गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
२०६ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ९८½-
अत्रोद्देशकः
कस्यापि कोटिरेकादश बाहुः षष्टिरन्यस्य । श्रुतिरेकषष्टिरन्यास्यानुक्तान्यत्र मे कथय ॥ ९८½ ॥
द्विसमचतुरश्रक्षेत्रस्यानयनप्रकारस्य सूत्रम्—
जन्यक्षेत्रभुजार्धहारफलजप्राग्जन्यकोट्योर्युति-
र्भूरास्यं वियुतिर्भुजा श्रुतिरथाल्पाल्पा हि कोटिर्भवेत् ।
आबाधा महती श्रुतिः श्रुतिरभूज्ज्येष्ठं फलं स्यात्फलं
बाहुः स्याद्वलम्बको द्विसमकक्षेत्रे चतुर्बाहुके ॥ ९९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी आकृति के संबंध में, लम्ब भुजा ११ है, दूसरी आकृति के संबंध में अन्य (दूसरी) भुजा
६० है, और तीसरी आकृति के संबंध में कर्ण ६१ है । इन तीन दशाओं में अज्ञात भुजाओं के मापों को
बतलाओ ॥ ९८½ ॥
दिये गये बीजों की सहायता से दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र को प्राप्त करने की रीति
के संबंध में नियम—
दिये गये बीजों की सहायता से प्राप्त प्रथम आयत की लम्ब भुजा को दूसरी आकृति (जिसे
मूलतः प्राप्त आकृति के आधार की अर्द्धराशि के मन से चुने हुए दो गुणनखंडों को बीज मानकर प्राप्त
किया गया है ऐसी आकृति) की लम्ब भुजा में जोड़नेपर दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र का
आधार उत्पन्न होता है । इन दो लम्बों के मापों के अन्तर से चतुर्भुज की ऊपरी भुजा उत्पन्न होती
है । पूर्व कथित दो प्राप्त आकृतियों का छोटा कर्ण दो बराबर भुजाओं में से किसी एक का माप होता है ।
उन दो प्राप्त आकृतियों के सम्बन्ध में दो लम्ब भुजाओं में से छोटी भुजा, आधार के उस छोटे खंड का
माप होती है जो ऊपरी भुजा के अंतों में से किसी एक से आधार पर लम्ब गिराने से बनता है। उन
दो प्राप्त आकृतियों के सम्बन्ध में बड़ा कर्ण इष्ट कर्ण का माप होता है । • उन दो प्राप्त आकृतियों में से
बड़े का क्षेत्रफल इष्ट आकृति का क्षेत्रफल होता है; और उन दो आकृतियों में से किसी एक का आधार,
ऊपरी भुजा के अंतों में से किसी एक से आधार पर गिराये गये लम्ब का माप होता है ॥ ९९½ ॥
१) { (अ² - ब²)² / (अ - ब)² ± (अ - ब)² } ÷ २ = अ² + ब² अथवा २ अ ब (दशानुसार)
२) { (२ अ ब)² / २ ब² ± २ ब² } ÷ २ = अ² + ब² अथवा अ² - ब²
३) √((अ² + ब²)² - (२ अ ब)²) = अ² - ब²
९९½) इस गाथा में कथित नियम के अनुसार साधन किया जाने वाला प्रश्न यह है कि दो
दिये गये बीजों की सहायता से दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की रचना किस प्रकार करना
चाहिये । भुजाओं, कर्णों और ऊपरी भुजा के अंतों से आधार पर गिराये गये लम्बों तथा लम्ब के कारण
उत्पन्न हुए खंडों की लम्बाइयों दिये गये बीजों की सहायता से संरचित दो आयतों में से निकालना पड़ती
है । इनमें से प्रथम आयत क्षेत्र ऊपर गाथा ९०½ में दिये गये नियमानुसार बनाया जाता है । प्रथम
आयत के आधार की लम्बाई की अर्द्धराशि के मन से चुने हुए दो गुणनखंडों में से उसी नियम के
अनुसार दूसरा आयत क्षेत्र बनता है । ( उन दो गुणनखंडों को बीज मान लेते हैं ।) इसलिये अब हम
प्रथम आयत को, दूसरे आयत क्षेत्र से अलग पहिचानने के लिये, प्राथमिक आकृति कहेंगे ।
-७. १००½] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २०७
अत्रोद्देशकः
चतुरश्रक्षेत्रस्य द्विसमस्य च पञ्चषट्कबीजस्य ।
मुखभूभुजावलम्बककर्णाबाधाधनानि वद ॥ १००½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो बराबर भुजाओं वाले तथा ५ और ६ को बीज मानकर उनकी सहायता से रचित चतुर्भुज
क्षेत्र के संबंध से ऊपरी भुजा, आधार, दो बराबर भुजाओं में से एक, ऊपरी भुजा से आधार पर गिराया
गया लंब, कर्ण और आधार का छोटा खंड तथा क्षेत्रफल के मापों को बतलाओ ॥१००½॥
इस नियम का मूल आधार गाथा १००½ में दिये गये प्रश्न के हल को चित्रित करने वाली
निम्नलिखित आकृतियों से स्पष्ट हो जावेगा । यहाँ दिये गये बीज ५ और ६ हैं । प्रथम आयत अथवा
बीजों से प्राप्त प्राथमिक आकृति अ ब स द है—
[ नोट—ये आकृतियाँ पैमाने रहित हैं । ]
इस आकृति में आधार की लम्बाई की अर्द्धराशि
३० है । इसके दो गुणनखंड ३ और १० चुने
जा सकते हैं । इन संख्याओं की सहायता से
( उन्हें बीज मानकर ) संरचित आयत क्षेत्र
इ फ ग ह है—
दो बराबर भुजाओं वाले इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र
की रचना के लिये अपने कर्ण द्वारा विभाजित
प्रथम आयत के दो त्रिभुजों में से एक को दूसरे
आयत की ओर, और वैसे ही दूसरे त्रिभुज के बराबर
क्षेत्र को दूसरे आयत की दूसरी ओर से हटा देते
हैं जैसा की आकृति ह अ' फ स' से स्पष्ट है ।
यह क्रिया आकृतियों की तुलना से स्पष्ट हो
जावेगी । इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र ह अ' फ स' का
क्षेत्रफल = दूसरे आयत इ फ ग ह का क्षेत्रफल ।
आधार अ' फ = प्रथम आयत की लम्ब भुजा
धन दूसरे आयत की लम्ब भुजा = अ ब + इ फ
ऊपरी भुजा ह स' = दूसरे आयत की लम्ब
भुजा ऋण प्रथम आयत की लम्ब भुजा = ग ह - स द
कर्ण ह फ = दूसरे आयत का कर्ण
२०८ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १०१½-
त्रिसमचतुरश्रक्षेत्रस्य मुखभूभुजावलम्बककर्णाबाधाधनानयनसूत्रम्—
भुजपदहृतबीजान्तरहृतजन्यधनाप्तभागहाराभ्याम् ।
तद्भुजकोटिभ्यां च द्विसम इव त्रिसमचतुरश्रे ॥ १०१½ ॥
अत्रोद्देशकः
चतुरश्रक्षेत्रस्य त्रिसमस्यास्य द्विकत्रिकस्वबोजस्य ।
मुखभूभुजावलम्बककर्णाबाधनानि वद् ॥ १०२½ ॥
दिये गये बीजों की सहायता से तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में ऊपरी
भुजा, आधार, कोई भी एक बराबर भुजा, ऊपर से आधार पर गिराया गया लम्ब, कर्ण, आधार का छोटा
खंड और क्षेत्रफल के मापों को निकालने के लिये नियम—
दिये गये बीजों का अंतर, उन बीजों की सहायता से तत्काल प्राप्त चतुर्भुज क्षेत्र के आधार के
वर्गमूल द्वारा गुणित किया जाता है। इस तत्काल प्राप्त प्राथमिक चतुर्भुज के क्षेत्रफल को इस प्रकार प्राप्त
गुणनफल द्वारा भाजित किया जाता है। तब क्रिया में बीजों की तरह उपयोग में लाये गये परिणामी
भजनफल और भाजक की सहायता से प्राप्त दूसरा चतुर्भुज क्षेत्र रचा जाता है। तीसरा चतुर्भुज,
तत्काल प्राप्त चतुर्भुज के आधार और लम्ब भुजा को बीज मानकर, बनाया जाता है। तब इन दो अंत
में प्राप्त चतुर्भुजों की सहायता से तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की उपर्युक्त भुजाओं आदि
के मापों को दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज में प्रयुक्त विधि अनुसार प्राप्त किया जाता है ॥१०१½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन बराबर भुजाओं वाले, तथा २ और ३ बीज हैं जिसके ऐसे, चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में
