गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
भाषाटीकासमेत । ( ६५ )
ततः श्रान्तो व्याकुलो वा क्षुधितो व्यग्रचित्तकः ।
कालेऽतिशीतेऽत्युष्णे वानिलाग्न्यम्बुसमाकुले ७
तप्त हो, श्रान्त हो, व्याकुल, क्षुधित, व्यग्रचित्त, अति-
शीतकाल वा अति उष्णकाल,अग्नि वायु और जलकी अधि-
काईवाला देश ॥ ७ ॥
सध्वनावतिजीर्णे गोः स्थाने साग्नौ जलान्तिके ॥
कूपकूले श्मशाने च नद्यां भित्तौ च मर्मरे ॥८॥
जिस स्थानमें ध्वनि, वा कलकलशब्द अधिक हो, गोठ,
अग्निके निकट, जलके निकट, कूपके निकट, श्मशान, नदी,
भीतिके निकट तथा जहां शुष्क पर्णका शब्द सुन पडता है,
अतिजीर्ण स्थान ॥ ८ ॥
चैत्ये सवल्मिके देशे पिशाचादिसमावृते ॥
नाभ्यसेद्योगविद्योगं योगध्यानपरायणः ॥ ९ ॥
चैत्य (बडी बाडियोंमें) वल्मीक (बांबई) तथा पिशाचादि-
युक्त स्थानमें योगाभ्यास करनेवाला योगी योगाभ्यास न
करै ॥ ९ ॥
स्मृतिलोपश्च मूकत्वं बाधिर्यं मन्दता ज्वरः ॥
जडता जायते सद्यो दोषाज्ञानाद्धि योगिनः १०
३
( ६६ ) गणेशगीता-अ० ५.
स्मृतिका लोप होना, गूँगापन, बधिरता, मन्दता, ज्वर,
जडता यह सब कुछ दोष अज्ञानसे योगीको होते हैं ॥ १० ॥
एते दोषाः परित्याज्या योगाभ्यसनशालिना ॥
अनादरे हि चैतेषां स्मृतिलोपादयो ध्रुवम्॥११॥
योगाभ्यासीको यह सब दोष त्याग करने चाहिये, इनमें
जो आलस्य करे तो अवश्य स्मृतिलोपादि दोष होते हैं, इससे
उपरोक्त स्थानोंमें योगसाधन न करै ॥ ११ ॥
नातिभुञ्जन्सदा योगी नामुञ्जन्नातिनिद्रितः ॥
नातिजाग्रत्सिद्धिमेति भूप योगं सदाभ्यसन् १२
योगी सदा थोडा भोजन करै, विना भोजन किये भी न
रहै, न बहुत सोवै, न बहुत जागै, इस प्रकार सदा योगाभ्यास
करनेसे सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ॥ १२ ॥
संकल्पजांस्त्यजेत्कामान्नियताहारजागरः ॥
नियम्य खगणं बुद्ध्या विरमेत शनैः शनैः १३॥
सम्पूर्ण इच्छा और कामनाओंको त्याग करे, थोडा
भोजन करै, जागरणशील हो, बुद्धिसे सब इंद्रियोंको वशकर
शनैः शनैः विरामको प्राप्त हो ॥ १३ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ६७ )
ततस्ततः कृषेदेतद्यत्र यत्रानुगच्छति ॥
धृत्यात्मवशगं कुर्याच्चित्तं चञ्चलमाहतः ॥१४॥
जिस जिस स्थानमें मन जाय उस उस स्थानसे उसे
खींचे और धैर्यतासे उसे अपने वश करै, कारण कि वह महा-
चंचल है ॥ १४ ॥
एवं कुर्वन्सदा योगी परां निर्वृतिमृच्छति ॥
विश्वस्मिन्निजमात्मानंविश्वंचस्वात्मनीक्षते १५
योगी सदा इसप्रकार करनेसे परम शांतिको प्राप्त होता
है, जो संसारको अपनी आत्मामें और आत्माको संसारमें
देखते हैं ॥ १५ ॥
योगेन यो मामुपैति तमुपैम्यहमादरात् ॥
मोच्यामि न मुञ्चामि तमहं मां स न त्यजेत् १६
योगसे जो मुझको प्राप्त होता है, उसको मैं आदरसे प्राप्त
होता हूं, और जो मुझको नहीं छोडता है उसको मैं नहीं
छोडताहूं, संसारसे मुक्त कर देता हूं ॥ १६ ॥
सुखे सुखेतरे द्वेषे क्षुधि तोषे समस्तृषि ॥
आत्मसाम्येन भूतानि सर्वगं मां च वेत्ति यः १७॥
(६८) गणेशगीता-अ० ५.
