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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 421 में से

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पृष्ठ 390

परिशिष्ट-५
डॉ० हीरालाल जैन ने जब सन् १९२३-२४ में कारंजा के जैन भण्डारों की ग्रन्थसूची तैयार की थी
तभी से उन्हें वहाँ की गणितसार संग्रह की प्राचीन प्रतियों की जानकारी थी । प्रस्तुत ग्रन्थ के पुनः
सम्पादन का विचार उत्पन्न होते ही उन्होंने उन प्रतियों को प्राप्त कर उनके पाठान्तर लेने का प्रयत्न
किया । इस कार्य में उन्हें उनके प्रिय शिष्य व वर्तमान में पाली प्राकृत के प्राध्यापक श्री जगदीश
किल्लेदार से बहुत सहायता मिली । उक्त प्रतियों का जो परिचय तथा उनमें से उपलब्ध टिप्पण
यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं वे उक्त प्रयास का ही फल है । अतः सम्पादक उक्त सज्जनों के बहुत
अनुगृहीत है ।
कारंजा जैन भण्डार की प्रतियों का परिचय
क्रमांक-अ० नं० ६३
( १ ) ( मुख पृष्ठ पर ) छत्तीसौ गणितग्रंथ ( ! )—( पुष्पिका में ) सारसंग्रह गणितशास्त्र ।
( २ ) पत्र ४९—प्रति पत्र ११ पंक्तियाँ—आकार ११.″७५ × ५″
( ३ ) प्रथम व्यवहार पत्र १५, द्वितीय २२ ( ! ), द्वितोय ३२, तृतीय ३७, चतुर्थ ४२
( ४ ) प्रारंभ—॥ ८० ॥ ॐ नमः सिद्धेभ्यः ॥ अलंघ्यं त्रिजगत्सारं ३०
( ५ ) अन्तिम—( पत्र ४२ ) इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ त्रिराशिको
नाम चतुर्थो व्यवहारः समाप्तः ॥
श्रीवीतरागाय नमः ॥ छ ॥ छत्तीसमेतेन सकल ८ भिन्न ८ भिन्नजाति ६
प्रकीर्णक १० त्रैराशिक ४ ईन्ता ३६ नू छत्तीसमे बुदु वीराचार्यरू पेल्हगणितवनु माधव-
चंद्रत्रैविद्याचार्यरू शोधिसिदरगि शोध्य सारसंग्रहमेनिसिकोंबुदु ॥ वर्गसंकलिता-
नयनसूत्रं ॥
( ६ ) अन्तिम—( पत्र ४९ ) घनं ३५ अंकसंहष्टिः छः ॥ इति छत्तीसीगणितग्रंथसमाप्तः ॥
छ ॥ छ ॥ श्रीः ॥ शुभं भूयात् सर्वेषां ॥ ॥ : संवत् १७०२ वर्षे मार्ग शिर वदी ४ बुधे
संवत् १७०२ वर्षे माह शुदि ३ शुक्ले श्रीमूसंघे सरस्वतीगछे बलात्कारगणे श्रीकुंदकुंदा-
चार्यान्वये भ० श्रीसकलकीर्तिदेवास्तदन्वये भ० श्रीवादिभूषण तत्पट्टे भ० श्रीरामकीर्ति-
स्तत्पट्टे भ० श्रीपद्मनंदीविराजमाने आचार्यश्रीनरेंद्रकीर्त्तिस्तच्छिष्य ब्र० श्रीलाड्यका तच्छिष्य
ब्र० कामराजस्तच्छिष्य ब्र० लालजि ताभ्यां श्रीरायदेशे श्रीभीलोडानगरे श्रीचंद्रप्रभचैत्यालये
दोसी कुंहा भार्या पदमा तयोः सुतौ दोसी केशर भार्या लाछा द्वितीय सुत दोसी वीरभाण
भार्या जितादे ताभ्यां स्वज्ञानावरणिकर्मक्षयार्थे निजद्रव्येण लिखाप्य छत्तीसीगणितशास्त्रं
दत्तं श्रीरस्तु ॥
( ७ ) प्राप्तिस्थान—बलात्कारगणमंदिर, कारंजा, अ० नं० ६३
( ८ ) स्थिति उत्कृष्ट, अक्षर स्पष्ट,
( ९ ) विशेषता—पृष्ठमात्रा, टिप्पण—( समास मे )