गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
७४ ] गणितसारसंग्रहः [ ४. ३६-
चरति कमलषण्डे सारसानां चतुर्थो नवमचरणभागौ सप्त मूलानि चाद्रौ ।
विकचबकुलमध्ये सप्तनिघ्नाष्टमानाः कति कथय सखे त्वं पक्षिणो दक्ष साक्षात् ॥ ३६ ॥
न भागः कपिवृन्दस्य त्रीणि मूलानि पर्वते । चत्वारिंशद्वने दृष्टा वानरास्तद्गणः कियान् ॥ ३७ ॥
कलकण्ठानामर्धं सहकारतरोः प्रफुल्लशाखायाम् ।
तिलकेऽष्टादश तस्थुर्नो मूलं कथय पिकनिकरम् ॥ ३८ ॥
हंसकुलस्य दलं बकुलेऽस्थात् पञ्च पदानि तमालकुजाग्रे ।
अत्र न किंचिदपि प्रतिदृष्टं तत्प्रमिति कथय प्रिय शीघ्रम् ॥ ३९ ॥
इतिमूलजातिः ।
अथ शेषमूलजातौ सूत्रम्—
पददलवर्गयुताग्रान्मूलं सप्राकपदार्धमस्य कृतिः ।
दृश्ये मूलं प्राप्ते फलमिह भागं तु भागजातिविधिः ॥ ४० ॥
पर
-४. ४६] प्रकीर्णकव्यवहारः [ ७५
अत्रोद्देशकः
गजयूथस्य त्र्यंशः शेषपदं च त्रिसंगुणं सानौ ।
सरसि त्रिहस्तिनीभिनगो दृष्टः कतीह गजाः ॥ ४१ ॥
निर्जन्तुकप्रदेशे नानाद्रुमषण्डमण्डितोद्याने । आसीनानां यमिनां मूलं तरुमूलयोगयुक्तम् ॥ ४२ ॥
शेषस्य दशमभागो मूलं नवमोऽथ मूलमष्टांशः । मूलं सप्तममूलं षष्ठो मूलं च पञ्चमो मूलं ॥ ४३ ॥
एते भागाः काव्यप्रवचनधर्मप्रमाणनयविद्याः ।
वादच्छन्दोज्योतिषमन्त्रालङ्कारशब्दज्ञाः ॥ ४४ ॥
द्वादशतपःप्रभावा द्वादशभेदाङ्गशास्त्रकुशलधियः ।
द्वादश मुनयो दृष्टाः कियती मुनिचन्द्र यतिसमितिः ॥ ४५ ॥
मूलानि पञ्च चरणेन युतानि सानौ शेषस्य पञ्चनवमः करिणां नगाग्रे ।
मूलानि पञ्च सरसीजवने रमन्ते नद्यास्तटे षडिह ते द्विरदाः कियन्तः ॥ ४६ ॥
इति शेषमूलजातिः ।
1 B में शेषस्य पदं त्रिसंगुणं पाठ है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
हाथियों के यूथ (झुंड) का १/३ भाग तथा शेष भाग की वर्गमूल राशि के हाथो, पर्वतीय उतार
पर देखे गये । शेष एक हाथी ३ हस्तिनियों के साथ एक सरोवर के किनारे देखा गया । बतलाओ
कितने हाथी थे ? ॥ ४१ ॥ कई प्रकार के वृक्षों के समूह द्वारा मंडित उद्यान के निर्जन्तुक प्रदेश में
कई साधु आसीन थे । उनमें से कुल के वर्गमूल की संख्या के साधु तरुमूल में बैठे हुए योगाभ्यास
कर रहे थे । शेष के १/१०, (इसको घटाकर) शेष का वर्गमूल, (इसको घटाकर) शेष के १/९, (इसको
घटाकर) शेष का १/८; (इसको घटाकर) शेष का १/७; (इसको घटाकर) शेष का वर्गमूल; (इसको
घटाकर) शेष का १/६; (इसको घटाकर) शेष का १/५; इसको घटाकर शेष के वर्गमूल द्वारा निरूपित
संख्याओं वाले वे थे जो (क्रमशः) काव्य प्रवचन, धर्म, प्रमाण नयविद्या, वाद, छन्द, ज्योतिष, मंत्र,
अलंकार और शब्द शास्त्र (व्याकरण) जानने वाले थे, तथा वे भी थे जो बारह प्रकार के तप के प्रभाव
से प्राप्त होनेवाली ऋद्धियों के धारी थे, तथा बारह प्रकार के अंग शास्त्र को कुशलता पूर्वक जानने वाले
थे । इनके अतिरिक्त अंत में १२ मुनि देखे गये । हे मुनिचंद्र ! बतलाओ कि यति समिति का संख्यात्मक
मान क्या था ? ॥ ४२-४५ ॥ हाथियों के समूह के वर्गमूल का ५ १/४ गुना भाग पर्वतीय उतार पर
क्रीड़ा कर रहा है; शेष का ५/९ भाग पर्वत के शिखर पर क्रीड़ा कर रहा है । (इसको घटाकर) शेष का
वर्गमूल प्रमाण हस्तीगण कमल के वन में रमण कर रहा है । और, शेष ६ हस्ती नदी के तीर पर हैं ।
यहाँ सब हस्ती कितने हैं ? ॥ ४६ ॥
इस प्रकार, 'शेषमूल' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
"द्विरग्र शेष मूल" जाति [शेषों की संरचना करने वाली दो ज्ञात राशियों वाले 'शेषमूल' प्रकार]
सम्बन्धी नियम-
(समूह वाचक अज्ञात राशि के) वर्गमूल का गुणांक, और (शेष रहने वाली) अंतिम ज्ञात•
(स√क - बक + अ) = ० द्वारा उपर्युक्त क - बक का मान सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है ।
यहाँ भी 'क' अज्ञात राशि है ।
)...: Ah, (१ - ब₁) (१ - ब₂) × ...इत्यादिis UNDERअ₂! Wait, where is the fraction bar between अ₂and(१ - ब₁)...? Wait, look at the image! Is there a fraction bar under अ₂? LOOK CLOSELY! Wait, there is NO horizontal line between अ₂and(१ - ब₁)?? Wait, let me look at ( १ - ब₁) ( १ - ब₂) × ...इत्यादि: Wait! Under स, there is a horizontal line: स --------------------------------- ( १ - ब₁) ( १ - ब₂) × ...इत्यादिNow look at the second one: अ₂Wait, is there a horizontal line? NO! Wait! Look atअ₂: It says: अ₂ ( १ - ब₁) ( १ - ब₂) × ...इत्यादि + अ₁, पद संहतियाँ प्राप्त होती हैं जिनका शेषमूल के सूत्र में स औरWAIT! Isअ₂just sitting above( १ - ब₁)without a line, or is there a line? Wait, look betweenअ₂and( १ - ब₁): Wait! There IS NO LINE between अ₂and( १ - ब₁)? Wait, look at + अ₁! + अ
? No, it's २ or ३ or ५?
Wait, why would it be २ and ३ or ५ and २?
Wait, could it be:
"के १/२ वें भाग से लेकर १/५ वें भाग तक"?
Wait, let's look at:
First: १/२? But the Sanskrit says "पञ्चांशकादिदलान्तिमाः"! पञ्चांशक = 1/5, आदि = first! Dal = 1/2, antima = last!
