गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
१३६ ] मिश्रकव्यवहारः [ ६. १७०–
अत्रोद्देशकः
एकक्षयमेकं च द्विक्षयमेकं त्रिवर्णमेकं च । वर्णचतुष्के च द्वे पञ्चक्षयिकाश्च चत्वारः ॥ १७० ॥
सप्त चतुर्दशवर्णास्त्रिगुणितपञ्चक्षयाश्चाष्टौ । एतानेकीकृत्य ज्वलने क्षिप्त्वैव मिश्रवर्णं किम् ।
एतन्मिश्रसुवर्णं पूर्वैर्भक्तं च किं किमेकस्य ॥ १७१ ½ ॥
दृष्टवर्णानामिष्टस्ववर्णानयनसूत्रम्—
स्वैःस्वैर्वर्णैर्हतंमिश्रं स्वर्णमिश्रेण भाजितम् । लब्धं वर्णं विजानीयात्तदिष्टप्राप्तं पृथक् पृथक् ॥ १७२ ½ ॥
अत्रोद्देशकः
विंशतिपणस्तु षोडश वर्णा दशवर्णपरिमाणैः ।
परिवर्तिता वद त्वं कति हि पुराणा भवन्त्यधुना ॥ १७३ ½ ॥
अष्टोत्तरशतकनकं वर्णाष्टांशत्रयेन संयुक्तम् ।
एकादशवर्णं चतुरुत्तरदशवर्णकैः कृतं च किं हेम ॥ १७४ ½ ॥
अज्ञातवर्णानयनसूत्रम्—
कनकक्षयसंवर्गं मिश्रं स्वर्णेन्नमिश्रतः शोद्ध्यम् । स्वर्णेन हृतं वर्णं वर्णविशेषेण कनकं स्यात् ॥ १७५ ½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
स्वर्ण का एक भाग १ वर्ण का है, एक भाग २ वर्णों का है, एक भाग ३ वर्णों का है, २
भाग ४ वर्णों के हैं, ४ भाग ५ वर्णों के हैं, ७ भाग १४ वर्णों के हैं, और ८ भाग १५ वर्णों के हैं ।
इन्हें अग्नि में डालकर एक पिण्ड बना लिया जाता है । बतलाओ कि इस प्रकार मिश्रित स्वर्ण किस
वर्ण का है ? यह मिश्रित स्वर्ण उन भागों के स्वामियों में वितरित कर दिया जाता है । प्रत्येक को
क्या मिलता है ? ॥ १७०–१७१ ½ ॥
जो मान में दिये गये वर्णों वाली दत्त स्वर्ण की मात्राओं के तुल्य है ऐसे किसी वाञ्छित
वर्ण वाले स्वर्ण का ( इच्छित ) वजन निकालने के लिये नियम—
स्वर्ण की दी गई मात्राओं को अलग-अलग उनके ही वर्ण द्वारा क्रमवार गुणित किया जाता
है, और गुणनफलों को जोड़ दिया जाता है । परिणामी योग को मिश्रित स्वर्ण के कुल वजन द्वारा
भाजित किया जाता है । भजनफल को परिणामी औसत वर्ण समझ लिया जाता है । यह उपर्युक्त
गुणनफलों का योग, इस स्वर्ण के समान ( इच्छित ) वजन को लाने के लिये, अलग-अलग वाञ्छित
वर्णों द्वारा भाजित किया जाता है ॥ १७२ ½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
१६ वर्ण के २० पण वजनवाले स्वर्ण को १० वर्ण वाले स्वर्ण से बदला गया है; बतलाओ
कि अब वह वजन में कितने पण हो जावेगा ? ॥ १७३ ½ ॥ ११ ३/८ वर्ण वाला १०८ वजन का स्वर्ण १४
वर्ण वाले स्वर्ण से बदला जाने पर कितने वजन का हो जावेगा ? ॥ १७४ ½ ॥
अज्ञात वर्ण को निकालने के लिये नियम—
स्वर्ण की कुल मात्रा को मिश्रण के परिणामी वर्ण से गुणित करो । प्राप्त गुणनफल में से उस
योग को घटाओ जो स्वर्ण की विभिन्न घटक मात्राओं को उनके निज के वर्णों द्वारा गुणित करने से
प्राप्त गुणनफलों को जोड़ने पर प्राप्त होता है । जब शेष को अज्ञात वर्ण वाले स्वर्ण की ज्ञात घटक
मात्रा से विभाजित किया जाता है, तब इष्ट वर्ण उत्पन्न होता है; और जब वह शेष परिणामी वर्ण
तथा ( स्वर्ण की अज्ञात घटक मात्रा के ) ज्ञात वर्ण के अंतर द्वारा भाजित किया जाता है, तब उस
स्वर्ण का इष्ट वजन उत्पन्न होता है ॥ १७५ ½ ॥
–६. १८१ ] मिश्रकव्यवहारः [ १३७
अज्ञातवर्णस्य पुनरपि सूत्रम्—
स्वस्ववर्णविनिहतयोगं स्वर्णैक्यदृढहताच्छोध्यम् । अज्ञातवर्णहेम्ना भक्तं वर्णं बुधाः प्राहुः ॥१७६ १/२॥
अत्रोद्देशकः
१षड्जलधिवह्निकनकैस्त्रयोदशाष्टर्तुवर्णकैः क्रमशः । अज्ञातवर्णहेम्नः पञ्च विमिश्रक्ष्यं च सैकदश ।
अज्ञातवर्णसंख्यां ब्रूहि सखे गणिततत्त्वज्ञ ॥ १७८ ॥
चतुर्दशैव वर्णानि सप्त स्वर्णानि तत्क्षये२ । चतुस्स्वर्णे दशोत्पन्नमज्ञातक्षयकं वद ॥ १७९ ॥
अज्ञातस्वर्णानयनसूत्रम् —
स्वस्ववर्णविनिहतयोगं स्वर्णैक्यगुणितदृढवर्णात् ।
त्यक्त्वाज्ञातस्वर्णक्षयदृढवर्णान्तराहतं कनकम् ॥ १८० ॥
अत्रोद्देशकः
द्वित्रिचतुःक्षयमानान्त्रिभिः कनकास्त्रयोदशक्षयिकः ।
वर्णयुतिर्दश जाता ब्रूहि सखे कनकपरिमाणम् ॥ १८१ ॥
१. यहाँ रनल के स्थान में वह्नि, और ष्टावृत्तुक्षयेः के स्थान में र्तुवर्णकैः आदेशित किया गया है,
ताकि पाठ व्याकरण की दृष्टि से और उत्तम हो जावे ।
२. हस्तलिपि में पाठ तत्क्षय है, जो स्पष्टरूप से अशुद्ध है ।
अज्ञात वर्ण के सम्बन्ध में एक और नियम—
स्वर्ण की विभिन्न संघटक मात्राओं को उनके क्रमवार वर्णों से (respectively) गुणित करते
हैं । प्राप्त गुणनफलों के योग को परिणामी वर्ण तथा स्वर्ण की कुलमात्रा के गुणनफल में से घटाते हैं ।
बुद्धिमान व्यक्ति कहते हैं कि यह शेष जब अज्ञात वर्णवाले स्वर्ण के वजन द्वारा भाजित किया जाता
है तब इष्ट वर्ण उत्पन्न होता है ॥१७६ १/२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
क्रमशः १३, ८ और ६ वर्ण वाले ६, ४ और ३ वजन वाले स्वर्ण के साथ अज्ञात वर्ण वाला ५
वजन का स्वर्ण मिलाया जाता है । मिश्रित स्वर्ण का परिणामी वर्ण ११ है । हे गणना के भेदों को जानने
वाले मित्र ! मुझे इस अज्ञात वर्ण का संख्यात्मक मान बतलाओ ॥१७७ १/२–१७८॥ दिये गये नमूने
का ७ वजन वाला स्वर्ण १४ वर्ण वाला है । ४ वजन वाला अन्य स्वर्ण का नमूना (प्रादर्श) उसमें
मिला दिया जाता है । परिणामी वर्ण १० है । दूसरे नमूने के स्वर्ण का अज्ञात वर्ण क्या है ? ॥१७९॥
स्वर्ण का अज्ञात वजन निकालने के लिये नियम —
स्वर्ण की विभिन्न संघटक मात्राओं को निज के वर्णों द्वारा गुणित करते हैं । प्राप्त गुणनफलों
के योग को, स्वर्ण के ज्ञात भारों को अभिनव दृढ़ (durable) परिणामी वर्ण द्वारा गुणित करने
से प्राप्त गुणनफलों के योग में से घटाते हैं । शेष को स्वर्ण की अज्ञात मात्रा के ज्ञात वर्ण तथा
मिश्रित स्वर्ण के दृढ़ ( durable ) परिणामी वर्ण के अन्तर द्वारा भाजित करने पर स्वर्ण का वजन
प्राप्त होता है ॥१८०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
स्वर्ण के तीन टुकड़े जिनमें से प्रत्येक वजन में ३ है, क्रमशः २, ३ और ४ वर्ण वाले हैं । ये
१३ वर्ण वाले अज्ञात वजन के स्वर्ण में गलाये जाते हैं । परिणामी- वर्ण १० होता है । हे मित्र !
