गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 255, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें-७. ८३½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २०१
अत्रोद्देशकः
पृष्ठं चतुर्दशोदरमष्टौ नेम्याकृतौ भूमौ ।
मध्ये चत्वारि च तद्बालेन्दोः किमिभदन्तस्य ॥ ८१½ ॥
चतुर्मण्डलमध्यस्थितक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
विष्कम्भवर्गराशेर्वृत्तस्यैकस्य सूक्ष्मफलम् ।
त्यक्त्वा समवृत्तानामन्तरजफलं चतुर्णां स्यात् ॥ ८२½ ॥
अत्रोद्देशकः
गोलकचतुष्टयस्य हि परस्परस्पर्शकस्य मध्यस्य ।
सूक्ष्मं गणितं किं स्याच्चतुष्कविष्कम्भयुक्तस्य ॥ ८३½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
नेमिक्षेत्र के संबंध में बाहरी वक्र १४ है और भीतरी ८ है । बीच में चौड़ाई ४ है । क्षेत्रफल
क्या है ? बालेन्दु क्षेत्र तथा इभदन्ताकार क्षेत्र की आकृतियों का क्षेत्रफल भी क्या होगा ? ॥ ८१½ ॥
चार, एक दूसरे को स्पर्श करने वाले, वृत्तों के बीच के क्षेत्र ( चतुर्मण्डल मध्यस्थित क्षेत्र )
के सूक्ष्म क्षेत्रफल को निकालने के लिये नियम—
किसी भी एक वृत्त के क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप यदि उस वृत्त के व्यास को वर्गित करने से प्राप्त
राशि में से घटाया जाय, तो पूर्वोक्त क्षेत्र का क्षेत्रफल प्राप्त होता है ॥ ८२½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
चार एक दूसरे को स्पर्श करने वाले वृत्तों के बीच का क्षेत्रफल निकालो (जब कि प्रत्येक वृत्त
का व्यास ४ है ) ॥ ८३½ ॥
( कंकण ) की चौड़ाई है । इस नेमिक्षेत्र के क्षेत्रफल की तुलना गाथा ७ में दिये गये नोट में वर्णित
अनुमानिक मान से की जाय, तो स्पष्ट होगा कि यह सूत्र शुद्ध मान नहीं देता । गाथा ७ में दिया गया
मान शुद्ध मान है । यह गलती, एक गलत विचार से उदित हुई मालूम होती है । इस क्षेत्रफल के
मान को निकालने के लिये, π का उपयोग प₁ और प₂ के मानों में अपेक्षाकृत उलटा किया गया है ।
इसके सम्बन्ध में जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति ( १०/९१ ) और त्रिलोक प्रज्ञप्ति ( ४/२५२१-२५२२ ) में दिये गये
सूत्र दृष्टव्य हैं ।
(८२½) निम्नलिखित आकृति से इस नियम का मूल | ( ८४½ ) इसी प्रकार, यह आकृति भी नियम के
कारण स्पष्ट हो जावेगा । | कारण को शीघ्र ही स्पष्ट करती है ।
[चित्र: परस्पर स्पर्शी चार वृत्त और अन्तःस्थित वर्ग] वर्ग | [चित्र: परस्पर स्पर्शी तीन वृत्त और अन्तःस्थित समत्रिभुज] समत्रिभुज
ग० सा० सं०-२६