Wait, why would a translator write: "के १/२ वें भाग से लेकर १/५ वें भाग तक"?
Or did the translator write: "के १/५ वें भाग से लेकर १/२ वें भाग तक"?
Wait, look at the first fraction:
Could the bottom digit be ५?
Let's look at the bottom digit of the FIRST fraction:
It has a vertical-ish stroke, then a loop at the bottom?
Wait! In Gujarati/Devanagari 5 is ५. In Marathi 5 is ५.
Wait, look at the SECOND fraction:
It has a horizontal bar, and below it is... wait, look at it: it has a loop at the bottom, going right: it's २!
Wait, then the first fraction is ५!
Wait,
७८ ] गणितसारसंग्रहः [ ४. ५३-
अत्रोद्देशकः
पद्मानालत्रिभागस्य जले मूलाष्टकं स्थितम् । षोडशाङ्गुलमाकाशे जलनालोदयं वद ॥ ५३ ॥
द्वित्रिभागस्य यन्मूलं नवघ्नं हस्तिनां पुनः । शेषत्रिपञ्चमांशस्य मूलं षड्भिः समाहतम् ॥ ५४ ॥
विगलद्दानधाराद्र्रगण्डमण्डलदन्तिनः । चतुर्विंशतिरादृष्टा मयाटव्यां कति द्विपाः ॥ ५५ ॥
क्रोडौघार्धचतुःपदानि विपिनं शार्दूलविक्रीडितं प्रापुः शेषदशांशमूलयुगलं शैलै चतुस्ताडितम् ।
शेषार्धस्य पदं त्रिवर्गगुणितं वप्रं वराहा वने दृष्टाः सप्तगुणाष्टकप्रमितयस्तेषां प्रमाणं वद ॥ ५६ ॥
इत्यंशमूलजातिः ।
अथ भागसंवर्गजातौ सूत्रम्—
स्वांशाप्रहरादूनाच्चतुर्गुणाग्रेण तद्धरेण हतात् । मूलं योज्यं त्याज्यं तच्छेदे तद्दलं वित्तम् ॥ ५७ ॥
१ B में 'वारार्द्र' पाठ है ।
२ इस श्लोक के पश्चात् सभी हस्तलिपियों में निम्नलिखित श्लोक है जो केवल ५७ वें श्लोक का
व्याख्यानुवाद है—
अन्यच्च—
चतुर्हतदृष्टे नोनाद्भागाहर्त्यशहृतहारात् । तच्छेदेन हतान्मूलं योज्यं त्याज्यं तच्छेदे तदर्धंवित्तम् ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कमल की नाल के त्रिभाग के वर्गमूल का आठगुना भाग पानी के भीतर है और १६ अंगुल
पानी के ऊपर वायु में है । बतलाओ कि तली से पानी की ऊँचाई कितनी है तथा कमल नाल की
लम्बाई क्या है ? ॥५३॥ हाथियों के झुण्ड में से, उनकी संख्या के २/३ भाग के वर्गमूल का ९ गुना
प्रमाण, और शेषभाग के ३/५ भाग के वर्गमूल का ६ गुना प्रमाण; और, अंत में शेष २४ हाथी वन में ऐसे
देखे गये जिनके चौड़े गण्ड मण्डल से मद झर रहा था । बतलाओ कुल कितने हाथी हैं ? ॥५४-५५॥
वराहों के झुण्ड के अर्द्ध अंश के वर्गमूल की चौगुनी राशि जंगल में गई जहाँ शेर क्रीड़ा कर रहे थे । शेष
झुंड के दसवें भाग के वर्गमूल की अठगुनी राशि पर्वत पर गईं । शेष के अर्द्धभाग के वर्गमूल की ९ गुनी
राशि नदी के किनारे गई । और अन्त में ५६ वराह वन में देखे गये । बताओ कि कुल वराह कितने थे ? ॥५६॥
इस प्रकार, 'अंशमूल' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
'भाग संवर्ग' जाति सम्बन्धी नियम—
(अज्ञात समूह वाचक राशि के विशिष्ट मिश्र भिन्नीय भाग के सरलीकृत) हर को स्व
सम्बन्धित (सरलीकृत) अंश द्वारा विभाजित करने से प्राप्त फल में से दिये गये ज्ञात भाग की
चौगुनी राशि घटाओ । तब इस अंतर फल को उसी (ऊपर वर्ते हुए सरलीकृत) हर द्वारा गुणित करो ।
इस गुणनफल के वर्गमूल को वर्ते हुए उसी हर में जोड़ो और फिर उसी में से घटाओ । तब योगफल
अथवा अंतर फल में से किसी एक की अर्द्ध राशि, इष्ट (अज्ञात समूह वाचक) राशि होती है । ॥५७॥
(५६) “शार्दूल विक्रीडित" का अर्थ शेरों की क्रीड़ा होता है । इसके सिवाय यह नाम उस
छन्द का भी है जिसमें कि यह श्लोक संरचित हुआ है ।
नफ _____ / नफ \ नफ
—— ± √ ( —— - ४अ ) ——
(५७) बीजीय रूप से कथन करने पर, क = मप \ मप / मप होता है । क की
——————————————————————
२
Here is the complete line-by-line transcription of the page in pure Devanagari Markdown:
-४. ६१ ] प्रकीर्णकव्यवहारः [ ७९
अत्रोद्देशकः
अष्टमं षोडशांशाघ्नं शालिराशेः कृषीवलः । चतुर्विंशतिवाहांश्च लेभे राशिः कियान् वद ॥ ५८ ॥
शिखिनां षोडशभागः स्वगुणश्रुते तमालषण्डेऽस्थात् ।
शेषनवांशः स्वहतरचतुरप्रदशापि कति ते स्युः ॥ ५९ ॥
जले त्रिंशदंशाहतो द्वादशांशः स्थितः शेषविंशो हतः षोडशेन ।
त्रिन्निघ्नेन पङ्के करा विंशतिः खे सखे स्तम्भदैर्घ्यस्य मानं वद त्वम् ॥ ६० ॥
इति भागसंवर्गजातिः ।
अथोनाधिकांशवर्गजातौ सूत्रम्—
स्वांशकभक्तह्रार्धं न्यूनयुगाधिकोनितं च तद्वर्गात् ।
न्यूनाधिकवर्गोत्रान्मूलं स्वर्णं फलं पर्देऽशाहतम् ॥ ६१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
८० ] गणितसारसंग्रहः [ ४. ६२-
१हीनालाप उदाहरणम्
महिषीणामष्टांशो व्येको वर्गीकृतो वने रमते । पञ्चदशाद्रौ दृष्टास्तृणं चरन्त्यः कियन्त्यस्ताः ॥६२॥
अनेकपानां दशमो द्विवर्जितः स्वसंगुणः क्रीडति सल्लकीवने ।
चरन्ति षड्वर्गमिता गजा गिरौ कियन्त एतेऽत्र भवन्ति दन्तिनः ॥ ६३ ॥
२अधिकालाप उदाहरणम्
जम्बूवृक्षे पञ्चदशांशो द्विकयुक्तः स्वेनाभ्यस्तः केकिकुलस्य द्विकृतिघ्नाः ।
पञ्चाप्यन्ये मत्तमयूराः सहकारे रंरम्यन्ते मित्र वदैषां परिमाणम् ॥ ६४ ॥
इत्यूनाधिकांशवर्गजातिः ॥
अथ मूलमिश्रजातौ सूत्रम्—
मिश्रकृतिरूनयुक्ता व्यधिका च द्विगुणमिश्रसंभक्ता ।
वर्गीकृता फलं स्यात्करणमिदं मूलमिश्रविधौ ॥ ६५ ॥
१ M में 'हीन' छूट गया है । २ M में यह तथा अनुगामी श्लोक छूट गये हैं ।
हीनालाप प्रकार के उदाहरण
कुल झुंड के १/८ वें भाग के पूर्ण वर्ग से एक कम महिष (भैंसा) राशि वन में क्रीड़ा कर रही है ।
शेष १५, पर्वत पर घास चरते हुए दिखाई दे रहे हैं । बतलाओ कुल कितने भैंसे हैं ? ॥६२॥ कुल
झुंड के १/१० वें भाग से दो कम प्रमाण, उसी प्रमाण द्वारा गुणित होने से लब्ध हस्ति राशि सल्लकी
वन में क्रीड़ा कर रही है । शेष हाथी जो संख्या में ६ की वर्गराशि प्रमाण हैं, पर्वत पर विचर रहे हैं ।
बतलाओ वे कुल कितने हैं ? ॥६३॥
अधिकालाप प्रकार का उदाहरण
कुल झुंड के १/१५ भाग से २ अधिक राशि को स्व द्वारा गुणित करने से प्राप्त राशि प्रमाण
मयूर जम्बू वृक्ष पर खेल रहे हैं । शेष गर्वीले २² × ५ मयूर आम के वृक्ष पर खेल रहे हैं । हे मित्र !
