गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
१८० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३३७½-
अत्रोद्देशकः
संख्यां प्रस्तारविधिं नष्टोद्दिष्टे लगक्रियाध्वानौ ।
षट्प्रत्ययांश्च शीघ्रं त्र्यक्षरवृत्तस्य मे कथय ॥३३७½॥
इति मिश्रकव्यवहारे श्रेढीबद्धसङ्कलितं समाप्तम् ।
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतो मिश्रकगणितं नाम पञ्चमव्यवहारः समाप्तः ॥
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उदाहरणार्थ प्रश्न
३ अक्षरों (syllables) वाले छन्द के सम्बन्ध में ६ प्रत्ययों को बतलाओ—.
(१) छन्द के सम्भव श्लोकों (stanzas) की महत्तम संख्या, (२) उन श्लोकों में
अक्षरों के विन्यास का क्रम, (३) किसी दिये गये प्रकार के श्लोकों में अक्षरों (शब्दांशों) का
विन्यास, जहाँ छन्द में सम्भव प्रकारों की क्रमसूचक स्थिति ज्ञात है, (४) दिये गये श्लोक की
क्रमसूचक स्थिति, (५) किसी दी गईं लघु या गुरु अक्षरों (शब्दांशों) की संख्यावाले दिये गये
छन्द (metre) में श्लोकों की संख्या, और (६) अध्वान नामक राशि ॥३३७½॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में श्रेढिबद्ध संकलित नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणितशास्त्र में मिश्रक नामक पञ्चम
व्यवहार समाप्त हुआ ।
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को उत्तरवर्ती गुणनफल द्वारा भाजित करते हैं । भजनफल ३ इष्ट उत्तर है ।
(६) ऐसा कहा गया है कि छन्द के किसी भी प्रकार के गुरु और लघु शब्दांशों के निरूपण
करनेवाले प्रतीक, एक अंगुल उदग्र (vertical) जगह ले लेते हैं, और कोई भी दो विभेदों के बीच
का अंतराल (जगह) भी एक अंगुल होना चाहिये । इसलिये, इस छन्द के ८ प्रकारों (विभेदों) के
लिये इष्ट उदग्र (vertical) जगह का परिमाण २ x ८ - १ अथवा १५ अंगुल होता है ।
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७. क्षेत्रगणित व्यवहारः
सिद्धेभ्यो निश्चितार्थेभ्यो वरिष्टेभ्यः कृतादरः । अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं नमस्कुर्वे पुनः पुनः ॥ १ ॥
इतः परं क्षेत्रगणितं नाम षष्ठगणितमुदाहरिष्यामः । तद्यथा--
क्षेत्रं जिनप्रणीतं फलाश्रयाद्व्यावहारिकं सूक्ष्ममिति ।
भेदाद् द्विधा विचिन्त्य व्यवहारं स्पष्टमेतदभिधास्ये ॥ २ ॥
त्रिभुजचतुर्भुजवृत्तक्षेत्राणि स्वस्वभेदभिन्नानि । गणितार्णवपारगतैराचार्यैः सम्यगुक्तानि ॥ ३ ॥
त्रिभुजं त्रिधा विभिन्नं चतुर्भुजं पञ्चधाष्टधा वृत्तम् । अवशेषक्षेत्राणि ह्येतेषां भेदभिन्नानि ॥ ४ ॥
त्रिभुजं तु समं द्विसमं विषमं चतुरश्रमपि समं भवति ।
द्विद्विसमं द्विसमं स्यात्त्रिसमं विषमं बुधाः प्राहुः ॥ ५ ॥
समवृत्तमर्धवृत्तं चायत्तवृत्तं च कम्बुकावृत्तम् । निम्नोन्नतं च वृत्तं बहिरन्तश्चक्रवालवृत्तं च ॥ ६ ॥
७. क्षेत्र-गणित व्यवहार ( क्षेत्रफल के माप सम्बन्धी गणना )
अपने इष्ट अर्थ की सिद्धि के लिये मैं मन, वचन, काय से कृतकृत्य और सर्वोत्कृष्ट सिद्धों को
वारंवार सादर नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
इसके पश्चात् हम क्षेत्र गणित नामक विषय की छः प्रकार की गणना की व्याख्या करेंगे जो
निम्नलिखित है—
जिन भगवान् ने क्षेत्रफल का दो प्रकार का माप प्रणीत किया है, जो फल के स्वभाव पर
आधारित है; अर्थात् एक वह जो व्यावहारिक प्रयोजनों के लिये अनुमानतः लिया जाता है, और दूसरा
वह जो सूक्ष्म रूप से शुद्ध होता है । इसे विचार में लेकर मैं इस विषय को स्पष्ट रूप से समझाऊँगा
॥ २ ॥ गणित रूपी समुद्र के पारगामी आचार्यों ने सम्यक् ( ठीक ) रूप से विविध प्रकार के क्षेत्रफलों
के विषय में कहा है । उन क्षेत्रफलों में त्रिभुज, चतुर्भुज और वृत्त ( वक्ररेखीय ) क्षेत्रों को इन्हीं
क्रमवार प्रकारों में वर्णित किया है ॥ ३ ॥ त्रिभुज क्षेत्र को तीन प्रकार में, चतुर्भुज को पाँच प्रकार में,
और वृत्त को आठ प्रकार में विभाजित किया गया है । शेष प्रकार के क्षेत्र वास्तव में इन्हीं विभिन्न
प्रकारों के क्षेत्रों के विभिन्न भेद हैं ॥ ४ ॥ बुद्धिमान लोग कहते हैं कि त्रिभुज क्षेत्र, समत्रिभुज,
द्विसम त्रिभुज ( समद्विबाहु त्रिभुज ) और विषम त्रिभुज हो सकता है, और चतुर्भुज क्षेत्र भी सम-
चतुरश्र ( वर्ग ), द्विद्विसमचतुरश्र ( आयत ), द्विसमचतुरश्र ( समलम्ब चतुर्भुज जिसकी दो असमा-
नान्तर भुजायें बराबर नापकी हों ), त्रिसमचतुरश्र ( समलम्ब चतुर्भुज, जिसकी तीन भुजायें बराबर
नापकी हों ), विषम चतुरश्र ( साधारण चतुर्भुज क्षेत्र ) हो सकता है ॥ ५ ॥ वक्रसरल क्षेत्र, समवृत्त
( वृत्त ), अर्धवृत्त, आयतवृत्त ( ऊनेन्द्र अथवा अंडाकार क्षेत्र ), कम्बुकावृत्त ( शंखाकार क्षेत्र ),
निम्नावृत्त ( नतोदर वृत्तीय क्षेत्र ), उन्नतावृत्त ( उन्नतोदर वृत्तीय क्षेत्र ), बहिश्चक्रवाल वृत्त ( बाह्य
स्थित कङ्कण ), एवं अंतश्चक्रवाल वृत्त ( भीतर स्थित कङ्कण ) हो सकता है ॥ ६ ॥
(५-६) इन गाथाओं में कथित विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ अगले पृष्ठ पर दर्शाई गई हैं—
१८२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ७ -
व्यावहारिकगणितम्
त्रिभुजचतुर्भुजक्षेत्रफलानयनसूत्रम् —
त्रिभुजचतुर्भुजबाहुप्रतिबाहुसमासदलहृतं गणितम् ।
नेमेर्भुजयुत्यर्धं व्यासगुणं तत्फलार्धमिह बालेन्दोः ॥ ७ ॥
व्यावहारिक गणित ( अनुमानतः मापसम्बन्धी गणना )
त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्रों के क्षेत्रफल ( अनुमानतः ) निकालने के लिये नियम —
सम्मुख भुजाओं के योगों की अर्द्धराशियों का गुणनफल, त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्रों के क्षेत्र-
फल का माप होता है । कङ्कण सदृश आकृति के चक्र की किनार ( rim ) का क्षेत्रफल भीतर और
( १ ) ( २ ) ( ३ )
सम त्रिभुज द्विसम त्रिभुज विषम त्रिभुज
( ४ ) ( ५ ) ( ६ )
समचतुरश्र द्वि द्वि समचतुरश्र द्विसमचतुरश्र
( ७ ) ( ८ ) ( ९ )
त्रिसम चतुरश्र विषम चतुरश्र समवृत्त
( १० ) ( ११ ) ( १२ )
अर्द्धवृत्त आयत वृत्त ( ऊनेन्द्र )
कम्बुकावृत्त ( शंख के आकार की आकृति )
-७.८ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १८३
अत्रोद्देशकः
त्रिभुजक्षेत्रस्याष्टौ बाहुप्रतिबाहुभूमयो दण्डाः । तद्व्यावहारिकफलं गणयित्वाचक्ष्व मे शीघ्रम् ॥८॥