सुख, दुःख, द्वेष, क्षुधा, शांति, तृपा इनमें जो आत्माके समान
सब प्राणियोंको देखता है, और जो मुझे जानता है ॥ १७ ॥
जीवन्मुक्तः स योगीन्द्रः केवलं मयि संगततः ॥
ब्रह्मादीनां च देवानां स वंद्यः स्याज्जगत्त्रये॥१८॥
ऐसे योगी जो केवल मुझमें संगति करनेवाले हैं, वे
जीवन्मुक्त हैं, वह त्रिलोकीमें ब्रह्मादिक देवताओंसे नमस्कार
करने योग्य हैं ॥ १८ ॥
वरेण्य उवाच ।
द्विविधोऽपि हि योगोऽयमसंभाव्यो हि मे मतः॥
यतोऽन्तःकरणं दुष्टं चञ्चलं दुर्ग्रहं विभो ॥१९॥
वरेण्यने कहा भगवन् ! यह दोनों प्रकारकी योगसिद्धि मैं
महाकठिन देखता हूं कारण कि मन बडा दुष्ट और चंचल है
इसका निग्रह करना कठिन है ॥ १९ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
यो निग्रहं दुर्ग्रहस्य मनसः संप्रकल्पयेत् ॥
घटीयन्त्रसमादस्मान्मुक्तः संसृतिचक्रकात् २०॥
श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! जो निग्रह करनेमें कठिन, इस
भाषाटीकासमेत । ( ६९ )
मनका निग्रह करता है, वह घटीयंत्रके समान घूमनेवाले
इस संसार चक्रसे मुक्त हो जाता है ॥ २० ॥
विषयैः क्रकचैरेतत्संस्सृष्टं चक्रकं दृढम् ॥
जनश्छेत्तुं न शक्नोति कर्मकीलैः सुसंवृतम्॥२१॥
विषयरूपी आरोंसे यह दृढ चक्र बना हुआ है और कर्म-
रूपी कीलोंसे जडा हुआ है इसकारण साधारण मनुष्य इसके
छेदन करनेको समर्थ नहीं होते ॥ २१ ॥
अतिदुःखं च वैराग्यं भोगाद्वैतृष्ण्यमेव च ॥
गुरुप्रसादः सत्संग उपायास्तज्जये अमी ॥२२॥
अतिशय दुःख वैराग्य, भोग तृष्णाका त्याग, गुरुकी
प्रसन्नता, सत्संग, यह इसके जीतनेके उपाय हैं ॥ २२ ॥
अभ्यासाद्वा वशीकुर्यान्मनो योगस्य सिद्धये ॥
वरेण्य दुर्लभो योगो विनास्य मनसो जयात्२३
योगसिद्धिके निमित्त अभ्याससे मनको अपने वशमें करै,
हे वरेण्य ! विना मनके जीते योग महाकठिन है ॥ २३ ॥
वरेण्य उवाच ।
योगभ्रष्टस्य को लोकः का गतिःकिं फलं भवेत् ॥
विभो सर्वज्ञ मे छिंधि संशयं बुद्धिचक्रभृत् २४॥
( ७० ) गणेशगीता-अ० ५.
