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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

-७. ६१ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९५
वर्गेस्त्रयोदशानां त्रिसमचतुर्बाहुके पुनर्भूमिः ।
सप्त चतुरशतयुक्तं कर्णाबाधावलम्बगणितं किम् ॥ ५८ ॥
विषमचतुरश्रबाहू त्रयोदशाभ्यस्तपञ्चदशविंशतिकौ ।
पञ्चघनो वदनमधस्त्रिशतं कान्यत्र कर्णमुखफलानि ॥ ५९ ॥
इतः परं वृत्तक्षेत्राणां सूक्ष्म फलानयनसूत्राणि । तत्र समवृत्तक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलानयन
सूत्रम्—
वृत्तक्षेत्रव्यासो दशपदगुणितो भवेत्परिक्षेपः ।
व्यासचतुर्भागगुणः परिधिः फलमर्धमर्धे तत् ॥ ६० ॥
अत्रोद्देशकः
समवृत्तव्यासोऽष्टादश विष्कम्भश्च षष्टिरन्यस्य ।
द्वाविंशतिरपरस्य क्षेत्रस्य हि के च परिधिफले ॥ ६१ ॥
१३ × २० हैं। ऊपरी भुजा (५)³ है, और नीचे की भुजा ३०० है । विकर्ण से आरम्भ कर सबके
मान यहाँ क्या क्या हैं ? ॥ ५९ ॥
इसके पश्चात् वक्ररेखीय क्षेत्रों के सम्बन्ध में सूक्ष्म मानों को निकालने के लिये नियम दिये
जाते हैं । उनमें से समवृत्त के सम्बन्ध में सूक्ष्म मान निकालने के लिये नियम—
वृत्त का व्यास १० के वर्गमूल से गुणित होकर परिधि को उत्पन्न करता है । परिधि को एक
चौथाई व्यास से गुणित करने पर क्षेत्रफल प्राप्त होता है । अर्द्धवृत्त के सम्बन्ध में यह इसका आधा
होता है ॥ ६० ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी वृत्ताकार क्षेत्र के सम्बन्ध में वृत्त का व्यास १८ है; दूसरे के सम्बन्ध में ६० है; एक
और अन्य के सम्बन्ध में २२ है । परिधियां और क्षेत्रफल क्या-क्या हैं ? ॥ ६१ ॥ अर्द्धवृत्ताकार क्षेत्र
चक्रीय चतुर्भुजों के लिये ठीक हैं । लम्ब अथवा विकर्णों के मानों को पहिले से बिना जाने हुए चतुर्भुज
के क्षेत्रफल को निकालने के प्रयत्न के विषय में भास्कराचार्य परिचित थे । यह उनकी लीलावती ग्रन्थ
की निम्नलिखित गाथा से प्रकट होता है—
लम्बयोः कर्णयोर्वैकमनिर्दिश्यापरान् कथम् ।
पृच्छत्यनियतत्वेऽपि नियतं चापि तत्फलम् ॥
संपृच्छकः पिशाचो वा वक्ता वा नितरां ततः ।
यो न वेत्ति चतुर्बाहुक्षेत्रस्यानियतां स्थितिम् ॥
(६०) इस गाथानुसार π = परिधि/व्यास का मान √१० = ३·१६...है । इससे भी
सूक्ष्म मान प्राप्त करने के लिये नवीं शताब्दी की धवला टीका ग्रंथों में निम्नलिखित रीति दी है—
१६ (व्यास) + १६ / ११३ + ३ (व्यास) = परिधि । इस सूत्र के वाम पक्ष के प्रथम पद में से अंश
का + १६ हटा देने पर π का मान ३५५/११३ अथवा ३·१४१५९३ प्राप्त होता है, जिसे चीन में ४७६ ईस्वी
पश्चात् त्सु-शुंग-चिह द्वारा उपयोग में लाया गया है । वास्तव में यह सूत्र एक प्रदेश के व्यास के सम्बन्ध
में प्रयुक्त हुआ है । असंख्यात प्रदेशों वाले अंगुल आदि व्यास के माप की इकाइयों के लिये + १६ का
मान नगण्य हो जाता है, और चीनी मान प्राप्त हो जाता है । आर्यभट द्वारा दिया गया π का मान
६२८३२/२०००० = ३·१४११६ है । भास्कराचार्य द्वारा भी यह मान (३९२७/१२५०) रूप में हासित कर प्ररूपित
किया गया है ।

१९६ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ६२-
द्वादशविष्कम्भस्य क्षेत्रस्य हि चार्धवृत्तस्य ।
षट्त्रिंशद्व्यासस्य कः परिधिः किं फलं भवति ॥ ६२ ॥
आयतवृत्तक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
व्यासकृतिःषड्गुणिता द्विसंगुणायामकृतियुता ( पदं ) परिधिः ।
व्यासचतुर्भागगुणश्चायतवृत्तस्य सूक्ष्मफलम् ॥ ६३ ॥
अत्रोद्देशकः
आयतवृत्तायामः षट्त्रिंशद्द्वादशस्य विष्कम्भः ।
कः परिधिः किं गणितं सूक्ष्मं विगणय्य मे कथय ॥ ६४ ॥
शङ्खाकारक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
वदनार्धोनो व्यासो दशपदगुणितो भवेत्परिक्षेपः ।
मुखदलरहितव्यासार्धवर्गमुखचरणकृतियोगः ॥ ६५ ॥
दशपदगुणितः क्षेत्रे कम्बुनिभे सूक्ष्मफलमेतत् ॥ ६५½ ॥
का व्यास १२ है । दूसरे क्षेत्र का व्यास ३६ है । बतलाओ कि परिधि क्या है और क्षेत्रफल
क्या है ? ॥ ६२ ॥
आयतवृत्त ( इलिप्स ) सम्बन्धी सूक्ष्म मानों को निकालने के लिये नियम—
छोटे व्यास का वर्ग ६ द्वारा गुणित किया जाता है, और बड़े व्यास की लम्बाई की दुगुनी राशि
के वर्ग को उसमें जोड़ा जाता है। इस योग का वर्गमूल परिधि का माप होता है। जब इस परिधि
के माप को छोटे व्यास की एक चौथाई राशि द्वारा गुणित करते हैं, तब उनेन्द्र का सूक्ष्म क्षेत्रफल
प्राप्त होता है ॥ ६३ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इलिप्स के सम्बन्ध में बड़े व्यास की लम्बाई ३६ और छोटे व्यास की १२ है, गणना के पश्चात्
बतलाओ कि परिधि क्या है और सूक्ष्म क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ६४ ॥
शंख के आकार की आकृति के सम्बन्ध में सूक्ष्म मानों को निकालने के लिये नियम—
आकृति की सबसे बड़ी चौड़ाई ( छोटे व्यास ) को मुख की चौड़ाई की अर्द्धराशि द्वारा हासित
कर, और तब १० के वर्गमूल द्वारा गुणित करने पर परिमाप ( perimeter ) उत्पन्न होता है ।
आकृति की महत्तम चौड़ाई की अर्द्धराशि के वर्ग को मुख की आधी चौड़ाई द्वारा हासित करने से प्राप्त
राशि में मुख की चौड़ाई की एक चौथाई राशि के वर्ग को जोड़ते हैं । परिणामी योग को १० के
वर्गमूल द्वारा गुणित करते हैं । प्राप्त राशि शंख आकृति का सूक्ष्म क्षेत्रफल होता है ॥ ६५½ ॥
( ६३ ) यदि बड़ा व्यास 'अ' और छोटा व्यास 'ब' हो, तो इस नियमानुसार परिधि
√ ६ब² + ४अ² होती है, और क्षेत्रफल : ¼ ब × √ ६ब² + ४अ² होता है । इस गाथा में
( हस्तलिपि में ) परिधि प्राप्त करने के लिये प्राप्त राशि के वर्गमूल निकालने का कथन भूल से छूट
गया है । यहाँ दिया गया क्षेत्रफल का सूत्र केवल एक अनुमान है, और वह वृत्त के क्षेत्रफल की
साम्यता पर आधारित है, जो π × व × व/४ द्वारा प्ररूपित होता है : जहाँ व व्यास है और ( π व )
परिधि है ।
( ६५½ ) बीजीय रूप से, परिधि = ( अ - ½ म ) × √ १० ; तथा,

