गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 265, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें-७. १०८½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २११
एकस्माज्जन्यायतचतुरश्राद्द्विसमत्रिभुजानयनसूत्रम्—
कर्णे भुजद्वयं स्याद्बाहुर्द्विगुणीकृतो भवेद्भूमिः ।
कोटिरवलम्बकोऽयं द्विसमत्रिभुजे धनं गणितम् ॥ १०८½ ॥
केवल एक जन्य आयत क्षेत्र की सहायता से समद्विबाहु त्रिभुज प्राप्त करने के लिये नियम—
दिये गये बीजों की सहायता से संरचित आयत के दो कर्ण इष्ट समद्विबाहु त्रिभुज की दो
बराबर भुजाएँ हो जाते हैं। आयत का आधार दो द्वारा गुणित होकर इष्ट त्रिभुज का आधार बन जाता
है। आयत की लंब भुजा, इष्ट त्रिभुज का शीर्ष से आधार पर गिराया हुआ लम्ब होती है। उस
आयत का क्षेत्रफल, इष्ट त्रिभुज का क्षेत्रफल होता है ॥१०८½॥
ऊपरी भुजा = ( स² - द² ) ( अ² + ब² ) ( अ² + ब² )
कर्ण = { ( अ² - ब² ) × २ स द + ( स² - द² ) २ अ ब } × ( अ² + ब² ) ; और
{ ( अ² - ब² ) ( स² - द² ) + ४ अ ब स द } × ( अ² + ब² )
लम्ब = { ( अ² - ब² ) × २ स द + ( स² - द² ) २ अ ब } × २ अ ब; और
{ ( अ² - ब² ) ( स² - द² ) + ४ अ ब स द } × ( अ² - ब² )
खंड अवधाएँ = { ( अ² - ब² ) × २ स द + ( स² - द² ) × २ अ ब } ( अ² - ब² ); और
{ ( अ² - ब² ) ( स² - द² ) + ४ अ ब स द } × २ अ ब.
(१०५½-१०७½) गाथा १०३½ के नोट में कथित मान यहाँ भी भुजाओं आदि के लिये दिये
गये हैं; केवल वे कुछ भिन्न विधि से कहे गये हैं। १०३½ वीं गाथा के ही प्रतीक लेकर—
कर्ण = [{२ स द - (स² - द²)} २ अ ब + {२ अ ब + (अ² - ब²) } (स² - द²)] × (अ² + ब²);
और [{२ स द - (स² - द²)} (अ² - ब²) + {२ अ ब + (अ² - ब²)} (स² - द²)] × (अ² + ब²) ।
[ {२ सद - (स² - द²) } × २ अ ब + {२ अ ब + (अ² - ब²) } (स² - द²) ] (अ² + ब²)
लम्ब = ----------------------------------------------------------------------------------------- × (अ² - ब²);
( अ² + ब² )
[ {२ स द - (स² - द²)} (अ² - ब²) + {२ अ ब + (अ² - ब²)} (स² - द²)] (अ² + ब²)
और --------------------------------------------------------------------------------------- × २ अ ब ।
( अ² + ब² )
उपर्युक्त चार बीजवाक्य १०३½ वीं गाथा में दिये गये कर्णों और लंबों के मापों के रूप में प्रका-
सित किये जा सकते हैं। यहाँ आधार के खंडों के माप, खंड की संवादी भुजा और लंब के वर्गों के अन्तर
के वर्गमूल को निकालने पर प्राप्त किये जा सकते हैं।
(१०८½) इस नियम का मूल आधार इस
प्रकार निकाला जा सकता है:—मानलो अ ब स द एक
आयत है और अ द, इ तक बढ़ाई जाती है ताकि
अ द = द इ । इ स को जोड़ो। अ स इ एक
समद्विबाहु त्रिभुज है जिसकी भुजाएँ आयत के कर्णों के माप के बराबर हैं, और जिसका क्षेत्रफल
आयत के क्षेत्रफल के बराबर है।
पार्श्व आकृति से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जावेगा।