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गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 130 में से

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पृष्ठ 66

भाषाटीकासमेत । ( ६५ )
ततः श्रान्तो व्याकुलो वा क्षुधितो व्यग्रचित्तकः ।
कालेऽतिशीतेऽत्युष्णे वानिलाग्न्यम्बुसमाकुले ७
तप्त हो, श्रान्त हो, व्याकुल, क्षुधित, व्यग्रचित्त, अति-
शीतकाल वा अति उष्णकाल,अग्नि वायु और जलकी अधि-
काईवाला देश ॥ ७ ॥
सध्वनावतिजीर्णे गोः स्थाने साग्नौ जलान्तिके ॥
कूपकूले श्मशाने च नद्यां भित्तौ च मर्मरे ॥८॥
जिस स्थानमें ध्वनि, वा कलकलशब्द अधिक हो, गोठ,
अग्निके निकट, जलके निकट, कूपके निकट, श्मशान, नदी,
भीतिके निकट तथा जहां शुष्क पर्णका शब्द सुन पडता है,
अतिजीर्ण स्थान ॥ ८ ॥
चैत्ये सवल्मिके देशे पिशाचादिसमावृते ॥
नाभ्यसेद्योगविद्योगं योगध्यानपरायणः ॥ ९ ॥
चैत्य (बडी बाडियोंमें) वल्मीक (बांबई) तथा पिशाचादि-
युक्त स्थानमें योगाभ्यास करनेवाला योगी योगाभ्यास न
करै ॥ ९ ॥
स्मृतिलोपश्च मूकत्वं बाधिर्यं मन्दता ज्वरः ॥
जडता जायते सद्यो दोषाज्ञानाद्धि योगिनः १०
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