उस झुंड के कुल मयूरों की संख्या बतलाओ ? ॥ ६४ ॥
इस प्रकार ऊनाधिक 'अंश वर्ग' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
'मूलमिश्र' जाति सम्बन्धी नियम—
( विशिष्ट अज्ञात राशियों के वर्गमूलों के ) मिश्रित ( ज्ञात ) योग के वर्ग में ( दी गई )
ऋणात्मक राशि जोड़ दी जाती है, अथवा दी गई धनात्मक राशि उसमें से घटा दी जाती है । परिणामी
राशि को उपर्युक्त मिश्रित योग की दुगुनी राशि द्वारा विभाजित करते हैं । इसे वर्गित करने पर इष्ट
अज्ञात समूह की अर्घा ( value ) प्राप्त होती है । यही, 'मूलमिश्र' प्रकार के प्रश्नों का साधन करने
का नियम है ॥ ६५ ॥
( ६४ ) इस गाथा में 'मत्तमयूर' शब्द का अर्थ 'गर्वीला मयूर' होता है । यह इस छन्द का भी
नाम है जिसमें यह गाथा संरचित हुई है ।
( ६५ ) बीजीय रूप से, क = { (म² ± द) / २ म }² है यह क की अर्हा समीकार √क + √(क ∓ द)
= म द्वारा सरलता से प्राप्त हो सकती है । यहाँ 'म', नियम में उल्लिखित ज्ञात मिश्रित योग है ।
-४. ७० ] प्रकीर्णकव्यवहारः [ ८१
हीनालाप उद्देशकः
मूलं कपोतवृन्दस्य द्वादशोनस्य चापि यत् । तयोर्योगे कपोताः षड् दृष्टास्तन्निकरः कियान् ॥६६॥
पारावतीयसंघे चतुर्थनोनेऽपि तत्र यन्मूलम् । तद्द्वययोगः षोडश तद्वृन्दे कति विहङ्गाः स्युः ॥६७॥
अधिकालाप उद्देशकः
राजहंसनिकरस्य यत्पदं साष्टषष्टिसहितस्य चैतयोः ।
संयुतिर्द्विकविहीनषट्कृतिस्तद्गणे कति मरालका वद ॥ ६८ ॥
इति मूलमिश्रजातिः ।
अथ भिन्नदृश्यजातौ सूत्रम्—
दृश्यांशोने रूपे भागाभ्यासेन भाजिते तत्र । यल्लब्धं तत्सारं प्रजायते भिन्नदृश्यविधौ ॥ ६९ ॥
अत्रोद्देशकः
सिकतायामष्टांशः संदृष्टोऽष्टादशांशसंगुणितः । स्तम्भस्यार्धं दृष्टं स्तम्भायामः कियान् कथय ॥७०॥
१ B में 'योगः', पाठ है । २ B, M और K में 'गगने' पाठ है ।
हीनालाप के उदाहरणार्थ प्रश्न
कपोतों की कुल संख्या के वर्गमूल में १२ द्वारा ह्रासित कपोतों की कुल संख्या के वर्गमूल को
जोड़ने पर ( ठीक फल ) ६ कबूतर प्रमाण देखने में आता है । उस वृन्द के कपोतों की कुल संख्या
क्या है ? ॥ ६६ ॥ कपोतों के कुल समूह का वर्गमूल, तथा ४ के घन द्वारा ह्रासित कपोतों की कुल
संख्या का वर्गमूल निकालकर इन ( दोनों राशियों ) का योग १६ प्राप्त होता है । बतलाओ समूह में
कुल कितने विहंग हैं ? ॥ ६७ ॥
अधिकालाप का उदाहरणार्थ प्रश्न
राजहंसों के समूह के संख्यात्मक मान का वर्गमूल तथा ६८ अधिक उसी समूह की संख्या का
वर्गमूल ( निकालने से प्राप्त ) इन ( दोनों राशियों ) का योग ६² - २ होता है । बतलाओ उस समूह
में कितने हंस हैं ? ॥ ६८ ॥
इस प्रकार 'मूल मिश्र' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
'भिन्न दृश्य' जाति सम्बन्धी नियम—
जब एक को ( अज्ञात राशियों से सम्बन्धित दी गईं ) भिन्नीय शेष राशि द्वारा ह्रासित कर
( सम्बन्धित विशिष्ट ) भिन्नीय भागों के गुणन फल द्वारा भाजित करते हैं, तब प्राप्त फल ( भिन्नों पर
प्रश्नों के ) 'भिन्न दृश्य' प्रकार का साधन करने में, इष्ट उत्तर होता है ॥ ६९ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी स्तम्भ का १/८ भाग, उसो स्तम्भ के १/१८ भाग द्वारा गुणित होता है । इससे प्राप्त भाग
प्रमाण रेत में गढ़ा हुआ पाया गया । उस स्तम्भ का १/२ भाग ऊपर दृष्टिगोचर हुआ । बतलाओ कि
स्तम्भ की ( उदग्र vertical ) लम्बाई क्या है ? ॥ ७० ॥ कुल हाथियों के झुंड के २/३ वें भाग
( ६९ ) बीजीय रूप से, क = ( १ - र/य ) ÷ मप/नफ है । यह, समीकरण क - म/न क × प/फ क -
ग० सा० सं०-११
प्रकीर्णक व्यवहार एवं त्रैराशिक व्यवहार (Proportion & Ratios)
८२ ] गणितसारसंग्रहः ४. ७१- ]
द्विभक्तनवमांशकप्रहतसप्तविंशांशकः प्रमोदमवतिष्ठते करिकुलस्य पृथ्वीतले ।
विनीलजलदाकृतिर्विहरति त्रिभागो नगे वद त्वमधुना सखे करिकुलप्रमाणं मम ॥ ७१ ॥
साधूत्कृतेर्निवसति षोडशांशकस्त्रिभाजितः स्वकगुणितो वनान्तरे ।
पादो गिरौ मम कथयाशु तन्मितिं प्रोत्तीर्णवान् जलधिसमं प्रकीर्णकम् ॥ ७२ ॥
इति भिन्नदृश्यजातिः ॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ प्रकीर्णको नाम तृतीयव्यवहारः समाप्तः ॥
को उसी झुंड के १/९ वें भाग से गुणित करने तथा २ द्वारा विभाजित करने से प्राप्त फल प्रमाण के
हाथी मैदान में प्रसन्न दशा में तिष्ठे हैं । शेष ( बचा हुआ ) १/३ भाग झुंड जो बादलों के समान अत्यन्त
काले हाथियों का है, पर्वत पर क्रीड़ा कर रहा है । हे मित्र ! बतलाओ कि हाथियों के झुंड का
संख्यात्मक मान क्या है ? ॥ ७१ ॥ साधुओं के समूह का १/१६ वां भाग ३ द्वारा विभाजित करने के
पश्चात् स्व द्वारा गुणित ( अर्थात् १/१६ ÷ ३ द्वारा गुणित ) करने से प्राप्त भाग प्रमाण वन के अन्तः भाग
में रह रहा है; उस समूह का ( बचा रहने वाला ) १/४ भाग पर्वत पर रह रहा है । हे जलधि सम
प्रकीर्णक के प्रोत्तीर्णवान् ! मुझे शीघ्रही साधुओं के समूह का संख्यात्मक मान बतलाओ । ॥७२॥