ऊपरी भुजा, आधार, तीन बराबर भुजाओं में से एक, ऊपरी भुजा से आधार पर गिराया गया कम्ब,
कर्ण, अधार का छोटा खंड और क्षेत्रफलों के मापों को बतलाओ ॥१०२½॥
आधार का छोटा खंड अर्थात् अ' इ = प्रथम आयत की लंब भुजा
= अ ब
लम्ब ह इ = दूसरे अथवा प्रथम आयत का आधार = ब स = फ ग
बाजू की प्रत्येक बराबर भुजा अ' ह अथवा फ स' = प्रथम आयत का कर्ण, अर्थात्, अ स
(१०१½) यदि दिये गये बीज अ और ब द्वारा निरूपित हों, तो तत्काल प्राप्त चतुर्भुज की
भुजाओं के माप ये होंगे : लम्ब भुजा = अ² - ब², आधार = २ अ ब, कर्ण = अ² + ब², क्षेत्रफल
= २ अ ब x ( अ² - ब² ) ।
जैसा कि दो बराबर भुजाओं वाले क्षेत्रफल की रचना के संबंध में गाथा ९९½ का नियम उपयोग
कहा गया है, उसी तरह यह नियम, दो प्राप्त आयतों की सहायता से, तीन बराबर भुजाओं वाले इष्ट
चतुर्भुज क्षेत्र की संरचना में सहायक होता है। इन आयतों में प्रथम संबंधी बीज ये हैं—
. २अ ब x (अ² - ब²)
——————————, अर्थात् √२अ ब x (अ + ब) और √२अ ब x (अ - ब)
√२अ ब x (अ ∓ )'
- गाथा ९०½ का नियम यहाँ प्रयुक्त करने पर हमें प्रथम आयत के लिये निम्नलिखित मान
प्राप्त होते हैं—
लम्ब भुजा = (अ + ब)² x २अ ब - (अ - ब)² x २अ ब अथवा ८अ² ब²
-७. १०३½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २०९
विषमचतुरश्रक्षेत्रस्य मुखभूभुजालम्बकर्णाबाधाधनानयनसूत्रम्—
ज्येष्ठाल्पान्योन्यहीनश्रुतिहतभुजकोटी भुजे भूमुखे ते
कोट्योरन्योन्यदोर्भ्यां हतयुतिरथ दोर्घातयुक्तकोटिघातः ।
कर्णाल्पश्रुतिघ्नावर्नाधकभुजकोट्याहृतौ लम्बकौ ता-
बाबाधे कोटिदोर्णाववनिविवरके कर्णघातार्धमर्थः ॥ १०३½ ॥
विषम चतुर्भुज के संबंध में, ऊपरी भुजा, आधार, बाजू की भुजाओं, ऊपरी भुजा के अंतों से
आधार पर गिराये गये लम्बों, कर्णों, आधार के खंडों और क्षेत्रफल के मापों को निकालने के लिये नियम —
दिये गये बीजों के दो कुलकों ( sets ) संबंधी दो आयताकार प्राप्त चतुर्भुज क्षेत्रों के बड़े
और छोटे कर्णों से आधार और ( उन्हीं प्राप्त छोटी और बड़ी आकृतियों की ) लम्ब भुजा क्रमशः
गुणित की जाती हैं। परिणामी गुणनफल इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र की दो असमान भुजाओं, आधार और
ऊपरी भुजा के मापों
२१० ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १०४½-
अत्रोद्देशकः
एकद्विकद्विकत्रिकजन्ये चोत्थाप्य विषमचतुरश्रे ।
मुखभूभुजावलम्बककर्णाबाधाधनानि वद ॥ १०४½ ॥
पुनरपि विषमचतुरश्रानयनसूत्रम्—
ह्रस्वश्रुतिकृतिगुणितो ज्येष्ठभुजः कोटिरपि धरा वदनम् ।
कर्णाभ्यां संगुणितावुभयभुजावल्पभुजकोटी ॥ १०५½ ॥
ज्येष्ठभुजकोटिवियुतिर्द्विधाल्पभुजकोटिताडिता युक्ता ।
ह्रस्वभुजकोटियुतिगुणपृथुकोट्याल्पश्रुतिघ्नकौ कर्णौ ॥ १०६½ ॥
अल्पश्रुतिहृतकर्णौल्पकोटिभुजसंहती पृथग्लम्बौ ।
तद्भुजयुतिवियुतिगुणोत्पदमाबाधे फलं श्रुतिगुणार्धम् ॥ १०७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
१ और २ तथा २ और ३ बीजों को लेकर, दो आकृतियाँ प्राप्त कर, विषम चतुर्भुज के संबंध में
ऊपर की भुजा, आधार, बाजू की भुजाओं, लम्बों, कर्णों, आधार के खंडों और क्षेत्रफल के मापों को
बतलाओ ॥१०४½॥
विषम चतुर्भुज के संबंध में भुजाओं के माप आदि को प्राप्त करने के लिए दूसरा नियम—
दो प्राप्त आयतों में छोटी आकृति के कर्ण के वर्ग को, अलग-अलग, आधार और बड़े आयत की
लंब भुजा द्वारा गुणित करने से विषम इष्ट चतुर्भुज के आधार और ऊपरी भुजा के माप उत्पन्न होते
हैं। छोटे आयत का आधार और लम्ब भुजा, प्रत्येक उत्तरोत्तर, उपरोक्त आयत क्षेत्रों के प्रत्येक के
कर्ण द्वारा गुणित होकर क्रमशः इष्ट चतुर्भुज की दो पार्श्व भुजाओं को उत्पन्न करते हैं। बड़ी आकृति
( आयत ) के आधार और लम्ब भुजा का अंतर, अलग-अलग दो स्थानों में रखा जाकर, छोटी आकृति
के आधार और लम्ब भुजा द्वारा गुणित किया जाता है। इस क्रिया के दो परिणामी गुणनफल अलग-
अलग उस गुणनफल में जोड़े जाते हैं, जो छोटे आयत के आधार और लंब भुजा के योग को बड़े
आयतकी लम्ब भुजा से गुणित करने पर प्राप्त होता है। इस प्रकारप्राप्त दो योग जब छोटे
आयत के कर्ण द्वारा गुणित किये जाते हैं, तो इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र के दो कर्णों के माप प्राप्त होते हैं। इष्ट
चतुर्भुज क्षेत्र के कर्णों को अलग-अलग छोटे आयत के कर्ण द्वारा भाजित किया जाता है।
इस प्रकार प्राप्त भजनफलों को क्रमशः छोटे आयत की लम्ब भुजा और आधार द्वारा गुणित किया
जाता है। परिणामी गुणनफल इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र के लंबों के मापों को उत्पन्न करते हैं। इन दो लंबों में
( आधार और ऊपरी भुजा छोड़कर ) उपर्युक्त दो भुजाओं के मानों को अलग-अलग जोड़ा जाता है।
बड़ी भुजा, बड़े लम्ब में और छोटी भुजा छोटे लंब में। इन लंबों और भुजाओं के अंतर भी उसी क्रम
में प्राप्त किये जाते हैं। उपर्युक्त योग क्रमशः इन अंतरों द्वारा गुणित किये जाते हैं। इस प्रकार प्राप्त
गुणनफलों के वर्गमूल इष्ट चतुर्भुज संबंधी आधार के खंडों के मानों को उत्पन्न करते हैं। इष्ट चतुर्भुज
क्षेत्र के कर्णों के गुणनफल की आधी राशि उसका क्षेत्रफल होती है ॥१०५½-१०७½॥
मानलो दिये गये बीजों के दो कुलक ( sets ) अ, ब और स, द हैं। तब विभिन्न इष्ट तत्त्व
निम्नलिखित होंगे—
बाजू की भुजाएँ = २ अ ब (स² + द²) (अ² + ब²) और (अ² - ब²) (स² + द²) (अ² + ब²)
आधार = २ स द ( अ² + ब² ) ( अ² + ब² )
-७. १०८½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २११
एकस्माज्जन्यायतचतुरश्राद्द्विसमत्रिभुजानयनसूत्रम्—
कर्णे भुजद्वयं स्याद्बाहुर्द्विगुणीकृतो भवेद्भूमिः ।
कोटिरवलम्बकोऽयं द्विसमत्रिभुजे धनं गणितम् ॥ १०८½ ॥
केवल एक जन्य आयत क्षेत्र की सहायता से समद्विबाहु त्रिभुज प्राप्त करने के लिये नियम—
दिये गये बीजों की सहायता से संरचित आयत के दो कर्ण इष्ट समद्विबाहु त्रिभुज की दो
बराबर भुजाएँ हो जाते हैं। आयत का आधार दो द्वारा गुणित होकर इष्ट त्रिभुज का आधार बन जाता
है। आयत की लंब भुजा, इष्ट त्रिभुज का शीर्ष से आधार पर गिराया हुआ लम्ब होती है। उस
आयत का क्षेत्रफल, इष्ट त्रिभुज का क्षेत्रफल होता है ॥१०८½॥
ऊपरी भुजा = ( स² - द² ) ( अ² + ब² ) ( अ² + ब² )
कर्ण = { ( अ² - ब² ) × २ स द + ( स² - द² ) २ अ ब } × ( अ² + ब² ) ; और
{ ( अ² - ब² ) ( स² - द² ) + ४ अ ब स द } × ( अ² + ब² )
लम्ब = { ( अ² - ब² ) × २ स द + ( स² - द² ) २ अ ब } × २ अ ब; और
{ ( अ² - ब² ) ( स² - द² ) + ४ अ ब स द } × ( अ² - ब² )
खंड अवधाएँ = { ( अ² - ब² ) × २ स द + ( स² - द² ) × २ अ ब } ( अ² - ब² ); और
{ ( अ² - ब² ) ( स² - द² ) + ४ अ ब स द } × २ अ ब.