मुझे बतलाओ कि अज्ञात भारवाले स्वर्ण का माप क्या है ? ॥१८१॥
ग० सा० सं०-१८
१३८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १८२-
युग्मवर्णमिश्रसुवर्णानयनसूत्रम्—
ज्येष्ठाल्पक्षयशोधितपक्वविशेषाप्तरूपकैः प्राग्वत् ।
प्रक्षेपमतः कुर्यादेवं बहुशोऽपि वा साध्यम् ॥१८२॥
पुनरपि युग्मवर्णमिश्रस्वर्णानयनसूत्रम्—
इष्टाधिकान्तरं चैव हीनेष्टान्तरमेव च । उभे ते स्थापयेद्व्यस्तं स्वर्णं प्रक्षेपतः फलम् ॥ १८३ ॥
अत्रोद्देशकः
दशवर्णसुवर्णं यत् षोडशवर्णेन संयुतं पक्वम् ।
द्वादश चेत्कनकशतं द्विभेदकनके पृथक् पृथग्ब्रूहि ॥ १८४ ॥
बहुसुवर्णानयनसूत्रम्—
व्येकपदानां क्रमशः स्वर्णानीष्टानि कल्पयेच्छेषम् ।
अव्यक्तकनकविधिना प्रसाधयेत् प्राक्तनायेव ॥ १८५ ॥
दिये गये वर्णों वाले स्वर्ण के दो दिये गये नमूनों के मिश्रण के ज्ञात वजन और ज्ञात वर्ण द्वारा
दो दिये गये वर्णों के संवादी स्वर्ण के भारों को निकालने के लिये नियम—
मिश्रण के परिणामी वर्ण और ( अज्ञात संघटक मात्राओं वाले स्वर्ण के ) ज्ञात उच्चतर और
निम्नतर वर्णों के अन्तरों को प्राप्त करो । १ को इन अन्तरों द्वारा क्रमवार भाजित करो । तब पहिले
की भाँति प्रक्षेप क्रिया ( अथवा इन विभिन्न भजनफलों की सहायता से समानुपातिक विभाजन ) करो ।
इस प्रकार, स्वर्ण की अनेक संघटक मात्राओं की अर्हा को भी प्राप्त किया जा सकता है ॥१८२॥
पुनः, दिये गये वर्ण वाले स्वर्ण के दो दिये गये नमूनों के मिश्रण के ज्ञात वजन और ज्ञात
वर्ण द्वारा दो दिये गये वर्णों के संवादी स्वर्ण के भारों को निकालने के लिये नियम—
परिणामी वर्ण तथा ( स्वर्ण की दो संघटक मात्राओं वाले दो दिये गये वर्णों के ) उच्चतर वर्ण
के अन्तर को और साथ ही परिणामी वर्ण तथा ( दो दिये गये वर्णों के ) निम्नतर वर्ण के अन्तर को
विलोम क्रम में लिखो । इन विलोम क्रम में रखे हुए अन्तरों की सहायता से समानुपातिक वितरण की
क्रिया करने पर प्राप्त किया गया परिणाम ( संघटक मात्राओं वाले ) स्वर्ण ( के इष्ट भारों ) को उत्पन्न
करता है । ॥१८३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यदि १० वर्ण वाला स्वर्ण, १६ वर्ण वाले स्वर्ण से मिलाया जाने पर १२ वर्ण वाला १००
वजन का स्वर्ण उत्पन्न करता है, तो स्वर्ण के दो प्रकारों के वजन के मापों को अलग-अलग प्राप्त
करो ॥१८४॥
ज्ञात वर्ण और ज्ञात वजनवाले मिश्रण में ज्ञात वर्ण के बहुत से संघटक मात्राओं वाले स्वर्ण
के भारों को निकालने के लिये नियम—
एक को छोड़कर सभी ज्ञात संघटक वर्णों के सम्बन्ध में मन से चुने हुए भारों को ले लिया
जाता है । तब, जो शेष रहता है उसे पहिले जैसी दी गई दशाओं के सम्बन्ध में अज्ञात भार वाले
स्वर्ण के निश्चित करने के नियम द्वारा हल करना पड़ता है । ॥१८५॥
[१८५] यहाँ दिया गया नियम ऊपर दी गई गाथा १८० में उपलब्ध है ।
-६. १८८ ] मिश्रकव्यवहारः [ १३९
अत्रोद्देशकः
वर्णाः शरर्तुनगवसुमुड्विश्वे नव च पक्ववर्णं हि ।
कनकानां षष्टिश्चेत् पृथक् पृथक् कनकमा किं स्यात् ॥ १८६ ॥
द्वयनष्टवर्णानयनसूत्रम्—
स्वर्णाभ्यां हतरूपे सुवर्णवर्णाहते द्विष्ठे ।
स्वस्वर्णहृतैकेन च हीनयुते व्यस्ततो हि वर्णफलम् ॥ १८७ ॥
अत्रोद्देशकः
षोडशदशकनकाभ्यां वर्णं न ज्ञायते¹ पक्वम् ।
वर्णं चैकादश चेद्द्रौ तत्कनकयोर्भवेतां कौ ॥ १८८ ॥
१. B में यहाँ यते जुड़ा है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
संघटक राशियों वाले स्वर्ण के दिये गये वर्ण क्रमशः ५, ६, ७, ८, ११ और १३ हैं; और
परिणामी वर्ण ९ है। यदि स्वर्ण की समस्त संघटक मात्राओं का कुल भार ६० हो तो स्वर्ण की
विभिन्न संघटक मात्राओं के वजन में विभिन्न माप कौन-कौन होंगे ? ॥१८६॥
जब मिश्रण का परिणामी वर्ण ज्ञात हो, तब स्वर्ण की दो ज्ञात मात्राओं के नष्ट अर्थात् अज्ञात
वर्णों को निकालने के लिये नियम—
१ को स्वर्ण के दिये गये दो वजनों द्वारा अलग-अलग भाजित करो । इस प्रकार प्राप्त
भजनफलों में से प्रत्येक को अलग-अलग स्वर्ण की संगत मात्रा के भार द्वारा तथा परिणामी वर्ण द्वारा
भी गुणित करो । इस प्रकार प्राप्त दोनों गुणनफलों को दो भिन्न स्थानों में लिखो । इन दो कुलकों
( sets ) में से प्रत्येक के इन फलों में से प्रत्येक को यदि उन राशियों द्वारा ह्रासित किया जाय अथवा
जोड़ा जाय, जो १ को संगत प्रकार के स्वर्ण के ज्ञात भार द्वारा भाजित करने पर प्राप्त होती हैं, तो
इष्ट वर्णों की प्राप्ति होती है ॥१८७॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यदि संघटक वर्ण ज्ञात न हो, और क्रमशः १६ और १० भार वाले दो भिन्न प्रकार के स्वर्णों
का परिणामी वर्ण ११ हो, तो इन दो प्रकार के स्वर्ण के वर्ण कौन कौन हैं, बतलाओ ॥१८८॥
( १८७ ) गाथा १८८ के प्रश्न को निम्न रीति से साधित करने पर यह सूत्र स्पष्ट हो जावेगा—
१/१६ × १६ × ११ और १/१० × १० × ११ दो स्थानों में लिख दिया जाता है ।
इस प्रकार; ११ ११ लिखने पर,
११ ११
१/१६ और १/१० को दो कुलकों में प्रत्येक के इन फलों में से प्रत्येक को क्रमानुसार १ को वर्ण
द्वारा भाजित करने से प्राप्त राशियों द्वारा जोड़ा और घटाया जाता है—
११ + १/१६ } { ११ - १/१६ }
११ - १/१० } और { ११ + १/१० } इस प्रकार उत्तरों के दो कुलक ( sets ) प्राप्त होते हैं ।
१४० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १८९-
पुनरपि द्वयनष्टवर्णानयनसूत्रम्—
एकस्य क्षयमिष्टं प्रकल्प्य शेषं प्रसाधयेत् प्राग्वत् ।
बहुकनकानामिष्टं व्येकपदानां ततः प्राग्वत् ॥ १८९॥
अत्रोद्देशकः
द्वादशचतुर्दशानां स्वर्णानां समरसीकृते जातम् ।
वर्णानां दशकं स्यात् तद्वर्णौ ब्रूहि संचिन्त्य ॥ १९० ॥
अपरार्धस्योदाहरणम्
सप्तनवशिखिदशानां कनकानां संयुते पकं । द्वादशवर्णं जातं किं ब्रूहि पृथक् पृथग्वर्णम् ॥ १९१ ॥
परीक्षणशलाकानयनसूत्रम्—
परमक्षयाप्तवर्णाः सर्वशलाकाः पृथक् पृथग्योज्याः ।
स्वर्णफलं तच्छोध्यं शलाकापिण्डात् प्रपूरणिका ॥ १९२ ॥
अत्रोद्देशकः
वैश्याः स्वर्णशलाकास्त्रिकीर्षवः स्वर्णवर्णज्ञाः ।
चक्रुः स्वर्णशलाका द्वादशवर्णं तदाद्यस्य ॥ १९३ ॥
पुनः, जब मिश्रण का परिणामी वर्ण ज्ञात हो, तब दो ज्ञात मात्राओं वाले स्वर्णों के अज्ञात वर्णों
को निकालने के लिये नियम—
दो दी गईं मात्राओं के स्वर्ण में से एक के सम्बन्ध में वर्ण मन से चुन लो । जो निकालना शेष
हो उसे पहिले की भाँति प्राप्त किया जा सकता है। एक को छोड़ कर समस्त प्रकार के स्वर्ण की ज्ञात
मात्राओं के सम्बन्ध में वर्ण मन से चुन लिये जाते हैं, और तब पहिले की तरह अपनाई गई रीति से
अग्रसर होते हैं ॥१८९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
क्रमशः १२ और १४ वजन वाले दो प्रकार के स्वर्ण को एक साथ गलाया गया, जिससे
परिणामी वर्ण १० बना । उन दो प्रकार के स्वर्ण के वर्णों को सोचकर बतलाओ ॥१९०॥