बाहर की परिधियों के योग की अर्द्धराशि को कङ्कण की चौड़ाई से गुणित करने पर प्राप्त होता है।
इस फल का यहाँ बालचन्द्रमा सदृश आकृति का क्षेत्रफल होता है ॥ ७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
त्रिभुज के सम्बन्ध में, भुजा, सम्मुख भुजा, और आधार का माप ८ दंड है; मुझे शीघ्र ही
बतलाओ कि इसका व्यावहारिक क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ८ ॥ दो बराबर भुजाओं वाले त्रिभुज के सम्बन्ध
( १३ ) ( १४ )
निम्नवृत्त ( नतोदर वृत्तीय क्षेत्र ) उन्नत वृत्त ( उन्नतोदर वृत्तीय क्षेत्र )
( १५ ) ( १६ )
बहिश्चक्रवाल वृत्त ( बाहर स्थिति कङ्कण )
अंतश्चक्रवालवृत्त ( भीतर स्थित कङ्कण )
चतुर्भुज क्षेत्रों के क्षेत्रफल और अन्य मापों के दिये गये नियमों पर विचार करने पर ज्ञात होगा
कि यहाँ कहे गये चतुर्भुज क्षेत्र चक्रीय ( वृत्त में अन्तर्लिखित ) हैं । इसलिये समचतुरश्र यहाँ वर्ग है,
द्वि-द्विसमचतुरश्र आयत है, और द्विसमचतुरश्र तथा त्रिसमचतुरश्र की ऊपरी भुजाएँ आधार के समा-
नान्तर हैं ।
( ७ ) यहाँ त्रिभुज को ऐसा चतुर्भुज माना गया है, जिसके आधार की सम्मुख भुजा इतनी
छोटी होती है कि वह उपेक्षणीय होती है । इस दशा में त्रिभुज की बाजू की दो भुजाएँ, सम्मुख भुजाएँ
बन जाती हैं, और ऊपरी भुजा मान में नहीं के बराबर ली जाती है । इसलिये नियम में त्रिभुजीय क्षेत्र
के सम्बन्ध में भी सम्मुख भुजाओं का उल्लेख किया गया है; त्रिभुज दो भुजाओं के योग की अर्द्ध-
राशि समस्त दशाओं में ऊँचाई से बड़ी होती है, इसलिये इस नियम के अनुसार प्राप्त क्षेत्रफल किसी भी
उदाहरण में सूक्ष्म रूप से ठीक नहीं हो सकता ।
चतुर्भुज क्षेत्रों के सम्बन्ध में इस नियम के अनुसार प्राप्त क्षेत्रफल वर्ग और आयत के विषय में
ठीक हो सकता है, परन्तु अन्य दशाओं में केवल स्थूलरूपेण शुद्ध होता है । जिनका एक ही केन्द्र होता
है, ऐसे दो वृत्तों की परिधियों के बीच का क्षेत्र नेमिक्षेत्र कहलाता है । यहाँ दिये गये नियम के अनुसार
नेमिक्षेत्र के व्यावहारिक क्षेत्रफल का माप शुद्ध माप होता है । बालेन्दु जैसी आकृति का इस नियमा-
नुसार प्राप्त क्षेत्रफल केवल अनुमानित ही होता है ।
१८४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७.९-
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रस्यायामः सप्तसप्ततिर्दण्डाः । विस्तारो द्वाविंशतिरथ हस्ताभ्यां च संमिश्राः ॥९॥
त्रिभुजक्षेत्रस्य भुजस्त्रयोदश प्रतिभुजस्य पञ्चदश ।
भूमिश्चतुर्दशास्य हि दण्डा विषमस्य किं गणितम् ॥ १० ॥
गजदन्तक्षेत्रस्य च पृष्ठेऽष्टाशीतिरत्र संदृष्टाः । द्वासप्ततिरुदरे तन्मूलेऽपि त्रिंशादिह१ दण्डाः ॥११॥
क्षेत्रस्य दण्डषष्टिर्बाहुप्रतिबाहुकस्य गणयित्वा । समचतुरश्रस्य त्वं कथय सखे गणितफलमाशु ॥१२॥
आयतचतुरश्रस्य व्यायामः सैकषष्टिर्हि दण्डाः । विस्तारो द्वात्रिंशद्व्यवहारं गणितमाचक्ष्व ॥१३॥
दण्डास्तु सप्तषष्टिर्द्विसमचतुर्बाहुकस्य चायामः । व्यासश्चाष्टत्रिंशत् क्षेत्रस्यास्य त्रयस्त्रिंशत् ॥१४॥
क्षेत्रस्याष्टोत्तरशतदण्डा बाहुत्रये मुखे चाष्टौ ।
हस्तैस्त्रिभिर्युतास्तत्त्रिसमचतुर्बाहुकस्य वद गणक ॥ १५ ॥
विषमक्षेत्रस्याष्टत्रिंशद्दण्डाः क्षितिर्मुखे द्वात्रिंशत् ।
पञ्चाशत्प्रति२बाहु षष्टित्वन्यः किमस्य चतुरश्रे ॥ १६ ॥
परिधोदरस्तु दण्डास्त्रिंशत्पृष्ठं शतत्रयं दृष्टम् ।
नवपञ्चगुणो व्यासो नेमिक्षेत्रस्य किं गणितम् ॥ १७ ॥
१. B और M दोनों में त्रिंशतिः पाठ है । छंदकी आवश्यकतानुसार इसे त्रिंशादिह रूप में शुद्ध
कर रखा गया है ।
२. B में “प्रति” के लिये “देक” पाठ है ।
में दो भुजाओं द्वारा प्ररूपित लम्बाई ७७ दंड है, और आधार द्वारा नापी गई चौड़ाई २२ दंड और
२ हस्त है; क्षेत्रफल निकालो ॥ ९ ॥ विषम त्रिभुज के सम्बन्ध में एक भुजा १३ दंड, सम्मुख भुजा
१५ दंड, और आधार १४ दंड है । इस आकृति के क्षेत्रफल का माप क्या है ? ॥ १० ॥ हाथी के दाँत
के मध्य से फाड़े हुए छेद ( section ) की आकृति के बाहरी वक्र की लम्बाई ८८ दंड है, भीतरी
वक्र की लम्बाई ७२ दंड है, और जड़ के पास की मुटाई ३० दंड है; क्षेत्रफल निकालो ॥ ११ ॥
समायत ( वर्ग ) के सम्बन्ध में, जिसकी भुजाओं में से प्रत्येक ६० दंड है, हे मित्र, शीघ्र ही क्षेत्रफल
का परिणामी नाप बतलाओ ॥ १२ ॥ आयत चतुरश्र क्षेत्र के सम्बन्ध में यहाँ लम्बाई ६१ दंड है
और चौड़ाई ३२ दंड है । व्यावहारिक क्षेत्रफल बतलाओ ॥ १३ ॥ दो समान बाहुओं वाले चतुर्भुजों
की प्रत्येक समान भुजा की लम्बाई ६७ दंड है, चौड़ाई ( आधार पर ) ३८ है और ( ऊपर ) ३३
दंड है । क्षेत्रफल का माप बतलाओ ॥ १४ ॥ तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की प्रत्येक
समान भुजा १०८ दंड की है, और शेष ( मुख अथवा ऊपरी ) भुजायें ८ दंड ३ हस्त हैं । हे
गणितज्ञ, इस क्षेत्र के क्षेत्रफल का माप बतलाओ ॥ १५ ॥ विषम चतुर्भुज का आधार ३८ दंड,
ऊपरी मुख-भुजा ३२ दंड, बाजू की एक भुजा ( प्रतिबाहु ) ५० दंड और दूसरी ६० दंड की है । इस
आकृति का क्षेत्रफल क्या है ? ॥ १६ ॥ किसी कंकण में भीतरी वृत्ताकार सीमा ३० दंड की है, बाहरी
वृत्ताकार सीमा ३०० दंड है और कङ्कण की चौड़ाई ४५ है । इस कङ्कण ( नेमि क्षेत्र ) का क्षेत्रफल
निकालो ॥ १७ ॥ बालचाँद सदृश एक आकृति की चौड़ाई २ हस्त है । बाहरी वक्र ६८ हस्त और
( ११ ) इस गाथा में कथित आकृति का आकार बाजू में दी गई आकृति के समान होता है ।
प्रयोजन यह है कि इसे त्रिभुजीय क्षेत्र के समान वर्ता जावे, और तब इसका क्षेत्रफल
त्रिभुजीय क्षेत्रों सम्बन्धी नियम द्वारा निकाला जाय ।
-७. २२ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १८५
हस्तौ द्वौ विष्कम्भः पृष्ठेऽष्टाषष्टिरिह च संदृष्टाः ।
उदरे तु द्वात्रिंशद्बालेन्दोः किं फलं कथय ॥ १८ ॥
वृत्तक्षेत्रफलानयनसूत्रम्—
त्रिगुणीकृतविष्कम्भः परिधिर्व्यासार्धवर्गराशिरयम् ।
त्रिगुणः फलं समेऽर्धे वृत्तेऽर्धं प्राहुराचार्याः ॥ १९ ॥
अत्रोद्देशकः
व्यासोऽष्टादश वृत्तस्य परिधिः कः फलं च किम् ।
व्यासोऽष्टादश वृत्तार्धे गणितं किं वदाशु मे ॥ २० ॥
आयतवृत्तक्षेत्रफलानयनसूत्रम्—
व्यासार्धयुतो द्विगुणित आयतवृत्तस्य परिधिरायामः ।
विष्कम्भचतुर्भागः परिवेषहतो भवेत्सारम् ॥ २१ ॥
अत्रोद्देशकः
क्षेत्रस्यायतवृत्तस्य विष्कम्भो द्वादशैव तु । आयामस्तत्र षट्त्रिंशत् परिधिः कः फलं च किम् ॥२२॥
