गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 130 में से
संदर्भ में पढ़ें(६८) गणेशगीता-अ० ५.
सुख, दुःख, द्वेष, क्षुधा, शांति, तृपा इनमें जो आत्माके समान
सब प्राणियोंको देखता है, और जो मुझे जानता है ॥ १७ ॥
जीवन्मुक्तः स योगीन्द्रः केवलं मयि संगततः ॥
ब्रह्मादीनां च देवानां स वंद्यः स्याज्जगत्त्रये॥१८॥
ऐसे योगी जो केवल मुझमें संगति करनेवाले हैं, वे
जीवन्मुक्त हैं, वह त्रिलोकीमें ब्रह्मादिक देवताओंसे नमस्कार
करने योग्य हैं ॥ १८ ॥
वरेण्य उवाच ।
द्विविधोऽपि हि योगोऽयमसंभाव्यो हि मे मतः॥
यतोऽन्तःकरणं दुष्टं चञ्चलं दुर्ग्रहं विभो ॥१९॥
वरेण्यने कहा भगवन् ! यह दोनों प्रकारकी योगसिद्धि मैं
महाकठिन देखता हूं कारण कि मन बडा दुष्ट और चंचल है
इसका निग्रह करना कठिन है ॥ १९ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
यो निग्रहं दुर्ग्रहस्य मनसः संप्रकल्पयेत् ॥
घटीयन्त्रसमादस्मान्मुक्तः संसृतिचक्रकात् २०॥
श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! जो निग्रह करनेमें कठिन, इस