नियम के उत्तरार्द्ध को निदर्शित करने के लिये उदाहरणार्थ प्रश्न
क्रमशः ७, ९, ३ और १० भारवाले चार प्रकार के स्वर्ण को गलाकर १२ वर्ण वाला स्वर्ण
बनाया गया । प्रत्येक प्रकार के संघटक स्वर्ण के वर्णों को अलग-अलग बतलाओ ॥१९१॥
स्वर्ण की परीक्षण शलाका की अर्हा का अनुमान लगाने के लिये नियम—
प्रत्येक शलाका के वर्ण को, अलग-अलग, दिये गये महत्तम वर्ण द्वारा विभाजित करना पड़ता
है । इस प्रकार प्राप्त ( सभी ) भजनफलों को जोड़ा जाता है । परिणामी योग शुद्ध स्वर्ण की इष्ट मात्रा
का माप होता है । सभी शलाकाओं के भारों का योग करने पर, प्राप्त योगफल में से पिछले परिणामी
योग को घटाते हैं । जो शेष बचता है वह प्रपूरणिका ( अर्थात् निम्न श्रेणी की मिश्रित धातु ) की मात्रा
होती है ॥१९२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
स्वर्ण के वर्ण को पहिचानने वाले ३ व्यापारी स्वर्ण की परीक्षण शलाकाओं को बनाने के
इच्छुक थे । उन्होंने ऐसी स्वर्ण-शलाकाएँ बनाईं । पहिले व्यापारी का स्वर्ण १२ वर्ण वाला, दूसरे का
-६. १९८½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १४१
चतुरुत्तरदशवर्ण षोडशवर्णं तृतीयस्य । कनकं चास्ति प्रथमस्यैकोनं च द्वितीयस्य ॥ १९४ ॥
अर्धार्धेन्यूनमथ तृतीयपुरुषस्य पादोनम् । परवर्णादारभ्य प्रथमस्यैकान्त्यमेव च व्यन्त्यम् ॥१९५॥
त्र्यन्त्यं तृतीयवणिजः सर्वशलाकास्तु माषमिताः ।
शुद्धं कनकं किं स्यात् प्रपूरणी का पृथक् पृथक् त्वं मे ।
आचक्ष्व गणक शीघ्रं सुवर्णगणितं हि यदि वेत्सि ॥ १९६½ ॥
विनिमयवर्णसुवर्णानयनसूत्रम्—
क्रयगुणसुवर्णविनिमयवर्णैष्ठन्तरं पुनः स्थाप्यम् ।
व्यस्तं भवति हि विनिमयवर्णान्तरहृतफलं कनकम् ॥ १९७½ ॥
अत्रोद्देशकः
षोडशवर्णं कनकं सप्तशतं विनिमयं कृतं लभते ।
द्वादशदशवर्णाभ्यां साष्टसहस्रं तु कनकं किम् ॥ १९८½ ॥
१४ वर्ण वाला और तीसरे का १६ वर्ण वाला था । पहिले व्यापारी की परीक्षण शलाकाओं के विभिन्न
नमूने, नियमित क्रम से, वर्ण में १ कम होते जाते थे । दूसरे के ½ और ½ कम और तीसरे के नियमित
क्रम में ¾ कम होते जाते थे । पहिले व्यापारी ने परीक्षण स्वर्ण के नमूने को महत्तम वर्णवाले से
आरम्भकर १ वर्ण वाले तक बनाये; उसी तरह से दूसरे व्यापारी ने २ वर्ण वाली तक की शलाकाएँ
बनाईं और तीसरे ने भी महत्तम वर्ण वाली से आरम्भ कर ३ वर्ण वाली तक की परीक्षण शलाकाएँ
बनाईं । प्रत्येक परीक्षण शलाका भार में १ माशा थी । हे गणितज्ञ ! यदि तुम वास्तव में स्वर्ण गणना
को जानते हो, तो शीघ्र बतलाओ कि यहाँ शुद्ध स्वर्ण का माप क्या है, तथा प्रपूर्णिका (निम्न श्रेणी की
मिली हुई धातु) की मात्रा क्या है ? ॥१९३-११६½॥
दो दिये गये वर्ण वाले और बदले में प्राप्त स्वर्ण के भिन्न भारों को निकालने के लिये नियम—
पहिले बदले जाने वाले दिये गये स्वर्ण के भार को दिये गये वर्ण द्वारा गुणित करते हैं,
और बदले में प्राप्त स्वर्ण का भार तथा बदले हुए स्वर्ण के दो नमूनों में से पहिले के वर्ण द्वारा गुणित
करते हैं । प्राप्त गुणनफलों के अंतर को एक ओर लिख लिया जाता है । उपर्युक्त प्रथम गुणनफल को
बदले में प्राप्त स्वर्ण का भार तथा बदले हुए स्वर्ण के दो नमूनों में से दूसरे के वर्ण द्वारा गुणित करने
से प्राप्त गुणनफल द्वारा हासित करने से प्राप्त अंतर को दूसरी ओर लिख लिया जाता है । यदि तब,
वे स्थिति में बदल दिये जायँ, और बदले हुए स्वर्ण के दो प्रकारों के दो विशिष्ट वर्णों के अंतर के द्वारा
भाजित किये जायँ, तो ( बदले में प्राप्त दो प्रकार के) स्वर्ण की दो इष्ट मात्रायें होती हैं ॥१९७½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
१६ वर्ण वाला ७०० भार का स्वर्ण बदले जाने पर, १२ और १० वर्ण वाले दो प्रकार का कुल
१००८ भार वाला स्वर्ण उत्पन्न करता है । अब स्वर्ण के इन दो प्रकारों में से प्रत्येक प्रकार का भार
कितना कितना है ? ॥१९८½॥
(१९७½) यह नियम गाथा १९८½ के प्रश्न का साधन करने पर स्पष्ट हो जावेगा—
७०० × १६ - १००८ × १० और १००८ × १२ - ७०० × १६ की स्थितियों को बदल कर
लिखने से ८९६ और ११२० प्राप्त होते हैं । जब इन्हें १२ - १० अर्थात् २ द्वारा भाजित करते हैं, तो
क्रमशः १० और १२ वर्ण वाले स्वर्ण के ४४८ और ५६० भार प्राप्त होते हैं ।
१४२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १९९½-
बहुपदविनिमयसुवर्णकरणसूत्रम्—
वर्णघ्नकनकमिष्टस्वर्णेनाप्तं दृढक्षयो भवति ।
प्राग्वत्प्रसाध्य लब्धं विनिमयबहुपदसुवर्णानाम् ॥१९९½॥
अत्रोद्देशकः
वर्णचतुर्दशकनकं शतत्रयं विनिमयं प्रकुर्वन्तः । वर्णैर्द्वादशदशवसुनगैश्च शतपञ्चकं स्वर्णम् ।
एतेषां वर्णानां पृथक् पृथक् स्वर्णमानं किम् ॥२०१॥
विनिमयगुणवर्णकनकलाभानयनसूत्रम्—
स्वर्णघ्नवर्णयुतिहृतगुणयुतिमूलक्षयप्ररूपोनेन । आप्तं लब्धं शोध्यं मूलधनाच्छेषवित्तं स्यात् ॥२०२॥
तल्लब्धमूलयोगाद्विनिमयगुणयोगभाजितं लब्धम् ।
प्रक्षेपकेन गुणितं विनिमयगुणवर्णकनकं स्यात् ॥२०३॥
कई विशिष्ट प्रकार के बदले के परिणाम स्वरूप प्राप्त स्वर्ण के विभिन्न भारों को निकालने के
लिये नियम—
यदि बदले जाने वाले दत्त स्वर्ण के भार को उसके ही वर्ण द्वारा गुणित कर उसे बदले में
प्राप्त इष्ट स्वर्ण की मात्रा से भाजित किया जाय, तो समांग औसत वर्ण उत्पन्न होता है । इसके पश्चात् ,
पूर्व कथित क्रियाओं को प्रयुक्त करने पर, प्राप्त परिणाम बदले में प्राप्त विभिन्न प्रकार के स्वर्ण के इष्ट
भारों को उत्पन्न करता है ॥१९९½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक मनुष्य १४ वर्ण वाले ३०० भार के स्वर्ण के बदले में ५०० भार के विभिन्न वर्ण वाले
१२, १०, ८ और ७ वर्ण वाले स्वर्ण के प्रकारों को प्राप्त करता है । बतलाओ कि इन भिन्न वर्णों में से
प्रत्येक का संगत अलग-अलग स्वर्ण कितने-कितने भार का होता है ? ॥२००½—२०१॥
बदले में प्राप्त स्वर्ण के विभिन्न ऐसे भारों को निकालने के लिये नियम, जो ज्ञात वर्ण वाले हैं
और निश्चित गुणजों ( multiples ) के समानुपात में हैं—
दी गई समानुपाती गुणज (multiple) संख्याओं के योग को, (दी गई समानुपाती मात्राओं
वाले विभिन्न प्रकार के बदले में प्राप्त) स्वर्ण की मात्राओं को, (उनके विशिष्ट) वर्णों द्वारा गुणित
करने पर, प्राप्त गुणनफलों के योग द्वारा भाजित करते हैं । परिणामी भजनफल को बदले जाने वाले
स्वर्ण के मूल वर्ण द्वारा गुणित किया जाता है । यदि इस गुणनफल को १ द्वारा हासित कर इसके द्वारा
बदले में प्राप्त स्वर्ण के भार में जो बढ़ती हुई है उसे भाजित करें, और प्राप्त भजनफल को स्वर्ण के
मूल भार में से घटायें, तो (जो बदला नहीं गया है ऐसे) स्वर्ण का शेष भार प्राप्त होता है । यह
शेष भार मूल स्वर्ण के भार तथा बदले के कारण भार में हुई वृद्धि के योग में से घटाया जाता है ।
इस प्रकार प्राप्त परिणामी शेष को बदले से सम्बन्धित समानुपाती गुणज ( multiple ) संख्याओं के
