास मे टिप्पण; क्वचित् पृष्ठमात्रा ।

गणितसारसंग्रह ५७
नोट—ऐसा प्रतीत होता है मानो यह माधवचंद्र त्रैविद्यदेव का विभिन्न ग्रंथ हो—
१. वर्ग संकलितानयनसूत्रं । २९६-९७ ।
२. घनसंकलितानयनसूत्रं । ३०१-८२ ।
३. एकवारादिसंकलितधनानयनसूत्रं ।
४. सर्वधनानयने सूत्रद्वयं ।
५. उत्तरोत्तरचयभवसंकलितधनानयनसूत्रं ।
६. उभयान्तादागत पुरुषद्वयसंयोगानयनसूत्रं ।
७. वणिक्करस्थितधनानयनसूत्रं ।
८. समुद्रमध्ये—१-२-३ ।
९. छेदोशशेषजातौ करणसूत्रं ।
१०. करणसूत्रत्रयम् ।
११. गुणगुण्यमिश्रे सति गुणगुण्यानयनसूत्रं ।
१२. बाहुकरणानयनसूत्रं ।
१३. व्यासाद्यानयनसूत्रं ।
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ वर्गसंकलितादिव्यवहारः पंचमः समाप्तः ।
प्रति क्रमांक—अ० नं० ६२
( १ ) उत्तरछत्तीसी टीका ।
( २ ) पत्र १९; प्रति पत्र १३ पंक्तियाँ; आकार ११" × ४"•७५ ।
( ३ ) आरंभ—ॐ नमः सिद्धेभ्यः ॥ सिद्धेभ्यो निष्ठितार्थेभ्यो इ० ।
( ४ ) अन्तिम — घनः २९२७७१५५८४ ॥ छ ॥
इति श्रीउत्तरछत्तीसी टीका समाप्ता ॥

  • आचार्य श्रीकल्याणकीर्तिस्तच्छिष्य मुनि श्रीत्रिभुवनचंद्रेणेदं गणितशास्त्रं लिखितं ॥
    उजलो पाषाण सुतारी गज १ समचोरस मण ४८ पालेवो पाषाण गज १ मण ६० खारो
    पाषाण गज १ मण ४० ।
    ( ५ ) प्राप्तिस्थान —अ० नं० ६२ ।
    ( ६ ) स्थिति उत्तम, अक्षर स्पष्ट ।
    ( ७ ) क्वचित् टिप्पण ।
    प्रति क्रमांक—अ० नं० ६६
    ( २ ) पत्र १५; प्रतिपत्र १४ पंक्तियाँ; आकार ११"•५ × ५"
    ( ३ ) * ब्रह्म जसवंताख्येन स्वपरपठनार्थं स्वहस्तेन लिखितं ।
    ( ५ ) अ० नं० ६६ ।
    प्रति क्रमांक—अ० नं० ६०
    ( २ ) पत्र २०; प्रतिपत्र ११ पंक्तियाँ; आकार १२" × ५"•५ ।
    ( ५ ) अ० नं० ६० ।

५८ गणितसारसंग्रह
प्रति क्रमांक - अ० नं० ६१
( २ ) पत्र १८; प्रतिपत्र १४ पंक्तियाँ; आकार १०"०५ x ६" ।
( ५ ) अ० नं० ६१ ।
गणितसारसंग्रह
प्रतक्रमांक ६३ = अ, प्र० क्र० ६५ = ब, प्र० क्र० ६४ = स
अर्थबोधक टिप्पण
श्लोक १-१ अलङ्घ्यम्—अ मिथ्यादृष्टिभिः । ब मिथ्यादृष्टिभिः लङ्घयितुम् अशक्यमित्यर्थः ।
स आप्ताभासागम्यम् अतल्लक्ष्यमस्ति । स त्रिजगत्सारम्—निरावरणत्वादनन्यसाधारणत्वाच्च लोकत्रयसारम्,
त्रिजगद्वन्द्याराध्यमित्यर्थः । अ अनन्तचतुष्टयम् अनन्तज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्यचतुष्टयम् । स तस्मै महावीराय
वर्धमानस्वामिने । स जिनेन्द्राय—एकदेशेन कर्मारातीन् जयन्तीति जिना असंयतसम्यग्दृष्ट्यादयस्तेषामिन्द्रः
स्वामी, तस्मै नमः । अ तायिने-धर्मोपदेशकत्वेन भव्यत्राणाय ।
