गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 72, कुल 130 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ७१ )
हे राजन् ! ज्ञाननिष्ठासे तपकी निष्ठावालोंसे कर्मनिष्ठासे जो
योगसे मुझमें भक्ति करता है वह श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे
श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे पंडित-
ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां योगावृत्ति-
प्रशंसनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
श्रीगजानन उवाच ॥
ईदृशं विद्धि मे तत्त्वं मद्गतेनान्तरात्मना ॥
यज्ज्ञात्वा मामसंदिग्धं वेत्सि मोक्ष्यसि सर्वगम् १
श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! इस प्रकार मुझमें मन
लगाकर मेरा तत्त्व जानो जिसके जाननेसे मुझे सर्वगत और
यथार्थ जानकर मुक्त हो जाओगे ॥ १ ॥
तत्तेऽहं शृणु वक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ॥
अस्ति ज्ञेयं यतो नान्यन्मुक्तेश्च साधनं नृप॥२॥
हे राजन् ! लोकोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे वह तत्त्व मैं
तुमसे वर्णन करता हूं जिसके जाननेसे दूसरे मुक्तिके साधन
जाननेकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ २ ॥
ज्ञेया मत्प्रकृतिः पूर्वं ततः स्याज्ज्ञानगोचरः ॥
ततो विज्ञानसंपत्तिर्मयि ज्ञाते नृणां भवेत् ॥३॥