वरेण्य बोले भगवन् ! योगभ्रष्टको किस लोककी प्राप्ति
और उसकी क्या गति होती है, क्या फल होता है हे सर्वज्ञ !
हे बुद्धिरूपी चक्रके धारण करनेवाले ! यह मेरा संदेह छेदन
कीजिये ॥ २४ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
दिव्यदेहधरो योगाद्द्रष्टः स्वभोगमुत्तमम् ॥
भुक्त्वा योगिकुलेजन्म लभेच्छुद्धिमतां कुले २५
श्रीगणेशजी बोले हे राजा ! योगभ्रष्ट पुरुष भी दिव्य देह
धारणकर स्वर्गमें जाते हैं, वहां कर्मोंके फल उत्तम सुख भोग
कर शुद्धता युक्त योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं ॥ २५ ॥
पुनर्योगी भवत्येष संस्कारात्पूर्वकर्मजात् ॥
नहि पुण्यकृतां कश्चिन्नरकं प्रतिपद्यते ॥ २६ ॥
और फिर भी यह पूर्व जन्मोंके संस्कारसे योगी होता है
कोई भी पुण्यकर्म करनेवाला नरकको नहीं जाता ॥ २६ ॥
ज्ञाननिष्ठात्तपोनिष्ठात्कर्मनिष्ठान्नराधिप ॥
श्रेष्ठो योगी श्रेष्ठतमो भक्तिमान्मयि तेषु यः २७
ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ-
शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे
योगावृत्तिप्रशंसनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ७१ )
हे राजन् ! ज्ञाननिष्ठासे तपकी निष्ठावालोंसे कर्मनिष्ठासे जो
योगसे मुझमें भक्ति करता है वह श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे
श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे पंडित-
ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां योगावृत्ति-
प्रशंसनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
श्रीगजानन उवाच ॥
ईदृशं विद्धि मे तत्त्वं मद्गतेनान्तरात्मना ॥
यज्ज्ञात्वा मामसंदिग्धं वेत्सि मोक्ष्यसि सर्वगम् १
श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! इस प्रकार मुझमें मन
लगाकर मेरा तत्त्व जानो जिसके जाननेसे मुझे सर्वगत और
यथार्थ जानकर मुक्त हो जाओगे ॥ १ ॥
तत्तेऽहं शृणु वक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ॥
अस्ति ज्ञेयं यतो नान्यन्मुक्तेश्च साधनं नृप॥२॥
हे राजन् ! लोकोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे वह तत्त्व मैं
तुमसे वर्णन करता हूं जिसके जाननेसे दूसरे मुक्तिके साधन
जाननेकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ २ ॥
ज्ञेया मत्प्रकृतिः पूर्वं ततः स्याज्ज्ञानगोचरः ॥
ततो विज्ञानसंपत्तिर्मयि ज्ञाते नृणां भवेत् ॥३॥
( ७२ ) गणेशगीता-अ० ६.