श्लोक १-२ अ जि [जै]नेन्द्रेण—जिनो देवता येषां ते जैनाः, तेषामिन्द्रः, तेन । पक्षे—
जिनेन्द्रस्यायं सम्बन्धी जैनेन्द्रः तेन वा । जिन एव जैनः, स एव इन्द्रः प्रधानो यत्र संख्याज्ञानप्रदीपे सः,
तेन । स जैनेन्द्रेण—जिनप्रणीतेन । स संख्याज्ञानप्रदीपेन—गणितशास्त्रज्योतिषा । स महात्विषा—
बहुप्रकाशेन । स सर्वम्—षड्भव्यसमुदायस्वरूपम् । अ तम्—महावीरम्, पक्षे संख्याज्ञानप्रदीपम् ।
श्लोक १-३ स प्रीणितः—तर्पितः । स प्राणिसस्यौघः विनेयजनस्य संघातः । अ निरीतिः—
निर्गता ईतयः अतिवृष्ट्यनावृष्टिमूषक-शलभ-शुक-स्वचक्र-परचक्रलक्षणाः यस्मात् असौ निरीतिः । अ
निरवग्रहः—निर्गतोऽवग्रहः शत्रुः यस्मात् यत्र वा सः, व्यथा—वर्षाविघातरहितः । स श्रीमता—लक्ष्मी-
मता । अ अमोघवर्षेण—सफलवृष्ट्या, पक्षे सत्यस्वरूपोपदेशवृष्ट्या । स सफलसद्धर्मोपदेशामृतवृष्ट्या ।
अ स्वेष्टहितैषिणा—स्वस्य इष्टं स्वेष्टम्, तच्च तद्धितं च स्वेष्टहितम्, तदिच्छतीति स्वेष्टहितैषी तेन । वा
स्वस्य इष्टाः स्वेष्टाः, तान् प्रति हितम् इच्छतीति स्वेष्टहितैषी, तेन । स स्वेष्टहितमिच्छता ।
श्लोक १-४ अ चित्तवृत्तिद्विषिर्भुजी [जि]—शुक्लध्यानाग्नौ । स भस्मसात् भावम्—भस्मस्वरूपम् ।
अ ईयुः—गच्छन्ति स्म । अ ते—आगमप्रसिद्धाः काम-क्रोधादिशत्रवः । अ अवन्ध्यकोपाः [पः]—
सफलकोपाः इत्यर्थः ।
श्लोक १-५ स वशीकुर्वन्—स्वाधीनं विदधत् । स नानुवशः—अन्याधीनो न भवति । स परैः—
एकान्तवादिभिः । अभिभूतः—अ पराभूतः । स तिरस्कृतः । स प्रभुः—जगदाराध्यः । स अपूर्वमकर-
ध्वजः—अभिनवमीनकेतनः ।
श्लोक १-६ अ विक्रम-क्रमाक्रान्त-चक्रीचक्र-कृतक्रियः—विक्रमक्रमेण पराक्रमसंतत्या आक्रान्ताः
ते च ते चक्रिणश्च, तेषां चक्रं समूहः, तेन कृतक्रिया सेवा यस्यासौ तथोक्तः । पक्षे चक्रं सेनाऽस्ति येषां ते
चक्रिणः, शेषं पूर्ववत् । अ चक्रिकाभञ्जनः—संसारचक्रभञ्जनः, पक्षे—परचक्रभञ्जनः । अ अञ्जसा—
परमार्थेन ।
श्लोक १-७ अ विद्यानद्यधिष्ठानः—विद्या द्वादशाङ्गलक्षणाः पक्षे—द्वासप्ततिकलालक्षणास्ता एव
नद्यः तासाम् अधिष्ठानम् आश्रयः यः सः । स मर्यादावज्रवेदिकः—मर्यादैव वज्रवेदिका यस्य सः । अ
रत्नगर्भः—रत्नानि सम्यग्दर्शनादीनि, पक्षे—स्वादीनि, गर्भे ते यस्य सो [यस्यासौ] । ब रत्नानि सम्यग्दर्शना-
दीनि, पक्षे—हस्त्यश्वादीनि गर्भे ते यस्यासौ तथोक्तः । अ यथाख्यातचारित्र [त्र] जलधिः—क्षायिक-
चारित्र्य [त्र] जलधिः, पक्षे—यथाख्यातं प्रवृद्धैर्यथोक्तम्, तच्चतच्चारित्र्यं [त्रं] आचरणं च ।

गणितसारसंग्रह ५९