(१०५½-१०७½) गाथा १०३½ के नोट में कथित मान यहाँ भी भुजाओं आदि के लिये दिये
गये हैं; केवल वे कुछ भिन्न विधि से कहे गये हैं। १०३½ वीं गाथा के ही प्रतीक लेकर—
कर्ण = [{२ स द - (स² - द²)} २ अ ब + {२ अ ब + (अ² - ब²) } (स² - द²)] × (अ² + ब²);
और [{२ स द - (स² - द²)} (अ² - ब²) + {२ अ ब + (अ² - ब²)} (स² - द²)] × (अ² + ब²) ।
[ {२ सद - (स² - द²) } × २ अ ब + {२ अ ब + (अ² - ब²) } (स² - द²) ] (अ² + ब²)
लम्ब = ----------------------------------------------------------------------------------------- × (अ² - ब²);
( अ² + ब² )
[ {२ स द - (स² - द²)} (अ² - ब²) + {२ अ ब + (अ² - ब²)} (स² - द²)] (अ² + ब²)
और --------------------------------------------------------------------------------------- × २ अ ब ।
( अ² + ब² )
उपर्युक्त चार बीजवाक्य १०३½ वीं गाथा में दिये गये कर्णों और लंबों के मापों के रूप में प्रका-
सित किये जा सकते हैं। यहाँ आधार के खंडों के माप, खंड की संवादी भुजा और लंब के वर्गों के अन्तर
के वर्गमूल को निकालने पर प्राप्त किये जा सकते हैं।
(१०८½) इस नियम का मूल आधार इस
प्रकार निकाला जा सकता है:—मानलो अ ब स द एक
आयत है और अ द, इ तक बढ़ाई जाती है ताकि
अ द = द इ । इ स को जोड़ो। अ स इ एक
समद्विबाहु त्रिभुज है जिसकी भुजाएँ आयत के कर्णों के माप के बराबर हैं, और जिसका क्षेत्रफल
आयत के क्षेत्रफल के बराबर है।
पार्श्व आकृति से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जावेगा।
२१२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १०९½-
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकबीजोत्थद्विसमत्रिभुजस्य गणक बाहू द्वौ ।
भूमिसमवलम्बकं च प्रगणय्याचक्ष्व मे शीघ्रम् ॥ १०९½ ॥
विषमत्रिभुजक्षेत्रस्य कल्पनाप्रकारस्य सूत्रम्—
जन्यभुजार्धं छित्त्वा केनापिच्छेदलब्धजं चाभ्याम् ।
कोटियुतिर्भूः कर्णौ भुजौ भुजा लम्बका विषमे ॥ ११०½ ॥
अत्रोद्देशकः
हे द्वित्रिबीजकस्य क्षेत्रभुजार्धेन चान्यमुत्थाप्य ।
तस्माद्विषमत्रिभुजे भुजभूम्यवलम्बकं ब्रूहि ॥ १११½ ॥
इति जन्यव्यवहारः समाप्तः ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणितज्ञ, ३ और ५ को बीज लेकर उनकी सहायता से प्राप्त समद्विबाहु त्रिभुज के संबंध
में दो बराबर भुजाओं, आधार और लंब के मापों को शीघ्र ही गणना कर बताओ ॥१०९½॥
विषम त्रिभुज की रचना करने की विधि के लिये नियम—
दिये गये बीजों से प्राप्त आयत के आधार की आधी राशि को मन से चुने हुए गुणनखंड
द्वारा भाजित करते हैं । भाजक और भजनफल की इस क्रिया में बीज मानकर दूसरा आयत प्राप्त
करते हैं । इन दो आयतों की लम्ब भुजाओं का योग इष्ट विषम त्रिभुज के आधार का माप होता है ।
उन दो आयतों के दो कर्ण इष्टत्रिभुज की दो भुजाओं के माप होते हैं । उन दो आयतों में से किसी एक
का आधार इष्ट त्रिभुज के लंब का माप होता है ॥११०½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
२ और ३ को बीज लेकर उनसे प्राप्त आयत तथा उस आयत के आधे आधार से प्राप्त दूसरा
आयत संरचित कर, मुझे इस क्रिया की सहायता से विषम त्रिभुज की भुजाओं, आधार और लंब के
मापों को बतलाओ ॥१११½॥
इस प्रकार, क्षेत्र गणित व्यवहार में जन्य व्यवहार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
(११०½) पार्श्वलिखित रचना से नियम
स्पष्ट हो जावेगा—
मानलो अ ब स द और इ फ ग ह
दो ऐसे जन्य आयत हैं कि आधार अ द =
आधार इ ह । ब अ को क तक इतना
बढ़ाओ कि अ क = इ फ हों । यह सरलता पूर्वक दिखाया जा सकता है कि द क = इ ग और त्रिभुज
ब द क का आधार ब क = ब अ + इ फ, जो आयतों की लंब भुजायें कहलाती हैं । त्रिभुज की भुजायें
उन्हीं आयतों के कर्णों के बराबर होती हैं ।
-७. ११२½] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २१३
पैशाचिकव्यवहारः
इतः परं पैशाचिकव्यवहारमुदाहरिष्यामः ।
समचतुरश्रक्षेत्रे वा आयतचतुरश्रक्षेत्रे वा क्षेत्रफले रज्जुसंख्यया समे सति, क्षेत्रफले
बाहुसंख्यया समे सति, क्षेत्रफले कर्णसंख्यया समे सति, क्षेत्रफले रज्ज्वर्धसंख्यया समे सति,
क्षेत्रफले बाहोस्तृतीयांशसंख्यया समे सति, क्षेत्रफले कर्णसंख्यायाश्चतुर्थांशसंख्यया समे सति,
द्विगुणितकर्णस्य त्रिगुणितबाहोश्च चतुर्गुणितकोटेश्च रज्जोस्संयोगसंख्यां द्विगुणीकृत्य तद्द्वि-
गुणितसंख्यया क्षेत्रफले समाने सति, इत्येवमादीनां क्षेत्राणां कोटिभुजाकर्णक्षेत्रफलरज्जुषु
इष्टराशिद्वयसाम्यस्य चेष्टराशिद्वयस्यान्योन्यमिष्टगुणकारगुणितफलवत्क्षेत्रस्य भुजाकोटि-
संख्यानयनस्य सूत्रम्—
स्वगुणेष्टेन विभक्ताः स्वेष्टानां गणक गणितगुणितेन ।
गुणिता भुजा भुजाः स्युः समचतुरश्रादिजन्यानाम् ॥ ११२½ ॥
पैशाचिक व्यवहार ( अत्यन्त जटिल प्रश्न )
इसके पश्चात् हम पैशाचिक विषय का प्रतिपादन करेंगे ।
समायत ( वर्ग ) अथवा आयत के संबंध में आधार और लंब भुजा का संख्यात्मक मान
निकालने के लिये नियम जब कि लंब भुजा, आधार, कर्ण, क्षेत्रफल और परिमिति में कोई भी दो
मन से समान चुन लिये जाते हैं, अथवा जब क्षेत्र का क्षेत्रफल वह गुणनफल होता है जो मन से चुने
हुए गुणकों (multipliers ) द्वारा क्रमशः उपर्युक्त तत्त्वों में से कोई भी दो राशियों को गुणित
करने पर प्राप्त होता है : अर्थात्—समायत ( वर्ग ) अथवा आयत के सम्बन्ध में आधार और लंब भुजा
का संख्यात्मक मान निकालने के लिए नियम जब कि क्षेत्र का क्षेत्रफल मान में परिमिति के तुल्य होता है;
अथवा जब (क्षेत्र का क्षेत्रफल) आधार के बराबर होता है, अथवा जब (क्षेत्र का क्षेत्रफल) परिमिति के
मापकी अर्द्धराशियों के तुल्य होता है; अथवा जब ( क्षेत्र का क्षेत्रफल ) आधार की एक तिहाई राशि के
बराबर होता है; अथवा जब (क्षेत्र का क्षेत्रफल) उस द्विगुणित राशि के तुल्य होता है जो उस राशि को
दुगुने करने पर प्राप्त होती है, और जिसे कर्ण की दुगुनी राशि, आधार की तिगुनी राशि, लंब भुजा की
चौगुनी राशि और परिमिति इत्यादि को जोड़ने पर परिणाम स्वरूप प्राप्त करते हैं—
किसी मन से चुनी हुई इष्ट आकृति के आधार के माप को ( परिणामी ) चुने हुए ऐसे
गुणनखंड द्वारा भाजित करने पर, जिसका गुणा आधार से करने पर मन से चुनी हुई इष्ट आकृति
का क्षेत्रफल उत्पन्न होता है ), अथवा ऐसी मन से चुनी हुई इष्ट आकृति के आधार को ऐसे गुणनखंड
से गुणित करने पर, ( कि जिसके दिये गये क्षेत्र के क्षेत्रफल में गुणा करने पर इष्ट प्रकार का परिणाम
प्राप्त होता है ) इष्ट समभुज चतुरश्र तथा अन्य प्रकार की प्राप्त आकृतियों के आधारों के माप उत्पन्न
होते हैं ॥११२½॥
(११२½) गाथा ११३½ में दिया गया प्रथम प्रश्न हल करने पर नियम स्पष्ट हो जावेगा—