इस प्रकार, 'भिन्न दृश्य' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणित शास्त्र में 'प्रकीर्णक' नामक तृतीय
व्यवहार समाप्त हुआ ।
- र/य क = ० से स्पष्ट है ।
(७१) 'पृथ्वी' शब्द जो इस गाथा में आया है, उसका अर्थ पृथ्वी है तथा यह उस छन्द का
नाम भी है जिसमें यह गाथा संरचित हुई है ।
५. त्रैराशिकव्यवहारः
त्रिलोकबन्धवे तस्मै केवलज्ञानभानवे । नमः श्रीवर्धमानाय निर्धूताखिलकर्मणे ॥ १ ॥
इतः परं त्रैराशिकं चतुर्थव्यवहारमुदाहरिष्यामः ।
तत्र करणसूत्रं यथा—
त्रैराशिकेऽत्र सारं फलमिच्छासंगुणं प्रमाणाप्तम् ।
इच्छाप्रमयोः साम्ये विपरीतेयं क्रिया व्यस्ते ॥ २ ॥
पूर्वार्धोद्देशकः
दिवसैस्त्रिभिः सपादैर्योजनषट्कं चतुर्थभागोनम् । गच्छति यः पुरुषोऽसौ दिनयुतवर्षेण किं कथय ॥३॥
व्यर्धाष्टाभिरहोभिः क्रोशाष्टांशं स्वपञ्चमं याति ।
पङ्गुः सपञ्चभागैर्वर्षैस्त्रिभिरत्र किं ब्रूहि ॥ ४ ॥
अङ्गुलचतुर्थभागं प्रयाति कीटो दिनाष्टभागेन । मेरोर्मूलाच्छिखरं कतिभिरहोभिः समाप्नोति ॥५॥
१ P, K और M में स्व के लिये स पाठ है ।
५. त्रैराशिकव्यवहार
तीनों लोकों के बन्धु तथा सूर्य के समान केवल ज्ञान के धारी श्री वर्द्धमान को नमस्कार है
जिन्होंने समस्त कर्म ( मल ) को निर्धूत कर दिया है । ॥१॥
इसके पश्चात्, हम त्रैराशिक नामक चतुर्थ व्यवहार का प्रतिपादन करेंगे ।
त्रैराशिक सम्बन्धी नियम—
यहाँ त्रैराशिक नियम में, फल को इच्छा द्वारा गुणित कर प्रमाण द्वारा विभाजित करने से
इष्ट उत्तर प्राप्त होता है, जब कि इच्छा और प्रमाण समान ( अनुक्रम direct अनुपात में ) होते
हैं । जब यह अनुपात प्रतिलोम ( inverse ) होता है तब यह गुणन तथा भाग की क्रिया विपरीत हो
जाती है ( ताकि भाग की जगह गुणन हो और गुणन के स्थान में भाग हो ) । ॥२॥
पूर्वार्ध, अनुक्रम त्रैराशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
वह मनुष्य जो ३ १/४ दिन में ५ ३/४ योजन जाता है, १ वर्ष और १ दिन में कितनी दूर जाता है ?
॥३॥ एक लंगड़ा मनुष्य ७ १/२ दिन में एक क्रोश का १/८ तथा उसका १/५ भाग चलता है । बतलाओ वह
३ १/५ वर्षों में कितनी दूरी तय करता है ? ॥४॥ एक कीड़ा १/८ दिन में १/४ अंगुल चलता है । बतलाओ कि
वह मेरुपर्वत की तली से उसके शिखर पर कब पहुँचेगा ? ॥५॥ वह मनुष्य जो ३ १/२ दिन में १ १/४ कार्षा-
( २ ) प्रमाण और फल के द्वारा अर्घ ( rate ) प्राप्त होती है । फल, इष्ट उत्तर के समान
राशि होती है और प्रमाण, इच्छा के समान होता है । 'इच्छा' वह राशि है जिसके विषय में, किसी अर्घ
( दर ) से, कोई वस्तु निकालना होती है । जैसे कि गाथा ३ के प्रश्न में ३ १/४ दिन प्रमाण है, ५ ३/४ योजन
फल है, और १ वर्ष १ दिन इच्छा है ।
( ५ ) मेरु पर्वत की ऊँचाई ९९,००० योजन अथवा ७६,०३२,०००,००० अंगुल मानी जाती है ।
८४ ] गणितसारसंग्रहः [ ५. ६-
कार्षापणं सपादं निर्विशति त्रिभिरहोभिरर्धयुतैः । यो ना पुराणशतकं सपणं कालेन केनासौ ॥६॥
कृष्णागुरुसत्खण्डं द्वादशहस्तायतं त्रिविस्तारम् । क्षयमेत्यङ्गुलमहः क्षयकालः कोऽस्य वृत्तस्य ॥७॥
स्वर्णैर्दशभिः सार्धैर्द्रोणाढककुडुबमिश्रितः क्रीतः । वरराजमाषवाहः किं हेमशतेन सार्धेन ॥ ८ ॥
सार्धैस्त्रिभिः पुराणैः कुङ्कुमपल मष्टभागसंयुक्तम् । संप्राप्यं यत्र स्यात् पुराणशतकेन किं तत्र ॥ ९ ॥
सार्धार्द्रक सप्रपलैश्चतुर्दशार्धोनिताः पण लब्धाः । द्वात्रिंशदार्द्रकपलैः सपञ्चमैः किं सखे ब्रूहि ॥१०॥
कार्षापणैश्चतुर्भिः पञ्चाशायुतैः पलानि रजतस्य । षोडश सार्धानि नरो लभते किं कर्षनियुतेन ॥११॥
कर्पूरस्याष्टपलैस्त्र्यंशोनैर्नात्र पञ्च दीनारान् । भागांशकलायुक्तान् लभते किं पलसहस्रेण ॥ १२ ॥
सार्धैस्त्रिभिः पणैरिह घृतस्य पलपञ्चकं सपञ्चांशम् । क्रीणाति यो नरोऽयं किं सार्धमकर्षशतकेना ॥१३॥
सार्धैः पञ्चपुराणैः षोडश सदलानि वस्त्रयुगलानि । लब्धानि सैकषष्ट्या कर्षाणां किं सखे कथय ॥१४॥
वापी समचतुरश्रा सलिलवियुक्ताष्टहस्तघनमाना । शैलस्तस्यास्तीरे संमुत्थितः शिखरतस्तस्य ॥१५॥
वृत्ताङ्गुलविष्कम्भा जलधारा स्फटिकनिर्मला पतिता ।
वाप्यन्तरजलपूर्णा नगोच्छ्रितिः का च जलसंख्या ॥ १६ ॥
१ B में सत्कृष्णागुरुखण्डं पाठ है । २ M और B में लभ्याः पाठ है । ३ B में समुत्थिता शि पाठ है ।
पण उपयोग में लाता है वह १ पण सहित १०० पुराण कितने दिन में खर्च करेगा ।॥६॥ १२ हाथ
लम्बे ( आयत ) तथा ३ हाथ व्यास ( विस्तार ) वाले कृष्णागुरु का सत्खंड ( अच्छा टुकड़ा ) एक दिन
में एक घन अंगुल के अर्घ ( rate ) से क्षय होता है । बतलाओ कुल बेलनाकार टुकड़े को क्षय
होने में कितना समय लगेगा ? ॥७॥ १० १/२ स्वर्ण में श्रेष्ठ काले चने का १ वाह, १ द्रोण, १ आढक और
१ कुडव खरीदे जाते हैं । बतलाओ १०० १/२ स्वर्ण में कितना कितना प्रमाण खरीदा जा सकेगा ? ॥८॥
यदि ३ १/२ पुराणों के द्वारा १ १/८ पल कुङ्कुम प्राप्त हो सकता हो तो १०० पुराणों में कितना प्राप्त हो सकेगा ?