श्लोक १-८ स देवस्य—स जिनस्य । स शासनम् अनेकान्तरूपं वर्धताम् ।
श्लोक १-९ स लौकिके—वृद्धिव्यवहारादौ । अ वैदिके—आगमे । स सामायिके—प्रतिक्रमणादौ ।
अ यः—यः कश्चित् व्यापारः प्रवृत्तिः तत्र सर्वत्र संख्यानं गणितम् उपयुज्यते उपयोगी भवति ।
श्लोक १-१० अ अर्थशास्त्रे — जीवादिपदार्थे ।
श्लोक १-११ अ प्रस्तुतम्—कथितम् । अ पुरा— पूर्वम् ।
श्लोक १-१२ अ ग्रहचारेषु—संक्रमणेपु । ब सूर्यादिसंक्रमणेपु । स ग्रहणे—चन्द्र-सूर्योपरागे ।
अ ग्रहसंयुतौ—ग्रहयुद्धे । अ त्रिप्रश्ने—त्रयः प्रश्नाः नष्ट-मुष्टि-चिन्तारूपाः यत्र तत् त्रिप्रश्नम्, होराशास्त्र-
मित्यर्थः, तस्मिन् । स अथवा त्रयो धातुं-मूँलं-जीवँविषयाः प्रश्नाः यत्र तत् त्रिप्रश्नम् । प्रश्नव्याकरणाय
सद्भावकेवलज्ञानहोरादिशास्त्रम् । स चन्द्रवृत्तौ—चन्द्रचारे । ब omits बुध्यन्ते (श्लोक १४) ।
ब omits—यात्राद्याः (श्लोक १५) ।
श्लोक १-१३ अ परिक्षेपः—परिधियः ।
श्लोक १-१४ अ उत्कराः—समूहाः । अ बुध्यन्ते—ज्ञायन्ते ।
श्लोक १-१५ अ तत्र—श्रेणीबद्धादिषु जीवानाम् । अ संस्थानम्—समचतुरस्रादि । अ अष्ट-
गुणादयः—अणिमादयः । अ यात्राद्याः—गति । अ संहितायाश्च—संधिप्रतिष्ठाग्रन्थो वा ।
श्लोक १-१७ अ गुरुपर्वतः—गुरुपरिपाटीभ्यः ।
श्लोक १-२०—अ कलासवर्णसरुलठत्पाटीनसंकुले—कीदृग्विधे सारसंग्रहवारिधौ । कलासवर्णाः
भिन्नप्रत्युत्पन्नादयः ते एव लुठत्पाटीनास्तेषां संकटे संकोचस्थाने ।
श्लोक १-२१ अ प्रकीर्णक—अ तृतीयव्यवहारः । अ महाग्राहे—मत्स्यविशेषः । अ मिश्रक—
अ वृद्धिव्यवहारादि ।
श्लोक १-२२ अ क्षेत्रविस्तीर्णपाताले—त्रिभुज-चतुर्भुजादिक्षेत्राणि एव विस्तीर्णपातालानि यत्र स
तस्मिन् । अ खाताख्यसिकताकुले—खाताख्यम् एव सिकताः ताभिः आकुले । अ करणस्कन्धसंबन्धच्छाया-
बेलाविराजिते—करणस्कन्धेन करणसूत्रसमूहेन संबन्धो यस्याः सा करणस्कन्धसंबन्धा, सा चासौ छाया-
गणितं (?) करणस्कन्धसंबन्धच्छाया, सा एव वेला, तया विराजिता तस्मिन् ।
श्लोक १-२३ अ गुणसंपूर्णैः—लघुकरणाद्यष्टगुणसंपूर्णैः । करणोपायैः—अ करणानुपयोगोपायैः सूत्रैः ।
श्लोक १-२४ अ यत्—यस्मा

६० गणितसारसंग्रह
श्लोक १-२६ अ अतः—अणोतः । तस्मात्—त्रसरेणोः । शिरोरुहः—( भवन्ति ) ।
श्लोक १-२७ अ लिक्षा—लिक्षाप्रमाणस्कन्धः । सः—स तिलः । अष्टगुणानि—अष्टगुणानि भवन्ति
त्रसरेष्वाद्यङ्गुलान्तानि ।
श्लोक १-२८ अ प्रमाणम्—प्रमाणाङ्गुलम् ।
श्लोक १-२९ अ तिर्यक्पादः—पादस्य अङ्गुष्ठकनिष्ठापर्यन्त भाग तिर्यक्पादः । तिर्यक्पादद्वयं
वितस्तिः । ब तिर्यग्पादः—omits.