यहाँ प्रश्न में वर्ग की भुजा का माप तथा क्षेत्रफल का मान निकालना है, जब कि क्षेत्रफल परिमिति
के बराबर है । मानलो ५ है भुजा जिसकी ऐसा वर्ग लिया जावे तो परिमिति २० होगी और क्षेत्रफल २५
होगा । वह गुणनखंड जिससे परिमिति के माप २० को गुणित करने पर क्षेत्रफल २५ हो जावे ५/४ है ।
यदि ५, वर्ग की मन से चुनी हुई भुजा ५/४ द्वारा भाजित की जावे, तो इष्ट चतुर्भुज की भुजा उत्पन्न
होती है ।
२१४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ११३½-
अत्रोद्देशकः
रज्जुर्गणितेन समा समचतुरश्रस्य का तु भुजसंख्या ।
अपरस्य बाहुसदृशं गणितं तस्यापि मे कथय ॥ ११३½ ॥
कर्णो गणितेन समः समचतुरश्रस्य को भवेद्बाहुः ।
रज्जुर्द्विगुणोऽन्यस्य क्षेत्रस्य धनाच्च मे कथय ॥ ११४½ ॥
आयतचतुरश्रस्य क्षेत्रस्य च रज्जुतुल्यमिह गणितम् ।
गणितं कर्णेन समं क्षेत्रस्यान्यस्य को बाहुः ॥ ११५½ ॥
कस्यापि क्षेत्रस्य त्रिगुणो बाहुर्धनाच्च को बाहुः ।
कर्णश्चतुर्गुणोऽन्यः समचतुरश्रस्य गणितफलात् ॥ ११६½ ॥
आयतचतुरश्रस्य श्रवणं द्विगुणं त्रिसंगुणो बाहुः ।
कोटिश्चतुर्गुणा तै रज्जुयुतैर्द्विगुणितं गणितम् ॥ ११७½ ॥
आयतचतुरश्रस्य क्षेत्रस्य च रज्जुरत्र रूपसमः ।
कोटिः को बाहुर्वा शीघ्रं विगणय्य मे कथय ॥ ११८½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
वर्ग क्षेत्र के संबंध में परिमिति का संख्यात्मक माप क्षेत्रफल के माप के बराबर है । आधार
का संख्यात्मक माप क्या है ? उसी प्रकार की दूसरी आकृति के संबंध में क्षेत्रफल का माप आधार
के माप के बराबर है । उस आकृति के संबंध में आधार का माप बतलाओ ॥ ११३½ ॥ किसी
समायत (वर्ग) क्षेत्र के संबंध में कर्ण का माप क्षेत्रफल के माप के बराबर है । आधार का माप क्या हो
सकता है ? दूसरी उसी प्रकार की आकृति के संबंध में परिमिति का माप, क्षेत्रफल के माप का
दुगुना है । आधार का माप बतलाओ ॥ ११४½ ॥ आयत क्षेत्र के संबंध में यहाँ क्षेत्रफल का माप
परिमिति के माप के तुल्य है, और दूसरे उसी प्रकार के क्षेत्र के संबंध में क्षेत्रफल का संख्यात्मक माप
कर्ण के माप के बराबर है । प्रत्येक दशा में आधार का माप क्या है ? ॥ ११५½ ॥ किसी वर्ग
क्षेत्र के संबंध में आधार का संख्यात्मक मान क्षेत्रफल के माप से तिगुना है । दूसरे वर्ग क्षेत्र
के संबंध में कर्ण का संख्यात्मक मान क्षेत्रफल के माप से चौगुना है । इनमें से प्रत्येक दशा में आधार
का माप क्या है ? ॥ ११६½ ॥ किसी आयत क्षेत्र में कर्ण के माप से दुगुनी राशि, आधार से
तिगुनी राशि तथा लंब भुजा से चौगुनी राशि लेकर उन में परिमिति का माप जोड़ा जाता है ।
इस प्राप्त योगफल से दुगुनी राशि क्षेत्रफल का संख्यात्मक माप होती है । आधार का माप
बतलाओ ॥ ११७½ ॥ आयत क्षेत्र के संबंध में परिमिति का संख्यात्मक मान १ है । गणना के पश्चात्
यह नियम दूसरी रीति भी निर्दिष्ट करता है जो व्यावहारिक रूप में उसी प्रकार है । वह गुणनखंड
जिससे क्षेत्रफल २५ को गुणित किया जाता है, ताकि वह परिमिति के माप २० के बराबर हो जावे,
४/५ है। यदि मन से चुनी हुई आकृति की भुजा (जो माप में ५ मान ली गई है) को इस गुणनखंड
४/५ से गुणित किया जावे तो इष्ट आकृति की भुजा का माप प्राप्त होता है ।
-७. १२२½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २१५
कर्णो द्विगुणो बाहुस्त्रिगुणःकोटिश्चतुर्गुणा मिश्रः ।
रज्ज्वा सह तत्क्षेत्रस्यायतचतुरश्रकस्य रूपसमः ॥ ११९½ ॥
पुनरपि जन्यायतचतुरश्रक्षेत्रस्य बीजसंख्यानयने करणसूत्रम्—
कोट्यूनकर्णदलतत्कर्णान्तरमुभयोश्च पदे ।
आयतचतुरश्रस्य क्षेत्रस्येयं क्रिया जन्ये ॥ १२०½ ॥
अत्रोद्देशकः
आयतचतुरश्रस्य च कोटिः पञ्चाशदधिकपञ्च भुजा ।
साष्टाचत्वारिंशत्सप्ततिः श्रुतिरथात्र के बीजे ॥ १२१½ ॥
इष्टकल्पितसंख्याप्रमाणवत्कर्णसहितक्षेत्रानयनसूत्रम्—
यत्तत्क्षेत्रं जातं बीजैः संस्थाप्य तस्य कर्णेन ।
इष्टं कर्णं विभजेल्लाभगुणाः कोटिदोः कर्णाः ॥ १२२½ ॥
मुझे शीघ्र बतलाओ कि लम्ब भुजा और आधार के माप क्या-क्या हैं ? ॥ ११८½ ॥ आयत क्षेत्र के
संबंध में कर्ण से दुगुनी राशि, आधार से तिगुनी राशि और लंब से चौगुनी राशि, इन सबको जोड़ कर,
जब परिमिति के माप में जोड़ते हैं, तो योग फल १ हो जाता है । आधार का माप बतलाओ ॥११९½॥
प्राप्त आयत क्षेत्र के संबंध में बीजों का निरूपण करने वाली संख्या को निकालने की रीति
संबंधी नियम—
आयत क्षेत्र के संबंध में, उत्पन्न करने वाले बीजों को निकालने की क्रिया में, ( १ ) लंब द्वारा
हासित कर्ण की अर्द्ध राशि तथा ( २ ) इस राशि और कर्ण का अंतर, इनके द्वारा निरूपित दो राशियों
का वर्गमूल निकालना पड़ता है ॥ १२०½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
आयत क्षेत्र के संबंध में लंब भुजा ५५ है, आधार ४८ है, और कर्ण ७३ है । यहाँ बीज
क्या-क्या हैं ? ॥१२१½ ॥
इष्ट कल्पित संख्यात्मक प्रमाण के कर्ण वाले आयत क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये नियम—
दिये गये बीजों की सहायता से प्राप्त विभिन्न आकृतियों में से प्रत्येक लिख लिये ( स्थापित
किये ) जाते हैं, और उसके कर्ण के माप के द्वारा दिया गया कर्ण का माप भाजित किया जाता है ।
इस आकृति की लंब भुजा, आधार और कर्ण, यहाँ प्राप्त हुए भजनफल द्वारा गुणित होकर, इष्ट क्षेत्र की
लंब भुजा, आधार और कर्ण को उत्पन्न करते हैं ।
(१२०½) इस अध्याय की ९५½वीं गाथा का नियम आयत क्षेत्र के कर्ण अथवा लंब अथवा आधार
से बीजों को प्राप्त करने की रीति प्रदर्शित करता है । परन्तु इस गाथा का नियम आयत के लंब और कर्ण
से बीजों को प्राप्त करने के विषय में रीति निरूपित करता है । वर्णित की हुई रीति निम्नलिखित सर्वसमिका
( identity ) पर आधारित है—
√[ {अ² + ब² - (अ² - ब²)} / २ ] = ब; और √[ अ² + ब² - {अ² + ब² - (अ² - ब²)} / २ ] = अ,
जहाँ अ² + ब² कर्ण का माप है, अ² - ब² आयत की लम्ब-भुजा का माप है। अ और ब इष्ट बीज हैं ।
(१२२½) यह नियम इस सिद्धान्त पर आधारित है कि समकोण त्रिभुज की भुजाएं कर्ण की अनुपाती
होती हैं । यहाँ कर्ण के उसी मापके लिये भुजाओं के मानो के विभिन्न कुलक ( sets ) हो सकते हैं ।
२१६ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १२३½-
अत्रोद्देशकः
एकद्विकद्विकत्रिकचतुष्कसप्तैकसाष्टकानां च ।
गणक चतुर्णां शीघ्रं बीजैरुत्थाप्य कोटिभुजाः ॥ १२३½ ॥
आयतचतुरश्राणां क्षेत्राणां विषमबाहुकानां च ।
कर्णोऽत्र पञ्चषष्टिः क्षेत्राण्याचक्ष्व कानि स्युः ॥ १२४½ ॥
इष्टजन्यायताचतुरश्रक्षेत्रस्य रज्जुसंख्यां च कर्णसंख्यां च ज्ञात्वा तज्जन्यायताचतुरश्रक्षेत्रस्य
भुजकोटिसंख्यानयनसूत्रम्—