-७. ५३ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९३
सूक्ष्मगणितानयनसूत्रम्—
भुजयुत्यर्धचतुष्काद्भुजहीनाद्घातितातपदं सूक्ष्मम् ।
अथवा मुखतलयुतिदलमवलम्बगुणं न विषमचतुरश्रे ॥ ५० ॥
अत्रोद्देशकः
त्रिभुजक्षेत्रस्याष्टौ दण्डा भूर्बाहुकौ समस्य त्वम् ।
सूक्ष्मं वद गणितं मे गणितविद्वल्लम्बकाबाधे ॥ ५१ ॥
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रे त्रयोदश स्युर्भुजद्वये दण्डाः ।
दश भूरस्याबाधे अथावलम्बं च सूक्ष्मफलम् ॥ ५२ ॥
विषमत्रिभुजस्य भुजा त्रयोदश प्रतिभुजा तु पञ्चदश ।
भूमिश्चतुर्दशास्य हि किं गणितं चावलम्बकाबाधे ॥ ५३ ॥
त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्रों के क्षेत्रफलों के सूक्ष्म माप निकालने के लिये नियम —
क्रमशः प्रत्येक भुजा द्वारा हासित भुजाओं के योग की अर्द्धराशि द्वारा निरूपित प्राप्त चार
राशियाँ एक साथ गुणित की जाती हैं। इस प्रकार प्राप्त गुणनफल का वर्गमूल क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप
होता है। अथवा क्षेत्रफल का माप, ऊपरी सिरे से आधार पर गिराये गये लम्ब को आधार और ऊपरी
भुजा के योग की अर्द्धराशि से गुणित करने पर प्राप्त होता है। पर यह बाद का नियम विषम चतुर्भुज
के सम्बन्ध में नहीं है ॥ ५० ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
समत्रिभुज की प्रत्येक भुजा ८ दंड है। हे गणितज्ञ, उसके क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप तथा
शीर्ष से आधार पर गिराये हुए लम्ब और इस तरह प्राप्त आधार के खंडों के सूक्ष्म मानों को
बतलाओ ॥ ५१ ॥ किसी समद्विबाहु त्रिभुज की बराबर भुजाओं में से प्रत्येक १३ दंड है और
आधार का माप १० है । क्षेत्रफल, लम्ब और आधार की आबाधाओं के सूक्ष्म मापों को निकालो
॥ ५२ ॥ विषम त्रिभुज की एक भुजा १३, सम्मुख भुजा १५ और आधार १४ है। इस क्षेत्र का
क्षेत्रफल, लम्ब और आधार की आबाधाओं के सूक्ष्म मान क्या हैं ? ॥ ५३ ॥
स₁ = ( स + (अ² - ब²) / स ) × १/२ ;
स₂ = ( स - (अ² - ब²) / स ) × १/२ ;
और ल = √(अ² - स₁²) अथवा √(ब² - स₂²) होता है । यहाँ अ, ब, स त्रिभुज की भुजाओं
का निरूपण करते हैं; स₁, स₂ ऐसे आधार के दो खंड हैं, जिनकी कुल लम्बाई स है, ल लम्ब है ।
( ५० ) बीजीय रूप से निरूपित करने पर,
किसी त्रिभुज का क्षेत्रफल = √ य ( य - अ ) ( य - ब ) ( य - स ) , जहाँ य भुजाओं के योग
की आधी राशि है । अ, ब, स भुजाओं के माप हैं ।
अथवा, क्षेत्रफल = (स / २) × ल , जहाँ ल शीर्ष से आधार पर गिराये गये लम्ब का मान है ।
ग० सा० सं०-२५

१९४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ५४-
• इतः परं पञ्चप्रकाराणां चतुरश्रक्षेत्राणां कर्णानयनसूत्रम्—
क्षितिहतविपरीतभुजौ मुखगुणभुजमिश्रितौ गुणच्छेदौ ।
छेदगुणौ प्रतिभुजयोः संवर्गयुतेः पदं कर्णौ ॥ ५४ ॥
अत्रोद्देशकः
समचतुरश्रस्य त्वं समन्ततः पञ्चबाहुकस्याशु ।
कर्णं च सूक्ष्मफलमपि कथय सखे गणिततत्त्वज्ञ ॥ ५५ ॥
आयतचतुरश्रस्य द्वादश बाहुश्च कोटिरपि पञ्च ।
कर्णः कः सूक्ष्मं किं गणितं चाचक्ष्व मे शीघ्रम् ॥ ५६ ॥
द्विसमचतुरश्रभूमिः षट्त्रिंशद्बाहुरेकषष्टिश्च ।
सोऽन्यश्चतुर्दशास्यं कर्णः कः सूक्ष्मगणितं किम् ॥ ५७ ॥
इसके पश्चात् पाँच प्रकार के चतुर्भुजों के विकर्णों के मान निकालने के लिये नियम—
आधार को बड़ी और छोटी, दाहिनी और बाईं भुजाओं के द्वारा गुणित करने से प्राप्त राशियों
को क्रमशः ऐसी दो अन्य राशियों में जोड़ते हैं, जो ऊपरी भुजा को दाहिनी और बाईं ओर की छोटी
और बड़ी भुजाओं द्वारा गुणित करने से प्राप्त होती हैं। परिणामी दो योग, गुणक और भाजक तथा
सम्मुख भुजाओं के गुणनफलों के योग सम्बन्धी भाजक और गुणन की संरचना करते हैं। इस प्रकार
प्राप्त राशियों के वर्गमूल विकर्णों के इष्ट माप होते हैं ॥ ५४ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जिसकी चारों ओर की प्रत्येक भुजा का माप ५ है, ऐसे समभुज चतुर्भुज के सम्बन्ध में
हे गणित तत्त्वज्ञ, विकर्ण तथा क्षेत्रफल के सूक्ष्म मान शीघ्र बतलाओ ॥ ५५ ॥ आयत क्षेत्र के सम्बन्ध
में क्षितिज भुजा माप में १२ है, और लम्ब रूप भुजा माप में ५ है । मुझे शीघ्र बतलाओ कि विकर्ण का
और क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप क्या क्या है ? ॥ ५६ ॥ समद्विबाहु चतुर्भुज ( समलम्ब चक्रीय चतुर्भुज )
की आधार भुजा ३६ है । एक भुजा ६१ है, और दूसरी भी उतनी ही है । ऊपरी भुजा १४ है ।
बतलाओ कि विकर्ण और क्षेत्रफल के सूक्ष्म माप क्या हैं ? ॥ ५७ ॥ समत्रिबाहु चतुर्भुज ( चक्रीय
समत्रिबाहु चतुर्भुज ) के सम्बन्ध में १३ का वर्ग समान भुजाओं में से एक का माप होता है । आधार
४०७ है । विकर्ण का माप तथा आधार के खण्डों का माप और लम्ब तथा क्षेत्रफल के माप
क्या क्या हैं ? ॥ ५८ ॥ किसी विषम चतुर्भुज की दाहिनी और बाईं भुजाएँ १३ × १५ और
चतुर्भुज क्षेत्र का क्षेत्रफल = √ ( य - अ ) ( य - ब ) ( य - स ) ( य - द ) ; यहाँ य, भुजाओं के योग
की अर्द्धराशि है, और अ, ब, स, द चतुर्भुज क्षेत्र की भुजाओं के माप हैं । अथवा, क्षेत्रफल = (ब + द)/२ × ल
( उस दशा के अपवाद को छोड़कर जबकि चतुर्भुज विषम होता है, जहाँ ल ऊपरी भुजा के अंतों से
आधार पर गिराये गये बराबर लम्बों में से किसी एक का माप है । त्रिभुज क्षेत्रों के लिये दिये गये ये
सूत्र ठीक हैं, परन्तु जो चतुर्भुज क्षेत्रों के लिये दिये गये हैं वे केवल चक्रीय चतुर्भुजों के सम्बन्ध में ठीक
हैं, क्योंकि उन्हीं मापों के लिये क्षेत्रफल तथा लम्ब का मान परिवर्तनशील हो सकता है ।
• ( ५४ ) बीजीय रूप से निरूपित चतुर्भुज क्षेत्र के विकर्ण का माप यह है—
√{ ( अस + बद ) ( अब + सद ) / ( अद + बस ) } अथवा √{ ( अस + बद ) ( अद + बस ) / ( अब + सद ) }, ये सूत्र केवल