भीतरी वक्र ३२ हस्त है । बतलाओ की परिणामी क्षेत्रफल क्या है ? ॥ १८ ॥
वृत्त का व्यावहारिक क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
व्यास को ३ द्वारा गुणित करने से परिधि प्राप्त होती है, और व्यास (विष्कम्भ) की अर्द्ध
राशि के वर्ग को ३ द्वारा गुणित करने से पूर्ण वृत्त का क्षेत्रफल प्राप्त होता है । आचार्य कहते हैं कि
अर्द्धवृत्त का क्षेत्रफल और परिधि का माप इनसे आधा होता है ॥ १९ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
वृत्त का व्यास १८ है । उसकी परिधि और परिणामी क्षेत्रफल क्या है ? अर्द्धवृत्त का व्यास
१८ है । शीघ्र कहो कि उसके क्षेत्रफल और परिधि क्या हैं ? ॥ २० ॥
आयत वृत्त (ऊनेन्द्र अथवा अंडाकार) आकृति का क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
बड़े व्यास को छोटे व्यास की अर्द्ध राशि द्वारा बढ़ाकर और तब २ द्वारा गुणित करने पर
आयतवृत्त (ऊनेन्द्र) की परिधि का आयाम (लम्बाई) प्राप्त होता है । छोटे व्यास की एक चौथाई
राशि को परिधि द्वारा गुणित करने पर क्षेत्रफल का माप प्राप्त होता है ॥ २१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ऊनेन्द्र आकृति (elliptical figure) के सम्बन्ध में छोटा व्यास १२ है और बड़ा व्यास
३६ है । परिधि और परिणामी क्षेत्रफल क्या हैं ? ॥ २२ ॥
(१९) परिधि और क्षेत्रफल का माप यहाँ (परिधि / व्यास = π) का मान ३ लेकर दिया गया है ।
(२१) ऊनेन्द्र (आयतवृत्त या अंडाकृति) की परिधि के लिये दिया गया सूत्र स्पष्ट रूप से
कोई भिन्न प्रकार का अनुमान है । ऊनेन्द्र का क्षेत्रफल (π. अ. ब.) होता है, जहाँ अ और ब इस
आयत वृत्त की क्रमशः बड़ी और छोटी अर्धाक्ष (semiaxes) हैं । यदि π का मान ३ लें तब
π. अ. ब = ३ अ. ब होता है । परन्तु इस गाथा में दिये गये सूत्र से क्षेत्रफल का माप
{ (२ अ + २ ब / २) २ } १/४ . २ ब = २ अब + ब² होता है ।
ग० सा० सं०-२४
१८४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. २३-
शङ्खाकारवृत्तस्य फलानयनसूत्रम्—
वदनाधोनो व्यासस्त्रिगुणः परिधिस्तु कम्बुकावृत्ते ।
वलयार्धकृतिर्यंशो मुखार्धवर्गत्विपाद्युतः ॥ २३ ॥
अत्रोद्देशकः
व्यासोऽष्टादश हस्ता मुखविस्तारोऽयमपि च चत्वारः ।
कः परिधिः किं गणितं कथय त्वं कम्बुकावृत्ते ॥ २४ ॥
निम्नोन्नतवृत्तयोः फलानयनसूत्रम्—
परिधेश्च चतुर्थांगो विष्कम्भगुणः स विद्धि गणितफलम् ।
चत्वाले कूर्मनिभे क्षेत्रे निम्नोन्नते तस्मात् ॥ २५ ॥
शंख के आकार की वक्ररेखीय आकृति का परिणामी क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
शंख के आकार के वक्ररेखीय ( curvilinear ) आकृति के सम्बन्ध में, सबसे बड़ी चौड़ाई
को मुख की अर्द्ध राशि द्वारा हासित और ३ द्वारा गुणित करने पर परिमिति ( परिधि ) प्राप्त होती है ।
इस परिमिति की अर्द्धराशि के वर्ग के एक तिहाई भाग को मुख की अर्द्धराशियों के वर्ग की तीन चौथाई
राशि द्वारा हासित करते हैं; इस प्रकार क्षेत्रफल प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
उदाहरणार्थ एक प्रश्न
शंख (कम्बुकावृत्त) की आकृति के सम्बन्ध में चौड़ाई १८ हस्त और मुख ४ हस्त है । उसकी
परिमिति तथा क्षेत्रफल निकालो ॥ २४ ॥
नतोदर और उन्नतोदर वर्तुल तलों के क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
समझो कि परिधि की एक चौथाई राशि को व्यास द्वारा गुणित करने पर परिणामी क्षेत्रफल
प्राप्त होता है । इस प्रकार चत्वाल और कछुवे की पीठ जैसे नतोदर और उन्नतोदर क्षेत्रों का क्षेत्रफल
प्राप्त करना पड़ता है ॥ २५ ॥
( २३ ) यदि अ व्यास हो और म मुख का माप हो, तब ३ ( अ - १/२ म ) परिधि का माप होता
है और { ३ ( अ - १/२ म ) / २ }² × १/३ + ३/४ × ( म / २ )² क्षेत्रफल का माप होता है । दिये हुए वर्णन से
आकृति का आकार स्पष्ट नहीं है । परन्तु परिधि और क्षेत्रफल के लिये दिये गये मानों से वह एक ही
व्यास पर दो और भिन्न-भिन्न व्यास वाले वृत्तों को खींचकर प्राप्त हुई आकृति का आकार माना जा
सकता है, जो ६ वीं गाथा के नोट में १२ वीं आकृति में बतलाया गया है ।
( २५ ) यहाँ निर्दिष्ट क्षेत्रफल गोलीय खंड का ज्ञात होता है । प्रतीक रूप से यह क्षेत्रफल
( प/४ × व ) के बराबर है, जहाँ प छेदीय वृत्त ( किनार ) की परिधि है और व व्यास है । परन्तु इस
प्रकार के गोलीय खंड के तल का क्षेत्रफल ( २ × π × त्र × उ ) होता है, जहाँ π = परिधि / व्यास ,
त्र = केन्द्रीय वृत्त ( किनार ) की त्रिज्या, और उ गोलीय खंड की ऊँचाई है ।
-७. ३० ] क्षेत्रगणितगणव्यवहारः [ १८७
अत्रोद्देशकः
चत्वालक्षेत्रस्य व्यासस्तु भसंख्यकः परिधिः । षट्पञ्चाशद्दृष्टं गणितं तस्यैव किं भवति ॥२६॥
कूर्मनिभस्योन्नतवृत्तस्योदाहरणम् —
विष्कम्भः पञ्चदश दृष्टः परिधिश्च षट्त्रिंशत् ।
कूर्मनिभे क्षेत्रे किं तस्मिन् व्यवहारजं गणितम् ॥ २७ ॥
अन्तश्चक्रवालवृत्तक्षेत्रस्य बहिश्चक्रवालवृत्तक्षेत्रस्य च व्यवहारफलानयनसूत्रम्—
निर्गमसहितो व्यासस्त्रिगुणो निर्गमगुणो बहिर्गणितम् ।
रहिताधिगमव्यासादभ्यन्तरचक्रवालवृत्तस्य ॥ २८॥
अत्रोद्देशकः
व्यासोऽष्टादश हस्ताः पुनर्बहिर्निर्गतास्त्रयस्तत्र ।
व्यासोऽष्टादश हस्ताश्चान्तः पुनरधिगतास्त्रयः किं स्यात् ॥ २९ ॥
समवृत्तक्षेत्रस्य व्यावहारिकफलं च परिधिप्रमाणं च व्यासप्रमाणं च संयोज्य एतत्संयोग-
संख्यामेव स्वीकृत्य तत्संयोगप्रमाण राशेः सकाशात् पृथक् परिधिव्यासफलानां संख्यानयनसूत्रम्—
गणिते द्वादशगुणिते मिश्रप्रक्षेपकं चतुःषष्टिः । तस्य च मूलं कृत्वा परिधिः प्रक्षेपकप दोनः ॥ ३० ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
चत्वाल (होम वेदी का अग्निकुण्ड) क्षेत्र के क्षेत्रफल के सम्बन्ध में व्यास २७ है और परिधि
५६ है । इस कुण्ड का क्षेत्रफल निकालो ॥ २६ ॥
- कछुवे की पीठ की तरह उन्नतोदर वर्तुलतल के लिये उदाहरणार्थ प्रश्न
व्यास १५ है और परिधि ३६ है । कछुवे की पीठ की भाँति इस क्षेत्र का व्यावहारिक
क्षेत्रफल निकालो ॥ २७ ॥
भीतरी कङ्कण और बाहरी कङ्कण के क्षेत्रफल का व्यावहारिक मान निकालने के लिये नियम—
भीतरी व्यास को कङ्कणक्षेत्र की चौड़ाई द्वारा बढ़ाकर जब ३ द्वारा गुणित किया जाता है, और
कङ्कणक्षेत्र की चौड़ाई द्वारा गुणित किया जाता है, तब बाहरी कङ्कण का क्षेत्रफल उत्पन्न होता है । इसी
प्रकार भीतरी कङ्कण के क्षेत्रफल को कङ्कण की चौड़ाई द्वारा हासित व्यास द्वारा गुणित करने से