कर्णकृतौ द्विगुणायां रज्ज्वर्धकृतिं विशोध्य तन्मूलम् ।
रज्ज्वर्धे संक्रमणीकृते भुजा कोटिरपि भवति ॥ १२५½ ॥
अत्रोद्देशकः
परिधिः स चतुस्त्रिंशत् कर्णाश्चात्र त्रयोदशो दृष्टः ।
जन्यक्षेत्रस्यास्य प्रगणय्याचक्ष्व कोटिभुजौ ॥ १२६½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणितज्ञ, दिये गये बीजों की सहायता से, ऐसे चार आयत क्षेत्रों की लंब भुजाएँ और
आधारों के मानों को शीघ्र बतलाओ, जिनके क्रमशः १ और २, २ और ३, ४ और ७, तथा १ और
८ बीज हैं, तथा जिनके आधार भिन्न भिन्न हैं । ( इस प्रश्न में ) यहाँ कर्ण का मान ६५ है । इस
दशामें, इष्ट क्षेत्रों के मापों को बतलाओ ॥ १२३½-१२४½ ॥
जिसकी परिमिति का माप और कर्ण का माप ज्ञात है ऐसे जन्य आयत क्षेत्र के आधार और
उसकी लम्ब भुजा के संख्यात्मक मानों को निकालने के लिये नियम—
कर्ण के वर्ग को २ से गुणित करो । परिणामी गुणनफल में से परिमिति की अर्द्धराशि के वर्ग
को घटाओ । तब परिणामी अंतर के वर्गमूल को प्राप्त करो । यदि यह वर्गमूल आधी परिमिति के
साथ संक्रमण क्रिया में लाया जाय, तो इष्ट आधार और लम्ब भुजा भी उत्पन्न होती हैं ॥ १२५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस दशामें परिमिति ३४ है, और कर्ण १३ है । इस जन्य आकृति के संबंध में लंब भुजा और
आधार के मापों को गणना के बाद बतलाओ ॥ १२६½॥
(१२५½) यदि किसी आयत की भुजाएं अ और ब द्वारा प्ररूपित हों, तो √(अ² + ब²) कर्ण
का माप होता है और परिमिति का माप २अ + २ब होता है । यह सरलतापूर्वक देखा जा सकता
है कि
{ (२अ + २ब)/२ + √[ २ ( √(अ² + ब²) )² - ( (२अ + २ब)/२ )² ] } ÷ २ = अ; और
{ (२अ + २ब)/२ - √[ २ ( √(अ² + ब²) )² - ( (२अ + २ब)/२ )² ] } ÷ २ = ब ।
ये दो सूत्र वर्णित रीति का यहां बीजीय रूप से निरूपण करते हैं ।
-७. १३०½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २१७
क्षेत्रफलं कर्णसंख्यां च ज्ञात्वा भुजकोटिसंख्यानयनसूत्रम्—
कर्णकृतौ द्विगुणीकृतगणितं हीनाधिकं कृत्वा ।
मूलं कोटिभुजौ हि ज्येष्ठे ह्रस्वेन संक्रमणे ॥ १२७½ ॥
अत्रोद्देशकः
आयतचतुरश्रस्य हि गणितं षष्ठिस्त्रयोदशास्यापि ।
कर्णस्तु कोटिभुजयोः परिमाणे श्रोतुमिच्छामि ॥ १२८½ ॥
क्षेत्रफलसंख्यां रज्जुसंख्यां च ज्ञात्वा आयतचतुरश्रस्य भुजकोटिसंख्यानयनसूत्रम्—
रज्ज्वर्धवर्गात्क्षेत्रगणितं चतुराहतं विशोध्याथ ।
मूलेन हि रज्ज्वर्धे संक्रमणे सति भुजाकोटी ॥ १२९½ ॥
अत्रोद्देशकः
सप्ततिशतं तु रज्जुः पञ्चशतोत्तरसहस्रमिष्टधनम् ।
जन्यायतचतुरश्रे कोटिभुजौ मे समाचक्ष्व ॥ १३०½ ॥
जब आकृति का क्षेत्रफल और कर्ण का मान ज्ञात हो, तब आधार और लम्ब भुजा के संख्यात्मक
मानों को प्राप्त करने के लिये नियम—
क्षेत्रफल के माप से दुगुनी राशि कर्ण के वर्ग में से घटाई जाती है। वह कर्ण के वर्ग में
जोड़ी भी जाती है। इस प्रकार प्राप्त अंतर और योग के वर्गमूलों से इष्ट लंब भुजा और आधार के माप
प्राप्त हो सकते हैं, जब कि वर्गमूलों में से बड़ी राशि के साथ छोटी (वर्गमूल राशि) के संबंध में
संक्रमण किया जावे ॥ १२७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी आयतक्षेत्र के संबंध में क्षेत्रफलका माप ६० है, और कर्ण का माप १३ है। मैं तुमसे
लम्ब भुजा और आधार के मापों को सुनने का इच्छुक हूँ ॥ १२८½ ॥
जब आयत क्षेत्र के क्षेत्रफल का तथा परिमिति का संख्यात्मक माप दिया गया हो, तब उस
आकृति के संबंध में आधार और लम्ब भुजा के संख्यात्मक मानों को प्राप्त करने के लिये नियम—
परिमिति की अर्द्धराशि के वर्ग में से ४ द्वारा गुणित क्षेत्रफल का माप घटाया जाता है। तब
इस परिणामी अंतर के वर्गमूल के साथ परिमिति की अर्द्धराशि के सम्बन्ध में संक्रमण क्रिया करने से
इष्ट आधार और लंबभुजा सचमुच में प्राप्त होती है। ॥ १२९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी प्राप्त आयत क्षेत्र में परिमिति का माप १७० है। दिये गये क्षेत्र का माप १५०० है।
लंब भुजा और आधार के मानों को बतलाओ ॥ १३०½ ॥
(१२७½) गाथा १२५½ वीं के नोट के समान ही प्रतीक लेकर यहाँ दिया गया नियम निम्नलिखित
रूप में निरूपित होता है:—दशानुसार
{ √( √(अ² + ब²)² + २ अ ब ) ± √( √(अ² + ब²)² - २ अ ब ) } ÷ २ = अ अथवा ब
(१२९½) यहाँ भी, { (२ अ + २ ब)/२ ± √[ ((२ अ + २ ब)/२)² - ४ अ ब ] } ÷ २ = अ अथवा ब,
जैसी दशा हो ।
ग० सा० सं०-२८
२१८ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १३१ १/२-
आयतचतुरश्रक्षेत्रद्वये रज्जुसंख्यायां सदृक्षायां सत्यां द्वितीयक्षेत्रफलात् प्रथमक्षेत्रफले
द्विगुणिते सति, अथवा क्षेत्रद्वयेऽपि क्षेत्रफले सदृशे सति प्रथमक्षेत्रस्य रज्जुसंख्याया अपि
द्वितीयक्षेत्ररज्जुसंख्यायां द्विगुणायां सत्याम् , अथवा क्षेत्रद्वये प्रथमक्षेत्ररज्जुसंख्याया अपि
द्वितीयक्षेत्रस्य रज्जुसंख्यायां द्विगुणायां सत्यां द्वितीयक्षेत्रफलादपि प्रथमक्षेत्रफले द्विगुणे सति,
तत्तत्क्षेत्रद्वयस्यानयनसूत्रम् —
स्वाल्पहृतरज्जुधनहत्कृतिरिष्टघ्नैव कोटिःस्यात् ।
व्येका दोस्तुल्यफलेऽन्यत्राधिकगणितगुणितेष्टम् ॥ १३१ १/२ ॥
व्येकं तदूनकोटिः त्रिगुणा दोः स्यात्तथान्यस्य ।
रज्ज्वर्धवर्गराशेरिति पूर्वोक्तेन सूत्रेण ।
तद्गणितरज्जुमितिभिः समानयेत्तद्भुजाकोटी ॥ १३३ ॥
इष्ट आयत क्षेत्रों के क्रमिक युग्मों को प्राप्त करने के लिये नियम (१) जब कि परिमिति के
संख्यात्मक माप बराबर हैं, और प्रथम आकृति का क्षेत्रफल दूसरे के क्षेत्रफल से दुगुना है; अथवा (२)
जब कि दोनों आकृतियों के क्षेत्रफल बराबर हैं, और दूसरी आकृति की परिमिति का संख्यात्मक माप
प्रथम आकृति की परिमिति से दुगुना है; अथवा (३) जब कि दो क्षेत्रों के संबंध में दूसरो आकृति की
परिमिति का संख्यात्मक माप, प्रथम आकृति की परिमिति से दुगुना है, और प्रथम आकृतिका क्षेत्रफल
दूसरी आकृति के क्षेत्रफल से दुगुना है—
दो इष्ट आयत क्षेत्रों संबंधी परिमितियों तथा क्षेत्रफलों की दी गई निष्पत्तियों में बड़ी संख्याओं को
उनकी संवादी छोटी संख्याओं द्वारा भाजित किया जाता है । परिणामी भजनफलों को एक दूसरे से
परस्पर गुणित कर वर्गित किया जाता है। यही राशि जब दिये गये मन से चुने गुणकार (multiplier)
द्वारा गुणित की जाती है, तब लंबभुजा का मान उत्पन्न होता है। और उस दशा में जब कि दो इष्ट
आकृतियों के क्षेत्रफल बराबर हों, यह लंब भुजा का माप एक द्वारा हासित होकर, आधार का माप बन
जाता है । परंतु दूसरी दशा में जब कि इष्ट आकृतियों के क्षेत्रफल बराबर नहीं होते, तब बढ़ी निष्पत्ति
संख्या जो क्षेत्रफलों से संबंधित होती है, दिये गये मन से चुने गुणकार द्वारा गुणित की जाती है