-७. ६९½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९७
अत्रोद्देशकः
व्यासोऽष्टादश दण्डा मुखविस्तारोऽयमपि च चत्वारः ।
कः परिधिः किं गणितं सूक्ष्मं तत्कम्बुकावृत्ते ॥ ६६½ ॥
बहिश्चक्रवालवृत्तक्षेत्रस्य चान्तश्चक्रवालवृत्तक्षेत्रस्य च सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
निर्गमसहितो व्यासो दशपदनिर्गमगुणो बहिर्गणितम् ।
रहितोऽधिगमनासावभ्यन्तरचक्रवालवृत्तस्य ॥ ६७½ ॥
अत्रोद्देशकः
व्यासोऽष्टादश दण्डाः पुनर्बहिर्निर्गतास्त्रयो दण्डाः ।
सूक्ष्मगणितं वद त्वं बहिरन्तश्चक्रवालवृत्तस्य ॥ ६८½ ॥
व्यासोऽष्टादश दण्डा अन्तः पुनरधिगताश्च चत्वारः ।
सूक्ष्मगणितं वद त्वं चाभ्यन्तरचक्रवालवृत्तस्य ॥ ६९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंख आकृति के वक्ररेखीय क्षेत्र के संबंध में महत्तम चौड़ाई १८ दंड है, और मुख की चौड़ाई ४
दंड है । इसकी परिमिति और सूक्ष्म क्षेत्रफल के माप क्या हैं ? ॥६६½॥
बाहर स्थित और भीतर स्थित ( बहिश्चक्रवाल और अंतश्चक्रवाल ) कंकण के संबंध में सूक्ष्म
मापों को निकालने के लिये नियम —
भीतरी व्यास में चक्रवाल वृत्त की चौड़ाई जोड़कर, प्राप्त राशि को १० के वर्गमूल तथा चक्र-
वाल वृत्त की चौड़ाई द्वारा गुणित करते हैं । इससे बहिश्चक्रवाल वृत्त का क्षेत्रफल प्राप्त होता है ।
बाहरी व्यास को चक्रवाल वृत्त की चौड़ाई द्वारा हासित करते हैं । प्राप्त राशि को १० के वर्गमूल
तथा चक्रवाल वृत्त की चौड़ाई द्वारा गुणित करने से अंतश्चक्रवाल वृत्त का क्षेत्रफल प्राप्त होता है ॥६७½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
चक्रवाल वृत्त का भीतरी अथवा बाहरी व्यास का माप १८ दंड है । चक्रवाल वृत्त की चौड़ाई
३ दंड है । बहिश्चक्रवाल वृत्त तथा अंतश्चक्रवाल वृत्त का सूक्ष्म माप बतलाओ ॥ ६८½ ॥ बाहरी
व्यास १८ दंड है । अंतश्चक्रवाल वृत्त की चौड़ाई ४ दंड है । अंतश्चक्रवाल वृत्त का सूक्ष्म क्षेत्रफल
निकालो ॥ ६९½ ॥
क्षेत्रफल = [{(अ - ३/२ म) × ½}² + (म/४)² ] × √१० ; जहाँ अ महत्तम चौड़ाई
का माप है और म शंख के मुख की चौड़ाई है । गाथा २३ के नोट के अनुसार यहाँ भी इस आकृति
को दो असमान अर्द्धवृत्तों द्वारा संरचित किया गया है ।

sits above or next to 'प्र'?
Wait, it's धनुर्गुणेष्प्रसाधने. Let's transcribe faithfully what is printed:
Wait, look at it: धनुर्गुणेष्प्रसाधने.

Let's check line 14:
"यवाकार क्षेत्र तथा धनुषाकार क्षेत्र के सम्बन्ध में सूक्ष्म मानों को निकालने के लिये नियम—"
Wait, in line 14: "धनुषाकार" - yes, printed as "धनुषाकार".
Line 15: "धनुष की डोरी को बाण की एक चौथाई राशि द्वारा गुणित करते हैं । प्राप्त फल को १० के"
Line 16: "वर्गमूल द्वारा गुणित करने पर धनुषाकार तथा यवाकार क्षेत्र के सम्बन्ध में क्षेत्रफल का सूक्ष्म रूप से"
Line 17: "ठीक मान प्राप्त होता है ॥ ७०½ ॥"
Line 18: "उदाहरणार्थ प्रश्न"
Line 19: "यवधान्य को बीच से फाड़ने से प्राप्त क्षेत्र की आकृति की महत्तम लम्बाई १२ दंड है; दो सिरे"
Line 20: "सुई-बिन्दु हैं, और बीच में चौड़ाई ४ दंड है। क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ७१½ ॥ धनुषाकार रूपरेखा"
Line 21: "वाली आकृति के संबंध में डोरी २४ है तथा बाण ४ है । क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप क्या है ? ॥ ७२½ ॥"
Line 22: "धनुष के वक्र का

-७. ७५½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९९
विपरीतक्रियायां सूत्रम्—
गुणचापकृतिविशेषात्तर्कहृतात्पदम्विषुः समुद्दिष्टः ।
शरवर्गात् षङ्गुणितादूनं¹ धनुषः कृतेः पदं जीवा ॥ ७४½ ॥
अत्रोद्देशकः
धनुराकारक्षेत्रे ज्या द्वादश षट् शरः काष्ठम् ।
न ज्ञायते सखे त्वं का जीवा कः शरस्तस्य ॥ ७५½ ॥
────────────────────────────────────────────────────────
१. B और M दोनों में उपर्युक्त पाठ है; पर इष्ट अर्थ “षङ्गुणितादूनाया धनुष्कृतेः पदं जीवा” से
निकलता है ।
────────────────────────────────────────────────────────
विपरीत क्रिया के सम्बन्ध में नियम—
डोरी के वर्ग और धनुष के वक्रकाष्ठ के वर्ग के अन्तर की ⅙ भाग राशि का वर्गमूल बाण का
माप होता है । धनुषकाष्ठ के वर्ग में से बाण के वर्ग की ६ गुनी राशि को घटाने से प्राप्त शेष का
वर्गमूल डोरी का माप होता है ॥ ७४½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
धनुषाकार आकृति की डोरी १२ है, और बाण ६ है । झुकी हुई काष्ठ का माप अज्ञात है । हे
मित्र, उसे निकालो । इसी आकृति के संबंध में डोरी और उसके बाण के माप को अलग-अलग किस
तरह निकालोगे, जब कि आवश्यक राशियाँ ज्ञात हों ? ॥ ७५½ ॥
────────────────────────────────────────────────────────
( ७३½-७४½ ) बीजीय रूप से, चाप = √( ६ ल² + क² ); लम्ब = √( (च² - क²) / ६ )
और चापकर्ण = √( च² - ६ ल² )
चापकर्ण और बाण के पदों में चाप का मान समीकरण के रूप में देने के लिये अर्द्धवृत्त बनानेवाले
चाप को आधार मानना पड़ता है । प्राप्त सूत्र को किसी भी अवधा ( वृत्त खंड ) के चाप का मान
निकालने के उपयोग में लाते हैं । अर्द्धवृत्तीय चाप = त्र × √ १० = √ १० त्र² = √ ६ त्र² + ४ त्र²
होता है, जहाँ त्र त्रिज्या अथवा अर्द्धव्यास है । इसी सिद्धान्त पर आधारित यह सूत्र किसी भी चाप के
लिये है । यहाँ ल = बाण ( चाप तथा चापकर्ण के बीच की महत्तम दूरी ), और क = जीवा ( चापकर्ण )
है । जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति ( २/२४, ६/१० ) में धनुषपृष्ठ का सूत्र महावीर के सूत्र समान है,
धनुषपृष्ठ = √ { ६ ( बाण² ) + { ( व्यास - बाण ) ४ बाण } } = √ { ६ ( बाण )² + ( जीवा )² }
त्रिलोक प्रज्ञप्ति ( ४/१८१ ) में सूत्र इस रूप में है,
धनुष = √ { २ { ( व्यास + बाण )² - ( व्यास )² } }
बाण निकालने के लिये जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति ( ६/११ ) तथा त्रिलोक प्रज्ञप्ति ( ४/१८२ ) में अवतरित
सूत्र दृष्टव्य हैं ।