॥९॥ ७ १/२ पल 'आर्द्रक' के द्वारा १३ १/२ पण प्राप्त किये गये । हे मित्र ! ३२ २/५ पल आर्द्रक में क्या प्राप्त
होगा ? ॥१०॥ ४ ३/४ कार्षापण में एक मनुष्य १६ १/२ पल रजत प्राप्त करता है तो उसे १००,००० कर्ष में
कितनी रजत प्राप्त होगी ? ॥११॥ ७ २/३ पल कर्पूर के द्वारा एक मनुष्य ५ दीनार तथा १ भाग, १ अंश
और १ कला प्राप्त करता है । बतलाओ कि उसे १००० पल के द्वारा क्या प्राप्त होगा ? ॥१२॥ वह
मनुष्य जो ३ १/२ पण में ५ ३/५ पल घी प्राप्त करता हो तो वह १०० १/२ कर्ष में कितना प्राप्त करेगा ? ॥१३॥ ५ १/२
पुराण के द्वारा एक मनुष्य १६ १/२ युगल वस्त्र प्राप्त करता है । हे मित्र ! ६१ कर्ष में उसे कितने प्राप्त होंगे ?
जल रहित एक वर्गाकार कूप ५१२ घन हस्त है । उसके तीर पर एक पहाड़ी है । उसके
शिखर से स्फटिक की भाँति निर्मल जल धारा जिसके वर्त्तुल छेद ( circular section ) का व्यास
१ अंगुल है, तली में गिरती है और कूप पानी से पूरी तरह भर जाता है । पहाड़ी की ऊँचाई क्या है
तथा पानी का माप ( संख्यात्मक मान में ) क्या है ? ॥१५-१६॥ किसी राजा ने संक्रांति के अवसर पर
( ७ ) यहाँ क्रिया में दिये गये व्यास से रंभ ( बेलन ) के अनुप्रस्थ छेद ( cross-section )
का क्षेत्रफल शत मान लिया जाता है । वृत्त का क्षेत्रफल अनुमानतः व्यास के वर्ग को ४ द्वारा भाजित
कर और ३ द्वारा गुणित करने से प्राप्त राशि मान लिया जाता है ।
कृष्णागुरु एक प्रकार की सुगन्धित लकड़ी है जिसे सुगन्ध के लिए अग्नि में जलाते हैं ।
(१५-१६) इस प्रश्न में पानी की धारा की लम्बाई पर्वत की ऊँचाई के बराबर है, जिससे ज्योंही
वह पर्वत की तली में पहुँचती है, त्योंही वह शिखर से बहना बंद हुई मान ली जाती है । वाहों में
-५. २० ] त्रैराशिकव्यवहारः [ ८५
मुद्गद्रोणयुगं नवाज्यकुडुबान् षट् तण्डुलद्रोणका-
नष्टौ वस्त्रयुगानि वत्ससहिता गाष्षट् सुवर्णत्रयम् ।
संक्रान्तौ ददता नराधिपतिना षड्भ्यो द्विजेभ्यः सखे
षट्त्रिंशत्त्रिशतेभ्य आशु वद किं तद्दत्तमुद्गादिकम् ॥ १७ ॥
इति त्रैराशिकः ।
व्यस्तत्रैराशिके तुरीयपादस्योद्देशकः
कल्याणकनकनवतेः कियन्ति नववर्णकानि कनकानि ।
साष्टांशकदशवर्णकसगुञ्जहेम्नां शतस्यापि ॥ १८ ॥
व्यासेन दैर्घ्येण च षट्कराणां चीनाम्बराणां त्रिशतानि तानि ।
त्रिपञ्चहस्तानि कियन्ति सन्ति व्यस्तानुपातक्रमविद्वद त्वम् ॥ १९ ॥
इति व्यस्तत्रैराशिकः ।
व्यस्तपञ्चराशिक उद्देशकः
पञ्चनवहस्तविस्तृतदैर्ध्यायां चीनवस्त्रसप्तत्याम् । द्वित्रिकरव्यासायति तच्छ्रुतवस्त्राणि कति कथय ॥२०॥
१ इस श्लोक के स्थान में B और K में निम्न
८६ ] गणितसारसंग्रहः [ ५. २१-
व्यस्तसप्तराशिक उद्देशकः
व्यासायामोदयतो बहुमाणिक्ये चतुर्नवाष्टकरे ।
द्विषडेकहस्तमितयः प्रतिमाः कति कथय तीर्थकृताम् ॥ २१ ॥
व्यस्तनवराशिक उद्देशकः
विस्तारदैर्घ्योदयतः करस्य षट्त्रिंशदष्टप्रमिता नवार्घा ।
शिला तया तु द्विषडेकमानास्ताः पञ्चकार्घाः कति चैत्ययोग्याः ॥ २२ ॥
इति व्यस्तपञ्चसप्तनवराशिकाः ।
गतिनिवृत्तौ सूत्रम् —
निजनिजकालोद्गतयोर्गमननिवृत्त्योर्विशेषणाज्जाताम् ।
दिनशुद्धगतिं न्यस्य त्रैराशिकविधिमतः कुर्यात् ॥ २३ ॥
अत्रोद्देशकः
क्रोशस्य पञ्चभागं नौर्याति दिनत्रिसप्तभागेन । वोधौ¹ वाताविद्धा प्रत्येति क्रोशनवमांशम् ॥ २४ ॥
कालेन केन गच्छेत् त्रिपञ्चभागोनयोजनशतं सा ।
संख्याब्धिसमुत्तरणे बाहुबलिंस्त्वं समाचक्ष्व ॥ २५ ॥
१ B और K में तस्मिन्काले वार्धौ, पाठ है ।
व्यस्त सप्तराशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
बतलाओ कि ४ हस्त चौड़े, ९ हस्त लम्बे, ८ हस्त ऊंचे बड़े मणि में से २ हस्त चौड़ी ६
हस्त लम्बी तथा १ हस्त ऊँची तीर्थंकरों की कितनी प्रतिमाएँ बन सकेंगी ? ॥२१॥
व्यस्त नव राशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
जिसकी कीमत ९ है ऐसी ६ हस्त चौड़ी ३० हस्त लम्बी तथा ८ हस्त ऊँची एक शिला दी
गई है। बतलाओ कि जिन मंदिर बनवाने के लिये इस शिला में से, जिसकी कीमत ५ है ऐसी २
हस्त चौड़ी ६ हस्त लम्बी तथा १ हस्त ऊँची कितनी शिलायें प्राप्त हो सकेंगी ? ॥२२॥
इस प्रकार व्यस्त पंचराशिक, सप्तराशिक और नवराशिक प्रकरण समाप्त हुआ।
गति निवृत्ति सम्बन्धी नियम—
दिन की शुद्ध गति को लिखो जो अग्र तथा पश्च ( आगे तथा पीछे की ओर होने वाली )
गतियों के दिये गये अर्घों ( rates ) के अन्तर से प्राप्त होती है, जबकि इन अर्घों में से प्रत्येक को
प्रथम उनके विशिष्ट समयों द्वारा विभाजित कर लिया जाता है। और तब, इस शुद्ध दैनिक गति के
सम्बन्ध में त्रैराशिक नियम की क्रिया करो।
उदाहरणार्थ प्रश्न
३/७ दिन में, एक जहाज समुद्र में १/५ क्रोश जाती है; उसी समय वह पवन के विरोध से १/९
क्रोश पीछे हट जाती है। हे संख्या समुद्र को पार करने के अर्थ बाहुबल धारी ! बतलाओ कि वह