और परिणामी गुणनफल १ द्वारा हासित किया जाता है। ऊपर प्राप्त लंब भुजा इस परिणामी राशि
द्वारा हासित की जाती है, और तब ३ द्वारा गुणित की जाती है । इस प्रकार आधार का माप
प्राप्त होता है । तत्पश्चात् दो इष्ट चतुर्भुज क्षेत्रों में से दूसरे चतुर्भुज के माप को प्राप्त करने के
लिए, ज्ञात क्षेत्रफल और परिमिति की सहायता से, गाथा १२९ १/२ में दिये गये नियमानुसार उसका
आधार तथा लंब निकालना पड़ते हैं ॥१३१ १/२-१३३॥
(१३१ १/२-१३३) यदि प्रथम आयत की दो आसन्न भुजाएँ क और ख हों, तथा दूसरे आयत की
दो आसन्न भुजाएँ अ और ब हों, तो इस नियम में दी गई तीन प्रकार की समस्याओं में कथित दशाओं
को इस प्रकार से प्ररूपित किया जा सकता है—
( १ ) क + ख = अ + ब; क ख = २ अ ब
( २ ) २ (क + ख) = अ + ब; क ख = अ ब
( ३ ) २ (क + ख) = अ + ब; क ख = २ अ ब
इस नियम में दिया गया हल केवल १३४-१३६ गाथाओं में दिये गये प्रश्नों की विशेष
दशाओं के लिये ही उपयुक्त दिखाई देता है ।
-७. १३७ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २१९
अत्रोद्देशकः
असमन्तासायामाक्षेत्रे द्वे द्वावथेष्टगुणकारः ।
प्रथमं गणितं द्विगुणं रज्जू तुल्ये किमत्र कोटिभुजे ॥ १३४ ॥
आयतचतुरश्रे द्वे क्षेत्रे द्वयमेवगुणकारः । गणितं सदृशं रज्जुर्द्विगुणा प्रथमात् द्वितीययस्य ॥१३५॥
आयतचतुरश्रे द्वे क्षेत्रे प्रथमस्य धनमिह द्विगुणम् ।
द्विगुणा द्वितीयरज्जुस्तयोर्भुजां कोटिमपि कथय ॥ १३६ ॥
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रयोः परस्पररज्जुधनसमानसंख्ययोरिष्टगुणकगुणितरज्जुधनवतोर्वा द्विसम-
त्रिभुजक्षेत्रद्वयानयनसूत्रम्—
रज्जुकृतिघ्नान्योन्यधनाल्पाप्तं षड्द्विघ्नमल्पमेकोनम् ।
तच्छेषं द्विगुणालपं बीजे तज्जन्ययोर्भुजाद्यः प्राग्वत् ॥ १३७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो चतुर्भुज क्षेत्र हैं जिनमें से प्रत्येक असमान लंबाई और चौड़ाई वाला है । दिया गया
गुणकार २ है । प्रथम क्षेत्र का क्षेत्रफल दूसरे के क्षेत्रफल से दुगुना है, और दोनों में परिमितियाँ
बराबर हैं । इस प्रश्न में लंब भुजाएँ और आधार क्या-क्या हैं ?॥१३४॥ दो आयत क्षेत्र हैं और दिया
गया गुणकार भी २ है । उनके क्षेत्रफल बराबर हैं परंतु दूसरे क्षेत्र की परिमिति पहिले की परिमिति से
दुगुनी है । उनकी लंब भुजाएँ और आधारों को निकालो ॥१३५॥ दो आयत क्षेत्र दिये गये हैं । प्रथम
का क्षेत्रफल दूसरे के क्षेत्रफल से दुगुना है । दूसरी आकृति की परिमिति पहिले की परिमिति से दुगुनी
है । उनके आधारों और लंब भुजाओं के मानों को प्राप्त करो ॥ १३६ ॥
ऐसे समद्विबाहु त्रिभुजों के युग्म को प्राप्त करने के लिये नियम, जिनकी परिमितियाँ और
क्षेत्रफल आपस में बराबर हों अथवा एक दूसरे के अपवर्त्य हों—
इष्ट समद्विबाहु त्रिभुजों की परिमितियों के निष्पत्तिरूप मानों के वर्गों में उन त्रिभुजों के
क्षेत्रफल के निष्पत्तिरूप मानों द्वारा एकान्तर गुणन किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त दो गुणनफलों में
से बड़ा छोटे के द्वारा विभाजित किया जाता है । तथा अलग से दो के द्वारा भी गुणित किया जाता
है । इस प्रकार प्राप्त गुणनफलों में से छोटा गुणनफल १ के द्वारा ह्रासित किया जाता है । बड़ा
गुणनफल और ह्रासित छोटा गुणनफल ऐसे आयतक्षेत्र के संबंध में दो बीजों की संरचना करते हैं,
जिनसे इष्ट त्रिभुजों में से एक प्राप्त किया जाता है । उपर्युक्त इन दो बीजों के अंतर और इन बीजों
में छोटे की दुगुनी राशि : ये दोनों ऐसे आयत क्षेत्र के संबंध में बीजों की संरचना करते हैं, जिनसे
दूसरा इष्ट त्रिभुज प्राप्त किया जाता है । अपने क्रमवार बीजों की सहायता से बनी हुई दो आयताकार
आकृतियों में से, इष्ट त्रिभुजों संबंधी भुजाएँ और अन्य बातें ऊपर समझाये अनुसार प्राप्त की
जाती हैं ॥१३७॥
(१३७) दो समद्विबाहु त्रिभुजों की परिमितियों की निष्पत्ति अ : ब हो, और उनके क्षेत्रफलों की
निष्पत्ति स : द हो, तब नियमानुसार, ६ब² स / अ² द और २ब² स / अ² द - १ तथा ४ब² स / अ² द + १ और ४ब² स / अ² द - २ ;
ये बीजों के दो कुलक ( sets ) हैं, जिनकी सहायता से दो समद्विबाहु त्रिभुजों के विभिन्न
२२० ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १३८-
अत्रोद्देशकः
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रद्वयं तयोः क्षेत्रयोःसमं गणितम् ।
रज्जू समे तयोःस्यात् को बाहुः का भवेद्भूमिः ॥ १३८ ॥
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रे प्रथमस्य धनं द्विसंगुणितम् ।
रज्जुः समा द्वयोरपि को बाहुः का भवेद्भूमिः ॥ १३९ ॥
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रे द्वे रज्जुर्द्विगुणिता द्वितीयस्य ।
गणिते द्वयोःसमाने को बाहुः का भवेद्भूमिः ॥ १४० ॥
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रे प्रथमस्य धनं द्विसंगुणितम् ।
द्विगुणा द्वितीयरज्जुः को बाहुः का भवेद्भूमिः ॥ १४१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो समद्विबाहु त्रिभुज हैं। उनका क्षेत्रफल एक सा है। उनकी परिमितियाँ भी बराबर हैं।
भुजाओं और आधारों के मान क्या क्या हैं ? ॥ १३८ ॥ दो समद्विबाहु त्रिभुज हैं। पहिले का क्षेत्रफल
दूसरे के क्षेत्रफल से दुगुना है। उन दोनों की परिमितियाँ एक सी हैं। भुजाओं और आधारों के मान
क्या क्या हैं ? ॥ १३९ ॥ दो समद्विबाहु त्रिभुज हैं। दूसरे त्रिभुज की परिमिति पहिले त्रिभुज की
परिमिति से दुगुनी है। उन दो त्रिभुजों के क्षेत्रफल बराबर हैं। भुजाओं और आधारों के माप क्या क्या
हैं ? ॥ १४० ॥ दो समद्विबाहु त्रिभुज दिये गये हैं। प्रथम त्रिभुज का क्षेत्रफल दूसरे के क्षेत्रफल से
दुगुना है, और दूसरे की परिमिति पहिले की परिमिति से दुगुनी है। भुजाओं और आधारों के
माप क्या क्या हैं ? ॥ १४१ ॥
इष्ट तत्त्वों को प्राप्त कर सकते हैं । इस अध्याय की १०८½ वीं गाथा के अनुसार, इन बीजों से
निकाली गई भुजाओं और ऊँचाइयों के मापों को जब क्रमशः परिमितियों की निष्पत्ति में पाई जाने
वाली राशियों अ और ब द्वारा गुणित करते हैं, तब दो समद्विबाहु त्रिभुजों की इष्ट भुजाओं और ऊँचाइयों
के माप प्राप्त होते हैं । वे निम्नलिखित हैं—
( १ ) बराबर भुजा = अ × { ( ६ब²स / अ²द )² + ( २ब²स / अ²द - १ )² } ......,
आधार = अ × २ × २ × ( ६ब²स / अ²द ) × ( २ब²स / अ²द - १ ) ......,
ऊँचाई = अ × { ( ६ब²स / अ²द )² - ( २ब²स / अ²द - १ )² } ......।
( २ ) बराबर भुजा = ब × { ( ४ब²स / अ²द + १ )² + ( ४ब²स / अ²द - २ )² } ......,
आधार = ब × २ × २ × ( ४ब²स / अ²द + १ ) × ( ४ब²स / अ²द - २ ) ......,
ऊँचाई = ब × { ( ४ब²स / अ²द + १ )² - ( ४ब²स / अ²द - २ )² } ......।