२०० ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ७६½-
अत्रोद्देशकः
मृदङ्गनिभक्षेत्रस्य च पणवाकारक्षेत्रस्य च वज्राकार क्षेत्रस्य च सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
मुखगुणितायामफलं स्वधनुःफलसंयुतं मृदङ्गनिभे ।
तत्पणववज्रनिभयोर्धनुःफलोनं तयोरुभयोः ॥ ७६½ ॥
अत्रोद्देशकः
चतुर्विंशतिरायामो विस्तारोऽष्टौ मुखद्वये ।
क्षेत्रे मृदङ्गसंस्थाने मध्ये षोडश किं फलम् ॥ ७७½ ॥
चतुर्विंशतिरायामस्तथाष्टौ मुखयोर्द्वयोः ।
चत्वारो मध्यविष्कम्भः किं फलं पणवाकृतौ ॥ ७८½ ॥
चतुर्विंशतिरायामस्तथाष्टौ मुखयोर्द्वयोः ।
मध्ये सूचिस्तथाचक्ष्व वज्राकारस्य किं फलम् ॥ ७९½ ॥
नेमिक्षेत्रस्य च बालेन्द्राकार क्षेत्रस्य च इभदन्ताकारक्षेत्रस्य च सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
पृष्ठोदरसंक्षेपः षड्भक्तो व्यासरूपसंगुणितः ।
दशमूलगुणो नेमेर्बालेन्दिभदन्तयोश्च तस्यार्धम् ॥ ८०½ ॥
मृदंगाकार, पणवाकार और वज्राकार आकृतियों के संबंध में सूक्ष्म फलों को प्राप्त करने के
लिये नियम—
जो महत्तम लम्बाई को मुख की चौड़ाई द्वारा गुणित करने पर प्राप्त होता है ऐसे परिणामी
क्षेत्रफल में संबंधित धनुषाकृतियों के क्षेत्रफलों के मान को जोड़ते हैं। यह परिणामी योग मृदंग के
आकार की आकृति के क्षेत्रफल का माप होता है । पणव और वज्र की आकृति के क्षेत्रफल प्राप्त करने
के लिये महत्तम लम्बाई और मुख की चौड़ाई के गुणनफल से प्राप्त क्षेत्रफल को धनुषाकृति संबंधी
क्षेत्रफलों के माप द्वारा हासित करते हैं । शेषफल इष्ट क्षेत्रफल होता है ॥ ७६½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
मृदंगाकार आकृति के संबंध में महत्तम लम्बाई २४ है । दो मुखों में से प्रत्येक के मुख की
चौड़ाई ८ है । बीच में महत्तम चौड़ाई १६ है । क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ७७½ ॥ पणवाकृति के संबंध
में महत्तम लम्बाई २४ है । इसी प्रकार प्रत्येक मुख की चौड़ाई ८ और केन्द्रीय चौड़ाई ४ है ।
क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ७८½ ॥ वज्र के आकार की आकृति के संबंध में महत्तम लम्बाई २४ है । दो
मुखों में से प्रत्येक की चौड़ाई ८ है । केन्द्र केवल एक बिन्दु है । क्षेत्रफल निकालो ॥ ७९½ ॥
नेमिक्षेत्र और बालेन्दु समान क्षेत्र (हाथी की खीस के अन्वायाम छेदाकृति) के सूक्ष्म क्षेत्र-
फलों को निकालने के लिये नियम—
नेमिक्षेत्र के संबंध में भीतरी और बाहरी वक्रों के मापों के योग को ६ द्वारा भाजित करते हैं ।
इसे कंकण की चौड़ाई से गुणित कर फिर से १० के वर्गमूल द्वारा गुणित करते हैं । परिणामी फल
इष्ट क्षेत्रफल होता है । इसका आधा बालेन्दु का क्षेत्रफल अथवा हाथी की खीस की अन्वायाम छेदाकृति
(इभदन्ताकार क्षेत्र) का क्षेत्रफल प्राप्त होता है ॥ ८०½ ॥
(७६½) इस नियम का मूल आधार ३२ वीं गाथा में नोट में दिये गये चित्रों से स्पष्ट हो जावेगा ।
(८०½) नेमिक्षेत्र के लिये दिया गया नियम यदि बीजीय रूप से प्ररूपित किया जाय, तो वह इस
रूप में आता है— (प₁ + प₂) / ६ ✕ ल ✕ √१० , जहाँ प₁, प₂ दो परिधियों के माप हैं, और ल नेमिक्षेत्र

-७. ८३½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २०१
अत्रोद्देशकः
पृष्ठं चतुर्दशोदरमष्टौ नेम्याकृतौ भूमौ ।
मध्ये चत्वारि च तद्बालेन्दोः किमिभदन्तस्य ॥ ८१½ ॥
चतुर्मण्डलमध्यस्थितक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
विष्कम्भवर्गराशेर्वृत्तस्यैकस्य सूक्ष्मफलम् ।
त्यक्त्वा समवृत्तानामन्तरजफलं चतुर्णां स्यात् ॥ ८२½ ॥
अत्रोद्देशकः
गोलकचतुष्टयस्य हि परस्परस्पर्शकस्य मध्यस्य ।
सूक्ष्मं गणितं किं स्याच्चतुष्कविष्कम्भयुक्तस्य ॥ ८३½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
नेमिक्षेत्र के संबंध में बाहरी वक्र १४ है और भीतरी ८ है । बीच में चौड़ाई ४ है । क्षेत्रफल
क्या है ? बालेन्दु क्षेत्र तथा इभदन्ताकार क्षेत्र की आकृतियों का क्षेत्रफल भी क्या होगा ? ॥ ८१½ ॥
चार, एक दूसरे को स्पर्श करने वाले, वृत्तों के बीच के क्षेत्र ( चतुर्मण्डल मध्यस्थित क्षेत्र )
के सूक्ष्म क्षेत्रफल को निकालने के लिये नियम—
किसी भी एक वृत्त के क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप यदि उस वृत्त के व्यास को वर्गित करने से प्राप्त
राशि में से घटाया जाय, तो पूर्वोक्त क्षेत्र का क्षेत्रफल प्राप्त होता है ॥ ८२½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
चार एक दूसरे को स्पर्श करने वाले वृत्तों के बीच का क्षेत्रफल निकालो (जब कि प्रत्येक वृत्त
का व्यास ४ है ) ॥ ८३½ ॥
( कंकण ) की चौड़ाई है । इस नेमिक्षेत्र के क्षेत्रफल की तुलना गाथा ७ में दिये गये नोट में वर्णित
अनुमानिक मान से की जाय, तो स्पष्ट होगा कि यह सूत्र शुद्ध मान नहीं देता । गाथा ७ में दिया गया
मान शुद्ध मान है । यह गलती, एक गलत विचार से उदित हुई मालूम होती है । इस क्षेत्रफल के
मान को निकालने के लिये, π का उपयोग प₁ और प₂ के मानों में अपेक्षाकृत उलटा किया गया है ।
इसके सम्बन्ध में जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति ( १०/९१ ) और त्रिलोक प्रज्ञप्ति ( ४/२५२१-२५२२ ) में दिये गये
सूत्र दृष्टव्य हैं ।
(८२½) निम्नलिखित आकृति से इस नियम का मूल | ( ८४½ ) इसी प्रकार, यह आकृति भी नियम के
कारण स्पष्ट हो जावेगा । | कारण को शीघ्र ही स्पष्ट करती है ।
[चित्र: परस्पर स्पर्शी चार वृत्त और अन्तःस्थित वर्ग] वर्ग | [चित्र: परस्पर स्पर्शी तीन वृत्त और अन्तःस्थित समत्रिभुज] समत्रिभुज
ग० सा० सं०-२६

२०२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ८४½-
वृत्तक्षेत्रत्रयस्यान्योऽन्यस्पर्शनाज्जातस्यान्तरस्थितक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
विष्कम्भमानसमकत्रिभुजक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलम् ।
वृत्तफलार्धविहीनं फलमन्तरजं त्रयाणां स्यात् ॥ ८४½ ॥
अत्रोद्देशकः
विष्कम्भचतुष्काणां वृत्तक्षेत्रत्रयाणां च । अन्योऽन्यस्पृष्टाना मन्तरजक्षेत्रगणितं किम् ॥ ८५½ ॥
षडश्रक्षेत्रस्य कर्णावलम्बकसूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
भुजभुजकृतिकृतिवर्गौ द्वित्रित्रिगुणा यथाक्रमेणैव ।
श्रुत्यवलम्बककृतिधनकृतयश्च षडश्रके क्षेत्रे ॥ ८६½ ॥
अत्रोद्देशकः
भुजषट्कक्षेत्रे द्वौ द्वौ दण्डौ प्रतिभुजं स्याताम् ।
अस्मिन् श्रुत्यवलम्बकसूक्ष्मफलानां च वर्गाः के ॥ ८७½ ॥
तीन समान परस्पर एक दूसरे को स्पर्श करनेवाले वृत्तीय क्षेत्रों के बीच के क्षेत्र का सूक्ष्म रूप
से शुद्ध क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
जिसकी प्रत्येक भुजा व्यास के बराबर होती है ऐसे सम त्रिभुज का सूक्ष्म क्षेत्रफल इन तीन
में से किसी भी एक के क्षेत्रफल की अर्द्धराशि द्वारा हासित किया जाता है । शेष ही इष्ट क्षेत्रफल
होता है ॥८४½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
परस्पर एक दूसरे को स्पर्श करने वाले तथा माप में ४० व्यास वाले तीन वृत्तों की परिधियों
से घिरे हुए क्षेत्र का सूक्ष्म क्षेत्रफल क्या है ? ॥८५½॥
नियमित षड्भुज क्षेत्र के संबंध में कर्ण, अवलम्ब ( लम्ब ) और क्षेत्रफल के सूक्ष्म रूप से शुद्ध
मानों को निकालने के नियम—
षट्भुज क्षेत्र के संबंध में भुजा के माप को, इस भुजा के वर्ग को तथा इसी भुजा के वर्ग के वर्ग
को क्रमशः २, ३ और ३ द्वारा गुणित करने पर उसी क्रम में कर्ण, लम्ब का वर्ग और क्षेत्रफल के माप
का वर्ग प्राप्त होता है ॥८६½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
नियमित षट्भुजाकार आकृति के संबंध में प्रत्येक भुजा २ दण्ड है । इस आकृति के कर्ण का
वर्ग, लम्ब का वर्ग और सूक्ष्म क्षेत्रफल के माप का वर्ग बतलाओ ॥८७½॥
(८६½) यह नियम नियमित षट्भुज आकृति के लिये लिखा गया ज्ञात होता है । यह सूत्र षट्भुज के
क्षेत्रफल का मान √ ३अ⁴ देता है, जहाँ किसी भी एक भुजा की लम्बाई अ है । तथापि शुद्ध
सूत्र यह है-- अ² × (३√३)/२