श्लोक १-३१ अ परिभाषा—अनियमेन नियमंकारिणी परिभाषा ।
श्लोक १-३२ अ अणुरण्वन्तरम्—मन्दगतिमाश्रितः सन्, शीघ्रगतिमाश्रितश्चेत् चतुर्दशरज्जुम्
अतिक्रामति । समयः—प्रोक्तः । असंख्यैः—जघन्ययुक्तासंख्यैः । ब असंख्यैः—omits, लोके—
omits (?)
श्लोक १-३३ अ स्तोक इति मानम् । तेषाम्—लवानाम् । सार्धाष्टात्रिंशता—३८ १/२ ।
श्लोक १-३४ अ पक्षः—भवेत् ।
श्लोक १-३५ अ तैः—ऋतुभिः । वत्सरो संवत्सरः ।
श्लोक १-३६ अ तत्र—धान्यमाने । चतस्रः—षोडशिकः । कुडवः—सहस्रैश्च त्रिभिः षड्भिः
शतैश्च व्रीहिभिः समैः । यः संपूर्णो भवेत् सोऽयं कुडवः परिभाष्यते ॥ लोके पवाळु ८। प्रस्थः—लोके
पाली ८। ब प्रस्थः—omits.
श्लोक १-३८ अ सेयं प्रवर्तिका । ताः खार्याः [ यैः ] । तस्याः प्रवर्तिकायाः ।
श्लोक १-३९ अ गण्डकैः—कस्तुंबुरुभिः, लोके धाना, धरणे-धरणद्वयम् ।
श्लोक १-४० अ धान्यद्वयेन—लोके धानाद्वयेन ब कुस्तुंबरद्वयेन । अत्र—रजतपरिकर्मणि ।
श्लोक १-४१ अ पुराणाम्—कर्षान् । रूप्ये—रजत—परिभाषायां मागधदेशव्यवहारमाश्रित्य ।
श्लोक १-४२ अ कल—कलेति नाम भवेत् ।
श्लोक १-४३ अ अस्मात्—द्रक्षूणात् । सतेरं—सतेराख्यं मानं भवति । ब लोहे—लोह-
परिभाषायाम् ।
श्लोक १-४४ अ 'प्रचक्षते' अन्तस्य 'अत्' आदेशो भवति ।
श्लोक १-४५ अ ब वस्त्राभरण-कटादीनाम् ।
श्लोक १-४६ ब अत्र—परिकर्मणि ।
श्लोक १-४८ अ भिन्नानि—यथा गुणाकारभिन्नः भागहारभिन्नः कृतिभिन्नः प्रत्येकभिन्नः इति
परं योज्यम् ।
ब तच्च—'विद्या कलासवर्णस्य' इति वा पाठः ।
श्लोक १-४९ ब हृतः शून्येन भक्तः सन् । खवधादिः—शून्यस्य भजन-गुणन-वर्गमूलादिः ।
योज्यरूपकम्—योज्यराशिसमानम् ।
स शून्येन ताडितो गुणितो राशिः खं शून्यं स्यात् । स राशिः शून्येन हतः [ हृतः ] भक्तः ।
शून्येन युतः सहितः । शून्येन हीनो रहितोऽपि अविकारी विकारवान् न भवति तदवस्थ एव—
खवधादिः ख शून्यस्य वधो गुणनं खं शून्यं स्यात् । आदिशब्देन भजन-वर्ग-घन-तन्मूलानि गृह्यं ।
श्लोक १-५० ब घाते गुणने । विवरं—महाराशौ स्वल्पराशिमपनीयावशिष्टशेषो विवरमित्युच्यते ।

गणितसारसंग्रह ६१
स ऋणयोः—ऋणरूपराश्योः । धनयोः—धनरूपराश्योः । भाजने—भागहारे । फलम्—गुणित-
फलम् । तु—पुनः ।—adds चेयमंकसंहतिः ।—adds illustrations to explain rules
on 50 ( stanza ).