प्राप्त करते हैं ॥ २८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
व्यास १८ हस्त है, और बाहरी कङ्कण क्षेत्र की चौड़ाई ३ है; व्यास १८ हस्त है, और फिर से
भीतरी कङ्कण की चौड़ाई ३ हस्त है । प्रत्येक दशा में कङ्कण का क्षेत्रफल निकालो ॥ २९ ॥
वृत्त आकृति की परिधि, व्यास और क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम, जबकि क्षेत्रफल, परिधि
और व्यास का योग दिया गया हो—
१२ द्वारा गुणित उक्त तीन राशियों के मिश्रित योग में प्रक्षेपित ६४ जोड़ते हैं, और इस योग का
वर्गमूल निकालते हैं । तदुपरांत इस वर्गमूल राशि को प्रक्षेपित ६४ के वर्गमूल द्वारा हासित करने से
परिधि का माप प्राप्त होता है ॥ ३० ॥
(२८) अन्तश्चक्रवाल वृत्तक्षेत्र और बहिश्चक्रवाल वृत्तक्षेत्र के आकार ७ वीं गाथा के नोट में
कथित ने मिक्षेत्र के आकार के समान हैं । इसलिये वह नियम जो इन सब आकृतियों के क्षेत्रफल निकालने
के लिये है, व्यवहार में समान साधित होता है ।
(३०) यह नियम निम्नलिखित बीजीय निरूपण से स्पष्ट हो जावेगा —
१८८ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ३१-
अत्रोद्देशकः
परिधिव्यासफलानां मिश्रं षोडशशतं सहस्रयुतं ।
कः परिधिः किं गणितं व्यासः को वा ममाचक्ष्व ॥ ३१ ॥
यवाकारमर्दलाकारपणवाकारवज्राकाराणां क्षेत्राणां व्यावहारिकफलानयनसूत्रम्—
यवमुरजपणवशक्रायुधसंस्थानप्रतिष्ठितानां तु ।
मुखमध्यसमासार्धं त्वायामगुणं फलं भवति ॥ ३२ ॥
अत्रोद्देशकः
यवसंस्थानक्षेत्रस्यायामोऽशीतिरस्य विष्कम्भः । मध्यश्चत्वारिंशत्फलं भवेत्किं ममाचक्ष्व ॥३३॥
आयामोऽशीतिरयं दण्डा मुखमस्य विंशतिर्मध्ये । चत्वारिंशत्क्षेत्रे मृदङ्गसंस्थानके ब्रूहि ॥ ३४ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी वृत्त की परिधि, व्यास और क्षेत्रफल का योग १११६ है, उस वृत्त की परिधि, गणना
किया हुआ क्षेत्रफल और व्यास के मापों को प्राप्त करो ॥ ३१ ॥
लम्बाई की ओर से फाड़ने से प्राप्त ( अन्वायाम छेद के ) (१) यवधान्य (२) मर्दल (३) पणव
और (४) वज्र आकार की वस्तुओं के व्यावहारिक क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
यवधान्य, मुरज, पणव और वज्र के आकार के क्षेत्रफलों के सम्बन्ध में इष्ट माप वह है जो अंत
और मध्य माप के योग की अर्द्धराशि को लम्बाई द्वारा गुणित करने पर प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी मृदंग के आकार के क्षेत्र का क्षेत्रफल निकालो जो लम्बाई में ८० दंड और अंत ( मुख )
में २० तथा मध्य में ४० दंड हो ॥ ३४ ॥ किसी क्षेत्र के सम्बन्ध में जिसका आकार पणव समान
मानलो प वृत्त की परिधि है । चूँकि π का मान ३ लिया गया है, इसलिये व्यास = प / ३
और ३ · (प² / ३६) वृत्त का क्षेत्रफल है । यदि परिधि, व्यास और वृत्त के क्षेत्रफल, इन तीनों, का मिश्रित
योग म हो, तो नियम में दिये गया सूत्र प = √(१२ म + ६४) - √६४ को समीकरण
प + प / ३ + ३ · (प² / ३६) = म द्वारा सरलतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं ।
( ३२ ) मुरज का अर्थ मर्दल तथा मृदंग भी होता है । गाथा में कथित विभिन्न आकृतियों के
आकार निम्नलिखित हैं—
यवाकार क्षेत्र मुरजाकार क्षेत्र पणवाकार क्षेत्र वज्राकार क्षेत्र
समस्त आकृतियों के क्षेत्रफल के माप इस गाथा में दिये गये नियमानुसार अनुमानतः ठीक हैं,
क्योंकि नियम इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक सीमावर्ती वक्ररेखा उन सरल रेखाओं के योग के
बराबर है, जो वक्रों के सिरों ( छोरों अथवा अन्तों ) को मध्य बिन्दु के मिलाने से प्राप्त होती हैं ।
-७. ३९ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १८९
पणवाकारक्षेत्रस्यायामः सप्तसप्ततिर्दण्डाः । मुखयोर्विस्तारोऽष्टौ मध्ये दण्डास्तु चत्वारः ॥ ३५ ॥
वज्राकृतेस्तथास्य क्षेत्रस्य षडप्रनवतियायामः ।
मध्ये सूचिर्मुखयोस्त्रयोदश त्र्यंशसंयुता दण्डाः ॥ ३६ ॥
उभयनिषेधादिक्षेत्रफलानयनसूत्रम्—
व्यासात्स्वायामगुणाद्विष्कम्भार्धघ्नदीर्घमुत्सृज्य ।
त्वं वद निषेधमुभयोस्तदर्धपरिहीणमेकस्य ॥ ३७ ॥
अत्रोद्देशकः
आयामः षट्त्रिंशद्विस्तारोऽष्टादशैव दण्डास्तु ।
उभयनिषेधे किं फलमेकनिषेधे च किं गणितम् ॥ ३८ ॥
बहुविधवज्राकाराणां क्षेत्राणां व्यावहारिकफलानयनसूत्रम् –
रज्ज्वर्धकृतिस्त्र्यंशो बाहुविभक्तो निरेकबाहुगुणः ।
सर्वेषामश्रवतां फलं हि बिम्बान्तरे चतुर्थांशः ॥ ३९ ॥
है, लम्बाई ७७ दंड, दोनों मुखों में प्रत्येक का माप ८ दंड और मध्य का माप ४ दंड है । इसके क्षेत्र-
फल का माप बतलाओ ॥ ३५ ॥ इसी प्रकार, किसी वज्राकार क्षेत्र की लम्बाई ९६ दंड, मध्य में केवल
मध्य बिन्दु है; और मुखों में से प्रत्येक का माप १३⅓ दंड है । इसका क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ३६ ॥
उभयनिषेध क्षेत्र के क्षेत्रफल को निकालने के लिये नियम —
लम्बाई और चौड़ाई के गुणनफल में से लम्बाई और आधी चौड़ाई के गुणनफल को घटाने
पर उभयनिषेध क्षेत्रफल प्राप्त होता है । जो लम्बाई और आधी चौड़ाई के गुणनफल में से उसी घटाई
जाने वाली राशि की अर्द्धराशि घटाई जाने पर प्राप्त होता है, वह एकनिषेध आकृति का क्षेत्रफल
होता है ॥ ३७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
लम्बाई ३६ है, चौड़ाई केवल १८ दंड है । उभयनिषेध तथा एक निषेध क्षेत्र के क्षेत्रफलों
को अलग अलग निकालो ॥ ३८ ॥
बहुविधवज्र के आकार की रूपरेखा वाले क्षेत्रों के व्यावहारिक क्षेत्रफल के माप को निकालने
के लिये नियम —
परिमिति की अर्द्धराशि के वर्ग की एक तिहाई राशि को भुजाओं की संख्या द्वारा भाजित कर,
और तब एक कम भुजाओं की संख्या द्वारा गुणित करने पर, भुजाओं से बने हुए समस्त क्षेत्रों के
( वज्राकार ) क्षेत्रफल का माप प्राप्त होता है । इस फल का चतुर्थांश संस्पर्शी ( एक दूसरे को स्पर्श
करने वाले ) वृत्तों द्वारा घिरे हुए क्षेत्र का क्षेत्रफल होता है ॥ ३९ ॥
( ३७ ) इस गाथा में कथित आकृतियाँ नीचे दी गई हैं—
ये आकृतियाँ किसी चतुर्भुजक्षेत्र को उसके
दो विकर्णों द्वारा चार त्रिभुजों में बाँट देने पर प्राप्त
हुई दिखाई देती हैं। उभयनिषेध आकृति, इस
चतुर्भुज के दो सम्मुख त्रिभुजों को हटाने पर प्राप्त
होती है, और एकनिषेध आकृति ऐसे केवल एक
त्रिभुज को हटाने पर प्राप्त होती है ।
