गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें-७. १३०½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २१७
क्षेत्रफलं कर्णसंख्यां च ज्ञात्वा भुजकोटिसंख्यानयनसूत्रम्—
कर्णकृतौ द्विगुणीकृतगणितं हीनाधिकं कृत्वा ।
मूलं कोटिभुजौ हि ज्येष्ठे ह्रस्वेन संक्रमणे ॥ १२७½ ॥
अत्रोद्देशकः
आयतचतुरश्रस्य हि गणितं षष्ठिस्त्रयोदशास्यापि ।
कर्णस्तु कोटिभुजयोः परिमाणे श्रोतुमिच्छामि ॥ १२८½ ॥
क्षेत्रफलसंख्यां रज्जुसंख्यां च ज्ञात्वा आयतचतुरश्रस्य भुजकोटिसंख्यानयनसूत्रम्—
रज्ज्वर्धवर्गात्क्षेत्रगणितं चतुराहतं विशोध्याथ ।
मूलेन हि रज्ज्वर्धे संक्रमणे सति भुजाकोटी ॥ १२९½ ॥
अत्रोद्देशकः
सप्ततिशतं तु रज्जुः पञ्चशतोत्तरसहस्रमिष्टधनम् ।
जन्यायतचतुरश्रे कोटिभुजौ मे समाचक्ष्व ॥ १३०½ ॥
जब आकृति का क्षेत्रफल और कर्ण का मान ज्ञात हो, तब आधार और लम्ब भुजा के संख्यात्मक
मानों को प्राप्त करने के लिये नियम—
क्षेत्रफल के माप से दुगुनी राशि कर्ण के वर्ग में से घटाई जाती है। वह कर्ण के वर्ग में
जोड़ी भी जाती है। इस प्रकार प्राप्त अंतर और योग के वर्गमूलों से इष्ट लंब भुजा और आधार के माप
प्राप्त हो सकते हैं, जब कि वर्गमूलों में से बड़ी राशि के साथ छोटी (वर्गमूल राशि) के संबंध में
संक्रमण किया जावे ॥ १२७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी आयतक्षेत्र के संबंध में क्षेत्रफलका माप ६० है, और कर्ण का माप १३ है। मैं तुमसे
लम्ब भुजा और आधार के मापों को सुनने का इच्छुक हूँ ॥ १२८½ ॥
जब आयत क्षेत्र के क्षेत्रफल का तथा परिमिति का संख्यात्मक माप दिया गया हो, तब उस
आकृति के संबंध में आधार और लम्ब भुजा के संख्यात्मक मानों को प्राप्त करने के लिये नियम—
परिमिति की अर्द्धराशि के वर्ग में से ४ द्वारा गुणित क्षेत्रफल का माप घटाया जाता है। तब
इस परिणामी अंतर के वर्गमूल के साथ परिमिति की अर्द्धराशि के सम्बन्ध में संक्रमण क्रिया करने से
इष्ट आधार और लंबभुजा सचमुच में प्राप्त होती है। ॥ १२९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी प्राप्त आयत क्षेत्र में परिमिति का माप १७० है। दिये गये क्षेत्र का माप १५०० है।
लंब भुजा और आधार के मानों को बतलाओ ॥ १३०½ ॥
(१२७½) गाथा १२५½ वीं के नोट के समान ही प्रतीक लेकर यहाँ दिया गया नियम निम्नलिखित
रूप में निरूपित होता है:—दशानुसार
{ √( √(अ² + ब²)² + २ अ ब ) ± √( √(अ² + ब²)² - २ अ ब ) } ÷ २ = अ अथवा ब
(१२९½) यहाँ भी, { (२ अ + २ ब)/२ ± √[ ((२ अ + २ ब)/२)² - ४ अ ब ] } ÷ २ = अ अथवा ब,
जैसी दशा हो ।
ग० सा० सं०-२८