श्लोक १—५१ स योगः—संयोजनम् । शोध्यम्—अपनेयम् ।
श्लोक १—५२— ब मूले—वर्गमूले । स्वर्णे—धनऋणे स्याताम् । Adds two stanzas
after 52. Printed in text at No. 69–70.
लघुकरणोहापोहानालस्यग्रहणधारणोपायैः ।
व्यक्तिकराङ्कविशिष्टैः गणकोष्टाभिर्गुणैर्ज्ञेयः ॥ १ ॥
इति संज्ञा समासेन भाषिता मुनिपुंगवैः ।
विस्तरेणागमाद् वेद्यं वक्ष्यन्थे यदितः परम् ॥ २ ॥
तत्पदम्—ऋणरूपवर्गराशेर्मूलं कथं भवेत् इत्याशङ्कायाम् इदमाह—ऋणराशिः निजऋणवर्गो न
भवेत्, किंतु धनरूपेण वर्गो भवेत् । तस्मात् ऋणराशेः सकाशात् मूलं न भवेत्, किंतु धनराशेः सकाशात्
ऋणराशेर्मूलं स्यात् ।
स धनराशेः ऋणराशेश्च वर्गो धनं भवति । Adds illustrations to explain rules
on 52 ( stanza ).
श्लोक १—५८ अ ऋतुर्जीवो—षड् जीवाः । कुमारवदनम्—कार्तिक [ केय ] वदनम् । ब
कुमारवदनम्—कार्तिकेयवदनम् ।
श्लोक १—६९ ब शीघ्रगुणन-भजनादिलक्षणं लघुकरणम् । अनेन प्रकारेण गुणनादौ कृते
सतीप्सितं लब्धं स्यादिति पूर्वमेव परिज्ञानलक्षणः ऊहः । इत्थं गुणनादौ कृते सतीप्सितं लब्धं न स्यादिति
पूर्वमेव परिज्ञानलक्षणः अपोहः । गुणनादिक्रियायां मन्दभावरहित्यलक्षणमनालस्यम् । कथितार्थलक्षणं
ग्रहणम् । कथितार्थस्य कालान्तरेऽप्यविस्मरणलक्षणा धारणा । सूत्रोक्तगुणनादिकमाधारं कृत्वा स्वबुद्ध्या
प्रकारान्तरगुणनादिविचारलक्षणः उपायः । अंकं व्यक्तं स्थापयित्वा गुणनादिकरणलक्षणो व्यक्तिकरांकः ।
इत्यष्टभिर्गुणै गणितज्ञो भवेदिति ज्ञेयः । इति ।
श्लोक २-१ अ ( १ ) येन राशिना गुण्यस्य भागो भवेत् तेन गुण्यं भङ्क्त्वा गुणकारं गुणयित्वा
स्थापनालक्षणो राशिखण्डः । येन राशिना गुणगुणकारस्य भागो भवेत् तेन गुणकारं भङ्क्त्वा गुण्यं गुणयित्वा
स्थापनालक्षणोऽर्धखण्डः । गुण्य-गुणकारो [ रौ ] अभेदयित्वा स्थापनालक्षणः तत्स्थः । इति त्रिप्रकारैः
स्थितगुण्य-गुणकारराशियुगलं कवाटसंधाणक्रमेण विन्यस्य । ( २ ) राशेरादितः आरभ्यान्तपर्यन्तं गुणनलक्षणेन
अनुलोममार्गेण । ( ३ ) राशेरन्ततः आरभ्यादिपर्यन्तं गुणनलक्षणेन विलोममार्गेण च गुण्यराशि गुणकार-
राशिना गुणयेत् । ( ४ ) 'गुणयेत् गुणेन गुण्यं कवाटसंधिक्रमेण संस्थाप्य' इति पाठान्तर—पादद्वयम् ।
( ५ ) गुण्यगुणकारं यथा व १४४ गुण्यं = प्रत्येक पञ्चानि गुणकार इति = ८ ; २४
४८
११५२ राशिखण्ड