( ३९ ) इस गाथा में कथित नियम कोई भी संख्या की भुजाओं से बनी हुई आकृतियों का
१९० ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ४०-
अत्रोद्देशकः
षड्बाहुकस्य बाहोर्विष्कम्भः पञ्च चान्यस्य ।
व्यासस्त्रयो भुजस्य त्वं षोडशबाहुकस्य वद ॥ ४० ॥
त्रिभुजक्षेत्रस्य भुजः पञ्च प्रतिबाहुरपि च सप्त धरा षट् ।
अन्यस्य षडश्रस्य ह्येकादिषडन्तविस्तारः ॥ ४१ ॥
मण्डलचतुष्टयस्य हि नवविष्कम्भस्य मध्यफलम् ।
षट्पञ्चचतुर्व्यासा वृत्तत्रितयस्य मध्यफलम् ॥ ४२ ॥
धनुराकारक्षेत्रस्य व्यावहारिकफलानयनसूत्रम्—
कृतवेषुगुणसमासं बाणार्धगुणं शरासने गणितम् ।
शरवर्गात्पञ्चगुणाज्ज्यावर्गयुतात्पदं काष्ठम् ॥ ४३ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
छः भुजाओं वाली आकृति की एक भुजा ५ है, और १६ भुजाओं वाली आकृति की एक भुजा
३ है । प्रत्येक दशा में क्षेत्रफल बताओ ॥ ४० ॥ त्रिभुज के सम्बन्ध में एक भुजा ५ है, सम्मुख
( दूसरी ) भुजा ७ है, और आधार ६ है । दूसरी छः भुजाकार आकृति में भुजाएँ क्रमवार १ से ६
तक हैं । प्रत्येक दशा में क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ४१ ॥ जिनमें से प्रत्येक का व्यास ९ है, ऐसे
चार समान एक दूसरे को स्पर्श करने वाले वृत्तों द्वारा घिरे हुए क्षेत्र का क्षेत्रफल क्या है ? तीन एक
दूसरे को स्पर्श करने वाले क्रमशः ६, ५ और ४ माप के व्यासवाले वृत्तों के द्वारा घिरे हुए क्षेत्र का
क्षेत्रफल भी बतलाओ ॥ ४२ ॥
धनुष के आकार की रूपरेखा है जिसकी ऐसे आकार वाली आकृति का व्यावहारिक क्षेत्रफल
निकालने के लिये नियम—
बाण और ज्या ( ताँत या डोरी ) के मापों को जोड़कर योगफल को बाण के माप की अर्द्ध राशि
द्वारा गुणित करने से, धनुषाकार क्षेत्र का क्षेत्रफल प्राप्त होता है । बाण के माप के वर्ग को ५ द्वारा
गुणित कर, और तब उसमें ताँत ( डोरी ) के वर्ग को मिलाने से प्राप्त राशि का वर्गमूल धनुष की
धनुषाकार काष्ठ की लम्बाई होती है ॥ ४३ ॥
क्षेत्रफल देता है । यदि भुजाओं के मापों के योग की आधी राशि य हो, और भुजाओं की संख्या न हो,
तो क्षेत्रफल = य² / ३ × (न - १) / न होता है । यह सूत्र त्रिभुज, चतुर्भुज, षट्भुज,
और वृत्त को अनन्त भुजाओं की आकृति मानकर, उनके सम्बन्ध में
व्यावहारिक क्षेत्रफल का मान देता है । नियम का दूसरा भाग एक
दूसरे को स्पर्श करने वाले वृत्तों के द्वारा घिरे क्षेत्र के विषय में है ।
इस नियमानुसार प्राप्त क्षेत्रफल भी आनुमानिक होता है । पार्श्व
में दिया गया चित्र, चार संस्पर्शी वृत्तों द्वारा सीमित क्षेत्र है ।
( ४३ ) धनुषाकार क्षेत्र रूपरेखा में, वास्तव में, वृत्त की
अवधा ( खण्ड ) जैसा होता है । यहाँ धनुष चाप है, धनुष की डोरी ( ज्या ) चापकर्ण है, और बाण
चाप तथा डोरी के बीच की महत्तम लम्ब रूप दूरी होती है । यदि च, क और ल इन तीनों रेखाओं
की लम्बाईयों को निरूपित करते हों, तो गाथा ४३ और ४५ में दिये नियमों के अनुसार यहाँ
-७. ४६ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९१
अत्रोद्देशकः
ज्या षड्िंवशतिरेषा त्रयोदशेषुश्च कार्मुकं दृष्टम्।
किं गणितमस्य काष्ठं किं वाचक्ष्वाशु मे गणक ॥ ४४ ॥
बाणगुणप्रमाणानयनसूत्रम्—
गुणचापकृतिविशेषात् पञ्चहृतात्पदमिरिषुः समुद्दिष्टः।
शरवर्गात्पञ्चगुणादूना धनुषः कृतिः पदं जीवा ॥ ४५ ॥
अत्रोद्देशकः
अस्य धनुःक्षेत्रस्य शरोऽत्र न ज्ञायते परस्यापि।
न ज्ञायते च मौर्वी तद्द्वयमाचक्ष्व गणितज्ञ ॥ ४६ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक धनुषाकार क्षेत्र की डोरी २६ है एवं बाण १३ है । हे गणक, शीघ्रही मुझे इसके क्षेत्रफल
और झुके हुए काष्ठ का माप बतलाओ ॥ ४४ ॥
धनुषाकार क्षेत्र के सम्बन्ध में बाणमाप और गुण ( डोरी ) प्रमाण निकालने के लिये नियम—
डोरी और झुके हुए धनुष के वर्गों के अन्तर को ५ द्वारा भाजित करते हैं । परिणामी भजन
फल का वर्गमूल बाण का इष्ट माप होता है । बाण के वर्ग को ५ द्वारा गुणित कर, प्राप्त गुणनफल को
धनुष के चाप के वर्ग में से घटाते हैं । इस परिणामी राशि का वर्गमूल डोरी के संवादी माप को
देता है ॥ ४५ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
धनुषाकार क्षेत्र के बाण का माप अज्ञात है, और दूसरे ऐसे ही क्षेत्र की डोरी का माप अज्ञात
है । हे गणितज्ञ, इन दोनों मापों को निकालो ॥ ४६ ॥
धनुष क्षेत्र का क्षेत्रफल निकालने के लिये दिया गया सूत्र, चीन की सम्भवतः पुस्तकों को २१३ ईस्वी
पूर्व में जलाये जाने की घटना से पूर्व की पुस्तक च्यु—चांग सुआन—चु ( नवाध्यायी अंकगणित ) में
भी इसी रूप में दृष्टिगत होता है ।
क्षेत्रफल = ( क + ल ) × ल / २ यहाँ च = चाप,
धनुष की लम्बाई = √ ५ल² + क² क = चापकर्ण,
ल = लम्ब है ।
बाण की लम्बाई = {√ च² - क² } १/५ सूक्ष्म मानों के लिये इस अध्याय की ७३½ और
७४½ वीं गाथाओं को देखिये ।
पुनः धनुष की डोरी की लम्बाई = √ च² - ५ ल²
जम्बू द्वीप प्रज्ञप्ति ( ६/९ ) में तथा त्रिलोक प्रज्ञप्ति.( ४/२५९८ ) में यह मान क्रमशः इस प्रकार
दिया गया है—
जीवा = √( (व्यास - बाण) ४ बाण कूलिज के अनुसार पायथेगोरस के साध्य पर आधारित
इस सूत्र का उद्गम बाबुल में प्रायः २६०० ईस्वी पूर्व
व्यास = [ ४ (बाण)² + (जीवा)² ] / ४ बाण स्फानलिपि ग्रंथों में दृष्टि गत हुआ है । इस सम्बन्ध
में तिलोय पण्णत्तिका गणित द्रष्टव्य है ।
१९२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ४७-
बहिरन्तश्चतुरश्रकवृत्तस्य व्यावहारिकफलानयनसूत्रम्—
बाह्ये वृत्तस्येदं क्षेत्रस्य फलं त्रिसंगुणं दलितम् ।
अभ्यन्तरे तदर्धं विपरीते तत्र चतुरश्रे ॥ ४७ ॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चदशबाहुकस्य क्षेत्रस्याभ्यन्तरं बहिर्गणितम् ।
चतुरश्रस्य च वृत्तव्यवहारफलं ममाचक्ष्व ॥ ४८ ॥
इति व्यावहारिकगणितं समाप्तम् ।
अथ सूक्ष्मगणितम्
इतः परं क्षेत्रगणिते सूक्ष्मगणितव्यवहार मुदाहरिष्यामः । तद्यथा १ आबाधावलम्ब-
कानयनसूत्रम्—
भुजकृत्यन्तरभूहृतभूसंक्रमणं त्रिबाहुकाबाधे ।
तद्भुजवर्गान्तरपदमवलम्बकमाहुराचार्याः ॥ ४९ ॥
१. इसके पश्चात् M में निम्नलिखित और जुड़ा है—
त्रिभुज क्षेत्रस्य भुजद्वयसंयोगस्थानमारभ्यअधस्स्थित भूमि संस्पृष्ट रेखाया नाम अवलम्बकः स्यात् ।
चतुर्भुज के बहिर्लिखित और अन्तर्लिखित वृत्त के क्षेत्रफल के व्यावहारिक मान को निकालने
के लिये नियम--