प्रथम तौ मेरी प्रकृति जाननी उचित है, उससे ज्ञान होता
है, इसके उपरान्त मेरा ज्ञान होनेसे प्राणियोंको विज्ञान
सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥
क्ष्मानलौ खमहंकारः कं चित्तं धीसमीरणौ ॥
रवीन्दू यागकृच्चैकादशधा प्रकृतिर्मम ॥ ४ ॥
पृथ्वी, अग्नि, आकाश, अहंकार, होमद्रव्य, चित्त, बुद्धि,
वायु, रवि, चंद्र, यागकर्ता, यह ग्यारह प्रकारकी मेरी प्रकृति है॥४
अन्यां मत्प्रकृतिं वृद्धा मुनयः संगिरन्ति च ॥
तथा त्रिविष्टपं व्याप्तं जीवत्वं गतयानया ॥ ५ ॥
औरभी वृद्ध मुनिजन ऐसा वर्णन करते हैं, कि आनेजानेवाली
जीवत्वको प्राप्त हुई त्रिलोकीमें व्याप्त यह भी मेरी प्रकृति है॥५॥
आभ्यामुत्पाद्यते सर्वं चराचरमयं जगत् ॥
संगाद्विश्वस्य संभूतिः परित्राणं लयोऽप्यहम्॥६॥
प्रकृतिपुरुषसेही चराचर जगत् उत्पन्न होताहै इसीके संगसे
मुझसे इस जगत्की उत्पत्ति पालन और नाश होता है ॥६॥
तत्त्वमेतन्निबोद्धुं मे यतते कश्चिदेव हि ॥
वर्णाश्रमवतां पुंसां पुरा चीर्णेन कर्मणा ॥ ७ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ७३ )
इस मेरे तत्त्व जाननेके निमित्त वर्णाश्रमी पुरुषोंमें पूर्वज-
न्मके कर्मानुसार कोई सहस्रोंमें एक यत्न करता है ॥ ७ ॥
साक्षात्करोति मां कश्चिद्यत्नवत्स्वपि तेषु च ॥
मत्तोऽन्यन्नेक्षते किंचिन्मयि सर्वं च वीक्षते ॥८॥
उन सहस्रों यत्नवानोंमें कोई एक मुझको साक्षात् करता
है मुझसे अन्य और किसीको नहीं देखता, और मुझमें सम्पूर्ण
जगत्को देखता है ॥ ८ ॥
क्षितौ सुगन्धरूपेण तेजोरूपेण चाग्निषु ॥
प्रभारूपेण पूष्ण्यब्जे रसरूपेण चाप्सु च ॥९॥
पृथिवीमें सुगन्धरूपसे, अग्निमें तेजोरूपसे, सूर्यमें और चन्द्रमें
प्रभारूपसे, जलमें रसरूपसे मैं स्थित हूं ॥ ९ ॥
धीतपोबलिनां चाहं धीस्तपो बलमेव च ॥
त्रिविधेषु विकारेषु मदुत्पन्नेष्वहं स्थितः ॥१०॥
बुद्धिमान् तपस्वी बलिष्ठोंमें मैं बुद्धि, तप और बलरूपसे
स्थित हूं, तीनप्रकारके विकार मुझसेही उत्पन्न हुए हैं और
उन सबमें मैं स्थित हूं ॥ १० ॥
न मां विन्दति पापीयान्मायामोहितचेतनः ॥
त्रिविकारा मोहयति प्रकृतिर्मे जगत्त्रयम् ११॥
( ७४ ) गणेशगीता-अ० ६.
मायासे मोहित चित्तवाले पापी मुझे नहीं जानते, तीन-
प्रकारके विकार सत् रज तमवाली मेरी प्रकृति त्रिलोकीको
मोहित करती है ॥ ११ ॥
यो मे तत्त्वं विजानाति मोहं त्यजति सोऽखिलम्।
अनेकैर्जन्मभिश्चैवं ज्ञात्वा मां मुच्यते ततः १२
जो मेरे तत्त्वको जानता है, वह सम्पूर्ण मोहको त्याग कर-
ता है, अनेक जन्मोंमें मुझे जानकर प्राणी मुक्त होजाताहै॥१२॥
अन्येनानाविधान्देवान्भजन्ते तान्व्रजन्ति ते ॥
यथायथा मतिं कृत्वा भजते मां जनोऽखिलः१३
जो अनेक प्रकारके देवतोंको भजन करते हैं, वे उन्हीको
प्राप्त होते हैं, सम्पूर्ण मनुष्य जैसी जैसी मति करके मेरा
भजन करते हैं ॥ १३ ॥
तथातथास्य तं भावं पूरयाम्यहमेव तम् ॥
अहं सर्वं विजानामि मां न कश्चिद्विबुद्ध्यते १४
उसी प्रकारसे मैं उनके भाव पूर्ण करताहूं, मैं सबको
जानताहूं और मुझे कोई नहीं जानता ॥ १४ ॥
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं न विदुः काममोहिताः ॥
नाहं प्रकाशतां यामि अज्ञानां पापकर्मणाम् १५
भाषाटीकासमेत । ( ७५ )