योग द्वारा भाजित किया जाता है, और तब उन समानुपाती संख्याओं में से प्रत्येक द्वारा अलग-अलग
गुणित किया जाता है । तब बदले में प्राप्त स्वर्ण के विशिष्ट वर्ण वाले और विशिष्ट अनुपात वाले विभिन्न
भारों की प्राप्ति होती है ॥२०२–२०३॥
( १९९½ ) यहाँ उल्लिखित क्रिया १८५ वीं गाथा से मिलती है ।
-६. २०८ ] मिश्रकव्यवहारः [ १४३
अत्रोद्देशकः
कश्चिद्वणिक् फलार्थी षोडशवर्णं शतद्वयं कनकम् ।
यत्किंचिद्विनिमयकृतमेकाद्यं द्विगुणितं यथा क्रमशः ॥२०४॥
द्वादशवसुनवदशकक्षयकं लाभो द्व्युत्तरशतम् ।
शेषं किं स्याद्विनिमयकांस्तेषां चापि मे कथय ॥२०५॥
दृश्यसुवर्णविनिमयसुवर्णमूलानयनसूत्रम्-
विनिमयवर्णेनाप्तं स्वांशं स्वेष्टक्षयघ्नसंमिश्रात् ।
अंशक्यौनेनाप्तं दृश्यं फलमत्र भवति मूलधनम् ॥२०६॥
अत्रोद्देशकः
वणिजः कंचित् षोडशवर्णकसौवर्णगुलकमाहृत्य ।
त्रिचतुःपञ्चमभागान् क्रमेण तस्यैव विनिमयं कृत्वा ॥२०७॥
द्वादशदशवर्णैः संयुज्य च पूर्वशेषेण । मूलेन विना दृष्टं स्वर्णसहस्रं तु किं मूलम् ॥२०८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई व्यापारी लाभ प्राप्त करने का इच्छुक है, और उसके पास १६ वर्ण वाला २०० भार का
स्वर्ण है । उसका एक भाग, १२, ८, ९ और १० वर्ण वाले चार प्रकार के स्वर्ण से बदला जाता है,
जिनके भार ऐसे अनुपात में हैं जो १ से आरम्भ होकर नियमित रूप से २ द्वारा गुणित किये जाते हैं ।
इस बदले के व्यापार के फलस्वरूप स्वर्ण के भार में १०२ लाभ होता है । शेष ( बिना बदले हुए )
स्वर्ण का भार क्या है ? उन उपर्युक्त वर्णों के संगत ( corresponding ) स्वर्ण-प्रकारों के भारों
कोभी बतलाओ, जो बदले में प्राप्त हुए हैं ॥२०४-२०५॥
जिसका कुछ भाग बदला गया है ऐसे स्वर्ण की सहायता से, और बदले के कारण बढ़ता देखा
गया है ऐसे स्वर्ण के भार की सहायता से स्वर्ण की मूल मात्रा के भार को निकालने के लिये नियम-
बदले जाने वाले मूल स्वर्ण के प्रत्येक विशिष्ट भाग को उसके बदले के संगत वर्ण द्वारा
भाजित किया जाता है । प्रत्येक दशा में, परिणामी भजनफल दिये गये मूल स्वर्ण के मन से गुने
हुए वर्ण द्वारा गुणित किये जाते हैं; और तब ये सब गुणनफल जोड़े जाते हैं । इस योग में से मूल,
स्वर्ण के विभिन्न भिन्नीय बदले हुए भागों के योग को घटाया जाता है । अब यदि बदले के कारण
स्वर्ण के भार की बढ़ती को इस परिणामी शेष द्वारा भाजित किया जाय, तो मूल स्वर्ण धन प्राप्त
होता है ॥२०६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी व्यापारी की १६ वर्ण सोने की एक छोटी गेंद ली जाती है; तथा उसके १/३, १/४ और १/५
भाग क्रमशः १२, १० और ९ वर्ण वाले स्वर्ण से बदल दिये जाते हैं । इन बदले हुए विभिन्न प्रकार
के स्वर्णों के भारों को मूल स्वर्ण के शेष भाग में जोड़ दिया जाता है । तब मूल स्वर्ण के भार को
लेखा में से हटाने से भार में १००० बढ़ती देखी जाती है । इस मूल स्वर्ण का भार बतलाओ
॥२०७-२०८॥
१४४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २०९-
इष्टांशदानेन इष्टवर्णानयनस्य तदिष्टांशकयोः सुवर्णानयनस्य च सूत्रम्—
अंशाभ्यैकं व्यस्तं क्षिप्ट्वेष्टघ्नं भवेत् सुवर्णमयी ।
सा गुलिका तस्या अपि परस्परांशाग्नकनकस्य ॥ २०९ ॥
स्वेच्छक्षयेण वर्णौ प्रकल्पयेत्प्राग्वदेव यथा ।
एवं तद्द्वययोरप्युभयं साम्यं फलं भवेद्यदि चेत् ॥२१०॥
प्राक्कल्पनेष्टवर्णौ गुलिकाभ्यां निश्चयौ भवतः ।
नो चेत्प्रथमस्य तदा किंचिन्न्यूनाधिकौ क्षयौ कृत्वा ॥२११॥
तत्क्षयपूर्वक्षययोरन्तरिते शेषमत्र संस्थाप्य ।
त्रैराशिकविधिलब्धं वर्णौ तेनोनिताधिकौ स्पष्टौ ॥२१२॥
दूसरे व्यक्ति के पास के वाञ्छित भिन्नीय भाग वाले स्वर्ण की पारस्परिक दान की सहायता से
इष्ट वर्ण निकालने के लिये, तथा उन मन से चुने हुए दिये गये भागों के संगत स्वर्णों के भारों को
क्रमशः निकालने के लिये नियम—
(दो विशिष्ट रूप से) दिये गये भागों में से प्रत्येक के संख्यात्मक मान द्वारा १ को भाजित कर
व्युत्क्रम में लिखा जाता है । यदि इस प्रकार प्राप्त भजनफलों में से प्रत्येक को मन से चुनी हुई राशि
द्वारा गुणित किया जाय, तो वह सोने की दो छोटी गेंदों में से प्रत्येक के भार को उत्पन्न करता है ।
सोने की इन छोटी गेंदों में से प्रत्येक का वर्ण, तथा व्यापार में दूसरे मनुष्य के द्वारा दिये गये स्वर्ण
को, प्रत्येक दशा में, दिये गये अन्तिम औसत वर्ण की सहायता से प्राप्त करना पड़ता है । यदि इस
प्रकार से प्राप्त उत्तर दोनों कुलक (sets) प्रश्न के इष्ट मानों से मेल खाते हैं, तो मन से चुनी हुई
संख्या से प्राप्त दो वर्ण, (दो दिये गये छोटे स्वर्ण की गेंदों के सम्बन्ध में ), कथित सत्यापित वर्ण हो
जाते हैं । यदि ये उत्तर मेल नहीं खाते, तो उत्तरों के प्रथम कुलक के वर्णों को आवश्यकतानुसार छोटा
या कुछ बड़ा बनाना पड़ता है । तब सुधारे हुए संघटक वर्णों के संगत औसत वर्ण को आगे प्राप्त
करना पड़ता है । इसके पश्चात्, इस औसत वर्ण और पहिले प्राप्त (बिना मेल खानेवाले औसत)
वर्ण के अन्तर को लिख लिया जाता है; और इष्ट समानुपातिक राशियाँ त्रैराशिक नियम द्वारा प्राप्त की
जाती हैं । पहिली चुनी हुई संख्या के अनुसार प्राप्त वर्णों को जब इन दो राशियों में से क्रमशः एक
द्वारा ह्रासित और दूसरी द्वारा जोड़ा जाता है, तब यहाँ इष्ट वर्णों की प्राप्ति होती है । ॥२०९-२१२॥
(२०९-२१२) गाथा २१३-२१५ के प्रश्न का साधन निम्न भाँति करने पर नियम स्पष्ट
हो जावेगा—
१ को १/२ और १/३ द्वारा भाजित करने पर हमें क्रमशः २, ३ प्राप्त होते हैं । उनकी स्थिति बदल
कर उन्हें किसी चुनी हुई संख्या (मानलो १) द्वारा गुणित करने से हमें ३, २ प्राप्त होते हैं । ये दो
संख्याएं क्रमशः दो व्यापारियों की स्वर्ण मात्राओं का प्ररूपण करती हैं ।
९ को प्रथम व्यापारी के स्वर्ण का वर्ण चुनकर, हम उसके द्वारा प्रस्तावित बदले (विनिमय) में से,
दूसरे व्यापारी के स्वर्ण के वर्ण १३ को सरलता पूर्वक प्राप्त कर सकते हैं । ये वर्ण ९ और १३, दूसरे
व्यापारी द्वारा प्रस्तावित बदले में, औसत वर्ण ३५/३ को उत्पन्न करते हैं, जब कि प्रश्न में दिया गया औसत
वर्ण १२ अथवा ३६/३ होता है ।
इसलिये वर्ण ९ और १३ को बदलना पड़ता है । यदि ९ के स्थान पर ८ चुना जाय तो १३
-६. २१६ ] मिश्रकव्यवहारः [ १४५
अत्रोद्देशकः
स्वर्णपरीक्षकवणिजौ परस्परं याचितौ ततः प्रथमः ।
अर्धं प्रादात् तामपि गुलिकां स्वसुवर्ण आयोज्य ॥२१३॥
वर्णदशकं करीमीत्यपरोऽवादीत् त्रिभागमात्रतया ।
लब्धे तथैव पूर्णं द्वादशवर्णं करोमि गुलिकाभ्याम् ॥२१४॥
उभयोः सुवर्णमाने वर्णौ संचिन्त्य गणिततत्त्वज्ञ ।
सौवर्णगणितकुशलं यदि तेऽस्ति निगद्यतामाशु ॥२१५॥
इति मिश्रकव्यवहारे सुवर्णकुट्टीकारः समाप्तः ।
विचित्रकुट्टीकारः
इतः परं मिश्रकव्यवहारं विचित्रकुट्टीकारं व्याख्यास्यामः । सत्यानृतसूत्रम्—