जहाज ९९ २/५ योजन कितने समय में जावेगी ? ॥२४-२५॥ एक मनुष्य जो ३½ दिनों में १४½ स्वर्ण
ghatoṁ)?
Wait, look at: 'पदों द्वारा'! In Hindi, it's definitely printed as "पदों द्वारा" or "घटों द्वारा"?
Wait, look at the first letter: it's 'प'!
Wait, why would Hindi say "पदों द्वारा"?
Wait, could "षट्पद" be split as "षट्पद-पद"?
No, what if the Sanskrit text in this edition has a typo, or literally reads:
"षट्पदपदोद्भिन्नाङ्घ्रिगण्डस्थलः" or "षट्पदप्रोद्भिन्नाङ्ग"?
Wait, let's search for this exact verse:
Verse 27:
"गन्धेभो मदलुब्धषट्पद..."
"सार्धं योजनपञ्चमं व्रजति यः षड्भिर्दलोनैर्दिनैः ।"
"प्रत्यायाति दिनैस्त्रिभिश्च सदलैः क्रोशद्विपञ्चांशकं"
"ब्रूहिक्रोशदलोनयोजनशतं कालेन केनाप्नुयात् ॥ २७ ॥"
LOOK AT THE PROBLEM:
Forward rate:
"सार्धं योजनपञ्चमं व्रजति यः षड्भिर्दलोनैर्दिनैः ।"
= goes 1 1/2 of 1/5 yojana (or 1/5 + 1/2? "सार्धं योजनपञ्चमं" = 1/5
८८ ] गणितसारसंग्रहः [ ५. ३२ -
पञ्चसप्तनवराशिकेषु करणसूत्रम्—
लोभं नीत्वान्योन्यं विभजेत् पृथुपङ्क्तिमल्पया पंक्त्या ।
गुणयित्वा जीवानां क्रयविक्रययोस्तु तानेव ॥ ३२ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वित्रिचतुःशतयोगे पञ्चाशत्षष्टिसप्ततिपुराणाः । लाभार्थिना प्रयुक्ता दशमासेष्वस्य का वृद्धिः ॥३३॥
हेम्नां सार्धाशीतेर्मासत्र्यंशेन वृद्धिरध्यर्धा । सत्रिचतुर्थनवत्याः कियती पादोनषण्मासैः ॥३४॥
१ P में निम्नलिखित पाठान्तर है ।
प्रकारान्तरेण सूत्रम्—
संक्रम्य फलं छिन्द्याल्लघुपंक्त्यानेकराशिकां पंक्तिम् । स्वगुणामश्वादीनां क्रयविक्रययोस्तु तानेव ।
अन्यदपि सूत्रम्—
संक्रम्य फलं छिन्द्यात् पृथुपंक्त्यभ्यासमन्यया पंक्त्या । अश्वादीनां क्रयविक्रययोरश्वादिकांश्च संक्रम्य ॥
B केवल बाद का श्लोक दिया गया है जिसके दूसरे चौथाई भाग का पाठान्तर यह है—
पृथुपंक्त्यभ्यासमल्पपंक्त्याहृत्या ।
साथ गुणित करने के पश्चात् ), सबको साथ लेकर गुणित की गई विभिन्न राशियों की छोटी संख्याओं
वाली पंक्ति द्वारा विभाजित करना चाहिये । परन्तु, जीवित पशुओं को बेचने और खरीदने के प्रश्नों में
केवल उन्हें प्ररूपण करनेवाली संख्याओं के सम्बन्ध में ही पक्षान्तरण करते हैं ॥३२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी व्यक्ति द्वारा ५०, ६० और ७० पुराण क्रमशः २, ३ और ४ प्रतिशत प्रतिमास के अर्घ
( दर ) से लाभ के लिये ब्याज पर दिये गये । दस माह में उसे कितना ब्याज प्राप्त होगा ? ॥३३॥
१/३ मास में ८० १/२ स्वर्ण मुद्राओं पर ब्याज १ १/२ होता है । ५ ३/४ माह में ९० ३/४ स्वर्ण मुद्राओं पर वह
कितना होगा ? ॥३४॥ वह जो १६ वर्ण के १०० स्वर्ण खंडों में २० रत्न प्राप्त करता है तो १० वर्ण
( ३२ ) फल का पक्षान्तरण तथा अन्य कथित क्रियायें निम्नलिखित साधित उदाहरण से स्पष्ट हो
जावेंगी । गाथा ३६ के प्रश्न में दिया गया न्यास ( data ) प्रथम निम्न प्रकार प्ररूपित किया जाता है ।
९ मानी | १ वाह + १ कुम्भ
३ योजन | १० योजन
६० पण |
जब यहाँ फल, जो ६० पण है, को अन्य पंक्ति में पक्षान्तरित करते हैं तब—
९ मानी | १ वाह + १ कुम्भ = १ १/४ वाह
३ योजन | १० योजन
| ६० पण
अब, जिसमें विभिन्न राशियों की संख्या अधिक है ऐसी दाहिने हाथ की पंक्ति की सब राशियों को
गुणित कर उसे वाम पंक्ति (जिसमें विभिन्न राशियों की संख्या कम है) की सब राशियों को गुणित करने से
प्राप्त गुणनफल द्वारा भाजित करना चाहिये । तब हमें पणों की संख्या प्राप्त होगी जो कि इष्ट उत्तर होगा ।
यथा, (१ १/४ × १० × ६०) / (९ × ३)
-५. ४१ ] त्रैराशिकव्यवहारः [ ८९
षोडशवर्णककाञ्चनशतेन यो रत्नविंशतिं लभते । दशवर्णसुवर्णानामष्टाशीतिद्विशत्या किम् ॥३५॥
गोधूमानां मानीर्नव नयता योजनत्रयं लब्धाः । षष्टिः पणाः सवाहं कुम्भं दशयोजनानि कति ॥३६॥
भाण्डप्रतिभाण्डस्योद्देशकः
कस्तूरीकर्षत्रयमुपलभते दशभिरष्टभिः कनैर्कैः ।
कर्षद्वयकपूरं मृगनाभित्रिशतकर्षर्कैः कति नौ ॥३७॥
पनसानि षष्टिमष्टभिरुपलभतेऽशीतिमातुलुङ्गानि ।
दशभिर्मोषैर्नवशतपनसैः कति मातुलुङ्गानि ॥३८॥
जीवक्रयविक्रययोरुद्देशकः
षोडशवर्षास्तुरगा विंशतिरर्हन्ति नियुतकनकानि ।
दशवर्षसप्तसप्ततिरिह कति गणकाग्रणीः कथय ॥ ३९ ॥
स्वर्णत्रिशती मूल्यं दशवर्षाणां नवा
९० ] गणितसारसंग्रहः [ ५. ४२-
सप्तराशिक उद्देशकः
त्रिचतुर्व्यासायामौ श्रीखण्डावर्हतोऽष्टहेमानि ।
षण्णवविस्तृतिदैर्घ्या हस्तेन चतुर्दशात्र कति ॥ ४२ ॥
इति सप्तराशिकः ।
नवराशिक उद्देशकः
पञ्चाष्टत्रिव्यासद्दैर्ध्योद्याम्भो धत्ते वापी शालिनी वाहषट्कम् ।
सप्तन्यासा हस्ततः षष्टिदैर्घ्याः पात्सेधोः किं नवाचक्ष्व विद्वन् ।। ४३ ।।