मुझ अव्यक्त गुप्त स्वरूपको कामसे मोहित दृष्टिवाले कोई
नहीं जानते हैं, अज्ञानी और पापी पुरुषोंको मैं प्रगट नहीं
होता हूं ॥ १५ ॥
यः स्मृत्वा त्यजति प्राणमन्ते मां श्रद्धयान्वितः॥
स यात्यपुनरावृत्तिं प्रसादान्मम भूभुज ॥ १६ ॥
जो अन्तसमय श्रद्धायुक्त होकर मुझे स्मरणकर अपना
शरीर त्याग करता है, हे राजन् ! वह मेरी कृपासे मुक्त
हो जाता है ॥ १६ ॥
यंयं देवं स्मरन्भक्त्या त्यजति स्वं कलेवरम् ॥
तत्तत्सालोक्यमायाति तत्तद्भक्त्या नराधिप १७
भक्तिपूर्वक जिस जिस देवताको यह प्राणी स्मरण करता
हुआ कलेवरको त्याग करता है, हे राजन् ! उनकी भक्ति
करनेसे उन्हींके लोकको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥
अतश्चाहर्निशं भूप स्मर्तव्योऽनेकरूपवान् ॥
सर्वेषामप्यहं गम्यः स्रोतसामर्णवो यथा ॥१८॥
इस कारण हे राजन् ! रातदिन मेरे अनेक रूप स्मरण ,
करने योग्य हैं, सबको मैं ही प्राप्त होता हूं; जैसे नदियोंका
( ७६ ) गणेशगीता-अ० ६.
जल सागरमें जाता है, ऐसे ही सब देवताओंकी आराधना
मुझमें प्राप्त होती है ॥ १८ ॥
ब्रह्मविष्णुशिवेन्द्राद्याँल्लोकान्प्राप्य पुनः पतेत् ॥
यो मामुपैत्य संदिग्धः पतनं तस्य न क्वचित् १९
ब्रह्मा विष्णु शिव इन्द्रादि लोकोंको प्राप्त होकर यह फिर
फिर संसारमें प्राप्त होता है, जो असंदिग्ध होकर मुझको
प्राप्त होता है उसका फिर जन्म नहीं होता ॥ १९ ॥
अनन्यशरणो यो मां भक्त्या भजति भूमिप ॥
योगक्षेमौ च तस्याहं सर्वदा प्रतिपादये ॥२०॥
हे राजन् ! जो अनन्य शरण होकर भक्तिसे मेरा भजन
करता है, मैं सदा उसके योग क्षेम ( मंगल ) का विधान
करता हूं ॥ २० ॥
विविधा गतिरुद्दिष्टा शुक्ला कृष्णा नृणां नृप ॥
एकया परं ब्रह्म परया याति संसृतिम् ॥२१॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगा-
मृतार्थशास्त्रे श्रीमन्महागणेशपु० उत्तरखण्डे श्रीगजानन-
वरेण्यसंवादे बुद्धियोगो नाम
षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
भाषाटीकासमेत । (७७)
हे राजन् ! मनुष्योंकी कृष्ण और शुक्लपक्षके भेदसे अनेक
गति हैं एकसे प्राणी संसारमें आता है, और दूसरीसे पर-
ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ २१ ॥
ॐ तत्स० श्रीमद्० योगा० श्रीगणेश० पण्डितज्वालाप्रसाद-
मिश्रकृतभाषाटीकायां बुद्धियोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
वरेण्य उवाच ।
का शुक्ला गतिरुद्दिष्टा का च कृष्णा गजानन ॥
किं ब्रह्म संसृतिः का मे वक्तुमर्हस्यनुग्रहात् ॥१॥
वरेण्य बोले हे गजानन ! शुक्ला गति और कृष्णा गति
किसको कहते हैं, ब्रह्म क्या है? और संसृति क्या है,सो आप
मुझसे कृपाकर कहिये ॥ १ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्ला कर्माहिमयनं गतिः ॥
चान्द्रं ज्योतिस्तथा धूमो रात्रिश्च दक्षिणायनम्२
श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! अग्निके अभिमानी देवता
और ज्योतिके अभिमानी देवता, दिवाभिमानी देवता, शुक्ल-
पक्षाभिमानी देवता और अन्तमें उत्तरायणके षण्मासाभिमानी
देवतोंका आश्रय करके जो चलते हैं, वह शुक्लागति कहाती
ह, और धूमाभिमानी देवता, रात्रि अभिमानी देवता, कृष्ण-
( ७८ ) गणेशगीता-अ० ७.