पुरुषाः सैकैष्टगुणा द्विगुणेष्टोना भवन्त्यसत्यानि । पुरुषकृतिस्तैरुना सत्यानि भवन्ति वचनानि ॥२१६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
स्वर्ण के मूल्य को परखने में कुशल दो व्यापारियों ने एक दूसरे से स्वर्ण बदलने के लिये
कहा । पहिले ने दूसरे से कहा, “यदि अपना आधा स्वर्ण मुझे दे दो, तो उसे मैं अपने स्वर्ण में
मिलाकर कुल स्वर्ण को १० वर्ण वाला बना लूँगा ।” तब दूसरे ने कहा, “यदि मैं तुम्हारा केवल १/३
भाग स्वर्ण प्राप्त करलूँ, तो मैं पूरे स्वर्ण को दो गोलियों की सहायता से १२ वर्ण वाला बना लूँगा ।”
हे गणित तत्त्वज्ञ ! यदि तुम स्वर्ण गणित में कुशल हो तो सोचविचार कर शीघ्र बतलाओ कि उनके
पास कितने-कितने वर्ण वाला कितना-कितना स्वर्ण ( भार में ) है ? ॥२१३-२१५॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में सुवर्ण कुट्टीकार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
विचित्र कुट्टीकार
इसके पश्चात् , हम मिश्रक व्यव्हार में विचित्र कुट्टीकार की व्याख्या करेंगे ।
( ऐसी परिस्थिति में जैसी कि नीचे दी गई है, जहाँ दोनों बातें साथ ही साथ सम्भव हैं, )
सत्य और असत्य वचनों की संख्या ज्ञात करने के लिये नियम—
मनुष्यों की संख्या को उनमें से चाहे गये मनुष्यों की संख्या को १ द्वारा बढ़ाने से प्राप्त संख्या
द्वारा गुणित करो, और तब उसे चाहे गये मनुष्यों की संख्या की दुगुनी राशि द्वारा हासित करो । जो
संख्या उत्पन्न होगी वह असत्य वचनों की संख्या होगी । सब मनुष्यों का निरूपण करनेवाली संख्या का
वर्ग इन असत्य वचनों की संख्या द्वारा हासित होकर सत्य वचनों की संख्या उत्पन्न करता है ॥२१६॥
को पहिले बदले में १६ तक बढ़ाना पड़ता है । इन दो वर्णों ८ और १६ को, दूसरे बदले में प्रयुक्त
करने से, हमें औसतवर्ण ३६/५ के बदले में ३५/५ प्राप्त होता है ।
इस प्रकार, दूसरे बदले में हम देखते हैं कि भार और वर्ण के गुणनफलों के योग में ( ४०-
३५ ) अथवा ५ की बढ़ती है, जबकि पूर्व के चुने हुए वर्णों के सम्बन्ध में घटती और बढ़ती क्रमशः
९ - ८ = १ और १६ - १३ = ३ हैं ।
परन्तु दूसरे बदले में भार और वर्ण के गुणनफलों के योग में बढ़ती ३६ - ३५ = १ है ।
त्रैराशिक के नियम का प्रयोग करने पर हमें वर्णों में संगत घटती और बढ़ती १/५ और ३/५ प्राप्त होती हैं ।
इसलिये वर्ण क्रमशः ९ - १/५ या ८ ४/५ और १३ + ३/५ = १३ ३/५ हैं ।
( २१६ ) इस नियम का मूल आधार गाथा २१७ में दिये गये प्रश्न के निम्नलिखित बीजीय
ग० सा० सं०-१९
१४६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २१७-
अत्रोद्देशकः
कामुकपुरुषाः पञ्च हि वेश्यायाश्च प्रियास्त्रयस्तत्र ।
प्रत्येकं सा ब्रूते त्वमिष्ट इति कानि सत्यानि ॥२१७॥
प्रस्तारयोगभेदस्य सूत्रम्—
एकाद्येकोत्तरतः पदमूर्ध्वाधर्गतः क्रमोत्क्रमशः ।
स्थाप्य प्रतिलोमघ्नं प्रतिलोमघ्नेन भाजितं सारम् ॥२१८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
पाँच कामुक व्यक्ति हैं । उनमें से तीन व्यक्ति वास्तव में वेश्या द्वारा चाहे जाते हैं । वह
प्रत्येक से अलग-अलग कहती है, “मैं केवल तुम्हें चाहती हूँ ।” उसके कितने ( व्यक्त और उप-
लक्षित ) वचन सत्य हैं ? ॥२१७॥
दी हुई वस्तुओं में ( सम्भव ) संचयों के प्रकारों सम्बन्धी नियम—
एक से आरम्भकर, संख्याओं को, दी गई वस्तुओं की संख्या तक एक द्वारा बढ़ाकर, नियमित
क्रम में और व्यस्तक्रम में ( क्रमशः ) एक ऊपर और एक नीचे क्षैतिजपंक्ति में लिखो । यदि ऊपर
की पंक्ति में दाहिने से बाएँ ओर को लिया गया ( एक, दो, तीन अथवा अधिक संख्याओं का ) गुणन-
फल, नीचे की पंक्ति में भी दाहिने से बाएँ ओर को लिये गये ( एक, दो, तीन अथवा अधिक संख्याओं
के संगत ) गुणनफल द्वारा भाजित किया जाय, तो प्रत्येक दशा में ऐसे संचय की इष्ट राशि फलस्वरूप
प्राप्त होती है ॥ २१८ ॥
निरूपण से स्पष्ट हो जावेगा—
मानलो कुल मनुष्यों की संख्या अ है जिनमें से ब चाहे जाते हैं । वचनों की संख्या अ है,
और प्रत्येक वचन अ मनुष्यों के बारे में है, इसलिये वचनों की कुल संख्या अ × अ = अ² है । अब
इन अ मनुष्यों में से ब मनुष्य चाहे जाते हैं, और अ — ब चाहे नहीं जाते । जब ब मनुष्यों में से
प्रत्येक को यह कहा जाता है, 'केवल तुम्हीं चाहे जाते हो', तब प्रत्येक दशा में असत्य वचन ब — १
हैं ; इसलिये असत्य वचनों की ब वचनों में कुल संख्या ब ( ब — १ ) है...................( १ )
जब फिर से वही कथन अ — ब मनुष्यों में से प्रत्येक को कहा जाता है तब प्रत्येक दशा में असत्य
कथनों की संख्या ब + १ है । इसलिये अ — ब वचनों में कुल असत्य वचनों की संख्या (अ — ब) (ब + १)
है...(२) (१) और (२) का योग करने पर, हमें ब ( ब — १) + (अ — ब) (ब + १) = अ (ब + १)
— २ ब प्राप्त होता है । यह असत्य वचनों की कुल संख्या को निरूपित करती है । इसे अ² में से घटाने
पर, जो कि सब सत्य और असत्य वचनों की कुल संख्या है, हमें सत्य वचनों की संख्या प्राप्त होती है ।
( २१८ ) यह नियम संचय ( combination ) के प्रश्न से सम्बन्ध रखता है । यहाँ दिया
गया सूत्र यह है—
न (न — १) (न — २)······(न — र + १) |__ न
----------------------------------- और यह स्पष्ट रूप से ------------ के तुल्य है ।
१ ˙ २ ˙ ३·········र |__ र |__ न — र
( २२६ ) नियम में दिया गया सूत्र बीजीय रूप से निम्न प्रकार है—
अदा / अदा \ ²
--- - √ ( --- ) — अबद ( दा — द )
२ \ २ /
क = ---------------------------------------- , जहाँ क = निकाली जाने वाली मजदूरी
दा — द
-६. २२२ ] मिश्रकव्यवहारः [ १४७
अत्रोद्देशकः
वर्णांश्चापि रसानां कषायतिक्ताम्लकटुकलवणानाम् ।
मधुररसेन युतानां भेदान् कथयाधुना गणक ॥२१९॥
वज्रेन्द्रनीलमरकतविद्रुममुक्ताफलैस्तु रचितमालायाः ।
कति भेदा युतिभेदात् कथय सखे सम्यगाशु त्वम् ॥२२०॥
केतक्यशोकचम्पकनीलोत्पलकुसुमरचितमालायाः ।
कति भेदा युतिभेदात्कथय सखे गणिततत्त्वज्ञ ॥२२१॥
ज्ञाताज्ञातलाभैर्मूलानयनसूत्रम्—
लाभोनमिश्रराशेः प्रक्षेपकतः फलानि संसाध्य । तेन हृतं तल्लब्धं मूल्यं त्वज्ञातपुरुषस्य ॥२२२॥
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उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणितज्ञ ! मुझे बतलाओ कि छः रस—कषायला, कडुवा, खट्टा, तीखा, खारा और मीठा
दिये गये हों तो संचय के प्रकार और संचय राशियां क्या होगी ? ॥ २१९ ॥ हे मित्र ! हीरा, नील,
मरकत, विद्रुम और मुक्ताफल से रची हुई अंतहीन धागे की माला के संचय में परिवर्तन होने से कितने
प्रकार प्राप्त हो सकते हैं, शीघ्र बतलाओ ॥ २२० ॥ हे गणित तत्त्वज्ञ सखे ! मुझे बतलाओ कि केतकी,
अशोक, चम्पक और नीलोत्पल के फूलों की माला बनाने के लिये संचयों में परिवर्तन करने पर कितने
प्रकार प्राप्त हो सकते हैं ?