७. ८९½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २०३
वर्गस्वरूपकरणिराशीनां युतिसंख्यानयनस्य च तेषां वर्गस्वरूपकरणिराशीनां यथाक्रमेण
परस्परवियुतिवतः शेषसंख्यानयनस्य च सूत्रम्—
केनाप्यपवर्तितफलपदयोगवियोगकृतिहताच्छेदात्।
मूलं पदयुतिवियुती राशीनां विद्धि करणिगणितमिदम् ॥ ८८½ ॥
अत्रोद्देशकः
षोडशषट्त्रिंशच्छतकरणीनां वर्गमूलपिण्डं मे। अथ चैतत्पदशेषं कथय सखे गणिततत्त्वज्ञ ॥८९½॥
इति सूक्ष्मगणितं समाप्तम्।
———❖———
कुछ वर्गमूल राशियों के योग के संख्यात्मक मान तथा एक दूसरे में से स्वाभाविक क्रम में
कुछ वर्गमूल राशियों को घटाने के पश्चात् शेषफल निकालने के लिये नियम—
समस्त वर्गमूल राशियाँ एक ऐसे साधारण गुणनखंड द्वारा भाजित की जाती हैं, जो ऐसे
भजनफलों को उत्पन्न करता है जो वर्गराशियाँ होती हैं। इस प्रकार प्राप्त वर्गराशियों के वर्गमूलों को
जोड़ा जाता है, अथवा उन्हें स्वाभाविक क्रम में एक को दूसरे में से घटाया जाता है। इस प्रकार
प्राप्त योग और शेषफल दोनों को वर्गित किया जाता है, और तब अलग अलग (पहिले उपयोग में
लाए हुए) भाजक गुणनखंड द्वारा गुणित किया जाता है। इन परिणामी गुणनफलों के वर्गमूल, प्रश्न में
दी गई राशियों के योग और अंतिम अंतर को उत्पन्न करते हैं। समस्त प्रकार की वर्गमूल राशियों के
गणित के संबंध में यह नियम जानना चाहिये ॥८८½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणिततत्त्वज्ञ सखे, मुझे १६, ३६ और १०० राशियों के वर्गमूलों के योग को बतलाओ,
और तब इन्हीं राशियों के वर्गमूलों के संबंध में अंतिम शेष भी बतलाओ। इस प्रकार, क्षेत्र गणित
व्यवहार में सूक्ष्म गणित नामक प्रकरण समाप्त हुआ ॥८९½॥
———❖———
(८८½) यहाँ आया हुआ "करणी" शब्द कोई भी ऐसी राशि दर्शाता है जिसका वर्गमूल
निकालना होता है, और जैसी दशा हो उसके अनुसार वह मूल परिमेय (rational, धनराशि जो
करणीरहित हो) अथवा अपरिमेय होता है। गाथा ८९½ में दिये गये प्रश्न को निम्न प्रकार से हल
करने पर यह नियम स्पष्ट हो जावेगा—
√ १६ + √ ३६ + √ १०० और (√ १००) – (√ ३६ – √ १६) के मान निकालना हैं।
इन्हें √ ४ (√ ४ + √ ९ + √ २५); √ ४ {√ २५ – (√ ९ – √ ४)} द्वारा प्ररूपित
किया जा सकता है।
साधित करने पर,
पूर्व राशि = √ ४ (२ + ३ + ५) ; अपर राशि = √ ४ {५ – (३ – २)}
= √ ४ (१०) ,, = √ ४ (४)
= √ ४ × √ १०० ,, = √ ४ × √ १६
= √ ४०० ,, = √ ६४
= २० ,, = ८

२०४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ९०½-
जन्यव्यवहारः
इतः परं क्षेत्रगणिते जन्यव्यवहारमुदाहरिष्यामः । इष्टसंख्याबीजाभ्यामायतचतुरश्रक्षेत्रा-
नयनसूत्रम्—
वर्गविशेषः कोटिः संवर्गो द्विगुणितो भवेद्बाहुः । वर्गसमासः कर्णश्चायतचतुरश्रजन्यस्य ॥ ९०½ ॥
अत्रोद्देशकः
एकद्विके तु बीजे क्षेत्रे जन्ये तु संस्थाप्य । कथय विगणय्य शीघ्रं कोटिभुजाकर्णमानानि ॥९१½॥
बीजे द्वे त्रीणि सखे क्षेत्रे जन्ये तु संस्थाप्य । कथय विगणय्य शीघ्रं कोटिभुजाकर्णमानानि ॥९२½॥
पुनरपि बीजसंज्ञाभ्यामायतचतुरश्रक्षेत्रफलनायाः सूत्रम्—
बीजयुतिवियुतिघातः कोटिस्तद्वर्गयोरथ संक्रमणे ।
बाहुश्रुती भवेतां जन्यविधौ करणमेतदपि ॥ ९३½ ॥
जन्य व्यवहार
इसके पश्चात् हम क्षेत्रफल माप सम्बन्धी गणित में जन्य क्रिया का वर्णन करेंगे । मन से चुनी
हुई संख्याओं को बीजों के समान लेकर उनकी सहायता से आयत क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये नियम—
मन से प्राप्त आयत क्षेत्र के संबंध में बीज संख्याओं के वर्गों का अंतर लंब भुजा की संरचना
करता है । बीज संख्याओं का गुणनफल २ द्वारा गुणित होकर दूसरी भुजा हो जाता है, और बीज
संख्याओं के वर्गों का योग कर्ण बन जाता है ॥९०½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ज्यामितीय आकृति के संबंध में (जिसे मन के अनुसार प्राप्त करना है) १ और २ लिखे जानेवाले
बीज हैं । गणना के पश्चात् मुझे लम्ब भुजा, दूसरी भुजा और कर्ण के मापों को शीघ्र बतलाओ ॥९१½॥
हे मित्र, २ और ३ को, मन के अनुसार किसी आकृति को प्राप्त करने के संबंध में, बीज लेकर
गणना के पश्चात् लम्ब भुजा, अन्य भुजा और कर्ण शीघ्र बतलाओ ॥९२½॥
पुनः बीजों द्वारा निरूपित संख्याओं की सहायता से आयत चतुरश्र क्षेत्र की रचना करने के
लिये दूसरा नियम—
बीजों के योग और अंतर का गुणनफल लम्बमाप होता है । बीजों के योग और अंतर के वर्गों
का संक्रमण अन्य भुजा तथा कर्ण को उत्पन्न करता है । यह क्रिया जन्य क्षेत्र को (दिये हुए बीजों
से) प्राप्त करने के उपयोग में भी लाई जाती है ॥९३½॥
(९०½) "जन्य" का शाब्दिक अर्थ "में से उत्पन्न" अथवा "में से व्युत्पादित" होता है, इसलिये
वह ऐसे त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्रों के विषय में है जो दिये गये न्यास (दत्त दशाओं) से प्राप्त किये जा
सकते हैं । त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्रों की भुजाओं की लम्बाई निकालने को जन्य क्रिया कहते हैं ।
बीज, जैसा कि यहाँ वर्णित है, साधारणतः धनात्मक पूर्णांक होता है । त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्रों
को प्राप्त करने के लिये दो ऐसे बीज अपरिवर्तनीय ढंग से दिये गये होते हैं ।
इस नियम का मूल आधार निम्नलिखित बीजीय निरूपण से स्पष्ट हो जावेगा—
यदि "अ" और "ब" बीज संख्यायें हों, तो अ² - ब² लम्ब का माप होता है । २ अब दूसरी
भुजा का माप होता है और अ² + ब² कर्ण का माप होता है, जब कि चतुर्भुज क्षेत्र आयत हो । इससे
स्पष्ट है कि बीज ऐसी संख्याएँ होती हैं जिनके गुणनफल और वर्गों की सहायता से प्राप्त भुजाओं के
मापों द्वारा समकोण त्रिभुज की रचना की जा सकती है ।
(९३½) यहाँ दिये गये नियम में अ² - ब², २ अब और अ² + ब² को (अ + ब) (अ - ब),

