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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 130 में से

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पृष्ठ 68

भाषाटीकासमेत । ( ६७ )
ततस्ततः कृषेदेतद्यत्र यत्रानुगच्छति ॥
धृत्यात्मवशगं कुर्याच्चित्तं चञ्चलमाहतः ॥१४॥
जिस जिस स्थानमें मन जाय उस उस स्थानसे उसे
खींचे और धैर्यतासे उसे अपने वश करै, कारण कि वह महा-
चंचल है ॥ १४ ॥
एवं कुर्वन्सदा योगी परां निर्वृतिमृच्छति ॥
विश्वस्मिन्निजमात्मानंविश्वंचस्वात्मनीक्षते १५
योगी सदा इसप्रकार करनेसे परम शांतिको प्राप्त होता
है, जो संसारको अपनी आत्मामें और आत्माको संसारमें
देखते हैं ॥ १५ ॥
योगेन यो मामुपैति तमुपैम्यहमादरात् ॥
मोच्यामि न मुञ्चामि तमहं मां स न त्यजेत् १६
योगसे जो मुझको प्राप्त होता है, उसको मैं आदरसे प्राप्त
होता हूं, और जो मुझको नहीं छोडता है उसको मैं नहीं
छोडताहूं, संसारसे मुक्त कर देता हूं ॥ १६ ॥
सुखे सुखेतरे द्वेषे क्षुधि तोषे समस्तृषि ॥
आत्मसाम्येन भूतानि सर्वगं मां च वेत्ति यः १७॥