गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें-७. ६१ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९५
वर्गेस्त्रयोदशानां त्रिसमचतुर्बाहुके पुनर्भूमिः ।
सप्त चतुरशतयुक्तं कर्णाबाधावलम्बगणितं किम् ॥ ५८ ॥
विषमचतुरश्रबाहू त्रयोदशाभ्यस्तपञ्चदशविंशतिकौ ।
पञ्चघनो वदनमधस्त्रिशतं कान्यत्र कर्णमुखफलानि ॥ ५९ ॥
इतः परं वृत्तक्षेत्राणां सूक्ष्म फलानयनसूत्राणि । तत्र समवृत्तक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलानयन
सूत्रम्—
वृत्तक्षेत्रव्यासो दशपदगुणितो भवेत्परिक्षेपः ।
व्यासचतुर्भागगुणः परिधिः फलमर्धमर्धे तत् ॥ ६० ॥
अत्रोद्देशकः
समवृत्तव्यासोऽष्टादश विष्कम्भश्च षष्टिरन्यस्य ।
द्वाविंशतिरपरस्य क्षेत्रस्य हि के च परिधिफले ॥ ६१ ॥
१३ × २० हैं। ऊपरी भुजा (५)³ है, और नीचे की भुजा ३०० है । विकर्ण से आरम्भ कर सबके
मान यहाँ क्या क्या हैं ? ॥ ५९ ॥
इसके पश्चात् वक्ररेखीय क्षेत्रों के सम्बन्ध में सूक्ष्म मानों को निकालने के लिये नियम दिये
जाते हैं । उनमें से समवृत्त के सम्बन्ध में सूक्ष्म मान निकालने के लिये नियम—
वृत्त का व्यास १० के वर्गमूल से गुणित होकर परिधि को उत्पन्न करता है । परिधि को एक
चौथाई व्यास से गुणित करने पर क्षेत्रफल प्राप्त होता है । अर्द्धवृत्त के सम्बन्ध में यह इसका आधा
होता है ॥ ६० ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी वृत्ताकार क्षेत्र के सम्बन्ध में वृत्त का व्यास १८ है; दूसरे के सम्बन्ध में ६० है; एक
और अन्य के सम्बन्ध में २२ है । परिधियां और क्षेत्रफल क्या-क्या हैं ? ॥ ६१ ॥ अर्द्धवृत्ताकार क्षेत्र
चक्रीय चतुर्भुजों के लिये ठीक हैं । लम्ब अथवा विकर्णों के मानों को पहिले से बिना जाने हुए चतुर्भुज
के क्षेत्रफल को निकालने के प्रयत्न के विषय में भास्कराचार्य परिचित थे । यह उनकी लीलावती ग्रन्थ
की निम्नलिखित गाथा से प्रकट होता है—
लम्बयोः कर्णयोर्वैकमनिर्दिश्यापरान् कथम् ।
पृच्छत्यनियतत्वेऽपि नियतं चापि तत्फलम् ॥
संपृच्छकः पिशाचो वा वक्ता वा नितरां ततः ।
यो न वेत्ति चतुर्बाहुक्षेत्रस्यानियतां स्थितिम् ॥
(६०) इस गाथानुसार π = परिधि/व्यास का मान √१० = ३·१६...है । इससे भी
सूक्ष्म मान प्राप्त करने के लिये नवीं शताब्दी की धवला टीका ग्रंथों में निम्नलिखित रीति दी है—
१६ (व्यास) + १६ / ११३ + ३ (व्यास) = परिधि । इस सूत्र के वाम पक्ष के प्रथम पद में से अंश
का + १६ हटा देने पर π का मान ३५५/११३ अथवा ३·१४१५९३ प्राप्त होता है, जिसे चीन में ४७६ ईस्वी
पश्चात् त्सु-शुंग-चिह द्वारा उपयोग में लाया गया है । वास्तव में यह सूत्र एक प्रदेश के व्यास के सम्बन्ध
में प्रयुक्त हुआ है । असंख्यात प्रदेशों वाले अंगुल आदि व्यास के माप की इकाइयों के लिये + १६ का
मान नगण्य हो जाता है, और चीनी मान प्राप्त हो जाता है । आर्यभट द्वारा दिया गया π का मान
६२८३२/२०००० = ३·१४११६ है । भास्कराचार्य द्वारा भी यह मान (३९२७/१२५०) रूप में हासित कर प्ररूपित
किया गया है ।