अंतर्लिखित चतुर्भुज के क्षेत्रफल के माप की तिगुनी राशि की अर्द्धराशि ऐसे बाहरी परिगत वृत्त
के क्षेत्रफल का माप होती है । उस दशा में जबकि वृत्त अन्तर्लिखित हो और चतुर्भुज बहिर्गत हो, तब
ऊपर के प्राप्त माप की अर्द्धराशि इष्ट राशि होती है ॥ ४७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
चतुर्भुज क्षेत्र की प्रत्येक भुजा १५ है । मुझे अंतर्गत और बहिर्गत वृत्तों के व्यावहारिक क्षेत्रफल
के माप बतलाओ ॥ ४८ ॥
इस प्रकार क्षेत्रगणित व्यवहार में व्यावहारिक गणित नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
सूक्ष्म गणित
इसके पश्चात् हम गणित में क्षेत्रफलों के माप सम्बन्धी सूक्ष्म गणित नामक विषय का प्रतिपादन
करेंगे । वह इस प्रकार है—
किसी दिये हुए त्रिभुज के आबाधाओं (खंड जिनमें की आधार लम्ब के द्वारा विभाजित हो जाता
है ) और अवलम्ब ( शीर्ष से आधार पर गिराया हुआ लम्ब ) के माप निकालने के लिये नियम--
भुजाओं के वर्गों को आधार द्वारा भाजित करने से प्राप्त राशि और आधार के बीच संक्रमण
क्रिया करने से त्रिभुज की आबाधाओं ( आधार के खंडों ) के माप प्राप्त होते हैं । आचार्य कहते हैं
कि इन आबाधाओं में से एक, और संवादी आसन्न भुजा के वर्गों के अंतर का वर्गमूल अवलम्ब का
माप होता है ॥ ४९ ॥
( ४७ ) यहाँ दिया गया सूत्र वर्ग के सम्बन्ध में ठीक माप देता है, परन्तु अन्य चतुर्भुजों के
सम्बन्ध में जब π का मान ३ लेते हैं, तब केवल अनुमानिक मान प्राप्त होता है ।
( ४९ ) बीजीय रूप से प्ररूपित होने पर—
-७. ६१ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९५
वर्गेस्त्रयोदशानां त्रिसमचतुर्बाहुके पुनर्भूमिः ।
सप्त चतुरशतयुक्तं कर्णाबाधावलम्बगणितं किम् ॥ ५८ ॥
विषमचतुरश्रबाहू त्रयोदशाभ्यस्तपञ्चदशविंशतिकौ ।
पञ्चघनो वदनमधस्त्रिशतं कान्यत्र कर्णमुखफलानि ॥ ५९ ॥
इतः परं वृत्तक्षेत्राणां सूक्ष्म फलानयनसूत्राणि । तत्र समवृत्तक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलानयन
सूत्रम्—
वृत्तक्षेत्रव्यासो दशपदगुणितो भवेत्परिक्षेपः ।
व्यासचतुर्भागगुणः परिधिः फलमर्धमर्धे तत् ॥ ६० ॥
अत्रोद्देशकः
समवृत्तव्यासोऽष्टादश विष्कम्भश्च षष्टिरन्यस्य ।
द्वाविंशतिरपरस्य क्षेत्रस्य हि के च परिधिफले ॥ ६१ ॥
१३ × २० हैं। ऊपरी भुजा (५)³ है, और नीचे की भुजा ३०० है । विकर्ण से आरम्भ कर सबके
मान यहाँ क्या क्या हैं ? ॥ ५९ ॥
इसके पश्चात् वक्ररेखीय क्षेत्रों के सम्बन्ध में सूक्ष्म मानों को निकालने के लिये नियम दिये
जाते हैं । उनमें से समवृत्त के सम्बन्ध में सूक्ष्म मान निकालने के लिये नियम—
वृत्त का व्यास १० के वर्गमूल से गुणित होकर परिधि को उत्पन्न करता है । परिधि को एक
चौथाई व्यास से गुणित करने पर क्षेत्रफल प्राप्त होता है । अर्द्धवृत्त के सम्बन्ध में यह इसका आधा
होता है ॥ ६० ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी वृत्ताकार क्षेत्र के सम्बन्ध में वृत्त का व्यास १८ है; दूसरे के सम्बन्ध में ६० है; एक
और अन्य के सम्बन्ध में २२ है । परिधियां और क्षेत्रफल क्या-क्या हैं ? ॥ ६१ ॥ अर्द्धवृत्ताकार क्षेत्र
चक्रीय चतुर्भुजों के लिये ठीक हैं । लम्ब अथवा विकर्णों के मानों को पहिले से बिना जाने हुए चतुर्भुज
के क्षेत्रफल को निकालने के प्रयत्न के विषय में भास्कराचार्य परिचित थे । यह उनकी लीलावती ग्रन्थ
की निम्नलिखित गाथा से प्रकट होता है—
लम्बयोः कर्णयोर्वैकमनिर्दिश्यापरान् कथम् ।
पृच्छत्यनियतत्वेऽपि नियतं चापि तत्फलम् ॥
संपृच्छकः पिशाचो वा वक्ता वा नितरां ततः ।
यो न वेत्ति चतुर्बाहुक्षेत्रस्यानियतां स्थितिम् ॥
(६०) इस गाथानुसार π = परिधि/व्यास का मान √१० = ३·१६...है । इससे भी
सूक्ष्म मान प्राप्त करने के लिये नवीं शताब्दी की धवला टीका ग्रंथों में निम्नलिखित रीति दी है—
१६ (व्यास) + १६ / ११३ + ३ (व्यास) = परिधि । इस सूत्र के वाम पक्ष के प्रथम पद में से अंश
का + १६ हटा देने पर π का मान ३५५/११३ अथवा ३·१४१५९३ प्राप्त होता है, जिसे चीन में ४७६ ईस्वी
पश्चात् त्सु-शुंग-चिह द्वारा उपयोग में लाया गया है । वास्तव में यह सूत्र एक प्रदेश के व्यास के सम्बन्ध
में प्रयुक्त हुआ है । असंख्यात प्रदेशों वाले अंगुल आदि व्यास के माप की इकाइयों के लिये + १६ का
मान नगण्य हो जाता है, और चीनी मान प्राप्त हो जाता है । आर्यभट द्वारा दिया गया π का मान
६२८३२/२०००० = ३·१४११६ है । भास्कराचार्य द्वारा भी यह मान (३९२७/१२५०) रूप में हासित कर प्ररूपित
किया गया है ।
१९६ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ६२-
द्वादशविष्कम्भस्य क्षेत्रस्य हि चार्धवृत्तस्य ।
षट्त्रिंशद्व्यासस्य कः परिधिः किं फलं भवति ॥ ६२ ॥
आयतवृत्तक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
व्यासकृतिःषड्गुणिता द्विसंगुणायामकृतियुता ( पदं ) परिधिः ।
व्यासचतुर्भागगुणश्चायतवृत्तस्य सूक्ष्मफलम् ॥ ६३ ॥
अत्रोद्देशकः
आयतवृत्तायामः षट्त्रिंशद्द्वादशस्य विष्कम्भः ।
कः परिधिः किं गणितं सूक्ष्मं विगणय्य मे कथय ॥ ६४ ॥
शङ्खाकारक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
वदनार्धोनो व्यासो दशपदगुणितो भवेत्परिक्षेपः ।
मुखदलरहितव्यासार्धवर्गमुखचरणकृतियोगः ॥ ६५ ॥
दशपदगुणितः क्षेत्रे कम्बुनिभे सूक्ष्मफलमेतत् ॥ ६५½ ॥
का व्यास १२ है । दूसरे क्षेत्र का व्यास ३६ है । बतलाओ कि परिधि क्या है और क्षेत्रफल
क्या है ? ॥ ६२ ॥
आयतवृत्त ( इलिप्स ) सम्बन्धी सूक्ष्म मानों को निकालने के लिये नियम—
छोटे व्यास का वर्ग ६ द्वारा गुणित किया जाता है, और बड़े व्यास की लम्बाई की दुगुनी राशि
के वर्ग को उसमें जोड़ा जाता है। इस योग का वर्गमूल परिधि का माप होता है। जब इस परिधि
के माप को छोटे व्यास की एक चौथाई राशि द्वारा गुणित करते हैं, तब उनेन्द्र का सूक्ष्म क्षेत्रफल
प्राप्त होता है ॥ ६३ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इलिप्स के सम्बन्ध में बड़े व्यास की लम्बाई ३६ और छोटे व्यास की १२ है, गणना के पश्चात्
बतलाओ कि परिधि क्या है और सूक्ष्म क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ६४ ॥
शंख के आकार की आकृति के सम्बन्ध में सूक्ष्म मानों को निकालने के लिये नियम—
आकृति की सबसे बड़ी चौड़ाई ( छोटे व्यास ) को मुख की चौड़ाई की अर्द्धराशि द्वारा हासित