-७. ९७ ½ ] मिश्रकव्यवहारः [ २०५
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकबीजाभ्यां जन्यक्षेत्रं सखे समुत्थाप्य।
कोटिभुजाश्रुतिसंख्याः कथय विचिन्त्याशु गणिततत्त्वज्ञ॥ ९४ ½ ॥
इष्टजन्यक्षेत्राद्बीजसंज्ञसंख्ययोरानयनसूत्रम्—
कोटिच्छेदावाप्त्योः संक्रमणे बाहुदलफलच्छेदौ।
बीजे श्रुतीष्टकृत्योर्योगवियोगार्धमूले ते॥ ९५ ½ ॥
अत्रोद्देशकः
कस्यापि क्षेत्रस्य च षोडश कोटिश्च बीजे के।
त्रिंशदथवान्यबाहुर्बीजे के ते श्रुतिश्चतुस्त्रिंशत्॥ ९६ ½ ॥
कोटिसंख्यां ज्ञात्वा भुजाकर्णसंख्यानयनस्य च भुजसंख्यां ज्ञात्वा कोटिकर्णसंख्यानयनस्य
च कर्णसंख्यां ज्ञात्वा कोटिभुजासंख्यानयनस्य च सूत्रम्—
कोटिकृतेश्छेदाप्त्योः संक्रमणे श्रुतिभुजौ भुजकृतेर्वा।
अथवा श्रुतीष्टकृत्योरन्तरपदमिष्टमपि च कोटिभुजे॥ ९७ ½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणिततत्त्वज्ञ मित्र, ३ और ५ को बीज लेकर उनकी सहायता से जन्य क्षेत्र की रचना करो,
और तब सोच विचार कर शीघ्र ही लम्ब भुजा, अन्य भुजा और कर्ण के मापों को बतलाओ॥९४ ½॥
बीजों से प्राप्त करने योग्य किसी दी गई आकृति संबंधी बीज संख्याओं को निकालने के लिये
नियम—
लम्ब भुजा के मन से चुने हुए यथार्थ भाजक और परिणामी भजनफल में संक्रमण क्रिया करने
से इष्ट बीज उत्पन्न होते हैं। अन्य भुजा की अर्द्धराशि के मन से चुने हुए यथार्थ भाजक और परिणामी
भजनफल भी इष्ट बीज होते हैं। वे बीज क्रमशः कर्ण और मन से चुनी हुई संख्या की वर्गित राशि के
योग की अर्द्धराशि के वर्गमूल तथा अंतर की अर्द्धराशि के वर्गमूल होते हैं॥९५ ½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी रैखिकीय आकृति के संबंध में लम्ब १६ है, बतलाओ बीज क्या-क्या हैं? अथवा यदि
अन्य भुजा ३० हो, तो बीजों को बतलाओ। यदि कर्ण ३४ हो, तो वे बीज कौनकौन हैं?॥९६ ½॥
अन्य भुजा और कर्ण के संख्यात्मक मानों को निकालने के लिये नियम, जब कि लम्ब भुजा
ज्ञात हो; लम्ब भुजा और कर्ण को निकालने के लिये नियम, जब कि अन्य भुजा ज्ञात हो; और लम्ब
भुजा तथा अन्य भुजा को निकालने के लिये नियम, जब कि कर्ण का संख्यात्मक माप ज्ञात हो—
लम्ब भुजा के वर्ग के मन से चुना हुए यथार्थ भाजक और परिणामी भजनफल के बीच
संक्रमण क्रिया करने पर क्रमशः कर्ण और अन्य भुजा उत्पन्न होती हैं। इसी प्रकार अन्य भुजा के वर्ग
के संबंध में वही संक्रमण क्रिया करने से लम्ब भुजा और कर्ण के माप उत्पन्न होते हैं। अथवा, कर्ण के
वर्ग और किसी मन से चुनी हुई संख्या के वर्ग के अंतर की वर्गमूल राशि तथा वह चुनी हुई संख्या
क्रमशः लम्ब भुजा और अन्य भुजा होती हैं॥९७ ½॥
{(अ + ब)² - (अ - ब)²} / २ और {(अ + ब)² + (अ - ब)²} / २ के द्वारा प्ररूपित किया गया है।
( ९५ ½ ) इस नियम में कथित क्रियाएं गाथा ९० ½ में कथित क्रियाओं से विपरीत हैं।
( ९७ ½ ) यह नियम निम्नलिखित सर्वसमिकाओं ( identities ) पर निर्भर है—

२०६ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ९८½-
अत्रोद्देशकः
कस्यापि कोटिरेकादश बाहुः षष्टिरन्यस्य । श्रुतिरेकषष्टिरन्यास्यानुक्तान्यत्र मे कथय ॥ ९८½ ॥
द्विसमचतुरश्रक्षेत्रस्यानयनप्रकारस्य सूत्रम्—
जन्यक्षेत्रभुजार्धहारफलजप्राग्जन्यकोट्योर्युति-
र्भूरास्यं वियुतिर्भुजा श्रुतिरथाल्पाल्पा हि कोटिर्भवेत् ।
आबाधा महती श्रुतिः श्रुतिरभूज्ज्येष्ठं फलं स्यात्फलं
बाहुः स्याद्वलम्बको द्विसमकक्षेत्रे चतुर्बाहुके ॥ ९९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी आकृति के संबंध में, लम्ब भुजा ११ है, दूसरी आकृति के संबंध में अन्य (दूसरी) भुजा
६० है, और तीसरी आकृति के संबंध में कर्ण ६१ है । इन तीन दशाओं में अज्ञात भुजाओं के मापों को
बतलाओ ॥ ९८½ ॥
दिये गये बीजों की सहायता से दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र को प्राप्त करने की रीति
के संबंध में नियम—
दिये गये बीजों की सहायता से प्राप्त प्रथम आयत की लम्ब भुजा को दूसरी आकृति (जिसे
मूलतः प्राप्त आकृति के आधार की अर्द्धराशि के मन से चुने हुए दो गुणनखंडों को बीज मानकर प्राप्त
किया गया है ऐसी आकृति) की लम्ब भुजा में जोड़नेपर दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र का
आधार उत्पन्न होता है । इन दो लम्बों के मापों के अन्तर से चतुर्भुज की ऊपरी भुजा उत्पन्न होती
है । पूर्व कथित दो प्राप्त आकृतियों का छोटा कर्ण दो बराबर भुजाओं में से किसी एक का माप होता है ।
उन दो प्राप्त आकृतियों के सम्बन्ध में दो लम्ब भुजाओं में से छोटी भुजा, आधार के उस छोटे खंड का
माप होती है जो ऊपरी भुजा के अंतों में से किसी एक से आधार पर लम्ब गिराने से बनता है। उन
दो प्राप्त आकृतियों के सम्बन्ध में बड़ा कर्ण इष्ट कर्ण का माप होता है । • उन दो प्राप्त आकृतियों में से
बड़े का क्षेत्रफल इष्ट आकृति का क्षेत्रफल होता है; और उन दो आकृतियों में से किसी एक का आधार,
ऊपरी भुजा के अंतों में से किसी एक से आधार पर गिराये गये लम्ब का माप होता है ॥ ९९½ ॥
१) { (अ² - ब²)² / (अ - ब)² ± (अ - ब)² } ÷ २ = अ² + ब² अथवा २ अ ब (दशानुसार)
२) { (२ अ ब)² / २ ब² ± २ ब² } ÷ २ = अ² + ब² अथवा अ² - ब²
३) √((अ² + ब²)² - (२ अ ब)²) = अ² - ब²
९९½) इस गाथा में कथित नियम के अनुसार साधन किया जाने वाला प्रश्न यह है कि दो
दिये गये बीजों की सहायता से दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की रचना किस प्रकार करना
चाहिये । भुजाओं, कर्णों और ऊपरी भुजा के अंतों से आधार पर गिराये गये लम्बों तथा लम्ब के कारण
उत्पन्न हुए खंडों की लम्बाइयों दिये गये बीजों की सहायता से संरचित दो आयतों में से निकालना पड़ती
है । इनमें से प्रथम आयत क्षेत्र ऊपर गाथा ९०½ में दिये गये नियमानुसार बनाया जाता है । प्रथम
आयत के आधार की लम्बाई की अर्द्धराशि के मन से चुने हुए दो गुणनखंडों में से उसी नियम के
अनुसार दूसरा आयत क्षेत्र बनता है । ( उन दो गुणनखंडों को बीज मान लेते हैं ।) इसलिये अब हम
प्रथम आयत को, दूसरे आयत क्षेत्र से अलग पहिचानने के लिये, प्राथमिक आकृति कहेंगे ।

-७. १००½] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २०७
अत्रोद्देशकः
चतुरश्रक्षेत्रस्य द्विसमस्य च पञ्चषट्कबीजस्य ।
मुखभूभुजावलम्बककर्णाबाधाधनानि वद ॥ १००½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो बराबर भुजाओं वाले तथा ५ और ६ को बीज मानकर उनकी सहायता से रचित चतुर्भुज
क्षेत्र के संबंध से ऊपरी भुजा, आधार, दो बराबर भुजाओं में से एक, ऊपरी भुजा से आधार पर गिराया
गया लंब, कर्ण और आधार का छोटा खंड तथा क्षेत्रफल के मापों को बतलाओ ॥१००½॥
इस नियम का मूल आधार गाथा १००½ में दिये गये प्रश्न के हल को चित्रित करने वाली
निम्नलिखित आकृतियों से स्पष्ट हो जावेगा । यहाँ दिये गये बीज ५ और ६ हैं । प्रथम आयत अथवा
बीजों से प्राप्त प्राथमिक आकृति अ ब स द है—
[ नोट—ये आकृतियाँ पैमाने रहित हैं । ]
इस आकृति में आधार की लम्बाई की अर्द्धराशि
३० है । इसके दो गुणनखंड ३ और १० चुने
जा सकते हैं । इन संख्याओं की सहायता से
( उन्हें बीज मानकर ) संरचित आयत क्षेत्र
इ फ ग ह है—
दो बराबर भुजाओं वाले इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र
की रचना के लिये अपने कर्ण द्वारा विभाजित
प्रथम आयत के दो त्रिभुजों में से एक को दूसरे
आयत की ओर, और वैसे ही दूसरे त्रिभुज के बराबर
क्षेत्र को दूसरे आयत की दूसरी ओर से हटा देते
हैं जैसा की आकृति ह अ' फ स' से स्पष्ट है ।
यह क्रिया आकृतियों की तुलना से स्पष्ट हो
जावेगी । इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र ह अ' फ स' का
क्षेत्रफल = दूसरे आयत इ फ ग ह का क्षेत्रफल ।
आधार अ' फ = प्रथम आयत की लम्ब भुजा
धन दूसरे आयत की लम्ब भुजा = अ ब + इ फ
ऊपरी भुजा ह स' = दूसरे आयत की लम्ब
भुजा ऋण प्रथम आयत की लम्ब भुजा = ग ह - स द
कर्ण ह फ = दूसरे आयत का कर्ण