किसी व्यापार में ज्ञात और अज्ञात लाभों की सहायता से अज्ञात मूल धन प्राप्त करने के लिये
नियम—
समानुपातिक विभाजन की क्रिया द्वारा समस्त लाभों के मिश्रित योग में से ज्ञात लाभ घटाकर
अज्ञात लाभों को निश्चित करते हैं । तब अज्ञात रकम लगाने वाले व्यक्ति का मूलधन, उसके लाभ को
ऊपर समानुपातिक विभाजन की क्रिया में प्रयुक्त उसी साधारण गुणनखण्ड द्वारा भाजित करने पर, प्राप्त
करते हैं ॥ २२२ ॥
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अ = ढोया जाने वाला कुल भार, दा = कुल दूरी, द = तय की हुई ( जो चली जा चुकी है ऐसी ) दूरी,
और ब = निश्चित की गई कुल मजदूरी है । यह आलोकनीय है कि यात्रा के दो भागों के लिये मजदूरी
की दर एक सी है, यद्यपि यात्रा के प्रत्येक भाग के लिये चुकाई गई रकम पूरी यात्रा के लिए निश्चित
की गई दर के अनुसार नहीं है ।
प्रश्न के न्यास ( data दत्त सामग्री ) सहित निम्नलिखित समीकरण से सूत्र सरलतापूर्वक
प्राप्त किया जा सकता है—
क ब - क
—— = ————————— , जहाँ क अज्ञात है ।
अद (अ - क) (दा ~ द)
१४८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २२३-
अत्रोद्देशकः
समये केचिद्वणिजस्त्रयः क्रयं विक्रयं च कुर्वीरन् ।
प्रथमस्य षट् पुराणा अष्टौ मूल्यं द्वितीयस्य ॥२२३॥
न ज्ञायते तृतीयस्य व्याप्तिस्तैर्नरैस्तु षण्णवतिः । अज्ञातस्यैव फलं चत्वारिंशद्धि तेनाप्तम् ॥२२४॥
कस्तस्य प्रक्षेप्यो वणिजोरुभयोर्भवेच्च को लाभः ।
प्रगणय्याचक्ष्व सखे प्रक्षेपं यदि विजानासि ॥२२५॥
भाटकानयनसूत्रम्—
भरभृतिगतगम्यहृतिं त्यक्त्वा योजनदलघ्नभारकृतेः ।
तन्मूलोनं गम्यच्छिन्नं¹ गन्तव्यभाजितं सारम् ॥२२६॥
अत्रोद्देशकः
पनसानि द्वात्रिंशन्नीत्वा योजनमसौ दलोनाष्टौ ।
गृह्णात्यन्तर्भाटकमर्धे भग्नोऽस्य किं देयम् ॥२२७॥
१ M और B में यहाँ त जुड़ा है; छंद की दृष्टि से यह अशुद्ध है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
समझौते के अनुसार तीन व्यापारियों ने खरीदने और बेचने की क्रिया की । उनमें से पहिले
की रकम ६ पुराण, दूसरे की ८ पुराण तथा तीसरे की अज्ञात थी । उन सब तीन मनुष्यों को ९६
पुराण लाभ प्राप्त हुआ । तीसरे व्यक्ति द्वारा अज्ञात रकम पर ४० पुराण लाभ प्राप्त किया गया
था । व्यापार में उसने कितनी रकम लगाई थी ? अन्य दो व्यापारियों को कितना-कितना लाभ हुआ ?
हे मित्र ! यदि समानुपातिक विभाजन की क्रिया से परिचित हो तो भलीभाँति गणना कर उत्तर
दो ॥ २२३-२२५ ॥
किसी दी गई दर पर किसी निश्चित दूरी के किसी भाग तक कुछ दी गईं वस्तुएँ ले जाने के
किराये को निकालने के लिये नियम—
ले जाये जाने वाले भार के संख्यात्मक मान और योजन में नापी गई तय दूरी की अर्द्ध राशि के
गुणनफल के वर्ग में से ले जाये जाने वाले भार के संख्यात्मक मान, तय किया गया किराया, पहुँची
हुई दूरी, इन सब के संतत गुणनफल को घटाओ । तब यदि ले जाये जाने वाले भार के भिन्नीय
भाग ( अर्थात् यहाँ आधा भाग ) को तय की गई पूरी दूरी द्वारा गुणित कर, और तब उपर्युक्त अंतर के
वर्गमूल द्वारा हासित कर, तय की जाने वाली ( जो अभी शेष है ऐसी ) दूरी के द्वारा भाजित किया
जाय, तो इष्ट उत्तर प्राप्त होता है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
यहाँ एक मनुष्य ऐसा है, जिसे ३२ पनस फलों को १ योजन दूर ले जाने पर मजदूरी में ७ ½
फल मिलते हैं । वह आधी दूर जाकर बैठ जाता है । उसे तय की गई मजदूरी में से कितनी मिलना
चाहिये ? ॥२२७॥
-६. २३० ] मिश्रकव्यवहारः [ १४९
द्वितीयतृतीययोजनानयनस्यसूत्रम्—
भरभाटकसंवर्गोऽद्वितीयभृतिकृतिविवर्जितश्छेदः ।
तद्भृत्यन्तरभरगतिहतेर्गतिः स्याद् द्वितीयस्य ॥२२८॥
अत्रोद्देशकः
पनसानि चतुर्विंशतिमा नीत्वा पञ्चयोजनानि नरः ।
लभते तद्भृतिमिह नव षड्भृतिवियुते द्वितीयनृगतिः का ॥२२९॥
बहुपद¹ भाटकानयनस्य सूत्रम्—
संनिहितनरहतेषु प्रागुत्तरमिश्रितेषु मार्गेषु ।
व्यावृत्तनरगुणेषु प्रक्षेपकासाधितं मूल्यम् ॥२३०॥
१. B में यहाँ 'पद' छूट गया है ।
जब पहिला अथवा दूसरा बोझ ढोने वाला थक कर बैठ जाता है, तब दूसरे अथवा तीसरे
बोझ ढोने वाले के द्वारा योजनों में तय की गईं दूरियों को निकालने के लिये नियम—
ले जाये जाने वाले कुल वजन और तय की गईं मजदूरियों के मान के गुणनफल में से प्रथम
ढोने वाले को दी गई मजदूरी के वर्ग को घटाओ । इस अन्तर को तय की गई मजदूरी और पहिले
ही दे दी गई मजदूरी के अन्तर, ढोया जाने वाला पूरा वजन, और तय की जानेवाली पूरी दूरी के
संतत गुणनफल के सम्बन्ध में भाजक के रूप में उपयोग में लाते हैं । परिणामी भजनफल दूसरे
मजदूर द्वारा तय की जाने वाली दूरी होता है ॥२२८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी मनुष्य को २४ पनस फल ५ योजन दूर ले जाने के लिये ९ फल मजदूरी के रूप में
प्राप्त हो सकते हैं । यदि प्रथम मनुष्य को इनमें से ६ फल मजदूरी के रूप में दिये जा चुके हों, तो
दूसरे ढोने वाले को अब कितनी दूरी तय करना है, ताकि वह शेष मजदूरी प्राप्त करले ? ॥२२९॥
विभिन्न दशाओं की संगत मजदूरियों के मानों को निकालने के लिये नियम, जब कि विभिन्न
मजदूर उन विभिन्न दूरियों तक दिया गया बोझ ले जावें—
मनुष्यों की विभिन्न संख्याओं द्वारा तय की गई दूरियों को वहाँ ढोने का काम करने वाले
मनुष्यों की संख्या द्वारा भाजित करो । प्राप्त भजनफलों को इस प्रकार संयुक्त करना पड़ता है,
कि उनमें से पहिला अलग रख लिया जाता है, और तब बाद के भजनफलों ( १, २, ३ आदि ) को
उसमें जोड़ दिया जाता है । इन परिणामी राशियों को क्रमशः विभिन्न स्थानों पर बैठ जाने वाले
मनुष्यों की संख्या द्वारा गुणित करना पड़ता है । तब इन परिणामी गुणनफलों के सम्बन्ध में प्रक्षेपक
क्रिया ( समानुपातिक विभाजन की क्रिया ) करने से विभिन्न स्थानों पर छोड़ने ( बैठने ) वाले मनुष्यों
की मजदूरियाँ प्राप्त होती हैं ॥२३०॥
(२२८) बीजीय रूप से : दा - द = [(ब - क) अ दा] / (अब - क²), जो पिछले नोट के समीकरण से सरलता-
पूर्वक प्राप्त किया जा सकता है । यहाँ क अज्ञात राशि है ।
१५० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २३१-
अत्रोद्देशकः
शिबिकां नयन्ति पुरुषा विंशतिरथ योजनद्वयं तेषाम् ।
वृत्तिर्दीनाराणां विंशत्यधिकं च सप्तशतम् ॥२३१॥
क्रोशद्वये निवृत्तौ द्वावुभयोः क्रोशयोस्त्रयश्चान्ये ।
पञ्च नरः शेषार्धाद्व्यावृताः का भृतिस्तेषाम् ॥२३२॥
इष्टगुणितपोट्टलकानयनसूत्रम्—
सैकगुणा स्वस्वेष्टं हित्वाऽन्योन्यघ्नशेषमितिः ।
अपवर्त्य योज्य मूलं ( विष्णोः ) कृत्वा व्येकेन मूलेन ॥२३३॥
पूर्वापवर्तराशीन् हत्वा पूर्वापवर्तराशियुतेः ।
पृथगेव पृथक् त्यक्त्वा हस्तगताः स्वधनसंख्याः स्युः ॥२३४॥
ताः स्वस्वं हित्वैव त्वशेषयोगं पृथक् पृथक् स्थाप्य ।
स्वगुणघ्नाः स्वकरगतैरूनाः पोट्टलकसंख्याः स्युः ॥२३५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
२० मनुष्यों को कोई पालकी २ योजन दूर ले जाने पर ७२० दीनार मिलते हैं। दो मनुष्य
दो क्रोश दूर जाकर रुक जाते हैं; दो क्रोश दूर और जाने पर अन्य तीन रुक जाते हैं, तथा शेष की
