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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 421 में से

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पृष्ठ 134

८० ] गणितसारसंग्रहः [ ४. ६२-
१हीनालाप उदाहरणम्
महिषीणामष्टांशो व्येको वर्गीकृतो वने रमते । पञ्चदशाद्रौ दृष्टास्तृणं चरन्त्यः कियन्त्यस्ताः ॥६२॥
अनेकपानां दशमो द्विवर्जितः स्वसंगुणः क्रीडति सल्लकीवने ।
चरन्ति षड्वर्गमिता गजा गिरौ कियन्त एतेऽत्र भवन्ति दन्तिनः ॥ ६३ ॥
२अधिकालाप उदाहरणम्
जम्बूवृक्षे पञ्चदशांशो द्विकयुक्तः स्वेनाभ्यस्तः केकिकुलस्य द्विकृतिघ्नाः ।
पञ्चाप्यन्ये मत्तमयूराः सहकारे रंरम्यन्ते मित्र वदैषां परिमाणम् ॥ ६४ ॥
इत्यूनाधिकांशवर्गजातिः ॥
अथ मूलमिश्रजातौ सूत्रम्—
मिश्रकृतिरूनयुक्ता व्यधिका च द्विगुणमिश्रसंभक्ता ।
वर्गीकृता फलं स्यात्करणमिदं मूलमिश्रविधौ ॥ ६५ ॥
१ M में 'हीन' छूट गया है । २ M में यह तथा अनुगामी श्लोक छूट गये हैं ।
हीनालाप प्रकार के उदाहरण
कुल झुंड के १/८ वें भाग के पूर्ण वर्ग से एक कम महिष (भैंसा) राशि वन में क्रीड़ा कर रही है ।
शेष १५, पर्वत पर घास चरते हुए दिखाई दे रहे हैं । बतलाओ कुल कितने भैंसे हैं ? ॥६२॥ कुल
झुंड के १/१० वें भाग से दो कम प्रमाण, उसी प्रमाण द्वारा गुणित होने से लब्ध हस्ति राशि सल्लकी
वन में क्रीड़ा कर रही है । शेष हाथी जो संख्या में ६ की वर्गराशि प्रमाण हैं, पर्वत पर विचर रहे हैं ।
बतलाओ वे कुल कितने हैं ? ॥६३॥
अधिकालाप प्रकार का उदाहरण
कुल झुंड के १/१५ भाग से २ अधिक राशि को स्व द्वारा गुणित करने से प्राप्त राशि प्रमाण
मयूर जम्बू वृक्ष पर खेल रहे हैं । शेष गर्वीले २² × ५ मयूर आम के वृक्ष पर खेल रहे हैं । हे मित्र !
उस झुंड के कुल मयूरों की संख्या बतलाओ ? ॥ ६४ ॥
इस प्रकार ऊनाधिक 'अंश वर्ग' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
'मूलमिश्र' जाति सम्बन्धी नियम—
( विशिष्ट अज्ञात राशियों के वर्गमूलों के ) मिश्रित ( ज्ञात ) योग के वर्ग में ( दी गई )
ऋणात्मक राशि जोड़ दी जाती है, अथवा दी गई धनात्मक राशि उसमें से घटा दी जाती है । परिणामी
राशि को उपर्युक्त मिश्रित योग की दुगुनी राशि द्वारा विभाजित करते हैं । इसे वर्गित करने पर इष्ट
अज्ञात समूह की अर्घा ( value ) प्राप्त होती है । यही, 'मूलमिश्र' प्रकार के प्रश्नों का साधन करने
का नियम है ॥ ६५ ॥
( ६४ ) इस गाथा में 'मत्तमयूर' शब्द का अर्थ 'गर्वीला मयूर' होता है । यह इस छन्द का भी
नाम है जिसमें यह गाथा संरचित हुई है ।
( ६५ ) बीजीय रूप से, क = { (म² ± द) / २ म }² है यह क की अर्हा समीकार √क + √(क ∓ द)
= म द्वारा सरलता से प्राप्त हो सकती है । यहाँ 'म', नियम में उल्लिखित ज्ञात मिश्रित योग है ।