२०८ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १०१½-
त्रिसमचतुरश्रक्षेत्रस्य मुखभूभुजावलम्बककर्णाबाधाधनानयनसूत्रम्—
भुजपदहृतबीजान्तरहृतजन्यधनाप्तभागहाराभ्याम् ।
तद्भुजकोटिभ्यां च द्विसम इव त्रिसमचतुरश्रे ॥ १०१½ ॥
अत्रोद्देशकः
चतुरश्रक्षेत्रस्य त्रिसमस्यास्य द्विकत्रिकस्वबोजस्य ।
मुखभूभुजावलम्बककर्णाबाधनानि वद् ॥ १०२½ ॥
दिये गये बीजों की सहायता से तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में ऊपरी
भुजा, आधार, कोई भी एक बराबर भुजा, ऊपर से आधार पर गिराया गया लम्ब, कर्ण, आधार का छोटा
खंड और क्षेत्रफल के मापों को निकालने के लिये नियम—
दिये गये बीजों का अंतर, उन बीजों की सहायता से तत्काल प्राप्त चतुर्भुज क्षेत्र के आधार के
वर्गमूल द्वारा गुणित किया जाता है। इस तत्काल प्राप्त प्राथमिक चतुर्भुज के क्षेत्रफल को इस प्रकार प्राप्त
गुणनफल द्वारा भाजित किया जाता है। तब क्रिया में बीजों की तरह उपयोग में लाये गये परिणामी
भजनफल और भाजक की सहायता से प्राप्त दूसरा चतुर्भुज क्षेत्र रचा जाता है। तीसरा चतुर्भुज,
तत्काल प्राप्त चतुर्भुज के आधार और लम्ब भुजा को बीज मानकर, बनाया जाता है। तब इन दो अंत
में प्राप्त चतुर्भुजों की सहायता से तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की उपर्युक्त भुजाओं आदि
के मापों को दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज में प्रयुक्त विधि अनुसार प्राप्त किया जाता है ॥१०१½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन बराबर भुजाओं वाले, तथा २ और ३ बीज हैं जिसके ऐसे, चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में
ऊपरी भुजा, आधार, तीन बराबर भुजाओं में से एक, ऊपरी भुजा से आधार पर गिराया गया कम्ब,
कर्ण, अधार का छोटा खंड और क्षेत्रफलों के मापों को बतलाओ ॥१०२½॥
आधार का छोटा खंड अर्थात् अ' इ = प्रथम आयत की लंब भुजा
= अ ब
लम्ब ह इ = दूसरे अथवा प्रथम आयत का आधार = ब स = फ ग
बाजू की प्रत्येक बराबर भुजा अ' ह अथवा फ स' = प्रथम आयत का कर्ण, अर्थात्, अ स
(१०१½) यदि दिये गये बीज अ और ब द्वारा निरूपित हों, तो तत्काल प्राप्त चतुर्भुज की
भुजाओं के माप ये होंगे : लम्ब भुजा = अ² - ब², आधार = २ अ ब, कर्ण = अ² + ब², क्षेत्रफल
= २ अ ब x ( अ² - ब² ) ।
जैसा कि दो बराबर भुजाओं वाले क्षेत्रफल की रचना के संबंध में गाथा ९९½ का नियम उपयोग
कहा गया है, उसी तरह यह नियम, दो प्राप्त आयतों की सहायता से, तीन बराबर भुजाओं वाले इष्ट
चतुर्भुज क्षेत्र की संरचना में सहायक होता है। इन आयतों में प्रथम संबंधी बीज ये हैं—
. २अ ब x (अ² - ब²)
——————————, अर्थात् √२अ ब x (अ + ब) और √२अ ब x (अ - ब)
√२अ ब x (अ ∓ )'

  • गाथा ९०½ का नियम यहाँ प्रयुक्त करने पर हमें प्रथम आयत के लिये निम्नलिखित मान
    प्राप्त होते हैं—
    लम्ब भुजा = (अ + ब)² x २अ ब - (अ - ब)² x २अ ब अथवा ८अ² ब²

-७. १०३½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २०९
विषमचतुरश्रक्षेत्रस्य मुखभूभुजालम्बकर्णाबाधाधनानयनसूत्रम्—
ज्येष्ठाल्पान्योन्यहीनश्रुतिहतभुजकोटी भुजे भूमुखे ते
कोट्योरन्योन्यदोर्भ्यां हतयुतिरथ दोर्घातयुक्तकोटिघातः ।
कर्णाल्पश्रुतिघ्नावर्नाधकभुजकोट्याहृतौ लम्बकौ ता-
बाबाधे कोटिदोर्णाववनिविवरके कर्णघातार्धमर्थः ॥ १०३½ ॥
विषम चतुर्भुज के संबंध में, ऊपरी भुजा, आधार, बाजू की भुजाओं, ऊपरी भुजा के अंतों से
आधार पर गिराये गये लम्बों, कर्णों, आधार के खंडों और क्षेत्रफल के मापों को निकालने के लिये नियम —
दिये गये बीजों के दो कुलकों ( sets ) संबंधी दो आयताकार प्राप्त चतुर्भुज क्षेत्रों के बड़े
और छोटे कर्णों से आधार और ( उन्हीं प्राप्त छोटी और बड़ी आकृतियों की ) लम्ब भुजा क्रमशः
गुणित की जाती हैं। परिणामी गुणनफल इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र की दो असमान भुजाओं, आधार और
ऊपरी भुजा के मापों

२१० ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १०४½-
अत्रोद्देशकः
एकद्विकद्विकत्रिकजन्ये चोत्थाप्य विषमचतुरश्रे ।
मुखभूभुजावलम्बककर्णाबाधाधनानि वद ॥ १०४½ ॥
पुनरपि विषमचतुरश्रानयनसूत्रम्—
ह्रस्वश्रुतिकृतिगुणितो ज्येष्ठभुजः कोटिरपि धरा वदनम् ।
कर्णाभ्यां संगुणितावुभयभुजावल्पभुजकोटी ॥ १०५½ ॥
ज्येष्ठभुजकोटिवियुतिर्द्विधाल्पभुजकोटिताडिता युक्ता ।
ह्रस्वभुजकोटियुतिगुणपृथुकोट्याल्पश्रुतिघ्नकौ कर्णौ ॥ १०६½ ॥
अल्पश्रुतिहृतकर्णौल्पकोटिभुजसंहती पृथग्लम्बौ ।
तद्भुजयुतिवियुतिगुणोत्पदमाबाधे फलं श्रुतिगुणार्धम् ॥ १०७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
१ और २ तथा २ और ३ बीजों को लेकर, दो आकृतियाँ प्राप्त कर, विषम चतुर्भुज के संबंध में
ऊपर की भुजा, आधार, बाजू की भुजाओं, लम्बों, कर्णों, आधार के खंडों और क्षेत्रफल के मापों को
बतलाओ ॥१०४½॥
विषम चतुर्भुज के संबंध में भुजाओं के माप आदि को प्राप्त करने के लिए दूसरा नियम—
दो प्राप्त आयतों में छोटी आकृति के कर्ण के वर्ग को, अलग-अलग, आधार और बड़े आयत की
लंब भुजा द्वारा गुणित करने से विषम इष्ट चतुर्भुज के आधार और ऊपरी भुजा के माप उत्पन्न होते
हैं। छोटे आयत का आधार और लम्ब भुजा, प्रत्येक उत्तरोत्तर, उपरोक्त आयत क्षेत्रों के प्रत्येक के
कर्ण द्वारा गुणित होकर क्रमशः इष्ट चतुर्भुज की दो पार्श्व भुजाओं को उत्पन्न करते हैं। बड़ी आकृति
( आयत ) के आधार और लम्ब भुजा का अंतर, अलग-अलग दो स्थानों में रखा जाकर, छोटी आकृति
के आधार और लम्ब भुजा द्वारा गुणित किया जाता है। इस क्रिया के दो परिणामी गुणनफल अलग-
अलग उस गुणनफल में जोड़े जाते हैं, जो छोटे आयत के आधार और लंब भुजा के योग को बड़े
आयतकी लम्ब भुजा से गुणित करने पर प्राप्त होता है। इस प्रकारप्राप्त दो योग जब छोटे
आयत के कर्ण द्वारा गुणित किये जाते हैं, तो इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र के दो कर्णों के माप प्राप्त होते हैं। इष्ट
चतुर्भुज क्षेत्र के कर्णों को अलग-अलग छोटे आयत के कर्ण द्वारा भाजित किया जाता है।
इस प्रकार प्राप्त भजनफलों को क्रमशः छोटे आयत की लम्ब भुजा और आधार द्वारा गुणित किया
जाता है। परिणामी गुणनफल इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र के लंबों के मापों को उत्पन्न करते हैं। इन दो लंबों में
( आधार और ऊपरी भुजा छोड़कर ) उपर्युक्त दो भुजाओं के मानों को अलग-अलग जोड़ा जाता है।
बड़ी भुजा, बड़े लम्ब में और छोटी भुजा छोटे लंब में। इन लंबों और भुजाओं के अंतर भी उसी क्रम
में प्राप्त किये जाते हैं। उपर्युक्त योग क्रमशः इन अंतरों द्वारा गुणित किये जाते हैं। इस प्रकार प्राप्त
गुणनफलों के वर्गमूल इष्ट चतुर्भुज संबंधी आधार के खंडों के मानों को उत्पन्न करते हैं। इष्ट चतुर्भुज
क्षेत्र के कर्णों के गुणनफल की आधी राशि उसका क्षेत्रफल होती है ॥१०५½-१०७½॥
मानलो दिये गये बीजों के दो कुलक ( sets ) अ, ब और स, द हैं। तब विभिन्न इष्ट तत्त्व
निम्नलिखित होंगे—
बाजू की भुजाएँ = २ अ ब (स² + द²) (अ² + ब²) और (अ² - ब²) (स² + द²) (अ² + ब²)
आधार = २ स द ( अ² + ब² ) ( अ² + ब² )