आधी दूरी जाने पर ५ मनुष्य रुक जाते हैं। ढोने वाले विभिन्न मजदूरों को क्या-क्या मजदूरी
मिलती है ? ॥२३१-२३२॥
किसी थैली में भरी हुई रकम को निकालने के लिये नियम, जो कुछ मनुष्यों में से प्रत्येक के
हाथ में जितनी रकम है उसमें जोड़ी जाने पर, अन्य के हाथों में रखी हुई रकमों के योग की विशिष्ट
गुणज ( multiple ) बन जाती है—
प्रश्न में विशिष्ट गुणज ( multiple ) संख्याओं में से प्रत्येक में एक जोड़कर योग राशियां
प्राप्त करते हैं। इन योगों को एक दूसरे से, प्रत्येक दशा में, विशेष उल्लिखित गुणज के सम्बन्धी योग
को उपेक्षित करते हुए, गुणित करते हैं। इन्हें, साधारण गुणनखंडों को हटा कर, अल्पतम पदों में प्रह्रासित
(लघुकृत) करते हैं। तब इन प्रह्रासित (लघुकृत) राशियों को जोड़ा जाता है। इस परिणामी योग का
वर्गमूल प्राप्त किया जाता है, जिसमें से एक घटा दिया जाता है। उपर्युक्त प्रह्रासित राशियों को इस १
द्वारा ह्रासित वर्गमूल द्वारा गुणित किया जाता है। तब इन्हें अलग-अलग उन्हीं प्रह्रासित राशियों के योग
में से घटाया जाता है। इस प्रकार, कई व्यक्तियों में से प्रत्येक के हाथ की रक़में प्राप्त होती हैं। उन
व्यक्तियों में से केवल एक के पास के धन के मान को प्रत्येक दशा में जोड़ से वञ्चित कर, इन सब
हाथ की रक़मों की राशियों को एक दूसरे में जोड़ना पड़ता है। इस प्रकार प्राप्त कई योग अलग-अलग
लिखे जाते हैं। इन्हें क्रमशः उपर्युक्त उल्लिखित गुणज राशियों द्वारा गुणित किया जाता है। इस
प्रकार प्राप्त कई गुणनफलों में से हाथ की रकमों को अलग-अलग घटाया जाता है। तब हाथ में कई
रकमों में से प्रत्येक के सम्बन्ध में अलग-अलग थैली की रकम का वही मान प्राप्त होता है ॥२३३-२३५॥
⎼ ( २३३-२३५ ) गाथा २३६-२३७ में दिये गये प्रश्न में, मानलो क, ख, ग हाथ में रखी हुई
तीन व्यापारियों की रक़में हैं; और थैली में य रकम है।
-६. २३६ ] मिश्रकव्यवहारः [ १५१
अत्रोद्देशकः
मार्गे त्रिभिर्वणिग्भिः पोट्टलकं दृष्टमाह तत्रैकः ।
पोट्टलकमिदं प्राप्य द्विगुणधनोऽहं भविष्यामि ॥२३६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन व्यापारियों ने सड़क पर एक थैली पड़ी हुई देखी । एक ने शेष उन से कहा, "यदि मुझे
यह थैली मिल जाय, तो तुम्हारे हाथ में जितनी रकमें हैं उनके हिसाब से मैं तुम दोनों लोगों से दुगुना
धनवान हो जाऊँगा ।" तब दूसरे ने कहा, "मैं तिगुना धनवान हो जाऊँगा ।" तब तीसरे ने कहा, "मैं
पांच गुना धनवान हो जाऊँगा ।" थैली की रकम तथा प्रत्येक के हाथ की रकमों को अलग-अलग
बतलाओ ॥२३६॥
हाथ की रकमों के मान तथा थैली की रकम निकालने के लिये नियम, जब कि थैली की रकम
का विशेष उल्लिखित भिन्नीय भाग दत्त-संख्या के मनुष्यों में, प्रत्येक के हाथ की रकम में क्रमशः
जोड़ने पर, प्रत्येक दशा में उनके धन की हाथ की रकम के वही गुणज ( multiple ) हो जावें—
तब य + क = अ ( ख + ग ), ⎞
य + ख = ब ( ग + क ), ⎬ जहाँ अ, ब, स प्रश्न में गुणजों का निरूपण करते हैं ।
य + ग = स ( क + ख ), ⎠
अब य + क + ख + ग = (अ + १) (ख + ग)
= (ब + १) (ग + क)
= (स + १) (क + ख).
तब {(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × (ख + ग) = (ब + १) (स + १),......( १ )
जहाँ ता = य + क + ख + ग है ।
इसी प्रकार, {(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × (ग + क) = (स + १) (अ + १)......( २ )
और {(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × (क + ख) = (अ + १) (ब + १)......( ३ )
( १ ), ( २ ) और ( ३ ) को जोड़ने पर,
{(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × २ (क + ख + ग)
= (ब + १) (स + १) + (स + १) (अ + १) + (अ + १) (ब + १) = शा......( ४ )
( १ ), ( २ ) और ( ३ ) को अलग-अलग २ द्वारा गुणित करके ( ४ ) में से घटाने पर—
{(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × २ क = शा – २ (ब + १) (स + १),
{(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × २ ख = शा – २ (स + १) (अ + १),
{(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × २ ग = शा – २ (अ + १) (ब + १),
१५२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २३७-
हस्तगताभ्यां युवयोस्त्रिगुणधनोऽहं द्वितीय आहेति ।
पञ्चगुणोऽहं त्वपरः पोट्टलहस्तस्थमानं किम् ॥२३७॥
सर्वतुल्यगुणकपोट्टलकानयनहस्तगतानयनसूत्रम्—
व्येकपदघ्नव्येकगुणेष्टांशवधोनितांशयुतिगुणघातः ।
हस्तगताः स्युर्भवति हि पूर्ववदिष्टांशभाजितं पोट्टलकम् ॥२३८॥
प्रश्न में दिये गये सभी उल्लिखित भिन्नों के योग के हर की उपेक्षा कर, उसे (उल्लिखित साधारण)
अपवर्त्य संख्या ( multiple ) द्वारा गुणित किया जाता है । इस गुणनफल में से वे राशियां अलग-
अलग घटाई जाती हैं, जो साधारण हर में प्रह्रासित उपर्युक्त भिन्नों में से प्रत्येक को एक कम मनुष्यों के
मामलों की संख्या और उल्लिखित अपवर्त्य के गुणनफल को एक द्वारा ह्रासित करने से प्राप्त राशि
द्वारा गुणित करने से प्राप्त होती हैं । परिणामी शेष, हाथ की रकमों के अलग-अलग मानों को स्थापित
करते हैं । पहिले की तरह क्रियायें करने पर और तब प्रश्न में विशेष उल्लिखित भिन्नीय भाग द्वारा
विभाजन करने पर थैली की रकम का मान प्राप्त हो जाता है ॥२३८॥
∴ क : ख : ग : : शा-२ (ब+१) (स+१) : शा-२ (स + १) (अ+१) : शा-२ (अ+१) (ब+१).
समानुपात के दाहिनी ओर, (यदि कोई हो तो) साधारण गुणनखंडों को हटाने से, हमें क, ख, ग
के सबसे छोटे पूर्णांक मान प्राप्त होते हैं । यह समानुपात नियम में सूत्र के रूप में दिया गया है । यह
देखने योग्य है कि नियम में कथित वर्गमूल केवल गाथा २३६-२३७ में दिये गये प्रश्न से सम्बन्धित
है । यदि शुद्ध रूप से लिखा जाय, तो “वर्गमूल” के स्थान में ‘३’ होना चाहिये । यह सरलता पूर्वक
देखा जा सकता है कि यह प्रश्न तभी सम्भव है, जब कि १/(अ + १), १/(ब + १) और १/(स + १) के कोई भी दो
का योग तीसरे से बड़ा हो ।
( २३८ ) नियम में दिया गया सूत्र यह है—
क = म ( अ + ब + स ) - अ ( २ म - १ ), ⎫ जहाँ क, ख, ग हाथ की रकमें हैं, म साधारण
ख = म ( अ + ब + स ) - ब ( २ म - १ ), ⎬ गुणज ( multiple ) है, और अ, ब, स
ग = म ( अ + ब + स ) - स ( २ म - १ ), ⎭ दिये गये उल्लिखित भिन्नीय भाग हैं ।
ये मान अगले समीकरणों से सरलता पूर्वक निकाले जा सकते हैं ।
पा. अ + क = म (ख + ग), ⎫
पा. ब + ख = म (ग + क), ⎬ जहाँ पा, थैली की रकम है ।
और पा. स + ग = म (क + ख), ⎭
-६. २४१ ] मिश्रकव्यवहारः [ १५३
अत्रोद्देशकः
वैश्यैः पञ्चभिरेकं पोट्टलकं दृष्टमाह चैकैकः ।
पोट्टलकषष्ठसप्तमनवमाष्टमदशमभागमाप्त्वैव ॥२३९॥
स्वस्वकरस्थेन सह त्रिगुणं त्रिगुणं च शेषाणाम् ।
गणक त्वं मे शीघ्रं वद हस्तगतं च पोट्टलकम् ॥२४०॥
इष्टांशेष्टगुणपोट्टलकानयनसूत्रम्—
इष्टगुणान्नान्यांशाः सेष्टांशाः सैकनिजगुणहृता युक्ताः ।
द्यूनपदघ्नेष्टांशन्यूनाः सैकेष्टगुणहृता हस्तगताः ॥२४१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
पाँच व्यापारियों ने एक थैली देखी । उन्होंने (एक के बाद दूसरे से) इस प्रकार कहा कि