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ त्रैराशिको नाम चतुर्थव्यवहारः ॥
१ ४३ वें श्लोक के सिवाय K और B में निम्नलिखित श्लोक प्राप्य है-
द्वयष्टाशीतिव्यासद्दैर्ध्योन्नताम्भो धत्ते वापी शालिनी सार्धवाहौ ।
हस्तादष्टायामकाः षोडशोच्छ्राः षट्कव्यासाः किं चतस्रा वद त्वम् ॥
——————————————————————————————————————————————————————
सप्तराशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
जिनमें प्रत्येक का व्यास ३ हस्त और लम्बाई ( आयाम ) ४ हस्त है, ऐसे संदल-लकड़ी के
दो टुकड़ों का मूल्य ८ स्वर्ण मुद्राएं हैं। इस अर्घ से, जिनमें प्रत्येक ६ हस्त व्यास में और ९ हस्त
लम्बाई में है ऐसे संदल-लकड़ी के १४ टुकड़ों का क्या मूल्य होगा ? ॥४२॥
नवराशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
जो चौड़ाई, लम्बाई और ( तली से ) ऊंचाई में क्रमशः ५, ८ और ३ हस्त है ऐसी किसी घर
की वापिका में ६ वाह पानी भरा है। हे विद्वान् ! बतलाओ कि ७ हस्त चौड़ी, ६० हस्त लम्बी
और तली से ५ हस्त ऊँचो ९ वापिकाओं में कितना पानी समावेगा ? ॥४३॥
इस प्रकार सप्तराशिक और नवराशिक प्रकरण समाप्त हुआ ।
इस प्रकार महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणित शास्त्र में त्रैराशिक नामक चतुर्थ
व्यवहार समाप्त हुआ ।
(४३) इस गाथा में 'शालिनी' शब्द का अर्थ "घर की" होता है । यह उस छंद का भी नाम है
जिसमें यह गाथा संरचित हुई है ।
६. मिश्रकव्यवहारः
प्राप्तानन्तचतुष्टयान् भगवतस्तीर्थस्य कर्तॄन् जिनान्
सिद्धान् शुद्धगुणांस्त्रिलोकमहितानाचार्यवर्यानपि ।
सिद्धान्तार्णवपारगान् भवभृतां नेतॄनुपाध्यायकान्
साधून् सर्वगुणाकरान् हितकरान् वन्दामहे श्रेयसे ॥ १ ॥
इतः परं मिश्रगणितं नाम पञ्चमव्यवहारमुदाहरिष्यामः । तद्यथा—
संक्रमणसंज्ञाया विषमसंक्रमणसंज्ञायाश्च सूत्रम्—
युतिवियुतिदलनकरणं संक्रमणं छेदलब्धयो राश्योः ।
संक्रमणं विषममिदं प्राहुर्गणितार्णवान्तगताः ॥ २ ॥
६. मिश्रकव्यवहार
जिन्होंने अनन्त चतुष्टय प्राप्त कर धर्म तीर्थ की प्रवर्तना की है ऐसे अरिहंत प्रभुओं की, जो
अष्टक्षायिक गुण सम्पन्न हैं तथा तीनों लोकों में आदर को प्राप्त हैं ऐसे सिद्ध प्रभुओं को, श्रेष्ठ
आचार्यों की, जो जैन सिद्धान्त सागर के पारगामी हैं तथा संसारी जीवों को मोक्षमार्ग के उपदेशक हैं
ऐसे उपाध्यायों की और जो सर्व सद्गुणों के धारक हैं तथा दूसरों के हितकर्ता हैं ऐसे साधुओं की हम
अपने सर्वोपरि हित के लिये वन्दना करते हैं ॥१॥
इसके पश्चात् हम मिश्रित उदाहरण नामक पाँचवें व्यवहार का प्रतिपादन करेंगे ।
पारिभाषिक शब्द ‘संक्रमण’ और ‘विषम संक्रमण’ के अर्थों को स्पष्ट करने के लिये सूत्र—
गणित समुद्र के पारगामी, किन्हीं दो राशियों के योग अथवा अन्तर के आधा करने को
संक्रमण कहते हैं । और, ऐसी दो राशियाँ जो क्रमशः भाजक तथा भजनफल रहती हैं, उनके संक्रमण
को विषम संक्रमण कहते हैं ॥२॥
( १ ) कर्म और जन्म मरण के दुःखों से पूर्ण संसारीजीवनरूपी नदी को पार करने के लिये
‘तीर्थ’ शब्द का प्रयोग ‘एक ऐसे स्थान के लिये हुआ है जो उथला होने के कारण नदी को पार करने
में सहायक सिद्ध होता है । संसार अर्थात् चतुश्चक्रभ्रमण के दुःखों रूपी सागर को पार कराने के लिये भगवान्
आत्माओं के लिये नैमित्तिक सहायक माने गये हैं । इसलिये इन जिनों को तीर्थंकर कहा जाता है ।
( २ ) बीजीय रूप से, दो राशियों अ और ब का संक्रमण (अ + ब)/२ और (अ ~ ब)/२ के मान निका-
लना है । उनका विषम संक्रमण, (ब + अ/ब)/२ और (ब ~ अ/ब)/२ के मान निकालना है ।
९२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३-
अत्रोद्देशकः
द्वादशसंख्याराशेर्द्वाभ्यां संक्रमणमत्र किं भवति ।
तस्माद्राशेर्भक्तं विषमं वा किं तु संक्रमणम् ॥ ३ ॥
पञ्चराशिकविधिः
पञ्चराशिकस्वरूपवृद्ध्यानयनसूत्रम्—
इच्छाराशिः स्वस्य हि कालेन गुणः प्रमाणफलगुणितः ।
कालप्रमाणभक्तो भवति तदिच्छाफलं गणिते ॥ ४ ॥
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकषट्कशते पञ्चाशतषष्टिसप्ततिपुराणाः । लाभार्थतः प्रयुक्ताः का वृद्धिर्मासषट्कस्य ॥ ५ ॥
व्यर्धाष्टकशत्युक्तास्त्रिंशत्कार्षापणाः पणाश्चाष्टौ । मासाष्टकेन जाता दलहीनेनैव का वृद्धिः ॥ ६ ॥
षष्ट्या वृद्धिर्दृष्टा पञ्च पुराणाः पणत्रयविमिश्राः । मासद्वयेन लब्धा शतवृद्धिः का तु वर्षस्य ॥ ७ ॥
सार्धशतकप्रयोगे सार्धकमासेन पञ्चदश लाभः । मासदर्शकेन लब्धा शतत्रयस्यात्र का वृद्धिः ॥८॥
साष्टशतकाष्टयोगे त्रिषष्टिकार्षापणा विशा दत्ताः । सप्तानां मासानां पञ्चमभागान्वितानां किम्॥९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जब संख्या १२, दो से आयोजित हो तो संक्रमण क्या होगा ? और, २ के सम्बन्ध में उसी
संख्या १२ का भागीय विषम संक्रमण क्या होगा ?
