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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

( ७४ ) गणेशगीता-अ० ६.
मायासे मोहित चित्तवाले पापी मुझे नहीं जानते, तीन-
प्रकारके विकार सत् रज तमवाली मेरी प्रकृति त्रिलोकीको
मोहित करती है ॥ ११ ॥
यो मे तत्त्वं विजानाति मोहं त्यजति सोऽखिलम्।
अनेकैर्जन्मभिश्चैवं ज्ञात्वा मां मुच्यते ततः १२
जो मेरे तत्त्वको जानता है, वह सम्पूर्ण मोहको त्याग कर-
ता है, अनेक जन्मोंमें मुझे जानकर प्राणी मुक्त होजाताहै॥१२॥
अन्येनानाविधान्देवान्भजन्ते तान्व्रजन्ति ते ॥
यथायथा मतिं कृत्वा भजते मां जनोऽखिलः१३
जो अनेक प्रकारके देवतोंको भजन करते हैं, वे उन्हीको
प्राप्त होते हैं, सम्पूर्ण मनुष्य जैसी जैसी मति करके मेरा
भजन करते हैं ॥ १३ ॥
तथातथास्य तं भावं पूरयाम्यहमेव तम् ॥
अहं सर्वं विजानामि मां न कश्चिद्विबुद्ध्यते १४
उसी प्रकारसे मैं उनके भाव पूर्ण करताहूं, मैं सबको
जानताहूं और मुझे कोई नहीं जानता ॥ १४ ॥
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं न विदुः काममोहिताः ॥
नाहं प्रकाशतां यामि अज्ञानां पापकर्मणाम् १५