गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
DevanagariHindipublished421 पृष्ठ
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गणितसारसंग्रह ४९
| शब्द | सूत्र | अध्याय | पृष्ठ | स्पष्टीकरण | अभ्युक्ति |
|---|---|---|---|---|---|
| मानी | ३७ | १ | ५ | धान्य सम्बन्धी आयतन माप । | परिशिष्ट ४ की |
| सूची ३ देखिये । | |||||
| माष | ४० | १ | ५ | रजत का भार माप टंक (सिक्का) । | परिशिष्ट ४ की |
| सूची ५ देखिये । | |||||
| मिश्रधन | ८०-८२ | २ | २४ | संयुक्त या मिला हुआ योग । | |
| मुख | ५० | ७ | १९३ | चतुर्भुज की ऊपरी भुजा (top-side) | शङ्खाकार और |
| मृदङ्ग आकार वाले | |||||
| क्षेत्रों में भी मुख का | |||||
| उपयोग हुआ है । | |||||
| मुरज | ३२ | ७ | १८८ | मृदंग के समान डिंडिम या भेरी । | |
| मुहूर्त | ३४ | १ | ५ | काल माप | परिशिष्ट ४ की |
| सूची २ देखिये । | |||||
| मूल | ३६ | २ | १५ | वर्गमूल; प्रकीर्णक भिन्नों को एक जाति | |
| ३ | ४ | ६८ | |||
| मूलमिश्र | ३ | ४ | ६८ | जिसमें वर्गमूल अंतर्भूत हों; प्रकीर्णक | |
| भिन्नों की एक जाति । | |||||
| मेरु | ५ | ५ | ८३ | जम्बूद्वीप के मध्यभाग में स्थित सुमेरु | |
| पर्वत । विशेष विवरण के लिये त्रिलोक | |||||
| प्रज्ञप्ति भाग २ में (४/१८०२-१८११; | |||||
| ४/२८१३, २८२३) देखिये । | |||||
| मृदंग | ३२ | ७ | १८८ | एक प्रकार की डिंडिम या भेरी । | |
| (अन्वायाम छेद) | |||||
| यव | २७ | १ | ४ | एक प्रकार का धान्य; लम्बाई का माप । | परिशिष्ट ४ की |
| ४२ | १ | ६ | एक प्रकार का धातु माप । | सूची १ देखिये । | |
| यव कोटि | ५ १/२ | ९ | २७० | लंका के पूर्व से ९०° की ओर एक स्थान । | |
| योग | ४२ | ४ | ७५ | मन वचन काय के निमित्त से आत्मा के | (जैन परिभाषा) |
| प्रदेशों के चंचल होने की क्रिया । | |||||
| तपस्या; ध्यान का अभ्यास | (अन्य मत से) | ||||
| योजन | ३१ | १ | ४ | लम्बाई का माप | परिशिष्ट ४ की |
| सूची १ देखिये । | |||||
| रथरेणु | २६ | १ | ४ | पुद्गल कण | " " |
| रूप | ९७ १/२ | ६ | १११ | पूर्णांक । | |
| रोमकापुरी | ५ १/२ | ९ | २७० | लंका के पश्चिम से ९०° की ओर एक स्थान । |