अब इन अर्हाओं (मानों) से सरलतापूर्वक सिद्ध किया जा सकता है कि परिमितियों की निष्पत्ति
अ : ब और क्षेत्रफलों की निष्पत्ति स : द है, जैसा कि आरम्भ में ले लिया गया था ।
-७. १४२ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २२१
एकद्वयादिगणनातीसंख्यासु इष्टसंख्यामिष्टवस्तुनो भागसंख्यां परिकल्प्य तदिष्टवस्तु-
भागसंख्यायाः सकाशात् समचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य च समवृत्तक्षेत्रानयनस्य च समत्रिभुजक्षेत्रा-
नयनस्य चायतचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य च सूत्रम् -
स्वसमीकृतापवृत्तिहृतधनं चतुर्घ्नं हि वृत्तसमचतुरश्रव्यासः ।
षड्गुणितं त्रिभुजायत चतुरश्रभुजार्धमपि कोटिः ॥ १४२ ॥
वर्ग, अथवा समवृत्त क्षेत्र, अथवा समत्रिभुज क्षेत्र, अथवा आयत को इनमें से किसी उपयुक्त
आकृति के अनुपाती भाग के संख्यात्मक मान की सहायता से प्राप्त करने के लिये नियम, जब कि
१, २ आदि से प्रारम्भ होने वाली प्राकृत संख्याओं में से कोई मन से चुनी हुई संख्या द्वारा उस दी
गईं उपर्युक्त आकृति के अनुपाती भाग के संख्यात्मक मान को उत्पन्न कराया जाता है—
(अनुपाती भाग के) क्षेत्रफल (का दिया गया माप हस्त में) लिए गए (समुचित रूप से)
अनुरूपित (similarised) माप द्वारा भाजित किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त भजनफल
यदि ४ के द्वारा गुणित किया जाय, तो वर्ग तथा वृत्त की भी चौड़ाई का माप उत्पन्न होता है। वही
भजनफल, यदि ६ द्वारा गुणित किया जाय, तो समत्रिभुज तथा आयत क्षेत्र के आधार का माप भी
उत्पन्न होता है। इसकी अर्द्धराशि आयत क्षेत्र की लंब भुजा का माप होती है ॥१४२॥
(१४२) इस नियम के अन्तर्गत दिये गये प्रश्नों के प्रकार में, वृत्त, या वर्ग, या समद्विबाहु
त्रिभुज, या आयत मन चाहे समान भागों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक भाग, एक ओर परिमिति
के किसी विशिष्ट भाग द्वारा सीमित होता है। जो अनुपात परिमिति के उस विशिष्ट भाग और पूरी
परिमिति में होता है वही अनुपात उस सीमित भाग और आकृति के पूर्ण क्षेत्रफल में रहना चाहिए ।
वृत्त के संबंध में प्रत्येक खंड, त्रैत्रिज्य ( sector ) होता है; वर्गाकार आकृति होने पर और आयताकार
आकृति होने पर वह भाग आयताकार होता है, तथा समत्रिभुज आकृति होने पर वह त्रिभुज होता है।
प्रत्येक भाग का क्षेत्रफल और मूल परिमिति की लम्बाई दोनों दत्त महत्ता की होती हैं। यह गाथा, वृत्त
के व्यास, वर्ग की भुजाओं, अथवा समत्रिभुज या आयत की भुजाओं का माप निकालने के लिये नियम
का कथन करती है। यदि प्रत्येक भाग का क्षेत्रफल 'म' हो और संपूर्ण परिमिति की लम्बाई का कोई
भाग 'न' हो तो नियम में दिये गये सूत्र ये हैं—
म / न × ४ = वृत्त का व्यास, अथवा वर्ग की भुजा;
और म / न × ६ = समत्रिभुज या आयत की भुजा;
और म / न × ६ का अर्द्धभाग = आयत की लंब भुजा की लम्बाई ।
अगले पृष्ठ पर दिये गये समीकारों से मूल आधार स्पष्ट हो जावेगा, जहाँ प्रत्येक आकृति के
विभाजित खंडों की संख्या 'क' है। वृत्त की त्रिज्या अथवा अन्य आकृति संबंधी भुजा 'अ' है, और
आयत की लंब भुजा 'ब' है।
२२२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १४३-
अत्रोद्देशकः
स्वान्तःपुरे नरेन्द्रः प्रासादतले निजाङ्गनामध्ये ।
दिव्यं स रत्नकम्बलमपीपतत्तच्च समवृत्तम् ।। १४३ ।।
ताभिर्देवीभिर्धृतमेभिर्भुजयोश्च मुष्टिभिर्लब्धम् ।
पञ्चदशैकस्याः स्युः कति वनिताः कोऽत्र विष्कम्भः ।। १४४ ।।
समचतुरश्रभुजाः के समत्रिबाहौ भुजाश्चात्र ।
आयतचतुरश्रस्य हि तत्कोटिभुजौ सखे कथय ।। १४५ ।।
क्षेत्रफलसंख्यां ज्ञात्वा समचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य चायतचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य च सूत्रम्—
सूक्ष्मगणितस्य मूलं समचतुरश्रस्य बाहुरिष्टहृतम् ।
धनमिष्टफले स्यातामायतचतुरश्रकोटिभुजौ ।। १४६ ।।
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी राजा ने अपने अंतःपुर के प्रासाद में अपनी रानियों के बीच में ऊपर से फर्श पर समवृत्त
आकार वाला उत्कृष्ट रत्नकंबल नीचे गिराया । वह उन देवियों द्वारा हाथ में ग्रहण कर लिया गया ।
उनमें से प्रत्येक ने अपनी दोनों भुजाओं की मुष्टियों में पंद्रह, पंद्रह दंड क्षेत्रफल का कंबल
ग्रहण कर रखा । यहाँ बतलाओ कि इस नरेन्द्र की वनितायें कितनी हैं, और वृत्ताकार कंबल का
व्यास ( विष्कंभ ) कितना है ? यदि यह कंबल वर्गाकार हो, तो इसकी प्रत्येक भुजा कितने माप की
होगी ? यदि वह समत्रिभुजाकार हो तो उसकी भुजा कितनी होगी ? हे मित्र, मुझे बतलाओ
कि यदि कंबल आयताकार हो, तो उसकी लंब भुजा और आधार का माप क्या होगा ? ॥१४३-१४५॥
वर्गाकार आकृति अथवा आयताकार आकृति प्राप्त करने के लिये नियम, जबकि आकृति के क्षेत्रफल
का संख्यात्मक मान ज्ञात हो—
दिये गये क्षेत्रफल के शुद्ध माप का वर्गमूल इष्ट वर्गाकार आकृति की भुजा का माप होता है ।
दिये गये क्षेत्रफल को मन से चुनी हुई ( केवल क्षेत्रफल के वर्गमूल को छोड़कर ) कोई भी राशि
द्वारा भाजित करने पर परिणामी भजनफल और यह मन से चुनी हुई राशि आयत क्षेत्र के संबंध में
क्रमशः आधार और लंब भुजा की रचना करती हैं ॥१४६॥
वृत्त की दशा में, (क × म) / (क × न) = π अ² / (२π अ) , जहाँ π = परिधि / व्यास ;
वर्ग की दशा में, (क × म) / (क × न) = अ² / ४अ ;
समत्रिभुज की दशा में, (क × म) / (क × न) = (अ² / २) / ३अ
आयत की दशा में, (क × म) / (क × न) = (अ × ब) / (२(अ + ब)) , जहाँ ब = अ / २ लिया गया है ।
अध्याय की ७ वीं गाथा में दिये गये नियम के अनुसार समभुजत्रिभुज के क्षेत्रफल का व्यावहारिक
मान यहाँ उपयोग में लाया गया है । अन्यथा, इस नियम में दिया गया सूत्र ठीक सिद्ध नहीं होता ।
(१४३-१४५) इस प्रश्न में मुट्ठीभर का अर्थ चार अंगुल प्रमाण होता है ।
-७. १४८ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २२३
अत्रोद्देशकः
कस्य हि समचतुरश्रक्षेत्रस्य फलं चतुष्षष्टिः ।
फलमायतस्य सूक्ष्मं षष्टिः के वात्र कोटिभुजे ॥ १४७ ॥
इष्टद्विसमचतुरश्रक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलसंख्यां ज्ञात्वा, इष्टसंख्यां गुणकं परिकल्प्य, इष्टसंख्या-
ङ्कबीजाभ्यां जन्यायतचतुरश्रक्षेत्रं परिकल्प्य, तदिष्टद्विसमचतुरश्रक्षेत्रफलवदिष्टद्विसमचतुर-
श्रानयनसूत्रम्—
तद्धनगुणितेष्टकृतिर्जन्यधनोना भुजाहता मुखं कोटिः ।
द्विगुणा समुखा भूर्दोर्लम्बः कर्णौ भुजे तदिष्टहृताः ॥ १४८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
६४ क्षेत्रफल वाली वर्गाकार आकृति वास्तव में कौन सी है ? आयत क्षेत्र के क्षेत्रफल का