पक्ष अभिमानी देवता, चंद्र और ज्योति अभिमानी देवता,
षण्मासाभिमानी देवताको आश्रय करके जो गमन करते हैं,
वह कृष्णागति कहाती है ॥ २ ॥
कृष्णेते ब्रह्मसंसृत्योरवाप्तेः कारणं गती ॥
दृश्यादृश्यमिदं सर्वं ब्रह्मैवेत्यवधारय ॥ ३ ॥
इन्हीं दोनों गतियोंसे ब्रह्म और संसारकी प्राप्ति होती है, जो
कुछ यह दृश्य और अदृश्य है, तुम इस सबको ब्रह्म जानो ३॥
क्षरं पञ्चात्मकं विद्धि तदन्तरक्षरं स्मृतम् ॥
उभाभ्यां यदतिक्रान्तं शुद्धं विद्धि सनातनम्४॥
पंचमहाभूतोंको क्षर कहते हैं, उसके अनन्तर अक्षर है, इन
दोनोंको अतिक्रमणकर शुद्ध सनातन ब्रह्मको जानो ॥ ४ ॥
अनेकजन्मसंभूतिः संसृतिः परिकीर्तिता ॥
संसृतिं प्राप्नुवन्त्येते ये तु मां गणयन्ति न ॥ ५ ॥
अनेक जन्मोंकी संभूति ( ऐश्वर्य ) को आवागमन कहते हैं
इस संसृतिको वे प्राप्त होते हैं जो मुझे नहीं गिन्ते ॥ ५ ॥
ये मां सम्यगुपासन्ते परं ब्रह्म प्रयान्ति ते ॥
ध्यानाद्यैरुपचारैर्मां तथा पञ्चामृतादिभिः ॥६॥
भाषाटीकासमेत । ( ७९ )
जो मुझे सम्यक् प्रकारसे उपासना करते हैं, वे परब्रह्मको
प्राप्त होते हैं ध्यान पूजन और पंचामृतादि ॥ ६ ॥
स्नानवस्त्राद्यलंकारसुगन्धधूपदीपकैः ॥
नैवेद्यैः फलताम्बूलैर्दक्षिणाभिश्च योऽर्चयेत् ॥७॥
तथा स्नान, वस्त्र, अलंकार, उत्तम प्रकार गंध, धूप, दीप,
नैवेद्य, फल, ताम्बूल, दक्षिणादिसे जो मेरी पूजा करता है ॥७॥
भक्त्यैकचेतसा चैव तस्येष्टं पूरयाम्यहम् ॥
एवं प्रतिदिनं भक्त्या मद्भक्तो मां समर्चयेत् ॥८॥
भक्ति तथा एकचित्तसे जो मेरा भजन करता है मैं उसके
मनोरथ पूरे करता हूं इसप्रकार प्रतिदिन भक्तिसे मेरे भक्त
मेरी पूजा करते हैं ॥ ८ ॥
अथवा मानसी पूजां कुर्वीत स्थिरचेतसा ॥
अथवा फलपत्राद्यैः पुष्पमूलजलादिभिः ॥९॥
अथवा स्थिरचित्तसे मानसी पूजा करै, अथवा फल पत्र
पुष्प मूल जलसे ॥ ९ ॥
पूजयेन्मां प्रयत्नेन तत्तदिष्टं फलं लभेत् ॥
त्रिविधास्वपि पूजासु श्रेयसी मानसी मता १०
( ८० ) गणेशगीता-अ० ७.