कर, और तब १० के वर्गमूल द्वारा गुणित करने पर परिमाप ( perimeter ) उत्पन्न होता है ।
आकृति की महत्तम चौड़ाई की अर्द्धराशि के वर्ग को मुख की आधी चौड़ाई द्वारा हासित करने से प्राप्त
राशि में मुख की चौड़ाई की एक चौथाई राशि के वर्ग को जोड़ते हैं । परिणामी योग को १० के
वर्गमूल द्वारा गुणित करते हैं । प्राप्त राशि शंख आकृति का सूक्ष्म क्षेत्रफल होता है ॥ ६५½ ॥
( ६३ ) यदि बड़ा व्यास 'अ' और छोटा व्यास 'ब' हो, तो इस नियमानुसार परिधि
√ ६ब² + ४अ² होती है, और क्षेत्रफल : ¼ ब × √ ६ब² + ४अ² होता है । इस गाथा में
( हस्तलिपि में ) परिधि प्राप्त करने के लिये प्राप्त राशि के वर्गमूल निकालने का कथन भूल से छूट
गया है । यहाँ दिया गया क्षेत्रफल का सूत्र केवल एक अनुमान है, और वह वृत्त के क्षेत्रफल की
साम्यता पर आधारित है, जो π × व × व/४ द्वारा प्ररूपित होता है : जहाँ व व्यास है और ( π व )
परिधि है ।
( ६५½ ) बीजीय रूप से, परिधि = ( अ - ½ म ) × √ १० ; तथा,
-७. ५३ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९३
सूक्ष्मगणितानयनसूत्रम्—
भुजयुत्यर्धचतुष्काद्भुजहीनाद्घातितातपदं सूक्ष्मम् ।
अथवा मुखतलयुतिदलमवलम्बगुणं न विषमचतुरश्रे ॥ ५० ॥
अत्रोद्देशकः
त्रिभुजक्षेत्रस्याष्टौ दण्डा भूर्बाहुकौ समस्य त्वम् ।
सूक्ष्मं वद गणितं मे गणितविद्वल्लम्बकाबाधे ॥ ५१ ॥
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रे त्रयोदश स्युर्भुजद्वये दण्डाः ।
दश भूरस्याबाधे अथावलम्बं च सूक्ष्मफलम् ॥ ५२ ॥
विषमत्रिभुजस्य भुजा त्रयोदश प्रतिभुजा तु पञ्चदश ।
भूमिश्चतुर्दशास्य हि किं गणितं चावलम्बकाबाधे ॥ ५३ ॥
त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्रों के क्षेत्रफलों के सूक्ष्म माप निकालने के लिये नियम —
क्रमशः प्रत्येक भुजा द्वारा हासित भुजाओं के योग की अर्द्धराशि द्वारा निरूपित प्राप्त चार
राशियाँ एक साथ गुणित की जाती हैं। इस प्रकार प्राप्त गुणनफल का वर्गमूल क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप
होता है। अथवा क्षेत्रफल का माप, ऊपरी सिरे से आधार पर गिराये गये लम्ब को आधार और ऊपरी
भुजा के योग की अर्द्धराशि से गुणित करने पर प्राप्त होता है। पर यह बाद का नियम विषम चतुर्भुज
के सम्बन्ध में नहीं है ॥ ५० ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
समत्रिभुज की प्रत्येक भुजा ८ दंड है। हे गणितज्ञ, उसके क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप तथा
शीर्ष से आधार पर गिराये हुए लम्ब और इस तरह प्राप्त आधार के खंडों के सूक्ष्म मानों को
बतलाओ ॥ ५१ ॥ किसी समद्विबाहु त्रिभुज की बराबर भुजाओं में से प्रत्येक १३ दंड है और
आधार का माप १० है । क्षेत्रफल, लम्ब और आधार की आबाधाओं के सूक्ष्म मापों को निकालो
॥ ५२ ॥ विषम त्रिभुज की एक भुजा १३, सम्मुख भुजा १५ और आधार १४ है। इस क्षेत्र का
क्षेत्रफल, लम्ब और आधार की आबाधाओं के सूक्ष्म मान क्या हैं ? ॥ ५३ ॥
स₁ = ( स + (अ² - ब²) / स ) × १/२ ;
स₂ = ( स - (अ² - ब²) / स ) × १/२ ;
और ल = √(अ² - स₁²) अथवा √(ब² - स₂²) होता है । यहाँ अ, ब, स त्रिभुज की भुजाओं
का निरूपण करते हैं; स₁, स₂ ऐसे आधार के दो खंड हैं, जिनकी कुल लम्बाई स है, ल लम्ब है ।
( ५० ) बीजीय रूप से निरूपित करने पर,
किसी त्रिभुज का क्षेत्रफल = √ य ( य - अ ) ( य - ब ) ( य - स ) , जहाँ य भुजाओं के योग
की आधी राशि है । अ, ब, स भुजाओं के माप हैं ।
अथवा, क्षेत्रफल = (स / २) × ल , जहाँ ल शीर्ष से आधार पर गिराये गये लम्ब का मान है ।
ग० सा० सं०-२५
१९४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ५४-
• इतः परं पञ्चप्रकाराणां चतुरश्रक्षेत्राणां कर्णानयनसूत्रम्—
क्षितिहतविपरीतभुजौ मुखगुणभुजमिश्रितौ गुणच्छेदौ ।
छेदगुणौ प्रतिभुजयोः संवर्गयुतेः पदं कर्णौ ॥ ५४ ॥
अत्रोद्देशकः
समचतुरश्रस्य त्वं समन्ततः पञ्चबाहुकस्याशु ।
कर्णं च सूक्ष्मफलमपि कथय सखे गणिततत्त्वज्ञ ॥ ५५ ॥
आयतचतुरश्रस्य द्वादश बाहुश्च कोटिरपि पञ्च ।
कर्णः कः सूक्ष्मं किं गणितं चाचक्ष्व मे शीघ्रम् ॥ ५६ ॥
द्विसमचतुरश्रभूमिः षट्त्रिंशद्बाहुरेकषष्टिश्च ।
सोऽन्यश्चतुर्दशास्यं कर्णः कः सूक्ष्मगणितं किम् ॥ ५७ ॥
इसके पश्चात् पाँच प्रकार के चतुर्भुजों के विकर्णों के मान निकालने के लिये नियम—
आधार को बड़ी और छोटी, दाहिनी और बाईं भुजाओं के द्वारा गुणित करने से प्राप्त राशियों
को क्रमशः ऐसी दो अन्य राशियों में जोड़ते हैं, जो ऊपरी भुजा को दाहिनी और बाईं ओर की छोटी
और बड़ी भुजाओं द्वारा गुणित करने से प्राप्त होती हैं। परिणामी दो योग, गुणक और भाजक तथा
सम्मुख भुजाओं के गुणनफलों के योग सम्बन्धी भाजक और गुणन की संरचना करते हैं। इस प्रकार
प्राप्त राशियों के वर्गमूल विकर्णों के इष्ट माप होते हैं ॥ ५४ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जिसकी चारों ओर की प्रत्येक भुजा का माप ५ है, ऐसे समभुज चतुर्भुज के सम्बन्ध में
हे गणित तत्त्वज्ञ, विकर्ण तथा क्षेत्रफल के सूक्ष्म मान शीघ्र बतलाओ ॥ ५५ ॥ आयत क्षेत्र के सम्बन्ध
में क्षितिज भुजा माप में १२ है, और लम्ब रूप भुजा माप में ५ है । मुझे शीघ्र बतलाओ कि विकर्ण का
और क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप क्या क्या है ? ॥ ५६ ॥ समद्विबाहु चतुर्भुज ( समलम्ब चक्रीय चतुर्भुज )
की आधार भुजा ३६ है । एक भुजा ६१ है, और दूसरी भी उतनी ही है । ऊपरी भुजा १४ है ।
बतलाओ कि विकर्ण और क्षेत्रफल के सूक्ष्म माप क्या हैं ? ॥ ५७ ॥ समत्रिबाहु चतुर्भुज ( चक्रीय
समत्रिबाहु चतुर्भुज ) के सम्बन्ध में १३ का वर्ग समान भुजाओं में से एक का माप होता है । आधार
४०७ है । विकर्ण का माप तथा आधार के खण्डों का माप और लम्ब तथा क्षेत्रफल के माप
क्या क्या हैं ? ॥ ५८ ॥ किसी विषम चतुर्भुज की दाहिनी और बाईं भुजाएँ १३ × १५ और
चतुर्भुज क्षेत्र का क्षेत्रफल = √ ( य - अ ) ( य - ब ) ( य - स ) ( य - द ) ; यहाँ य, भुजाओं के योग
की अर्द्धराशि है, और अ, ब, स, द चतुर्भुज क्षेत्र की भुजाओं के माप हैं । अथवा, क्षेत्रफल = (ब + द)/२ × ल
( उस दशा के अपवाद को छोड़कर जबकि चतुर्भुज विषम होता है, जहाँ ल ऊपरी भुजा के अंतों से
आधार पर गिराये गये बराबर लम्बों में से किसी एक का माप है । त्रिभुज क्षेत्रों के लिये दिये गये ये