शुद्ध मान ६० है । बतलाओ कि यहाँ लंब भुजा और आधार के मान क्या क्या हैं ? ॥१४७॥
दो बराबर भुजाओं वाले ऐसे चतुर्भुज क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये नियम, जिसे बीजों की
सहायता से आयत क्षेत्र को प्राप्त करने पर और साथ ही किसी दी हुई संख्या को इष्ट गुणकार की तरह
उपयोग में लाकर प्राप्त करते हैं, तथा जब ( दो बराबर भुजाओंवाले ) ऐसे चतुर्भुज क्षेत्र के क्षेत्रफल
के बराबर ज्ञात सूक्ष्म क्षेत्रफल वाले चतुर्भुज का क्षेत्रफल होता है—
दिये गये गुणकार का वर्ग दिये गये क्षेत्रफल द्वारा गुणित किया जाता है । परिणामी गुणनफल,
दिये गये बीजों से प्राप्त आयत के क्षेत्रफल द्वारा हासित किया जाता है । शेषफल जब इस आयत
के आधार द्वारा भाजित किया जाता है, तब ऊपरी भुजा का माप उत्पन्न होता है । प्राप्त आयत की
लंब भुजा का मान, जब २ द्वारा गुणित होकर ( पहिले ही ) प्राप्त ऊपरी भुजा के मान में जोड़ा
जाता है, तब आधार का मान उत्पन्न होता है । इस आयत क्षेत्र के आधार का मान ऊपरी भुजा
के अंतरों से आधार पर गिराये गये लंब के समान होता है, तथा व्युत्पादित आयत क्षेत्र के कर्णों का
मान भुजाओं के मान के समान होता है । इस प्रकार प्राप्त दो समान भुजाओं वाले चतुर्भुज के ये
तत्त्व दिये गये गुणकार द्वारा भाजित किये जाते हैं, ताकि दो समान भुजाओं वाला इष्ट चतुर्भुज
प्राप्त हो ॥१४८॥
(१४८) यहाँ दिये गये क्षेत्रफल और दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज की रचना संबंधी प्रश्न का
विवेचन किया गया है । इस हेतु मन से कोई संख्या चुनी जाती है । दो बीजों का एक कुलक ( set )
भी दिया गया रहता है । इस नियम में वर्णित रीति दूसरी गाथा में दिये गये प्रश्न में प्रयुक्त करने पर
स्पष्ट हो जावेगी । उल्लिखित बीज यहाँ २ और ३ हैं । दिया गया क्षेत्रफल ७ है, तथा मन से चुनी हुई
संख्या ३ है ।
२२४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १४९-
अत्रोद्देशकः
सूक्ष्मधनं सप्तेष्टं त्रिकं हि बीजे द्विके त्रिके दृष्टे ।
द्विसमचतुरश्रबाहु मुखभूम्यवलम्बकान् ब्रूहि ॥ १४९ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दिये गये क्षेत्रफल का ठीक माप ७ है, मन से चुना हुआ गुणकार ३ है, और दत्त बीज २
और ३ हैं। दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र को बराबर भुजाओं, ऊपरी भुजा, आधार और
लंब के मानों को प्राप्त करो ॥१४९॥
नोट—आकृतियों के माप अनुमाप ( scale ) रहित हैं ।
सबसे पहिले इस अध्याय की ९० १/२ वीं गाथानुसार दिये गये बीजों की सहायता से आयत की
रचना करते हैं । उस आयत की छोटी भुजा का माप ५
और बड़ी भुजा का माप १२ तथा कर्ण का माप १३ होता
है । उसका क्षेत्रफल मान में ६० होता है । अब इस
प्रश्न में दिये गये क्षेत्रफल को प्रश्न में दी गई मन से चुनी
हुई संख्या के वर्ग द्वारा गुणित करते हैं, जिससे हमें
७ × ३² = ६३ प्राप्त होता है । इस ६३ में से हमें दिये
गये बीजों से संरचित आयत का क्षेत्रफल ६० घटाना
पड़ता है, जिससे ३ शेष प्राप्त होता है । ३ क्षेत्रफल वाला
एक आयत बनाना पड़ता है, जिसकी एक भुजा बीजों
से प्राप्त आयत की बड़ी भुजा के बराबर होती है । यह
बड़ी भुजा माप में १२ है, इसलिये इस आयत की छोटी
भुजा आकृति में दिखलाये अनुसार १/४ के माप की होती है ।
बीजों से प्राप्त आयत के दो भाग कर्ण द्वारा प्राप्त करते
हैं, जो दो त्रिभुज होते हैं । इन दो त्रिभुजों को, आकृति
में दिखाये अनुसार, १/४ × १२ क्षेत्रफल वाले आयत के दोनों
ओर जमाते हैं, ताकि लंबी भुजाएँ संपाती हों ।
इस प्रकार अंत में हमें दो बराबर १३ मापवाली
भुजाओं का चतुर्भुज प्राप्त होता है, जिसकी ऊपरी भुजा
१/४ और आधार १० १/४ होता है । इसकी सहायता से
प्रश्न में इष्ट चतुर्भुज की भुजाओं के माप, मन से चुनी हुई
संख्या ३ द्वारा, भुजाओं के माप १३, १/४, १३ और
१० १/४ को भाजित कर, प्राप्त कर सकते हैं ।
-७. १५१ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २२५
इष्टसूक्ष्मगणितफलवत्रिसमचतुरश्रक्षेत्रानयनसूत्रम्—
इष्टधनभक्तधनकृतिरिष्टयुतार्धं भुजा द्विगुणितेष्टम् ।
विभुजं मुखमिष्टाप्तं गणितं ह्यवलम्बकं त्रिसमजन्ये ॥ १५० ॥
अत्रोद्देशकः
कस्यापि क्षेत्रस्य त्रिसमचतुर्बाहुकस्य सूक्ष्मधनम् ।
षण्णवतिरिष्टमष्टौ भूबाहुमुखावलम्बकानि वद ॥ १५१ ॥
तीन बराबर भुजाओं वाले ज्ञात क्षेत्रफल के चतुर्भुज क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये नियम जब कि
गुणक ( multiplier ) दिया गया हो—
दिये गये क्षेत्रफल के वर्ग को दिये गये गुणक के घन द्वारा भाजित किया जाता है ।
तब दिये गये गुणकार को परिणामी भजनफल में जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त योग की अर्द्धराशि
बराबर भुजाओं में से किसी एक का माप देती है । दिया गया गुणक २ से गुणित होकर, और
तब प्राप्त बराबर भुजा ( जो अभी प्राप्त हुई है ऐसी समान भुजा ) द्वारा हासित होकर, ऊपरी भुजा
का माप देता है । दिया गया क्षेत्रफल दिये गये गुणक द्वारा भाजित होकर, तीन बराबर भुजाओं
वाले इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में ऊपरी भुजा के अंतों से आधार पर गिराये गये समान लंबों में से
किसी एक का मान देता है ॥१५०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी ३ बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में क्षेत्रफल का शुद्ध मान ९६ है । दिया
गया गुणक ८ है । आधार, भुजाओं, ऊपरी भुजा और लंब के मापों को बतलाओ ॥ १५१ ॥
(१५०) नियम में कथन है कि दिये गये क्षेत्रफल को मन से चुनी हुई दत्त संख्या द्वारा भाजित
करने पर इष्ट आकृति संबंधी लंब प्राप्त होता है । क्षेत्रफल का मान, आधार और ऊपरी भुजा के योग
की अर्द्धराशि तथा लंब के गुणनफल के बराबर होता है । इसलिये ब स
दी गई चुनी हुई संख्या ऊपरी भुजा और आधार के योग की अर्द्धराशि
का निरूपण करती है । यदि अ ब स द तीन बराबर भुजाओं वाला
चतुर्भुज है, और स इ, स से अद पर गिराया गया लंब है, तो
अ इ, अ द और ब स के योग की आधी होती है, और दी गई चुनी
हुई संख्या के बराबर होती है । यह सरलता पूर्वक दिखाया जा सकता
है कि २अ द × अ इ = (स इ)² + (अ इ)² । अ इ द
( स इ² × अ इ² )
( स इ )² + ( अ इ )² ( स इ )² अ इ ———————— + अ इ
∴ अ द = ————————— = ———— + —— = ( अ इ ³ )
२अ इ २अ इ २ —————————————
२
( स इ × अ इ )²
——————— + अ इ
( अ इ )³
= ——————————
२
यहाँ स इ × अ इ = चतुर्भुज का दिया गया क्षेत्रफल है । यह अंतिम सूत्र, प्रश्न में तीन बराबर भुजाओं
वाले चतुर्भुज की कोई भी एक बराबर भुजा का मान निकालने के लिये दिया गया है ।
ग० सा० सं०-२९