जो यत्न करके मेरी पूजा करता है, वह इष्ट फलको प्राप्त
होता है, तीनों प्रकारकी पूजामें मानसी पूजा श्रेष्ठ है ॥१०॥
साप्युत्तमा मता पूजानिच्छया या कृता मम ॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिश्च यः ११
वहभी यदि कामनारहित होकर कीजाय तौ अति उत्तम
है, ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ या संन्यासी ॥ ११ ॥
एकां पूजां प्रकुर्वाणोऽप्यन्यो वा सिद्धिमृच्छति॥
मदन्यदेवं यो भक्त्या द्विषन्मामन्यदेवताम् १२
अथवा और जो कोई एक मेरी पूजाको करता है, वह
सिद्धिको प्राप्त होता है, और मुझे छोडकर और मुझसे द्वेषकर
जो और देवताका भक्तिसे पूजन करता है ॥ १२ ॥
सोऽपि मामेव यजते परं त्वविधितो नृप ॥
यो ह्यन्यदेवतां मां च द्विषन्नन्यां समर्च्चयेत् १३
हे राजन् ! अथवा मेरी पूजा विधिसे न करके और देव-
ताका वा मेरा द्वेष पूजन करके करता है ॥ १३ ॥
याति कल्पसहस्रं स निरयान्दुःखभाक् सदा ॥
भूतशुद्धिं विधायादौ प्राणानां स्थापनं ततः १४
भाषाटीकासमेत। ( ८१ )
वह सहस्र कल्पवर्ष तक नरकमें पडकर सदा दुःख भोगता
है, प्रथम भूतशुद्धि करके फिर प्राणायाम करे ॥ १४ ॥
आकृष्य चेतसो वृत्तिं ततो न्यासमुपक्रमेत् ॥
कृत्वान्तर्मातृकान्यासं बहिश्चाथ षडङ्गम् १५
फिर चित्तकी वृत्तियोंको आकर्षण करके न्यास करे, फिर
मातृका न्यासकरे, फिर बहिरङ्ग षडङ्ग न्यास करे ॥ १५ ॥
न्यासं च मूलमंत्रस्य ततो ध्यात्वा जपेन्मनुम् ॥
स्थिरचित्तो जपेन्मन्त्रं यथा गुरुमुखागतम् १६॥
इसके उपरान्त मूलमंत्रका न्यास करके ध्यान करे और
स्थिरचित्तसे गुरुमुखसे सुने मंत्रका जप करे ॥ १६ ॥
जपं निवेद्य देवाय स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकधा ॥
एवं मां य उपासीत स लभेन्मोक्षमव्ययम्॥१७॥
फिर देवताके निमित्त जपको निवेदन कर अनेक प्रकारसे
स्तोत्रका पाठ करे इस प्रकारसे जो मेरी उपासना करता है
वह सनातनी मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥
य उपासनया हीनो धिङ्नरो व्यर्थजन्मभाक् ॥
यज्ञोऽहमौषधं मन्त्रोऽग्निराज्यं च हविर्हुतम् १८॥
( ८२ ) गणेशगीता-अ० ७.
