गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 266, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें२१२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १०९½-
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकबीजोत्थद्विसमत्रिभुजस्य गणक बाहू द्वौ ।
भूमिसमवलम्बकं च प्रगणय्याचक्ष्व मे शीघ्रम् ॥ १०९½ ॥
विषमत्रिभुजक्षेत्रस्य कल्पनाप्रकारस्य सूत्रम्—
जन्यभुजार्धं छित्त्वा केनापिच्छेदलब्धजं चाभ्याम् ।
कोटियुतिर्भूः कर्णौ भुजौ भुजा लम्बका विषमे ॥ ११०½ ॥
अत्रोद्देशकः
हे द्वित्रिबीजकस्य क्षेत्रभुजार्धेन चान्यमुत्थाप्य ।
तस्माद्विषमत्रिभुजे भुजभूम्यवलम्बकं ब्रूहि ॥ १११½ ॥
इति जन्यव्यवहारः समाप्तः ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणितज्ञ, ३ और ५ को बीज लेकर उनकी सहायता से प्राप्त समद्विबाहु त्रिभुज के संबंध
में दो बराबर भुजाओं, आधार और लंब के मापों को शीघ्र ही गणना कर बताओ ॥१०९½॥
विषम त्रिभुज की रचना करने की विधि के लिये नियम—
दिये गये बीजों से प्राप्त आयत के आधार की आधी राशि को मन से चुने हुए गुणनखंड
द्वारा भाजित करते हैं । भाजक और भजनफल की इस क्रिया में बीज मानकर दूसरा आयत प्राप्त
करते हैं । इन दो आयतों की लम्ब भुजाओं का योग इष्ट विषम त्रिभुज के आधार का माप होता है ।
उन दो आयतों के दो कर्ण इष्टत्रिभुज की दो भुजाओं के माप होते हैं । उन दो आयतों में से किसी एक
का आधार इष्ट त्रिभुज के लंब का माप होता है ॥११०½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
२ और ३ को बीज लेकर उनसे प्राप्त आयत तथा उस आयत के आधे आधार से प्राप्त दूसरा
आयत संरचित कर, मुझे इस क्रिया की सहायता से विषम त्रिभुज की भुजाओं, आधार और लंब के
मापों को बतलाओ ॥१११½॥
इस प्रकार, क्षेत्र गणित व्यवहार में जन्य व्यवहार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
(११०½) पार्श्वलिखित रचना से नियम
स्पष्ट हो जावेगा—
मानलो अ ब स द और इ फ ग ह
दो ऐसे जन्य आयत हैं कि आधार अ द =
आधार इ ह । ब अ को क तक इतना
बढ़ाओ कि अ क = इ फ हों । यह सरलता पूर्वक दिखाया जा सकता है कि द क = इ ग और त्रिभुज
ब द क का आधार ब क = ब अ + इ फ, जो आयतों की लंब भुजायें कहलाती हैं । त्रिभुज की भुजायें
उन्हीं आयतों के कर्णों के बराबर होती हैं ।