थैली की रकम का क्रमशः १/६, १/७, १/९, १/८ और १/१० भाग पाने पर वह अपने हाथ की रकम मिलाकर अन्य
व्यापारियों के कुल धन से तिगुना धनी हो जायगा । हे गणितज्ञ ! उनके हाथों की अलग-अलग रकम
तथा थैली में भरी हुई रकम को शीघ्र ही बतलाओ ॥२३९-२४०॥
थैली की रकम प्राप्त करने के लिये नियम, जब कि उल्लिखित भिन्नीय भागों को, क्रमशः
उन व्यक्तियों के हाथ की रकम जोड़ने पर, प्रत्येक अन्य की कुल रकमों के मान से विशिष्ट गुणा
धनी बन जावे—
(इष्ट मनुष्य के भाग को छोड़कर,) शेष सभी से सम्बन्धित उल्लिखित भिन्नीय भागों को
साधारण हर में प्रहासित कर हर को उपेक्षित कर दिया जाता है । इन्हें (अलग-अलग दृष्ट मनुष्य
सम्बन्धी) निर्दिष्ट अपवर्त्य (multiple) द्वारा गुणित करते हैं । इन गुणनफलों में उस दृष्ट मनुष्य
के भिन्नीय भाग को जोड़ते हैं । परिणामी योगों में से प्रत्येक को अलग-अलग उसके संगत उल्लिखित
अपवर्त्य (multiple) से एक अधिक राशि द्वारा भाजित करते हैं । तब इन भजनफलों को भी
जोड़ा जाता है । अलग-अलग दशाओं सम्बन्धी इस प्रकार प्राप्त योगों को, दो कम दशाओं की संख्या
द्वारा गुणित कर, निर्दिष्ट भिन्नीय भाग द्वारा हासित करते हैं । अन्तर को एक अधिक निर्दिष्ट अपवर्त्य
द्वारा भाजित करते हैं । यह फल (इस विशिष्ट दशा में) हाथ की रकम है ॥२४१॥
( २४१ ) नियम में दिया गया सूत्र इस प्रकार है—
क = { (अ + मब)/(न + १) + (अ + मस)/(य + १) + (अ + मद)/(र + १) + ... - (श - २) अ } ÷ (म + १)
ख = { (ब + नअ)/(म + १) + (ब + नस)/(य + १) + (ब + नद)/(र + १) + ... - (श - २) ब } ÷ (न + १) इत्यादि;
जहाँ क, ख, ............ हाथ की रकमें हैं; अ, ब, स, द भिन्नीय भाग हैं;
म, न, य, र, ............ विभिन्न अपवर्त्य संख्यायें हैं; और श व्यापार सम्बन्धी व्यक्तियों की
संख्या है ।
ग० सा० सं०-२०
१५४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २४२-
अत्रोद्देशकः
द्वाभ्यां पथि पथिकाभ्यां पोट्टलकं दृष्टमाह तत्रैकः ।
अस्यार्धं संप्राप्य द्विगुणधनोऽहं भविष्यामि ॥२४२॥
अपरस्त्वंशद्वितयं त्रिगुणधनस्त्वत्करस्थधनात् ।
मत्करधनेन सहितं हस्तगतं किं च पोट्टलकम् ॥ २४३ ॥
दृष्टं पथि पथिकाभ्यां पोट्टलकं तद्गृहीत्वा च ।
द्विगुणमभूदाद्यस्तु स्वकरस्थधनेन चान्यस्य ॥
हस्तस्थधनादन्यस्त्रिगुणं किं करगतं च पोट्टलकम् ॥ २४४½ ॥
मार्गे नरैश्चतुर्भिः पोट्टलकं दृष्टमाह तत्राद्यः ।
पोट्टलकमिदं लब्ध्वा ह्यष्टगुणोऽहं भविष्यामि ॥ २४५½ ॥
स्वकरस्थधनेनान्यो नवसङ्गुणितं च शेषधनात् ।
दशगुणधनवानपरस्त्वेकादशगुणितधनवान् स्यात् ।
पोट्टलकं किं करगतधनं कियद्ब्रूहि गणकाशु ॥ २४७ ॥
मार्गे नरैः पोट्टलकं चतुर्भिर्दृष्टं हि तस्यैव तदा बभूवुः ।
पञ्चांशपादार्धतृतीयभागास्तद्द्वित्रिपञ्चघ्नचतुर्गुणाश्च १ ॥ २४८ ॥
१. M और B में स्युः पाठ है, जो स्पष्टरूप से अनुपयुक्त है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो यात्रियों ने सड़क पर धन से भरी हुई थैली देखी । उनमें से एक ने दूसरे से कहा, “थैली
की आधी रकम प्राप्त होने पर मै तुमसे दुगुना धनी हो जाऊँगा ।” दूसरे ने कहा, “इस थैली की २/३
रकम मिल जाने पर मैं हाथ की रकम मिलाकर तुम्हारे हाथ की रकम से तिगुनी रकमवाला हो
जाऊँगा ।” हाथ की अलग-अलग रकमें तथा थैली की रकम बतलाओ ॥२४२-२४३॥ दो यात्रियों ने
रास्ते पर पड़ी हुई धन से भरी थैलो देखी । एक ने उसे उठाया और कहा, “इस धन और हाथ के
धन को मिलाकर मैं तुमसे दुगुना धनी हूँ ।” दूसरे ने थैली को लेकर कहा, “मैं इस धन और हाथ के
धन को मिलाकर तुमसे तिगुना धनी हूँ ।” हाथ की रकमें और थैली की रकम अलग-अलग बतलाओ ।
॥२४४-२४४½॥ चार मनुष्यों ने धन से भरी एक थैली रास्ते में देखी । पहिले ने कहा, “यदि मुझे
यह थैली मिल जाय, तो मैं कुल धन मिलाकर तुम सभी के धन से आठगुना धनवान हो जाऊँ ।” दूसरे
ने कहा, “यदि यह थैली मुझे मिल जाय तो मेरा कुलधन तुम्हारे कुलधन से ९ गुना हो जाय ।”
तीसरे ने कहा, “मैं १० गुना धनी हो जाऊँगा ।” और चौथे ने कहा, “मैं ११ गुना धनी हो जाऊँगा ।”
हे गणितज्ञ ! थैली की रकम और उनमें से प्रत्येक के हाथ की रकमें बतलाओ ॥२४५½-२४७॥ चार
मनुष्यों ने रकम भरी थैली रास्ते में देखी । तब जो कुछ प्रत्येक के हाथ में था, यदि उसमें थैली का
क्रमशः १/५, १/४, १/२ और १/३ भाग मिलाया जाता, तो वह दूसरों के कुलधन से क्रमशः दुगुना, तिगुना,
पाँचगुना और चारगुना धन हो जाता । थैली की रकम और उनमें से प्रत्येक के हाथ की रकमें
बतलाओ ॥२४८॥ तीन व्यापारियों ने रास्ते में धन से भरी हुई थैली देखी । पहिले ने (शेष) उनसे
-६. २५२½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १५५
मार्गे त्रिभिर्वणिग्भिः पोट्टलकं दृष्टमाह तत्राद्यः ।
यद्यस्य चतुर्थांशं लभेऽहमित्याह स युवयोर्द्विगुणः ॥ २४९ ॥
आह त्रिभागमपरः स्वहस्तधनसहितमेव च त्रिगुणः ।
अस्यार्धं प्राप्याहं तृतीयपुरुषश्चतुर्गुधनवान् स्याम् ।
आचक्ष्व गणक शीघ्रं किं हस्तगतं च पोट्टलकम् ॥ २५०½ ॥
याचितरूपैरिष्टगुणकहस्तगतानयनस्य सूत्रम्—
याचितरूपैक्यानि स्वसैकगुणवर्धितानि तैः प्राग्वत् ।
हस्तगतानां नीत्वा चेष्टगुणन्नेति सूत्रेण ॥ २५१½ ॥
सदृशच्छेदं कृत्वा सैकैष्टगुणाहतेष्टगुणयुत्या ।
रूपोनितया भक्तान् तानेव करस्थितान् विजानीयात् ॥ २५२½ ॥
कहा, “यदि मुझे इस थैली का ¼ धन मिल जाय, तो मैं अपने हाथ की रकम मिलाकर तुम सभी के
कुलधन से दुगुने धनवाला हो जाऊँ ।” दूसरे ने कहा, “यदि मुझे थैली का ⅓ धन मिल जाय, तो उसे
मिलाकर मैं तुम सभी के कुल धन से तिगुने धनवाला हो जाऊँ ।” तीसरे ने कहा, “यदि मुझे थैली
का आधा धन मिल जाय तो उसे मिलाकर मैं तुम दोनों के कुल धन से चौगुने धनवाला हो जाऊँ ।”
हे गणितज्ञ ! शीघ्र ही उनके हाथ की रकमें तथा थैली की रकम अलग-अलग बतलाओ ॥ २४९–२५०½ ॥
हाथ की ऐसी रकम निकालने का नियम, जो दूसरे से माँगे हुए धन में मिलने पर दूसरों के
हाथ की रकमों का निर्दिष्ट अपवर्त्य बन जाती है :—
माँगी हुई रकमों को अलग-अलग निज की संगत, अपवर्त्य ( multiple ) राशि में एक
जोड़ने से प्राप्तफल द्वारा गुणित करते हैं । इन गुणनफलों की सहायता से गाथा २४१ में दिये गये
नियम द्वारा हाथ की रकमों को प्राप्त कर लेते हैं । इस प्रकार प्राप्त इन राशियों को साधारण हरवाली
बनाते हैं । प्रत्येक एक द्वारा बढ़ाई गईं अपवर्त्य ( multiple ) राशियों द्वारा क्रमशः निर्दिष्ट अप-
वर्त्य राशियों को भाजित करते हैं । तब साधारण हरवाली राशियों को अलग-अलग इन प्राप्त फलों के
एकोन योग द्वारा भाजित करते हैं । इन परिणामी भजनफलों को विभिन्न मनुष्यों के हाथों की रकमें
समझना चाहिये ॥ २५१½-२५२½ ॥
( २५१½–२५२½ ) बीजीय रूप से,
[ (अ + ब) (म + १) + म (स + द) (न + १)
[ क - { ─────────────────────────────────── +
न + १
(अ + ब) (म + १) + म (इ + फ) (प + १)
─────────────────────────────────── + .........
प + १
··· + ··· इत्यादि— (श - २) (अ + ब) (म + १) } ÷ (म + १) ] ÷
( म + न + प - १ )
───── ───── ─────
म + १ न + १ प + १
इसी प्रकार ख, ग के लिये, इत्यादि । यहाँ अ, ब, स, द, इ, फ एक दूसरे से माँगी हुई रकमें हैं ।