पंचराशिक विधि
पंचराशिक प्रकार के ब्याज को निकालने की विधि के लिये नियम—
इच्छा का प्ररूपण करनेवाली संख्या, अर्थात् जिस पर ब्याज निकालना इष्ट होता है ऐसे धन
को उससे सम्बन्धित समय द्वारा गुणित किया जाता है और तब दिये हुए मूलधन पर ब्याज दर का
निरूपण करने वाली संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । गुणनफल को समय तथा मूलधन राशि द्वारा
भाजित किया जाता है । यह भजनफल, गणित में, इष्ट धन का ब्याज होता है ॥४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५०, ६० और ७० पुराण क्रमशः ३, ५ और ६ प्रतिशत प्रतिमाह की दर ( rate ) से ब्याज पर
दिये गये, उनका ६ माह में ब्याज क्या होगा ? ॥५॥ ३० कार्षापण और ८ पण, ७ ½ प्रतिशत प्रतिमाह
की दर से ब्याज पर दिये गये, ७ ½ माह में कितना ब्याज होगा ? ॥६॥ ६० पर २ माह में ५ पुराण और
३ पण ब्याज होता है; १०० पण १ वर्ष का ब्याज बतलाओ ॥७॥ १५० को १ ½ माह तक उधार देने
से १५ ब्याज प्राप्त होता है । इसी अर्ध से ३०० पर १० माह का ब्याज क्या होगा ? ॥८॥ एक
व्यापारी ने ६३ कार्षापण, १०८ पर ८ प्रतिमाह की दर से उधार दिये, बतलाओ ७ ⅕ माह में कितना
ब्याज होगा ॥९॥
ध × अ × बा
( ४ ) बीजीय रूप से ब = ―――――――――― जहाँ आ, धा और बा प्रमाण अथवा दर सम्बन्धी क्रमशः
आ × धा
अवधि, मूलधन और ब्याज हैं और अ, ध तथा ब इच्छा की क्रमशः अवधि, मूलधन और ब्याज हैं ।
प्रमाण और इच्छा के विशेष स्पष्टीकरण के लिये अध्याय ५ की गाथा २ की पाद टिप्पणी देखिये ।
( ५ ) ब्याज की दर यदि उल्लिखित न हो तो उसे प्रतिमास समझना चाहिये ।
–६. १४ ] मिश्रकव्यवहारः [ ९३
मूलानयनसूत्रम्—
मूलं स्वकालगुणितं स्वफलेन विभाजितं तदिच्छायाः ।
कालेन भजेल्लब्धं फलेन गुणितं तदिच्छा स्यात् ॥ १० ॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चार्धकशतयोगे पञ्च पुराणान्दलोनमासौ द्वौ । वृद्धिं लभते कश्चित् किं मूलं तस्य मे कथय ॥११॥
सप्तत्याः सार्धमासेन फलं पञ्चार्धमेव च । व्यर्धाष्टमासे मूलं किं फलयोः सार्धयोर्द्वयोः ॥ १२ ॥
त्रिकपञ्चकषट्कशते यथा नवाष्टादशाथ पञ्चकृतिः ।
पञ्चांशकेन मिश्रा षट्सु हि मासेषु कानि मूलानि ॥ १३ ॥
कालानयनसूत्रम्—
कालगुणितप्रमाणं स्वफलेच्छाभ्यां हृतं ततः कृत्वा ।
तदिहेच्छाफलगुणितं लब्धं कालं बुधाः प्राहुः ॥ १४ ॥
——————————————————————————————————————
उधार दिये गये मूलधन को निकालने के लिये नियम—
मूलधन राशि को उसो से सम्बन्धित समय द्वारा गुणित करते हैं और सम्बन्धित ब्याज द्वारा
विभाजित करते हैं । तब इस भजनफल को (उधार दिये गये) मूलधन से सम्बन्धित अवधि द्वारा
विभाजित करते हैं; यह अंतिम भजनफल जब उपार्जित ब्याज द्वारा गुणित किया जाता है तब वह
मूलधन प्राप्त होता है जिस पर कि उक्त ब्याज प्राप्त हुआ है ॥१०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ब्याज दर २ ½ प्रतिशत प्रतिमाह से १ ½ माह तक रकम उधार देकर एक व्यक्ति ५ पुराण
ब्याज प्राप्त करता है । मुझे बतलाओ कि उस ब्याज के सम्बन्ध में मूलधन क्या है ? ॥११॥
७० पर १ ½ माह में २ ½ ब्याज होता है । यदि ७ ½ माह में २ ½ ब्याज होता हो तो बतलाओ कि
कितना मूलधन ब्याज पर दिया गया है ? ॥१२॥ क्रमशः ३, ५ और ६ प्रतिशत प्रति माह की दर से
उधार देने पर ६ माह में प्राप्त होने वाले ब्याज क्रमशः ९, १८ और २५ ⅕ हैं; कौन-कौन से मूलधन
ब्याज पर दिये गये हैं ? ॥१३॥
अवधि निकालने के लिये नियम—
मूलधन को सम्बन्धित अवधि से गुणित करो; तब इस गुणनफल को उसो से सम्बन्धित ब्याज
दर से भाजित करो और उधार दी हुई रकम से भी भाजित करो । प्राप्त भजनफल को उधार दी हुई
रकम के ब्याज द्वारा गुणित करो । बुद्धिमान मनुष्य कहते हैं कि परिणामी गुणनफल (उपार्जित ब्याज
की) अवधि होता है ॥१४॥
.........................................................................................................................
धा × आ × बा
(१०) प्रतीक रूप से, ─────────── = ध
बा × अ
धा × आ × ब
(१४) प्रतीक रूप से, ────────── = अ
बा × घ