जो मनुष्य उपासनासे हीन है उसे धिक्कार है और उसका
जन्म वृथा है, यज्ञ, औषध, मंत्र, अग्नि, आज्य, हवि, हुत यह
सब मेरा ही स्वरूप है ॥ १८ ॥
ध्यानं ध्येयं स्तुतिं स्तोत्रं नतिर्भक्तिरुपासना ॥
त्रयीज्ञेयं पवित्रं च पितामहपितामहः ॥ १९ ॥
ध्यान, ध्येय, स्तुति, स्तोत्र, नमस्कार, भक्ति, उपासना,
वेदत्रयीसे जानने योग्य, पवित्र, पितामहके पितामह यह सब
मैं हीहूं ॥ १९ ॥
ॐकार पावनः साक्षी प्रभुर्मित्रं गतिर्लयः ॥
उत्पत्तिः पोषको बीजं शरणं वा स एव च॥२०॥
ॐकार, पावन, साक्षी, प्रभु, मित्र, गति, लय, उत्पत्ति,
पोषक, बीज, शरण ॥ २० ॥
असन्मृत्युः सदमृतमात्मा ब्रह्माहमेव च ॥
दानं होमस्तपो भक्तिर्जपः स्वाध्याय एव च२१॥
इसी प्रकार असत्, सत्, अमृत, आत्मा तथा ब्रह्म यह
सब मैं ही हूं, दान, होम, तप, भक्ति, जप, वेदपाठ ॥२१॥
यद्यत्करोति तत्सर्वं समे मयि निवेदयेत् ॥
योषितोऽथ दुराचाराः पापास्त्रैवर्णिकास्तथा२२
भाषाटीकासमेत । ( ८३ )
यह जो कुछ भी करे सब मुझे निवेदन करदे मेरे आश्रय
करनेवाले स्त्री दुराचारी पापी क्षत्रिय वैश्य शूद्रादि ॥ २२ ॥
मदाश्रया विमुच्यंते किं मद्भक्त्या द्विजातयः ॥
न विनश्यति मद्भक्तो ज्ञात्वेमा मद्दिभूतयः २३॥
यह भी तो मेरा आश्रय करनेसे मुक्त होजाते हैं फिर मेरे
भक्तोंकी तौ बातही क्या है, मेरा भक्त यह मेरी विभूति
जानकर कभी नष्ट नहीं होता है ॥ २३ ॥
प्रभवं मे विभूतीश्च न देवा ऋषयो विदुः ॥
नानाविभूतिभिरहं व्याप्य विश्वं प्रतिष्ठितः २४
मेरे प्रभव ( उत्पत्ति ) और मेरी विभूतियों को देवता और
ऋषिभी नहीं जानते, मैं अनेक विभूतियोंसे विश्वमें व्याप्त
होकर स्थित हूं ॥ २४ ॥
यद्यच्छ्रेष्ठतमं लोके सा विभूतिर्निबोध मे ॥२५॥
ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृ-
तार्थशास्त्रे उत्त० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे उपास-
नायोगोनाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
( ८४ ) गणेशगीता-अ० ८.
जो जो इस लोकमें तेजयुक्त और श्रेष्ठतम हैं वह सब
मेरी विभूति हैं ॥ २५ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेश० योगामृतार्थशास्त्रे गजाननवरेण्य-
संवादे पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायाम्
उपासनायोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
वरेण्य उवाच ।
भगवन्नारदो मह्यं तव नाना विभूतयः ॥
उक्तवांस्ता अहं वेद न सर्वाः सोऽपि वेत्ति ताः १
वरेण्य बोले हे गणेशजी ! नारदजीके मुखसे मैंने तुम्हारी
अनेक विभूति श्रवण की हैं उन्हें मैं जानताहूं, सब नहीं जानता,
कारण कि सम्पूर्ण विभूति तो नारदजी भी नहीं जानते ॥ १॥
त्वमेव तत्त्वतः सर्वा वेत्सि ता द्विरदानन ॥
निजं रूपमिदानीं मे व्यापकं चारु दर्शय ॥ २ ॥
हे गजानन ! आपही उन सबको तत्त्वसे जानते हो, इस समय
मनोहर और व्यापक आप अपना रूप मुझे दिखाइये ॥ २ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
एकस्मिन्मयि पश्य त्वं विश्वमेतच्चराचरम् ॥
नानाश्चर्याणि दिव्यानि पुरा दृष्टानि केनचित् ३