-७. १०८½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २११
एकस्माज्जन्यायतचतुरश्राद्द्विसमत्रिभुजानयनसूत्रम्—
कर्णे भुजद्वयं स्याद्बाहुर्द्विगुणीकृतो भवेद्भूमिः ।
कोटिरवलम्बकोऽयं द्विसमत्रिभुजे धनं गणितम् ॥ १०८½ ॥
केवल एक जन्य आयत क्षेत्र की सहायता से समद्विबाहु त्रिभुज प्राप्त करने के लिये नियम—
दिये गये बीजों की सहायता से संरचित आयत के दो कर्ण इष्ट समद्विबाहु त्रिभुज की दो
बराबर भुजाएँ हो जाते हैं। आयत का आधार दो द्वारा गुणित होकर इष्ट त्रिभुज का आधार बन जाता
है। आयत की लंब भुजा, इष्ट त्रिभुज का शीर्ष से आधार पर गिराया हुआ लम्ब होती है। उस
आयत का क्षेत्रफल, इष्ट त्रिभुज का क्षेत्रफल होता है ॥१०८½॥
ऊपरी भुजा = ( स² - द² ) ( अ² + ब² ) ( अ² + ब² )
कर्ण = { ( अ² - ब² ) × २ स द + ( स² - द² ) २ अ ब } × ( अ² + ब² ) ; और
{ ( अ² - ब² ) ( स² - द² ) + ४ अ ब स द } × ( अ² + ब² )
लम्ब = { ( अ² - ब² ) × २ स द + ( स² - द² ) २ अ ब } × २ अ ब; और
{ ( अ² - ब² ) ( स² - द² ) + ४ अ ब स द } × ( अ² - ब² )
खंड अवधाएँ = { ( अ² - ब² ) × २ स द + ( स² - द² ) × २ अ ब } ( अ² - ब² ); और
{ ( अ² - ब² ) ( स² - द² ) + ४ अ ब स द } × २ अ ब.
(१०५½-१०७½) गाथा १०३½ के नोट में कथित मान यहाँ भी भुजाओं आदि के लिये दिये
गये हैं; केवल वे कुछ भिन्न विधि से कहे गये हैं। १०३½ वीं गाथा के ही प्रतीक लेकर—
कर्ण = [{२ स द - (स² - द²)} २ अ ब + {२ अ ब + (अ² - ब²) } (स² - द²)] × (अ² + ब²);
और [{२ स द - (स² - द²)} (अ² - ब²) + {२ अ ब + (अ² - ब²)} (स² - द²)] × (अ² + ब²) ।
[ {२ सद - (स² - द²) } × २ अ ब + {२ अ ब + (अ² - ब²) } (स² - द²) ] (अ² + ब²)
लम्ब = ----------------------------------------------------------------------------------------- × (अ² - ब²);
( अ² + ब² )
[ {२ स द - (स² - द²)} (अ² - ब²) + {२ अ ब + (अ² - ब²)} (स² - द²)] (अ² + ब²)
और --------------------------------------------------------------------------------------- × २ अ ब ।
( अ² + ब² )
उपर्युक्त चार बीजवाक्य १०३½ वीं गाथा में दिये गये कर्णों और लंबों के मापों के रूप में प्रका-
सित किये जा सकते हैं। यहाँ आधार के खंडों के माप, खंड की संवादी भुजा और लंब के वर्गों के अन्तर
के वर्गमूल को निकालने पर प्राप्त किये जा सकते हैं।
(१०८½) इस नियम का मूल आधार इस
प्रकार निकाला जा सकता है:—मानलो अ ब स द एक
आयत है और अ द, इ तक बढ़ाई जाती है ताकि
अ द = द इ । इ स को जोड़ो। अ स इ एक
समद्विबाहु त्रिभुज है जिसकी भुजाएँ आयत के कर्णों के माप के बराबर हैं, और जिसका क्षेत्रफल
आयत के क्षेत्रफल के बराबर है।
पार्श्व आकृति से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जावेगा।

२१२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १०९½-
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकबीजोत्थद्विसमत्रिभुजस्य गणक बाहू द्वौ ।
भूमिसमवलम्बकं च प्रगणय्याचक्ष्व मे शीघ्रम् ॥ १०९½ ॥
विषमत्रिभुजक्षेत्रस्य कल्पनाप्रकारस्य सूत्रम्—
जन्यभुजार्धं छित्त्वा केनापिच्छेदलब्धजं चाभ्याम् ।
कोटियुतिर्भूः कर्णौ भुजौ भुजा लम्बका विषमे ॥ ११०½ ॥
अत्रोद्देशकः
हे द्वित्रिबीजकस्य क्षेत्रभुजार्धेन चान्यमुत्थाप्य ।
तस्माद्विषमत्रिभुजे भुजभूम्यवलम्बकं ब्रूहि ॥ १११½ ॥
इति जन्यव्यवहारः समाप्तः ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणितज्ञ, ३ और ५ को बीज लेकर उनकी सहायता से प्राप्त समद्विबाहु त्रिभुज के संबंध
में दो बराबर भुजाओं, आधार और लंब के मापों को शीघ्र ही गणना कर बताओ ॥१०९½॥
विषम त्रिभुज की रचना करने की विधि के लिये नियम—
दिये गये बीजों से प्राप्त आयत के आधार की आधी राशि को मन से चुने हुए गुणनखंड
द्वारा भाजित करते हैं । भाजक और भजनफल की इस क्रिया में बीज मानकर दूसरा आयत प्राप्त
करते हैं । इन दो आयतों की लम्ब भुजाओं का योग इष्ट विषम त्रिभुज के आधार का माप होता है ।
उन दो आयतों के दो कर्ण इष्टत्रिभुज की दो भुजाओं के माप होते हैं । उन दो आयतों में से किसी एक
का आधार इष्ट त्रिभुज के लंब का माप होता है ॥११०½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
२ और ३ को बीज लेकर उनसे प्राप्त आयत तथा उस आयत के आधे आधार से प्राप्त दूसरा
आयत संरचित कर, मुझे इस क्रिया की सहायता से विषम त्रिभुज की भुजाओं, आधार और लंब के
मापों को बतलाओ ॥१११½॥
इस प्रकार, क्षेत्र गणित व्यवहार में जन्य व्यवहार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
(११०½) पार्श्वलिखित रचना से नियम
स्पष्ट हो जावेगा—
मानलो अ ब स द और इ फ ग ह
दो ऐसे जन्य आयत हैं कि आधार अ द =
आधार इ ह । ब अ को क तक इतना
बढ़ाओ कि अ क = इ फ हों । यह सरलता पूर्वक दिखाया जा सकता है कि द क = इ ग और त्रिभुज
ब द क का आधार ब क = ब अ + इ फ, जो आयतों की लंब भुजायें कहलाती हैं । त्रिभुज की भुजायें
उन्हीं आयतों के कर्णों के बराबर होती हैं ।