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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

भाषाटीकासमेत । (७७)
हे राजन् ! मनुष्योंकी कृष्ण और शुक्लपक्षके भेदसे अनेक
गति हैं एकसे प्राणी संसारमें आता है, और दूसरीसे पर-
ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ २१ ॥
ॐ तत्स० श्रीमद्० योगा० श्रीगणेश० पण्डितज्वालाप्रसाद-
मिश्रकृतभाषाटीकायां बुद्धियोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
वरेण्य उवाच ।
का शुक्ला गतिरुद्दिष्टा का च कृष्णा गजानन ॥
किं ब्रह्म संसृतिः का मे वक्तुमर्हस्यनुग्रहात् ॥१॥
वरेण्य बोले हे गजानन ! शुक्ला गति और कृष्णा गति
किसको कहते हैं, ब्रह्म क्या है? और संसृति क्या है,सो आप
मुझसे कृपाकर कहिये ॥ १ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्ला कर्माहिमयनं गतिः ॥
चान्द्रं ज्योतिस्तथा धूमो रात्रिश्च दक्षिणायनम्२
श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! अग्निके अभिमानी देवता
और ज्योतिके अभिमानी देवता, दिवाभिमानी देवता, शुक्ल-
पक्षाभिमानी देवता और अन्तमें उत्तरायणके षण्मासाभिमानी
देवतोंका आश्रय करके जो चलते हैं, वह शुक्लागति कहाती
ह, और धूमाभिमानी देवता, रात्रि अभिमानी देवता, कृष्ण-