गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें-७. १२२½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २१५
कर्णो द्विगुणो बाहुस्त्रिगुणःकोटिश्चतुर्गुणा मिश्रः ।
रज्ज्वा सह तत्क्षेत्रस्यायतचतुरश्रकस्य रूपसमः ॥ ११९½ ॥
पुनरपि जन्यायतचतुरश्रक्षेत्रस्य बीजसंख्यानयने करणसूत्रम्—
कोट्यूनकर्णदलतत्कर्णान्तरमुभयोश्च पदे ।
आयतचतुरश्रस्य क्षेत्रस्येयं क्रिया जन्ये ॥ १२०½ ॥
अत्रोद्देशकः
आयतचतुरश्रस्य च कोटिः पञ्चाशदधिकपञ्च भुजा ।
साष्टाचत्वारिंशत्सप्ततिः श्रुतिरथात्र के बीजे ॥ १२१½ ॥
इष्टकल्पितसंख्याप्रमाणवत्कर्णसहितक्षेत्रानयनसूत्रम्—
यत्तत्क्षेत्रं जातं बीजैः संस्थाप्य तस्य कर्णेन ।
इष्टं कर्णं विभजेल्लाभगुणाः कोटिदोः कर्णाः ॥ १२२½ ॥
मुझे शीघ्र बतलाओ कि लम्ब भुजा और आधार के माप क्या-क्या हैं ? ॥ ११८½ ॥ आयत क्षेत्र के
संबंध में कर्ण से दुगुनी राशि, आधार से तिगुनी राशि और लंब से चौगुनी राशि, इन सबको जोड़ कर,
जब परिमिति के माप में जोड़ते हैं, तो योग फल १ हो जाता है । आधार का माप बतलाओ ॥११९½॥
प्राप्त आयत क्षेत्र के संबंध में बीजों का निरूपण करने वाली संख्या को निकालने की रीति
संबंधी नियम—
आयत क्षेत्र के संबंध में, उत्पन्न करने वाले बीजों को निकालने की क्रिया में, ( १ ) लंब द्वारा
हासित कर्ण की अर्द्ध राशि तथा ( २ ) इस राशि और कर्ण का अंतर, इनके द्वारा निरूपित दो राशियों
का वर्गमूल निकालना पड़ता है ॥ १२०½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
आयत क्षेत्र के संबंध में लंब भुजा ५५ है, आधार ४८ है, और कर्ण ७३ है । यहाँ बीज
क्या-क्या हैं ? ॥१२१½ ॥
इष्ट कल्पित संख्यात्मक प्रमाण के कर्ण वाले आयत क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये नियम—
दिये गये बीजों की सहायता से प्राप्त विभिन्न आकृतियों में से प्रत्येक लिख लिये ( स्थापित
किये ) जाते हैं, और उसके कर्ण के माप के द्वारा दिया गया कर्ण का माप भाजित किया जाता है ।
इस आकृति की लंब भुजा, आधार और कर्ण, यहाँ प्राप्त हुए भजनफल द्वारा गुणित होकर, इष्ट क्षेत्र की
लंब भुजा, आधार और कर्ण को उत्पन्न करते हैं ।
(१२०½) इस अध्याय की ९५½वीं गाथा का नियम आयत क्षेत्र के कर्ण अथवा लंब अथवा आधार
से बीजों को प्राप्त करने की रीति प्रदर्शित करता है । परन्तु इस गाथा का नियम आयत के लंब और कर्ण
से बीजों को प्राप्त करने के विषय में रीति निरूपित करता है । वर्णित की हुई रीति निम्नलिखित सर्वसमिका
( identity ) पर आधारित है—
√[ {अ² + ब² - (अ² - ब²)} / २ ] = ब; और √[ अ² + ब² - {अ² + ब² - (अ² - ब²)} / २ ] = अ,
जहाँ अ² + ब² कर्ण का माप है, अ² - ब² आयत की लम्ब-भुजा का माप है। अ और ब इष्ट बीज हैं ।
(१२२½) यह नियम इस सिद्धान्त पर आधारित है कि समकोण त्रिभुज की भुजाएं कर्ण की अनुपाती
होती हैं । यहाँ कर्ण के उसी मापके लिये भुजाओं के मानो के विभिन्न कुलक ( sets ) हो सकते हैं ।