सूत्र ठीक हैं, परन्तु जो चतुर्भुज क्षेत्रों के लिये दिये गये हैं वे केवल चक्रीय चतुर्भुजों के सम्बन्ध में ठीक
हैं, क्योंकि उन्हीं मापों के लिये क्षेत्रफल तथा लम्ब का मान परिवर्तनशील हो सकता है ।
• ( ५४ ) बीजीय रूप से निरूपित चतुर्भुज क्षेत्र के विकर्ण का माप यह है—
√{ ( अस + बद ) ( अब + सद ) / ( अद + बस ) } अथवा √{ ( अस + बद ) ( अद + बस ) / ( अब + सद ) }, ये सूत्र केवल
-७. ६९½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९७
अत्रोद्देशकः
व्यासोऽष्टादश दण्डा मुखविस्तारोऽयमपि च चत्वारः ।
कः परिधिः किं गणितं सूक्ष्मं तत्कम्बुकावृत्ते ॥ ६६½ ॥
बहिश्चक्रवालवृत्तक्षेत्रस्य चान्तश्चक्रवालवृत्तक्षेत्रस्य च सूक्ष्मफलानयनसूत्रम्—
निर्गमसहितो व्यासो दशपदनिर्गमगुणो बहिर्गणितम् ।
रहितोऽधिगमनासावभ्यन्तरचक्रवालवृत्तस्य ॥ ६७½ ॥
अत्रोद्देशकः
व्यासोऽष्टादश दण्डाः पुनर्बहिर्निर्गतास्त्रयो दण्डाः ।
सूक्ष्मगणितं वद त्वं बहिरन्तश्चक्रवालवृत्तस्य ॥ ६८½ ॥
व्यासोऽष्टादश दण्डा अन्तः पुनरधिगताश्च चत्वारः ।
सूक्ष्मगणितं वद त्वं चाभ्यन्तरचक्रवालवृत्तस्य ॥ ६९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंख आकृति के वक्ररेखीय क्षेत्र के संबंध में महत्तम चौड़ाई १८ दंड है, और मुख की चौड़ाई ४
दंड है । इसकी परिमिति और सूक्ष्म क्षेत्रफल के माप क्या हैं ? ॥६६½॥
बाहर स्थित और भीतर स्थित ( बहिश्चक्रवाल और अंतश्चक्रवाल ) कंकण के संबंध में सूक्ष्म
मापों को निकालने के लिये नियम —
भीतरी व्यास में चक्रवाल वृत्त की चौड़ाई जोड़कर, प्राप्त राशि को १० के वर्गमूल तथा चक्र-
वाल वृत्त की चौड़ाई द्वारा गुणित करते हैं । इससे बहिश्चक्रवाल वृत्त का क्षेत्रफल प्राप्त होता है ।
बाहरी व्यास को चक्रवाल वृत्त की चौड़ाई द्वारा हासित करते हैं । प्राप्त राशि को १० के वर्गमूल
तथा चक्रवाल वृत्त की चौड़ाई द्वारा गुणित करने से अंतश्चक्रवाल वृत्त का क्षेत्रफल प्राप्त होता है ॥६७½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
चक्रवाल वृत्त का भीतरी अथवा बाहरी व्यास का माप १८ दंड है । चक्रवाल वृत्त की चौड़ाई
३ दंड है । बहिश्चक्रवाल वृत्त तथा अंतश्चक्रवाल वृत्त का सूक्ष्म माप बतलाओ ॥ ६८½ ॥ बाहरी
व्यास १८ दंड है । अंतश्चक्रवाल वृत्त की चौड़ाई ४ दंड है । अंतश्चक्रवाल वृत्त का सूक्ष्म क्षेत्रफल
निकालो ॥ ६९½ ॥
क्षेत्रफल = [{(अ - ३/२ म) × ½}² + (म/४)² ] × √१० ; जहाँ अ महत्तम चौड़ाई
का माप है और म शंख के मुख की चौड़ाई है । गाथा २३ के नोट के अनुसार यहाँ भी इस आकृति
को दो असमान अर्द्धवृत्तों द्वारा संरचित किया गया है ।
sits above or next to 'प्र'?
Wait, it's धनुर्गुणेष्प्रसाधने. Let's transcribe faithfully what is printed:
Wait, look at it: धनुर्गुणेष्प्रसाधने.
Let's check line 14:
"यवाकार क्षेत्र तथा धनुषाकार क्षेत्र के सम्बन्ध में सूक्ष्म मानों को निकालने के लिये नियम—"
Wait, in line 14: "धनुषाकार" - yes, printed as "धनुषाकार".
Line 15: "धनुष की डोरी को बाण की एक चौथाई राशि द्वारा गुणित करते हैं । प्राप्त फल को १० के"
Line 16: "वर्गमूल द्वारा गुणित करने पर धनुषाकार तथा यवाकार क्षेत्र के सम्बन्ध में क्षेत्रफल का सूक्ष्म रूप से"
Line 17: "ठीक मान प्राप्त होता है ॥ ७०½ ॥"
Line 18: "उदाहरणार्थ प्रश्न"
Line 19: "यवधान्य को बीच से फाड़ने से प्राप्त क्षेत्र की आकृति की महत्तम लम्बाई १२ दंड है; दो सिरे"
Line 20: "सुई-बिन्दु हैं, और बीच में चौड़ाई ४ दंड है। क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ७१½ ॥ धनुषाकार रूपरेखा"
Line 21: "वाली आकृति के संबंध में डोरी २४ है तथा बाण ४ है । क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप क्या है ? ॥ ७२½ ॥"
Line 22: "धनुष के वक्र का
-७. ७५½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९९
विपरीतक्रियायां सूत्रम्—
गुणचापकृतिविशेषात्तर्कहृतात्पदम्विषुः समुद्दिष्टः ।
शरवर्गात् षङ्गुणितादूनं¹ धनुषः कृतेः पदं जीवा ॥ ७४½ ॥
अत्रोद्देशकः
धनुराकारक्षेत्रे ज्या द्वादश षट् शरः काष्ठम् ।
न ज्ञायते सखे त्वं का जीवा कः शरस्तस्य ॥ ७५½ ॥
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१. B और M दोनों में उपर्युक्त पाठ है; पर इष्ट अर्थ “षङ्गुणितादूनाया धनुष्कृतेः पदं जीवा” से
निकलता है ।
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विपरीत क्रिया के सम्बन्ध में नियम—
डोरी के वर्ग और धनुष के वक्रकाष्ठ के वर्ग के अन्तर की ⅙ भाग राशि का वर्गमूल बाण का
माप होता है । धनुषकाष्ठ के वर्ग में से बाण के वर्ग की ६ गुनी राशि को घटाने से प्राप्त शेष का
वर्गमूल डोरी का माप होता है ॥ ७४½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
धनुषाकार आकृति की डोरी १२ है, और बाण ६ है । झुकी हुई काष्ठ का माप अज्ञात है । हे
मित्र, उसे निकालो । इसी आकृति के संबंध में डोरी और उसके बाण के माप को अलग-अलग किस
तरह निकालोगे, जब कि आवश्यक राशियाँ ज्ञात हों ? ॥ ७५½ ॥
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( ७३½-७४½ ) बीजीय रूप से, चाप = √( ६ ल² + क² ); लम्ब = √( (च² - क²) / ६ )
और चापकर्ण = √( च² - ६ ल² )
चापकर्ण और बाण के पदों में चाप का मान समीकरण के रूप में देने के लिये अर्द्धवृत्त बनानेवाले
चाप को आधार मानना पड़ता है । प्राप्त सूत्र को किसी भी अवधा ( वृत्त खंड ) के चाप का मान
निकालने के उपयोग में लाते हैं । अर्द्धवृत्तीय चाप = त्र × √ १० = √ १० त्र² = √ ६ त्र² + ४ त्र²
होता है, जहाँ त्र त्रिज्या अथवा अर्द्धव्यास है । इसी सिद्धान्त पर आधारित यह सूत्र किसी भी चाप के
लिये है । यहाँ ल = बाण ( चाप तथा चापकर्ण के बीच की महत्तम दूरी ), और क = जीवा ( चापकर्ण )
है । जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति ( २/२४, ६/१० ) में धनुषपृष्ठ का सूत्र महावीर के सूत्र समान है,
धनुषपृष्ठ = √ { ६ ( बाण² ) + { ( व्यास - बाण ) ४ बाण } } = √ { ६ ( बाण )² + ( जीवा )² }
त्रिलोक प्रज्ञप्ति ( ४/१८१ ) में सूत्र इस रूप में है,
धनुष = √ { २ { ( व्यास + बाण )² - ( व्यास )² } }
बाण निकालने के लिये जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति ( ६/११ ) तथा त्रिलोक प्रज्ञप्ति ( ४/१८२ ) में अवतरित
सूत्र दृष्टव्य हैं ।